सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक हर्ष मंदर के लेखों की यह एक नई श्रृंखला है, जिसमें वे आतंकवाद, हेट क्राइम और मौत की सज़ा से जुड़े मामलों में भारतीय न्याय व्यवस्था के रवैये की पड़ताल कर रहे हैं. पढ़िए श्रृंखला का पहला भाग.
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मेरी नज़र में, भारतीय गणतंत्र में आपराधिक न्याय व्यवस्था का सबसे बड़ा अपमान यह है कि नफ़रत से प्रेरित अपराधों (हेट क्राइम्स) से निपटने के लिए न्यायिक विवेक का इस्तेमाल चुनिंदा तरीक़े से किया जाता है. जब मुस्लिम पहचान वाले लोग नफ़रत से प्रेरित हत्याओं को अंजाम देते हैं, तो भारतीय अदालतें अक्सर ऐसे मामलों को ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ (रेयरेस्ट ऑफ द रेयर) अपराध मानकर फांसी की सज़ा सुना देती हैं. उन्हें मौत की सज़ा तब भी दी जाती है जब यह साफ़ हो कि सज़ा पाने वाला व्यक्ति उस आतंकी साज़िश का मुख्य साज़िशकर्ता – या पुलिस की भाषा में कहें तो ‘मास्टरमाइंड’ – नहीं था.
मैं किसी भी अपराध के लिए मौत की सज़ा दिए जाने का कड़ा विरोध करता हूं, चाहे वह बम धमाका द्वारा या सांप्रदायिक हिंसा में बड़े पैमाने पर लोगों की हत्या हो या फिर लिंचिंग (भीड़ द्वारा हत्या) में किसी की जान लेना हो. हालांकि, मेरी चिंता इस बात को लेकर है कि मौत की सज़ा देने के उस स्वीकृत सिद्धांत को खुलेआम पक्षपातपूर्ण तरीक़े से लागू किया जाता है, जिसके अनुसार यह सज़ा केवल ऐसे जघन्य अपराधों के लिए दी जानी चाहिए जो ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ हों और जिनमें दोषी के सुधरने या ख़ुद को बदलने की कोई गुंजाइश न हो.
भारत की आज़ादी के बाद से अब तक, नफ़रत के कारण हुई हत्याओं – या जिन्हें हम आतंकी अपराध कह सकते हैं – के लिए हिंदू पहचान वाले सिर्फ़ दो लोगों को ही फांसी क्यों दी गई? ये दो लोग नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे थे, जिन्हें नवंबर 1949 में राष्ट्रपिता की हत्या के लिए फांसी दी गई थी? (वैसे, गांधीजी के बेटों मणिलाल और रामदास ने अपील की थी कि उनकी सज़ा को उम्रक़ैद में बदल दिया जाए, क्योंकि उनका मानना था कि उनके पिता होते तो ऐसा ही चाहते). इन दोनों लोगों के शवों का अंतिम संस्कार अंबाला जेल के अंदर ही किया गया, जहां उन्हें फांसी दी गई थी, और उनकी राख चुपचाप घग्गर नदी में बहा दी गई.
इससे कुछ और सवाल भी उठते हैं. सबसे पहले तो यह कि नफ़रत के कारण होने वाली ऐसी हत्याओं को शायद ही कभी आतंकी अपराध माना जाता है, जिनमें पीड़ित मुस्लिम (या ईसाई) होते हैं और हमलावर हिंदू पहचान वाले होते हैं? यहां तक कि जब बड़े पैमाने पर नफ़रत के कारण हुई हत्याओं में दर्जनों, सैकड़ों या हज़ारों लोगों की जान चली जाती है, तब भी पुलिस, अदालतें और मीडिया अक्सर इसे सांप्रदायिक या बदले की भावना से की गई हिंसा ही बताती हैं?
