मिर्ज़ापुर: थर्मल परियोजना की पर्यावरण मंज़ूरी को लेकर अडानी पावर, केंद्र और यूपी सरकार को एनजीटी का नोटिस

एनजीटी ने उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर जिले में अडानी पावर की प्रस्तावित 1600 मेगावाट कोयला आधारित मिर्जापुर ताप विद्युत परियोजना को दी गई पर्यावरण मंज़ूरी के मामले में अडानी पावर, केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार के संबंधित विभागों को नोटिस जारी किया है. परियोजना का स्थानीय नागरिकों द्वारा विरोध किया जा रहा है.

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उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में अडानी पावर की प्रस्तावित 1600 मेगावाट कोयला आधारित मिर्जापुर ताप विद्युत परियोजना की ओर जाती हुई सड़क. (फोटो: संतोष देव गिरि)

मिर्जापुर: नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में अडानी पावर की प्रस्तावित 1600 मेगावाट कोयला आधारित मिर्जापुर ताप विद्युत परियोजना को दी गई पर्यावरण मंजूरी के मामले में अडानी पावर, केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार के संबंधित विभागों को नोटिस जारी किया है.

हालांकि, यह खबर प्रकाशित किए जाने के समय तक एनजीटी का यह आदेश उनकी वेबसाइट पर अपडेट नहीं किया गया है.

एनजीटी के इस फैसले का स्वागत करते हुए परियोजना का शुरू से विरोध कर रहे ग्रामीणों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इसे महत्वपूर्ण कदम बताया है. उनका कहना है कि हजारों लोगों के जीवन, जल-जंगल, हरियाली और वन्यजीवों पर पड़ने वाले प्रभावों को नजरअंदाज कर विकास का सपना दिखाया जा रहा था. उनका मानना है कि इस आदेश से यह उम्मीद जगी है कि पर्यावरणीय नियमों और स्थानीय लोगों की चिंताओं की अनदेखी करने वालों को जवाब देना होगा.

एनजीटी ने अडानी पावर की मिर्जापुर थर्मल एनर्जी यूपी प्रा. लि. की प्रस्तावित 1600 मेगावाट कोयला आधारित ताप विद्युत परियोजना से जुड़े तीन मामलों में नोटिस जारी किया है. प्रतिवादियों में परियोजना कंपनी, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) तथा उत्तर प्रदेश सरकार के कई विभाग शामिल हैं.

ट्रिब्यूनल के समक्ष लंबित मामलों में पहला मामला 23 सितंबर 2025 को मंत्रालय द्वारा परियोजना को दी गई पर्यावरण मंजूरी को चुनौती देने वाली याचिका का है.

दूसरा मामला वर्ष 2024 में दायर एक निष्पादन आवेदन से जुड़ा है, जिसमें आरोप लगाया गया था कि परियोजना कंपनी ने आवश्यक अनुमतियां प्राप्त किए बिना निर्माण गतिविधियां शुरू कर दी थीं. इस मामले को वर्ष 2025 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की पीठ के निर्देश पर समानांतर कार्यवाही से बचने के लिए एनजीटी ने समाप्त कर दिया था.

हालांकि, वर्तमान मुख्य न्यायाधीश ने अब इस मामले को लंबित पर्यावरण मंजूरी अपील के साथ व्यापक सुनवाई के लिए पुनः एनजीटी को भेज दिया है. अब कथित पुराने उल्लंघनों से जुड़े मामलों की सुनवाई भी एनजीटी करेगा.

तीसरा मामला परियोजना से संबंधित गतिविधियों पर रोक लगाने की मांग वाली स्थगन याचिका का है. इस पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने सभी पक्षों को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है.

गौरतलब है कि मिर्जापुर थर्मल एनर्जी (यू.पी.) प्रा. लि., जो अडानी समूह की एक सहायक कंपनी है, की प्रस्तावित 1600 मेगावाट कोयला आधारित ताप विद्युत परियोजना लंबे समय से कानूनी और पर्यावरणीय विवादों के केंद्र में रही है. परियोजना स्थल 10 आरक्षित वनों से घिरा हुआ है.

