नई दिल्ली: भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने अपनी 2024-25 की ऑडिट रिपोर्ट में असम सरकार की वित्तीय अनुशासनहीनता से जुड़े गंभीर मामलों को उजागर किया है. रिपोर्ट में बताया गया है कि 13 मामलों में बिना किसी बजट प्रावधान या पुनर्विनियोजन आदेश के 509.59 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जो संविधान के अनुच्छेद 204 का सीधा उल्लंघन है.
सरकार को सार्वजनिक धन खर्च करने से पहले कानूनन विधानसभा की मंजूरी लेना अनिवार्य होता है. लेकिन 13 मामलों में ऐसा नहीं किया गया. ये 509.59 करोड़ रुपये ‘सार्वजनिक ऋण और ऋण सेवा’ (Public Debt and Servicing of Debt) मद के तहत खर्च किए गए, जबकि मूल बजट में इसके लिए कोई प्रावधान नहीं था, न ही अनुपूरक स्वीकृति ली गई और न ही कोई पुनर्विनियोजन आदेश जारी किया गया.
कैग ने कहा कि यह केवल कागजी गड़बड़ी नहीं है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 204 का उल्लंघन है और यह दर्शाता है कि सरकारी विभागों में वित्तीय अनुशासन पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है.
रिपोर्ट में कहा गया, ‘बिना बजट के किया गया खर्च न केवल वित्तीय नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यह विधायिका की इच्छा के भी विपरीत है. यह इस बात का भी संकेत है कि सरकारी विभागों में अधिक वित्तीय अनुशासन की आवश्यकता है.’
जवाबदेही से जुड़ी खामियां इससे भी अधिक गंभीर हैं. 31 मार्च 2025 तक कुल 6,929 उपयोगिता प्रमाणपत्र (Utilisation Certificates) जिनकी राशि 23,240.56 करोड़ रुपये थी, लेखा महानियंत्रक के पास जमा नहीं किए गए थे.
कैग ने कहा कि इन प्रमाणपत्रों के बिना यह निर्धारित करना असंभव है कि अनुदान की राशि उसी उद्देश्य के लिए इस्तेमाल हुई या नहीं, जिसके लिए उसे स्वीकृत किया गया था.
रिपोर्ट में जिन पांच प्रमुख विभागों का ज़िक्र किया गया है – उनमें से अकेले वित्त विभाग के ही 4,067.06 करोड़ रुपये के प्रमाण पत्र लंबित थे, जो कि इन सभी विभागों में सबसे अधिक है.
कमजोर वित्तीय नियंत्रण का एक और उदाहरण देते हुए रिपोर्ट में कहा गया कि 31 मार्च 2025 तक 1,222 एब्स्ट्रैक्ट कंटिन्जेंट बिल जिनकी राशि 753.61 करोड़ रुपये थी, उन्हें विस्तृत प्रति-हस्ताक्षरित कंटिन्जेंट बिलों में परिवर्तित नहीं किया गया था. यानी सार्वजनिक खजाने से निकाली गई रकम के लिए कानूनन आवश्यक वाउचर-समर्थित दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि 2024-25 में एक अनुदान के तहत 604.40 करोड़ रुपये का अतिरिक्त व्यय हुआ, जिसे संविधान के अनुच्छेद 205 के तहत राज्य विधानसभा से नियमित कराना आवश्यक है.
इससे भी अधिक गंभीर बात यह है कि 2006-07 से 2023-24 के बीच किए गए 11,995.69 करोड़ रुपये के अतिरिक्त भुगतान अब तक नियमित नहीं किए गए हैं. यह लंबित मामला लगभग दो दशकों से चला आ रहा है.