इसके पीछे अक्सर यह सोच होती है कि ये घटनाएं बहुसंख्यक हिंदू समुदाय के उस ग़ुस्से और तकलीफ़ का नतीजा थीं, जो अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों द्वारा किए गए असली या काल्पनिक अपराधों की वजह से पैदा हुई थीं. जैसे, फ़रवरी 2002 में गुजरात में, मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गोधरा में ट्रेन के डिब्बे को जलाने की घटना – जिसमें हिंदू पहचान वाले 59 यात्रियों की मौत हो गई थी – को तुरंत ही पश्चिमी सीमा पर मौजूद हमारे पड़ोसी देश के समर्थन वाले अज्ञात आतंकी संगठनों की सोची-समझी आतंकी कार्रवाई क़रार दिया था. इसके बाद जो नरसंहार हुआ, जिसमें 1000 से 2000 लोगों की जान गई, उसे आतंकी कार्रवाई नहीं कहा गया.
इसके बजाय, मोदी ने कहा कि हर क्रिया के समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है. जो लोग बड़े पैमाने पर नफ़रत के कारण होने वाली इन हत्याओं की योजना बनाते हैं और उन्हें अंजाम देते हैं, उन्हें कभी फांसी नहीं दी गई, बहुत कम मामलों में ही उन्हें सज़ा मिल पाती है. जब दलितों को निशाना बनाया जाता है, तो इसे दलितों पर अत्याचार कहा जाता है.
तो फिर, हेट क्राइम करने वालों की पहचान के आधार पर हम अलग-अलग भाषा का इस्तेमाल क्यों करते हैं?
जब हेट क्राइम के आरोपी मुस्लिम होते हैं, तो हम उन्हें आतंकवादी कहते हैं. जब हेट किलिंग के आरोपी हिंदू होते हैं, तो हम उन्हें पहरेदार, गौरक्षक, कभी-कभी राम भक्त, या ज़्यादा से ज़्यादा दंगाई कहते हैं.
उन पांच आदमियों के बारे में सोचिए जिन्होंने दिल्ली-आगरा हाईवे पर 30 किलोमीटर तक एक कार का पीछा किया, और फिर 12वीं क्लास के स्टूडेंट आर्यन मिश्रा को गोली मार दी. न्यूज़ रिपोर्ट्स में उन पांच आदमियों को गौरक्षक बताया गया जिन्होंने मिश्रा को (मुस्लिम) गाय तस्कर समझ लिया था. सोचिए अगर वे पांच आदमी मुस्लिम होते, तो क्या उन्हें नरमी से रक्षक कहा जाता? (इत्तेफ़ाक़ से, जब शूटरों में से एक मिश्रा के पिता से मिला, तो उसने हाथ जोड़कर माफ़ी मांगी, उन्हें याद दिलाया कि वे दोनों ब्राह्मण हैं और उनके बेटे की हत्या के लिए सफ़ाई देते हुए कहा कि उसने ग़लती से उसे गोली मार दी क्योंकि उसने उसे मुसलमान समझ लिया था. पिता ने जवाब दिया, ‘चाहे हिंदू हों या मुसलमान, सब बराबर हैं. क्या मुसलमान इंसान नहीं हैं?’)
जुलाई 2023 में रेलवे प्रोटेक्शन फ़ोर्स के एक हिंदू कॉन्स्टेबल ने ट्रेन में पहले अपने सुपरवाइज़र और फिर तीन कथित मुस्लिम यात्रियों की हत्या कर दी. उसका नाम चेतन कुमार था. रेलवे अधिकारियों और उसके परिवार ने चेतन को तुरंत ‘मानसिक रूप से बीमार’ बता दिया. पुलिस ने उस पर हत्या और समुदायों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने का आरोप लगाया. प्रधानमंत्री और किसी भी बड़े सरकारी अधिकारी ने इस अपराध के लिए अफ़सोस या दुख नहीं जताया.
सोचिए अगर वह एक मुस्लिम कॉन्स्टेबल होता, जिसने कथित हिंदू यात्रियों को मार डाला होता. इस प्रकार की हत्या को तुरंत आतंकी कार्रवाई माना जाता, मीडिया और सोशल मीडिया पर हंगामा मच जाता, और इस बात की पूरी संभावना थी कि प्रधानमंत्री इस आतंकी कार्रवाई की निंदा करते, और शायद बॉर्डर पार से ऑपरेट कर रहे किसी आतंकवादी संगठन को दोषी ठहराते.
ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियां (रोकथाम) संशोधन अधिनियम, 2019 (यूएपीए) सरकार को किसी व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करने के लिए ऐसी शक्तियां देता है जिन्हें द हिंदू (अंग्रेजी अखबार) ने सही ही ‘अपनी मर्ज़ी से, बिना किसी रोक-टोक के इस्तेमाल की जाने वाली असीम शक्ति’ कहा है. यह देखना दिलचस्प है कि 2014 से इस शक्ति का इस्तेमाल कैसे किया गया है.
अगर हम गृह मंत्रालय द्वारा यूएपीए के तहत आतंकवादी घोषित किए गए लोगों की सार्वजनिक सूची को देखें, तो इसमें सांप्रदायिक झुकाव साफ़ तौर से नज़र आता है. आधिकारिक तौर पर आतंकवादी घोषित किए गए 57 लोगों में से 44 मुस्लिम पुरुष हैं और बाक़ी 13 सिख पुरुष हैं. उनमें से एक भी हिंदू नहीं है.
यूएपीए की पहली अनुसूची में आतंकवादी संगठनों की सूची दी गई है. यह ध्यान देने वाली बात है कि यहां सूचीबद्ध लगभग आधे संगठन इस्लामी हैं, 12 पूर्वोत्तर भारत के उग्रवादी समूह हैं, 5 खालिस्तानी समूह हैं, 3 तमिल उग्रवादी समूह हैं और 2 माओवादी समूह हैं. फिर से, हिंदुत्ववादी संगठन इसमें साफ़ तौर पर नदारद हैं.
जनता और न्यायपालिका की सोच में इस प्रकार के स्पष्ट विभेदकारी नज़रिए के पीछे जो धारणा काम कर रही है, वह स्पष्ट है, नुक़सानदेह है, ग़लत है और इस्लाम का अपमान करने वाली है. वह धारणा यह है कि हिंदुत्ववादी आतंकवाद असंभव है क्योंकि हिंदू धर्म और उसे मानने वाले लोग पूरी तरह से शांतिप्रिय और अहिंसक होते हैं, जबकि इस्लाम धर्म हिंसा का समर्थन करता है. गृह मंत्री अमित शाह ने तो यहां तक कह दिया, ‘मुझे यह कहते हुए गर्व है कि कोई भी हिंदू आतंकवादी नहीं हो सकता.’
मगर उदाहरण के लिए वे यह नहीं बताते कि नाथूराम गोडसे के बारे में क्या कहा जाए, जिसने महात्मा गांधी की हत्या की थी? या 22 वर्षीय कलाईवली राजरत्नम, जिन्हें आमतौर पर धनु के नाम से जाना जाता है, के लिए हम क्या कह सकते हैं जिसने आत्मघाती हमले में राजीव गांधी की हत्या की थी? या फिर 1983 में नेल्ली, 1984 में दिल्ली, 1989 में भागलपुर, 1992-93 में मुंबई और 2002 में गुजरात में बड़े पैमाने पर हत्याएं करने वालों को हम क्या कहेंगे?
तीन फांसी की कहानी
साल 2000 के बाद भारत में सात लोगों को फांसी दी गई है, जिनमें से तीन मामले आतंकवाद संबंधी अपराधों से जुड़े थे.
इनमें सबसे पहला मामला अजमल कसाब का था. कसाब उन दस पाकिस्तानी आतंकवादियों में से अकेला जीवित बचा था जिन्होंने 26 नवंबर, 2008 को 160 से ज़्यादा लोगों की हत्या करके दहशत फैला दी थी. इससे पहले फांसी देने का सिलसिला काफ़ी समय से रुका हुआ था, क्योंकि लगातार कई राष्ट्रपतियों ने अपनी मेज़ पर पड़ी दया याचिकाओं को ख़ारिज नहीं किया था. कसाब को फांसी (21 नवंबर 2012) दिए जाने से पहले के 15 सालों में सिर्फ़ एक व्यक्ति को फांसी दी गई थी. साल 2004 में धनंजय चटर्जी को फांसी दी गई थी. वह एक पूर्व सुरक्षा गार्ड था, जिसे 14 साल की स्कूली छात्रा के बलात्कार और हत्या के लिए यह सज़ा दी गई थी.