मूल रूप से इस परियोजना को वर्ष 2014 में एम/एस वेलस्पन एनर्जी प्रा. लि. के लिए 1320 मेगावाट क्षमता वाले संयंत्र के रूप में पर्यावरण मंजूरी दी गई थी. हालांकि, वर्ष 2016 में एनजीटी ने एक महत्वपूर्ण फैसले में पर्यावरणीय चिंताओं और कथित रूप से ‘दूषित पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) प्रक्रिया’ का हवाला देते हुए इस मंजूरी को रद्द कर दिया था और स्थल को पूर्व स्थिति में बहाल करने का निर्देश दिया था.

फाइल फोटो: परियोजना का विरोध करती महिला. (फोटो: संतोष देव गिरि)

इसके बाद परियोजना को पुनर्जीवित करने के कई प्रयास हुए और बाद में अडानी समूह ने इस स्थल का अधिग्रहण किया.

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि वर्ष 2024 के मध्य में बड़े पैमाने पर वनस्पति हटाने और अवैध निर्माण गतिविधियां शुरू की गईं. मीडिया रिपोर्टों का संज्ञान लेते हुए एनजीटी ने स्वतः संज्ञान लिया था, जबकि याचिकाकर्ताओं ने वर्ष 2016 के आदेश की अवमानना का आरोप लगाते हुए निष्पादन आवेदन (Execution Application) दायर किया था.

याचिकाकर्ताओं का दावा है कि परियोजना स्थल वन भूमि तथा महत्वपूर्ण वन्यजीव आवास का हिस्सा है और इसे प्रस्तावित स्लॉथ बियर संरक्षण रिजर्व क्षेत्र के रूप में भी देखा जाता रहा है. हालांकि, कंपनी ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा है कि परियोजना से किसी वन भूमि या वन्यजीव आवास को नुकसान नहीं पहुंचेगा.

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, 12 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार, केंद्र सरकार और परियोजना कंपनी को नोटिस जारी किया था. सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता को एनजीटी में लंबित मामला वापस लेने का निर्देश दिया था, क्योंकि मामले को मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया था.

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस बीच पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 9 सितंबर 2025 को परियोजना को स्टेज-1 वन मंजूरी और 23 सितंबर 2025 को पर्यावरण मंजूरी प्रदान कर दी. विंध्य बचाओ अभियान का आरोप है कि यह मंजूरियां ऐसे समय दी गईं, जब कथित अवमानना से जुड़े मामले तथा परियोजना क्षेत्र की वन भूमि और वन्यजीव आवास से संबंधित विवादित प्रश्न अभी न्यायिक विचाराधीन हैं.

संगठन ने 30 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में एक स्थगन याचिका भी दायर की थी. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं का निपटारा कर दिया है.

विंध्य बचाओ अभियान से जुड़े पर्यावरण संरक्षण कार्यकर्ता और याचिकाकर्ता देवादित्यो सिन्हा ने एनजीटी के हालिया फ़ैसले पर द वायर हिंदी से बातचीत में कहा, ‘एनजीटी के फैसले ने आस बढ़ाई है. यह उन ग्रामीणों के लिए काफी अहम है जो बिना किसी प्रलोभन और लालच के अपने हक-अधिकारों तथा आने वाली पीढ़ियों को प्रदूषण से बचाने के लिए आंदोलन करते रहे हैं.’

उन्होंने कहा, ‘हम शांतिपूर्ण ढंग से देश की विधि-व्यवस्था पर भरोसा रखते हुए अपनी बात कहते आए हैं, जबकि दूसरी ओर शासन-सत्ता के समर्थन और आर्थिक ताकत के सहारे अपना साम्राज्य विस्तार करने वाले लोग हैं, जिनके लिए गरीबों का जीवन, जल-जंगल, हरियाली और वन्यजीवों का कोई मोल नहीं है.’

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के मड़िहान वन रेंज क्षेत्र में प्रस्तावित इस कोयला आधारित ताप विद्युत परियोजना को लेकर शुरू से ही पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी के आरोप लगते रहे हैं. परियोजना के विरोधियों का कहना है कि इससे कंपनी को भले ही भारी आर्थिक लाभ हो, लेकिन पर्यावरण, वन क्षेत्र और स्थानीय जलवायु पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं.

स्थानीय किसानों, ग्रामीणों, पर्यावरण विशेषज्ञों और कृषि वैज्ञानिकों ने भी इस परियोजना को क्षेत्र के लिए संभावित रूप से विनाशकारी बताते हुए इसके खिलाफ चिंता जताई है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)