बंगनामा: ऐतिहासिक राइटर्स बिल्डिंग में बंगाल का भविष्य

1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद राइटर्स बिल्डिंग पश्चिम बंगाल सरकार का सचिवालय बन गया. यह परिवर्तन उल्लेखनीय था क्योंकि वही भवन, जो कभी अंग्रेज़ अधिकारियों का मुख्यालय था, अब पश्चिम बंगाल के मंत्रियों और ‘नौकरशाहों’ का कार्यालय बन गया. इन दिनों राइटर्स फिर चर्चा में है क्योंकि पश्चिम बंगाल में बनी भाजपा की नई सरकार ने एक बार फिर इसी भवन को अपना महाकरण (मुख्य सचिवालय) बनाने का निर्णय लिया है.

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(फोटो साभार: विकिपीडिया)

चाफ़ी खाबे (चाफ़ी पियोगे)?’ अवर सचिव की कुर्सी पर आसीन मेरे बैचमेट ने पूछा. ‘चाफ़ी माने (चाफ़ी का मतलब)?’ मैंने पलटकर जानना चाहा. ‘केनो जे आमी आज परजंतो बूझते पारी नी एटा चा ना कॉफ़ी. एइ जोन्नो चाफ़ी (क्योंकि मैं आज तक समझ नहीं पाया हूं कि यह चाय है या कॉफ़ी. इसलिए चाफ़ी).’

मैं भी नहीं समझ पाया, न तो 34 वर्ष पूर्व मई महीने की उस सुबह और न ही उसके बाद फिर कभी. यह राइटर्स बिल्डिंग की, जिसे आम रूप से सिर्फ़ राइटर्स के नाम से जाना जाता है, मेरी सबसे पुरानी यादों में से एक है.

1992 मई में अचानक ही मेरा तबादला बंगाल की खाड़ी पर स्थित कॉनटाई सबडिवीज़न से असम की सीमा पर अवस्थित अलीपुरद्वार सबडिवीज़न हो गया था परंतु अलीपुरद्वार में पदस्थ सबडिवीज़नल अफसर का स्थानांतरण न होने के कारण सरकार बहादुर ने मुझे त्रिशंकु की तरह आसमान तथा पृथ्वी के बीचोंबीच ‘कंपलसरी वेटिंग’, या अनिवार्य प्रतीक्षा, में लटका दिया तथा और मुझे कलकत्ता की राइटर्स बिल्डिंग में कार्मिक विभाग में प्रस्तुत होने का आदेश दिया.

चूंकि कंपल्सरी वेटिंग के दिनों अपेक्षा करना ही मेरा काम था और चूंकि अपेक्षा किसी भी स्थिति में की जा सकती है, मैंने नए आदेश के इंतज़ार में कई दिन राइटर्स बिल्डिंग का परिदर्शन करते हुए बिताया. इससे पूर्व मैं दो-तीन बार ही राइटर्स आया था लेकिन मेरी पहुंच भवन के सामने के मुख्य खंड के प्रथम तले पर अपर सचिव के कमरे तक ही थी.

इस तले पर मुख्यमंत्री और चुनिंदा विभागों के मंत्रियों तथा मुख्य सचिव के साथ इने-गिने वरिष्ठ सचिवों के दफ़्तर थे जो 120 मीटर लंबे और छह मीटर चौड़े बरामदे पर खुलते थे. चूंकि राइटर्स के सामने का यह हिस्सा, विशेषतः प्रथम तल, वीआइपी खंड था इसका रखरखाव उच्च स्तर का तो था ही यह अंश भीड़ मुक्त भी था. यहां प्रवेश नियंत्रित था और इसके तीन प्रवेश द्वारों पर पुलिस तैनात रहती थी. लेकिन बाक़ी खंडों, नए-पुराने दोनों, का चित्र कुछ भिन्न था.

अंदर के बाक़ी 12 खंडों में अधिकारियों के लिए छोटे कमरे तथा कर्मचारियों के लिए बड़े हॉल थे जिनमें क़तारों से मेज़ और कुर्सियां लगी थीं. सुबह, दोपहर या शाम- आप किसी वक्त भी चले जाएं कोई ऐसी मेज़ नहीं दिखती थी जो फ़ाइलों के बोझ से लड़खड़ा न रही हो.

राइटर्स में कर्मचारियों का व्यवहार तथा रवैया वैसा ही था जैसा आपको अधिकतर राज्यों के सचिवालयों में दिखता होगा. यहां भी दफ़्तर आने की नहीं दफ़्तर से जाने की जल्दी रहती थी, इसलिए दफ्तर का आधिकारिक समय 10 बजे से 5.30 तक होने के बावजूद यहां कोई काम करवाना हो तो 11 बजे ‘सुबह’ से 4 बजे का समय सबसे शुभ माना जाता था.