अरुणाचल: मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने असम में ड्रग-विरोधी कार्यकर्ता की कथित हिरासत यातना पर जताई चिंता
अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू पेमा खांडू ने मंगलवार (26 मई) को ड्रग-विरोधी कार्यकर्ता गुमिन मिज़े के कथित हिरासत में उत्पीड़न को लेकर चिंता जताई. यह मामला तब और गरमा गया जब सोशल मीडिया पर पुलिस हिरासत के दौरान उनके शरीर पर चोट के निशान दिखाने वाली कथित तस्वीरें और वीडियो वायरल हो गए, जिससे अरुणाचल प्रदेश और पड़ोसी असम में व्यापक आक्रोश फैल गया.
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, राज्य सरकार ने इस मुद्दे को असम सरकार के समक्ष उठाया है. मुख्यमंत्री खांडू ने कहा कि उन्होंने सोशल मीडिया पर घटना देखने के बाद व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप किया.

पत्रकारों से बात करते हुए खांडू ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश किसी अन्य राज्य की न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं कर सकता, लेकिन उसने असम सरकार के सामने अपनी गंभीर चिंता स्पष्ट रूप से व्यक्त की है.
उन्होंने कहा, ‘मिज़े पिछले कई वर्षों से यहां नशे के खिलाफ बेहतरीन काम कर रहे हैं. उन्होंने ड्रग तस्करी में शामिल कई लोगों की गिरफ्तारी में भी मदद की है.’
मुख्यमंत्री ने इस घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि उन्होंने विशेष रूप से असम सरकार से अनुरोध किया है कि हिरासत के दौरान मिज़े के साथ किसी प्रकार की यातना या दुर्व्यवहार न हो.
गुमिन मिज़े, जो अरुणाचल एंटी-ड्रग वॉरियर्स (एपीएडीडब्ल्यू) के अध्यक्ष हैं, को असम पुलिस ने 20 मई को ईटानगर से गिरफ्तार किया था. यह गिरफ्तारी असम के लखीमपुर जिले के बिहपुरिया पुलिस स्टेशन में दर्ज एक मामले के संबंध में की गई थी.
उन पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की कई धाराओं और आर्म्स एक्ट के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया है.
पॉपी काकाती नामक महिला द्वारा दर्ज एफआईआर के अनुसार, मामला 15 मई को असम के सेसा राजगढ़ क्षेत्र में हुई कथित हिंसक घटना से जुड़ा है. आरोप है कि 12 से 15 अज्ञात लोगों के एक समूह ने एक घर में घुसकर परिवार के सदस्यों पर हमला किया, हथियार लहराए और नकदी तथा मोबाइल फोन लूट लिए.
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि हमलावर तीन वाहनों में उसके पति रूपम काकाती की तलाश में आए थे. जब उन्होंने कथित रूप से भागने की कोशिश की, तो उनका पीछा किया गया, मारपीट की गई, हथकड़ी लगाई गई और उन पर गोली चलाई गई. प्राथमिकी में यह भी कहा गया कि बीच-बचाव करने की कोशिश करने पर शिकायतकर्ता के साथ भी मारपीट की गई.
पुलिस का कहना है कि मिज़े को इस मामले में इसलिए गिरफ्तार किया गया क्योंकि मुठभेड़ के दौरान गोली चलने के आरोप लगे थे.
हालांकि, मिज़े के समर्थकों का दावा है कि वह ड्रग-विरोधी अभियान के सिलसिले में उस इलाके में गए थे और कथित ड्रग तस्करों के हमले के बाद आत्मरक्षा में चेतावनी स्वरूप गोलियां चलाई थीं.
गिरफ्तारी के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर मिज़े के शरीर पर चोट और सूजन के निशान दिखाने वाली कथित तस्वीरें और वीडियो सामने आए, जिसके बाद पूर्वोत्तर के विभिन्न छात्र संगठनों, नागरिक समूहों और ड्रग-विरोधी कार्यकर्ताओं ने न्याय की मांग करते हुए विरोध शुरू कर दिया.
कई संगठनों और नागरिकों ने आरोप लगाया है कि ड्रग-विरोधी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका के कारण वे क्षेत्र में मादक पदार्थों के कारोबार से जुड़े स्वार्थी तत्वों के निशाने पर आ गए हो सकते हैं.
