नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग (पीएमएलए) से संबंधित मामले को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर नागरिक को निष्पक्ष सुनवाई का मौलिक अधिकार प्राप्त है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. अदालत ने कहा कि ऐसे किसी भी मामले का संज्ञान (Cognizance) लेने से पहले अदालत के लिए आरोपी का पक्ष सुनना अनिवार्य है.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एनके सिंह की बेंच ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की उस दलील को भी खारिज कर दिया, जिसमें ईडी ने पहले कहा था कि पीएमएलए एक स्वतंत्र कानून है और इसलिए इसके तहत होने वाली कार्यवाही पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएनएस) के प्रावधान लागू नहीं होते हैं.
इस संबंध में अदालत ने कहा, ‘हालांकि बीएनएसएस का चैप्टर XVI मजिस्ट्रेट के सामने की गई शिकायतों से जुड़े प्रक्रियात्मक कानून को बताता है, लेकिन हमारा मानना है कि ऊपर बताया गया प्रावधान मूल प्रकृति का है, क्योंकि यह सिर्फ़ यह तय नहीं करता कि कार्यवाही किस तरह से की जाएगी, बल्कि यह आरोपी को यह अधिकार भी देता है कि संज्ञान लेने से पहले उसकी बात सुनी जाए. यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत आरोपी को मिले निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का एक हिस्सा है.’
सुनवाई के दौरान जब अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने यह दलील दी कि एक विशेष पीएमएलए अदालत को बीएनएसएस के तहत तय की गई सामान्य आपराधिक प्रक्रिया का पालन करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, तो इस पर अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई देने वाले किसी भी कानून की अनदेखी नहीं की जा सकती.
अदालत ने कहा, ‘सीआरपीसी की धारा 200 से 205 (अब बीएनएसएस की धारा 223 से 228) के तहत शिकायत से जुड़े प्रावधानों को पीएमएलए के तहत होने वाली कार्यवाही पर लागू न करना—खासकर उन प्रावधानों को जिनका आरोपी के अधिकारों के साथ-साथ अदालत की शक्तियों पर भी गंभीर असर पड़ता है—इसके बेहद बुरे परिणाम हो सकते हैं.’
इसके साथ ही पीठ ने पीएमएलए अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी को सुने बिना ही अपराध का संज्ञान ले लिया गया था. शीर्ष अदालत ने पीएमएलए अदालत को निर्देश दिया कि वह आरोपी को सुनवाई का मौका दे.
पीठ ने अपने फैसले में कहा कि निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर नागरिक का मौलिक अधिकार है. यदि कोई कोर्ट आरोपी को बिना सुने किसी मामले का संज्ञान लेती है, तो वह कानूनी प्रक्रिया शुरुआत से ही अमान्य (शून्य) मानी जाएगी.
गौरतलब है कि ईडी की कार्रवाई और गिरफ्तारियों पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं. इस केंद्रीय एजेंसी पर सरकार द्वारा विपक्ष के नेताओं के खिलाफ हथियार के तौर पर भी इस्तेमाल करने के आरोप लगते रहे हैं. ऐसे में अदालत के उस फैसले को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