इस दौरान भी मैंने किसी भी हॉल में कभी भी सौ क्या अस्सी फीसदी कुर्सियों को भी भरा हुआ नहीं पाया. इन कमरों में घुसते ही आभास हो जाता था कि समय के ठहर जाने का तात्पर्य क्या है. फिर भी यहां दो शिकवे बारंबार सुनाई देते थे: ‘काजेर चाप एतो बेशी… (काम का इतना बोझ है कि…)’ एवं ‘आर पारा जाच्चे ना… (अब और बर्दाश्त नहीं हो रहा…).’

राइटर्स के कमरों में भले ही समय ठहरा हुआ प्रतीत होता था मगर बाहर हर तले के गलियारों में हमेशा चहल पहल रहती थी और यह केवल सरकारी कर्मचारियों के आने-जाने से नहीं थी. गलियारों में क्लांत कर्मचारियों की ऊर्जा पुनः पूर्ति की पर्याप्त व्यवस्था थी-  इनके किनारों से छोटी-छोटी चाय की दुकानें निःशब्द पुकारते रहती थीं. वहां चाफ़ी के अलावा लाल और नींबू चाय का सेवन भी किया जा सकता था और साथ में कई तरह के रंग-बिरंगे केक, बिस्कुट, नमकीन इत्यादि का भी.

अगर अल्प आहार से आपका काम न चलता हो तो नीचे तले पर बनी तीन कैंटीन भी थीं जहां आप शरण ले सकते थे. चाय, गप्प और ठहाकों के अलावा आए दिन मध्याह्न भोजन के समय ये गलियारे ‘चोलबे ना, चोलबे ना … (नहीं चलेगी, नहीं चलेगी…)’ या ‘दीते होबे, दीते होबे … (देना पड़ेगा, देना पड़ेगा …)’ जैसे इंकलाबी नारों से गूंजने लगते थे.

2013 में इस भवन के निर्माण के 236 वर्ष के लंबे काल में पहली बार राइटर्स के सितारे गर्दिश में चले गए. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सत्ता में आने के दो वर्षों बाद यह निर्णय लिया कि ऐतिहासिक राइटर्स बिल्डिंग को मरम्मत तथा नवीकरण की आवश्यकता है. और चंद सप्ताह बाद ही चट मंगनी पट ब्याह वाले अंदाज़ में उन्होंने अपना महाकरण (मुख्य सचिवालय) राइटर्स से हटाकर इसे हुगली नदी के पश्चिमी तट पर स्थापित कर दिया एक नवनिर्मित 14 तले भवन में- जहां एक भीड़-भरे संकुलित बाज़ार का स्थानांतरण होना था. ममता बनर्जी ने इस नए महाकरण का नाम दिया ‘नबान्न’ यानी ‘नया अन्न’.

कुछ लोगों का यह मत है कि स्थान परिवर्तन का बड़ा कारण यह था कि मुख्यमंत्री को राइटर्स अशुभ प्रतीत हुआ. कारण? 21 जुलाई 1993 को उन्होंने वोटर पहचान पत्र के ज़बरदस्त मांग के मुद्दे पर एक विशाल उग्र प्रतिवाद जुलूस का नेतृत्व करते हुए राइटर्स बिल्डिंग पर हल्ला बोला था. जुलूस को क़ाबू में लाने के लिए पुलिस ने गोली चलाई और 13 प्रदर्शनकारियों की मृत्यु हो गई. ॉ

ऐसा भी कहा गया है कि मुख्यमंत्री ने यह बदलाव किसी ज्योतिषाचार्य के परामर्श पर किया था. वजह जो भी हो सत्य यह है कि तेरह वर्षों के बाद भी इस भव्य विरासत भवन की मरम्मत नहीं हो पाई है. राइटर्स और नबान्न में ढेरों असमानताएं होने के बावजूद एक समानता थी-  दोनों इमारतें मूल रूप से वाणिज्य के हित में बनी थीं.

‘राइटर्स’ का इतिहास

इन दिनों राइटर्स बिल्डिंग फिर चर्चा में है, परंतु यह कोई नई बात नहीं. यह इमारत अपने निर्माण के बाद से लगातार चर्चा में रही है. 1757 में प्लासी के युद्ध के पश्चात ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल की दीवानी प्राप्त हुई तथा व्यापार के अलावा राजस्व संग्रह के अतिरिक्त कार्यों के लिए उसके क्लर्क और लेखाकारों, जिन्हें राइटर्स के नाम से जाना जाता था, में काफ़ी वृद्धि हुई.

1776-77 में लॉर्ड हेस्टिंज़ ने इन्हीं के लिए एक आवास बनाने का निर्णय लिया जो 1780 में बन कर खड़ा हुआ. इसके आर्किटेक्ट थे टॉमस लीयोन जिनके नाम से राइटर्स के पीछे बना रास्ता ‘लीयोन रेंज’ के नाम से जाना जाता है. राइटर्स बिल्डिंग कलकत्ता की पहली तीन-मंज़िली इमारत थी एवं कंपनी बहादुर की शान और शक्ति की अभिव्यंजना भी.