विवाद बढ़ने के बीच, इस मामले को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) में भी औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई है. शिकायत में असम के लखीमपुर जिले के बिहपुरिया पुलिस स्टेशन में हिरासत के दौरान मिज़े को प्रताड़ित किए जाने का आरोप लगाया गया है.
नमसाई निवासी बुटेंग तायेंग द्वारा दायर शिकायत में आरोप लगाया गया है कि पुलिसकर्मियों ने हिरासत में मिज़े के साथ गंभीर शारीरिक मारपीट की, गाली-गलौज की और उचित चिकित्सीय जांच से भी वंचित रखा.
याचिका में एनएचआरसी से आरोपों की स्वतंत्र जांच कराने और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की मांग की गई है.
हालांकि, बिहपुरिया पुलिस स्टेशन के अधिकारियों ने हिरासत में यातना दिए जाने के आरोपों से इनकार किया है और दावा किया है कि सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरें और वीडियो एआई की मदद से तैयार किए गए हैं.
इस बीच, जनता के भारी विरोध के बीच असम के लखीमपुर जिला कोर्ट ने गुमिन मिज़े को अंतरिम ज़मानत दे दी.
मणिपुर: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- जातीय हिंसा मामलों में सुनवाई में तेजी लाई जाए
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (27 मई) को कहा कि 2023 की मणिपुर जातीय हिंसा से जुड़े मामलों की चल रही सुनवाई में तेजी लाई जानी चाहिए. अदालत ने इस संबंध में अधिकारियों से स्थिति रिपोर्ट भी मांगी है.
मणिपुर में जातीय हिंसा 3 मई 2023 को उस समय भड़की थी, जब पहाड़ी जिलों में ‘आदिवासी एकता मार्च’ आयोजित किया गया था. यह प्रदर्शन मेईतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने की मांग के विरोध में किया गया था. इस हिंसा में 260 से अधिक लोगों की मौत हुई और हजारों लोग विस्थापित हो गए हैं.

बुधवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि विशेष जांच दल (एसआईटी) की रिपोर्ट के अनुसार 207 मामलों में 400 से अधिक आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किए जा चुके हैं.
पीठ केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें गौहाटी हाईकोर्ट द्वारा दो आरोपियों – अरुण खुंडोंगबाम और नामैराकपम किरण मेईतेई – को दी गई जमानत को चुनौती दी गई है. इन दोनों पर महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार करने और उन्हें निर्वस्त्र घुमाने का आरोप है.
पीठ ने कहा, ‘हमारा मानना है कि चल रही सुनवाई में तेजी लाई जानी चाहिए. हमने सीबीआई और अन्य पक्षों से कहा है कि पीड़ितों की सहायता के लिए ऐसे विधिक सहायता वकील उपलब्ध कराए जाएं जो मणिपुरी भाषा जानते हों. अगली सुनवाई में चल रहे मुकदमों की स्थिति रिपोर्ट पेश की जानी चाहिए.’
सुनवाई की शुरुआत में पीठ ने स्पष्ट किया कि मामला पीड़ित परिवारों को कानूनी सहायता उपलब्ध कराने से संबंधित है और अदालत अन्य मुद्दों में हस्तक्षेप नहीं करेगी.
सीबीआई की रिपोर्ट का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि 20 आरोपपत्र दाखिल किए जा चुके हैं और 16 मामलों में सुनवाई शुरू हो चुकी है. वहीं, एसआईटी की स्थिति रिपोर्ट के अनुसार 207 मामलों में 400 से अधिक आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दायर किए गए हैं.
पीठ ने यह भी कहा कि पूर्व आईपीएस अधिकारी दत्तात्रेय पडसलगीकर द्वारा दाखिल रिपोर्ट के अनुसार इस वर्ष 7 और 18 अप्रैल को राज्य की कानून-व्यवस्था की स्थिति ‘नाजुक’ थी. रिपोर्ट में कहा गया कि हिंसा की कुछ घटनाएं हुईं और राज्य पुलिस पर काफी दबाव था.