कसाब को फांसी दिए जाने के कुछ ही महीनों बाद मोहम्मद अफ़ज़ल गुरु (जिसे 2001 में संसद पर हमले के लिए 2013 में फांसी दी गई) और याक़ूब अब्दुल रज़्ज़ाक मेमन (जिसे 1993 में मुंबई बम धमाकों के लिए 2015 में फांसी दी गई) को फांसी दी गई. इनके अलावा, जिन लोगों ने 2012 में ‘निर्भया’ के साथ सामूहिक बलात्कार और उसकी हत्या की, उन्हें भी फांसी के फंदे तक पहुंचाया गया. जिन लोगों को फांसी नहीं दी गई, उनमें वे लोग शामिल थे जिन्हें पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 1991 में हुई हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था.
मैं आतंकवाद से जुड़े अपराधों के लिए फांसी की सज़ा पाने वाले उन तीन लोगों के मामले पर फिर से ग़ौर करूंगा. मैं यह सवाल उठाऊंगा कि क्या वे वाक़ई ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ अपराधों की उस बहुत ऊंची श्रेणी में आते थे, जिनमें सुधरने या प्रायश्चित करने की कोई गुंजाइश नहीं होती.
अजमल कसाब
2000 के दशक में भारत में आतंकी अपराधों के लिए पहली आधिकारिक फांसी अजमल कसाब को दी गई थी. उसे 21 नवंबर, 2012 को पुणे की यरवदा जेल में फांसी दी गई. यह फांसी गुपचुप तरीक़े से दी गई थी. फांसी के कुछ घंटों बाद जब मीडिया को इसकी जानकारी दी गई, तो भारतीय अधिकारियों ने पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय को पत्र लिखकर कहा कि वे कसाब के परिवार को उसकी फांसी के बारे में सूचित करें. उन्होंने बताया कि चूंकि कसाब का शव लेने के लिए कोई आगे नहीं आया, इसलिए सरकार ने उसे पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल में ही दफ़ना दिया.
नवंबर 2008 में मुंबई में हुए आतंकी हमलों में मोहम्मद अजमल आमिर कसाब की भूमिका को लेकर कोई शक की गुंजाइश नहीं है. काली टी-शर्ट पहने और ऑटोमैटिक हथियार से गोली चलाते हुए उसकी तस्वीर दुनिया भर के टेलीविज़न स्क्रीन पर दिखाई दी थी. वह उन दस नौजवानों में से एक था जो पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े थे. उन्होंने भारत की एक मछली पकड़ने वाली नाव को हाईजैक किया, उसके कप्तान को मार डाला, रबर की नाव से मुंबई पहुंचे और फिर 60 घंटों के दौरान 160 से ज़्यादा लोगों की हत्या कर दी.
उनके हमले का निशाना तीन लग्ज़री होटल, एक रेलवे स्टेशन, एक टूरिस्ट रेस्टोरेंट और एक यहूदी केंद्र थे. पाकिस्तान में बैठे उनके हैंडलर फ़ोन से उन्हें निर्देश दे रहे थे और वे उसी हिसाब से कार्रवाई कर रहे थे. आतंकी हमले को नाकाम करते हुए भारतीय सुरक्षा बलों ने बाक़ी नौ लोगों को मार गिराया. उनमें से कसाब ही अकेला ज़िंदा बचा था.
जज एमएल तहिलियानी ने कहा, ‘उसे तब तक फांसी पर लटकाया जाए जब तक उसकी मौत न हो जाए. भारत के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने, हत्या और आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने की वजह से मुझे ऐसा कोई आधार नहीं दिखता कि मौत की सज़ा से कम सज़ा दी जाए.’ उन्होंने कसाब का बचाव करने वाले वकील की इन दलीलों को ख़ारिज कर दिया कि उसने यह अपराध लश्कर-ए-तैयबा के दबाव और ज़ोर-ज़बरदस्ती के कारण किया था.