उन्नीसवीं शताब्दी में जब ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारिक संस्था से क्षेत्रीय साम्राज्य में परिवर्तित हुई, तब यह भवन बंगाल प्रशासन का केंद्रीय कार्यालय बन गया और इसके मूल ढांचे में नए भवन खंड भी जुड़ते गए. 1879–1906 के बीच इस इमारत में सबसे बड़े वास्तु परिवर्तन हुए, जब भवन को उसका वर्तमान भव्य नव-शास्त्रीय रूप मिला और यह साम्राज्यवादी शक्ति के प्रभावशाली प्रतीक में बदल दी गई.

तीन नए खंडों के साथ एक सादे तीन मंज़िले भवन का मुख भाग अलंकृत करने के लिए कोरिंथियन स्तंभ, मेहराब, और यूरोपीय शैली की मूर्तियां जोड़ी गईं और इसे लाल ईंटों से सजाया गया. इसके केंद्रीय भाग पर रोमन ज्ञान की देवी मिनर्वा की प्रतिमा स्थापित की गई, जबकि छत पर खड़ी अन्य मूर्तियां व्यापार, कृषि, विज्ञान और न्याय का प्रतीक हैं.

यूं मानिए कि विश्व का सर्वोच्च शोषणकारी साम्राज्य देदीप्यमान भेष धरकर एहसान जता रहा था कि उसने विज्ञान की सहायता से अपने सबसे विस्तृत औपनिवेशिक क्षेत्रों में कृषि तथा वाणिज्य का विकास कर न्याय स्थापित किया है. आज ये मूर्तियां इसी अद्भुत विडंबना की याद दिलाती हैं.

8 दिसंबर 1930 को यह भवन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की एक ऐतिहासिक घटना का साक्षी बना. तीन युवा क्रांतिकारी- बिनय बसु, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता ने राइटर्स बिल्डिंग में प्रवेश कर अत्याचारी जेल महानिरीक्षक कर्नल एनएस सिंपसन की हत्या कर दी. गिरफ्तारी से बचने के लिए बादल ने साइनाइड खा लिया, जबकि बिनय और दिनेश ने स्वयं को गोली मार ली.

बिनय बाद में अस्पताल में मारे गए और दिनेश को फांसी पर चढ़ा दिया गया. इस घटना ने बंगाल के राष्ट्रवादी आंदोलन को गहरा प्रेरणा-स्रोत प्रदान किया। स्वतंत्रता के बाद डलहौज़ी स्क्वायर का नाम बदलकर ‘बीबीडी बाग़’ रखा गया- बिनय, बादल और दिनेश की स्मृति में.

1937 से 1947 तक राइटर्स प्रांतीय सरकार का भी मुख्यालय बना रहा तथा 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद राइटर्स बिल्डिंग पश्चिम बंगाल सरकार का सचिवालय बन गया. यह परिवर्तन उल्लेखनीय था क्योंकि वही भवन, जो कभी अंग्रेज़ अधिकारियों का मुख्यालय था, अब पश्चिम बंगाल के मंत्रियों और ‘नौकरशाहों’ का कार्यालय बन गया.

यह सत्ता के आसन का रूप भी था और उसके विरुद्ध आंदोलन का निशाना भी, यहां निर्णय लिए जाते थे और नीतियां बनाई जाती थीं- फिर उनमें से कई लाल फ़ीतों में उलझकर दम तोड़ देते थे. आहिस्ता-आहिस्ता ‘राइटर्स’ शब्द राज्य सरकार का पर्याय ही बन गया.

इन दिनों राइटर्स बिल्डिंग फिर चर्चा में है क्योंकि पश्चिम बंगाल में बनी भाजपा की नई सरकार ने एक बार फिर इसी भवन को अपना महाकरण बनाने का निर्णय लिया है.

ऐसा प्रतीत होता है कि इस निर्णय के पीछे दो कारण हैं. पहला, राइटर्स बिल्डिंग बंगाल में शासन की परंपरा से लंबे काल से जुड़ा हुआ है, 1780 के ईस्ट इंडिया कंपनी के युग से आरंभ कर 2013 के राज्य सरकार के शासन तक, एवं अब यह बंगाल में सरकार का सर्वाधिक परिचित छवि है, प्रतीक है.

द्वितीय, भाजपा की नई सरकार सिर्फ़ यह नहीं बता रही है कि वह शासन की परंपरा को आगे बढ़ा रही है परंतु यह भी कि वह बंगाल के बीते हुए सुनहरे दिन वापस लाएगी.

(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)

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