अदालत ने कहा कि पीड़ितों का न्याय व्यवस्था पर भरोसा बनाए रखना बेहद महत्वपूर्ण है और उनके लिए ‘विश्वास बहाली के उपाय’ किए जाने चाहिए.
8 सितंबर 2025 को गौहाटी हाईकोर्ट ने दोनों आरोपियों को यह कहते हुए जमानत दे दी थी कि वे दो वर्षों से हिरासत में हैं जबकि अब तक आरोप तय नहीं किए गए हैं. अदालत ने इसे ‘अनुचित रूप से लंबी कैद’ बताया था.
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था, ‘हालांकि आरोप बेहद गंभीर और चौंकाने वाले हैं, लेकिन अदालत इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकती कि मुकदमे के बिना अनिश्चितकालीन हिरासत पूर्व-दंड के समान है, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है.’
सीबीआई ने यौन हिंसा के गंभीर आरोपों का हवाला देते हुए जमानत रद्द करने की मांग की है.
बुधवार की सुनवाई के दौरान कुछ पीड़ितों की ओर से पेश वकील निजाम पाशा ने कहा कि उसी अदालत ने 9 मई 2025 को अपराध की भयावह प्रकृति का उल्लेख किया था, लेकिन बाद में 8 सितंबर को सुनवाई में देरी के आधार पर जमानत दे दी.
इस पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, ‘चूंकि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मामला है, इसलिए जमानत रद्द करने के लिए अत्यंत गंभीर आधार आवश्यक होता है. हमारी मुख्य चिंता सच्चाई को सामने लाना है और इसके लिए जो भी पुनर्वास उपाय जरूरी होंगे, उन पर विचार किया जाएगा.’
इससे पहले मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को पीड़ितों के लिए कानूनी सहायता वकील नियुक्त करने का निर्देश दिया था.
20 जुलाई 2023 को महिलाओं के साथ अत्याचार का वीडियो ऑनलाइन सामने आने और देशभर में आक्रोश फैलने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था.
इस हिंसा से पहले आरक्षित वन भूमि से कुकी ग्रामीणों को हटाने को लेकर तनाव बढ़ा था, जिसके कारण कई छोटे विरोध प्रदर्शन हुए थे.
अगस्त 2023 में केंद्र सरकार ने मणिपुर सरकार की सिफारिश पर जातीय हिंसा पीड़ितों के राहत और पुनर्वास की निगरानी के लिए जस्टिस गीता मित्तल आयोग का गठन किया था. सरकार ने इसे जनहित से जुड़ा महत्वपूर्ण मामला बताते हुए जांच की आवश्यकता पर जोर दिया था.
आयोग का कार्यकाल हाल ही में 31 जुलाई तक बढ़ा दिया गया है.
नगा संगठन ने मणिपुर सरकार को छह अपहृत व्यक्तियों के मामले में चार दिन का अल्टीमेटम दिया
मणिपुर की ऑल नगा स्टूडेंट्स एसोसिएशन, मणिपुर (एएनएसएएम) ने शुक्रवार (29 मई) को राज्य सरकार को चार दिन का ‘अल्टीमेटम’ जारी करते हुए छह नगा नागरिकों, जिनमें दो पादरी भी शामिल हैं, की स्थिति का पता लगाने की मांग की. आरोप है कि इन लोगों का अपहरण कुछ कुकी व्यक्तियों द्वारा किया गया था.

संगठन ने चेतावनी दी कि यदि निर्धारित समयसीमा के भीतर इन लोगों की स्थिति का पता नहीं लगाया, तो नगा समुदाय सरकार का बहिष्कार करने के लिए मजबूर होगा. साथ ही, उसने सरकार को समर्थन दे रहे सभी नगा विधायकों से समुदाय के व्यापक हित और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अपना समर्थन वापस लेने की अपील की.