उन्होंने कहा कि कसाब अपनी मर्ज़ी से इस समूह में शामिल हुआ था और उसने एक लड़ाके के तौर पर ट्रेनिंग ली थी. उन्होंने कहा, ‘ऐसे व्यक्ति को ख़ुद को सुधारने का मौक़ा नहीं दिया जा सकता.’

फिर भी, इस ख़ूनी खेल में निर्विवाद रूप से दोषी पाए जाने के बावजूद मानवाधिकार कार्यकर्ता अभी भी सवाल उठाते हैं कि क्या उसे मौत की सज़ा मिलनी चाहिए थी. इसके लिए ज़रूरी है कि अपराध ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ की श्रेणी का हो, जिसमें अपराधी को कोई पछतावा न हो और सुधार की कोई गुंजाइश न दिखे.
सबसे पहले, उसकी उम्र को लेकर संदेह जताया गया कि क्या बड़े पैमाने पर आतंकवादी हत्याओं का अपराध करते समय वह नाबालिग़ था. विशेषज्ञों की एक टीम ने उसकी उम्र लगभग 21 साल आंकी. लेकिन अदालत ने कसाब के वकील को रिपोर्ट की कॉपी देने से इनकार कर दिया, वह शायद दूसरे विशेषज्ञों से इस बारे में कोई राय ले सकता था या इसे चुनौती देने के लिए अपील कर सकता था. जैसा कि फ़्रंटलाइन ने रेखांकित किया कि, ‘न्याय का एक स्थापित सिद्धांत है कि अगर आरोपी के नाबालिग़ होने की ज़रा भी संभावना हो, तो उसे मौत की सज़ा नहीं दी जानी चाहिए.’
अपनी अपील के दौरान कसाब ने तर्क दिया कि उसे सही क़ानूनी मदद नहीं मिली और उस पर लगे कुछ आरोप ऐसे थे जो भले ही साबित हो गए हों मगर उसमें शक की गुंजाइश थी. जनवरी में जब उसकी अपील की सुनवाई शुरू हुई, तो कसाब ने एक बयान में कहा, ‘मुझे निष्पक्ष सुनवाई का मौक़ा नहीं दिया गया. हो सकता है कि मैं लोगों की हत्या करने और आतंकवादी घटना को अंजाम देने का दोषी समझा जाऊं, लेकिन मैं राज्य के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने का दोषी नहीं हूं.’
मुक़दमे के बीच में जब उसके वकील काज़मी ने लगभग 250 गवाहों से पूछताछ कर ली, तो निचली अदालत ने काज़मी को ‘हटाने’ का बहुत ही असामान्य क़दम उठाया. कोर्ट का कहना था कि वे सहयोग नहीं कर रहे थे. जाने-माने क़ानूनी विशेषज्ञ फ़ली एस. नरीमन ने मुंबई मिरर में प्रकाशित एक लेख में कहा कि काज़मी को हटाने से मुक़दमा निष्पक्ष नहीं रहा. उन्होंने कहा कि सिर्फ़ सहयोग न करना वकील को हटाने का पर्याप्त आधार नहीं है, ख़ासकर तब जब आरोपी को उन पर भरोसा हो. उन्होंने लिखा कि इससे मामले का अंतिम फ़ैसला प्रभावित हो सकता है. उन्होंने कहा कि काज़मी को हटाना उन्हें न्यायसंगत नहीं लगा.
उच्च न्यायालय में कसाब का बचाव करने के लिए दो वरिष्ठ आपराधिक वकीलों, अमीन सोलकर और फ़रहाना शाह, को नियुक्त किया गया. उन्होंने पुलिस की मौजूदगी के बिना- जहां पुलिस इतनी दूरी पर रहे कि उनकी बातचीत न सुन सके- कसाब से मिलने की अनुमति मांगी. हालांकि, कोर्ट ने इस आधार पर अनुमति देने से इनकार कर दिया कि कसाब वकीलों को नुक़सान पहुंचा सकता है!
कोर्ट ने कसाब का मनोवैज्ञानिक परीक्षण कराने की इजाज़त भी नहीं दी. वकील ऐसा इसलिए नहीं करवाना चाहते थे कि कसाब को मानसिक रूप से बीमार साबित किया जा सके, बल्कि वे बचाव के लिए कुछ ज़रूरी बातें रिकॉर्ड पर लाना चाहते थे. लेकिन, इसकी भी इजाज़त नहीं मिली.
उच्चतम न्यायालय ने कसाब के इस बयान का हवाला दिया कि वह शहीद बनना चाहता था. कोर्ट ने इसे इस बात का सबूत माना कि उसे अपने किए पर कोई पछतावा नहीं था और इसलिए उसे सुधारा नहीं जा सकता. आतंकवाद के मामलों में मौत की सज़ा न देने के पक्ष में एक अहम तर्क यह है कि आतंकवादी शहादत पाने और भविष्य में दूसरों को भी अपने मक़सद के लिए शहीद बनने के लिए प्रेरित करने के इरादे से ही भयानक अपराध करता है. इसलिए, आतंकवाद और युद्ध छेड़ने के आरोपी और दोषी व्यक्ति को मौत की सज़ा देने से मौत की सज़ा का असल मक़सद ही ख़त्म हो जाता है, जो कि ऐसे अपराधों को रोकना है.
कसाब को फांसी दिए जाने के बाद केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा, ‘आतंकवादियों के ख़िलाफ़ लड़ाई में अपनी जान गंवाने वाले सभी पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों को आज न्याय मिल गया है.’
कोर्ट के बाहर सरकारी वकील उज्ज्वल निकम (जिन्हें बाद में राष्ट्रपति ने राज्यसभा के लिए नॉमिनेट किया) ने एक पोस्टर दिखाया जिसमें कसाब को फांसी के फंदे के पीछे दिखाया गया था और पत्रकारों के सामने यह बताने की कोशिश की कि उनकी जीत हुई. उन्होंने कहा, ‘आज की सज़ा यह संदेश देती है कि कसाब को ज़िंदा रखना अपने आप में एक अपराध होता. आतंकवाद और कसाब जैसे आतंकवादियों को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. मौत की सज़ा ही एकमात्र विकल्प है.’
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इससे असहमति जताई. उसने कहा, ‘हम उन अपराधों की गंभीरता को समझते हैं जिनके लिए अजमल कसाब को दोषी ठहराया गया था, और इन घटनाओं के पीड़ितों और उनके परिवारों के प्रति सहानुभूति रखते हैं, लेकिन मौत की सज़ा सज़ा का सबसे क्रूर और अमानवीय रूप है.’ एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा कि मौत की सज़ा के इस्तेमाल से जुड़े अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन किया गया, पाकिस्तान में अजमल कसाब के वकील और परिवार को इसकी सूचना नहीं दी गई थी कि उसे फांसी दी जाने वाली है.
जब राष्ट्रपति ने कसाब की दया याचिका पर विचार करके उसे ख़ारिज कर दिया और उसकी फांसी का रास्ता साफ़ हो गया, उस समय राष्ट्रपति के पास कई पुरानी दया याचिकाएं पहले से ही विचार के लिए लंबित थीं. फ़्रंटलाइन सवाल उठाता है कि क्या संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए मौत की सज़ा को कम करने के बजाय, राज्य ने बदले की भावना से कसाब की दया याचिका को ख़ारिज करने की प्रक्रिया को तेज़ कर दिया.
क़ानूनी मामलों की जानकार उषा रामनाथन का कहना है कि राज्य को अनुच्छेद 72 का इस्तेमाल बदले की भावना के चक्र को जारी रखने के बजाय उसे तोड़ने के लिए करना चाहिए.
(हर्ष मंदर सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक हैं.)
(मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की ‘कोलिका’ नामक संस्था से जुड़े हैं.)