छात्र संगठन ने हाल ही में तीन नगा लोगों की हत्या में शामिल सभी आरोपियों की गिरफ्तारी की भी मांग की. इनमें से दो की हत्या उखरुल जिले में और एक की नोनी जिले में हुई थी. इसके अलावा, कुकी-बहुल कांगपोकपी जिले में थाडौ समुदाय के तीन चर्च नेताओं की हत्या के आरोपियों की गिरफ्तारी की भी मांग की गई.
एएनएसएएम ने केंद्र सरकार और विभिन्न कुकी उग्रवादी समूहों के बीच हुए सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस (एसओओ) समझौते को तत्काल खत्म करने की मांग भी की. संगठन का आरोप है कि यह शांति समझौता अब निर्दोष नागरिकों की हत्या और अपहरण करने का ‘लाइसेंस’ बन गया है.
संगठन ने राज्य के गृह मंत्री गोविंददास कोंथौजाम की भी आलोचना की और उन पर ‘सरेआम झूठ’ बोलने का आरोप लगाया. यह आरोप 7 मई को हुई कथित सीमा-पार घुसपैठ से जुड़ा है, जिसमें एसओओ समझौते के अंतर्गत आने वाले कुकी सशस्त्र समूहों और म्यांमार स्थित पीपुल्स डिफेंस फोर्स (पीडीएफ) के सदस्यों पर अंतरराष्ट्रीय सीमा के निकट कामजोंग जिले के कुछ नगा गांवों पर हमला करने का आरोप लगाया गया था.
13 मई को थाडौ समुदाय के तीन चर्च नेताओं की कांगपोकपी जिले में एक घात लगाकर किए गए हमले में हत्या कर दी गई थी. उसी दिन विभिन्न समूहों द्वारा अलग-अलग स्थानों से 38 से अधिक कुकी और नगा व्यक्तियों के अपहरण का आरोप लगाया गया.
दो दिन बाद अपहरणकर्ताओं ने 14 नगा और 14 कुकी लोगों को रिहा कर दिया. नगा संगठनों का दावा है कि छह अन्य नगा अब भी कुकी समूहों की कैद में हैं. वहीं, कुकी संगठनों का कहना है कि कथित अपहरण के बाद 14 अन्य कुकी लोगों का भी अब तक कोई पता नहीं चल पाया है.
गुरुवार को मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह ने पुष्टि की कि छह नगा व्यक्तियों के अपहरण में संलिप्त होने के संदेह में चार लोगों को गिरफ्तार किया गया है. उन्होंने आश्वासन दिया कि इन छह लोगों का जल्द ही पता लगा लिया जाएगा.
मेघालय: मुख्यमंत्री ने यूसीसी पर अपना रुख़ नरम किया
अपने पहले के विरोधी रुख से हटते हुए मुख्यमंत्री कोनराड संगमा ने बुधवार (27 मई) को प्रस्तावित समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर अधिक लचीला और नरम रुख अपनाने के संकेत दिया. उन्होंने कहा कि असम और उत्तराखंड में लागू हालिया कानूनों में आदिवासी पारंपरिक कानूनों को छूट दिए जाने से उन्हें कुछ हद तक संतोष हुआ है.
द शिलांग टाइम्स के अनुसार, हालांकि, संगमा ने यह भी स्पष्ट किया कि मेघालय सरकार किसी भी प्रस्तावित यूसीसी की वास्तविक सामग्री और ढांचे का गहराई से अध्ययन करने के बाद ही अपना अंतिम रुख तय करेगी.

पत्रकारों से बातचीत करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि वह लगातार यह कहते रहे हैं कि यूसीसी के सटीक प्रावधानों को देखे बिना इस पर कोई ठोस राय बनाना कठिन है. उन्होंने यह भी कहा कि ‘समान नागरिक संहिता’ शब्द अपने आप में बहुत व्यापक है और इसकी अलग-अलग व्याख्याएं हो सकती हैं.
संगमा ने कहा, ‘मेरा शुरुआती विरोध इस चिंता से जुड़ा था कि कहीं राष्ट्रीय कानूनी ढांचे के तहत आदिवासी पारंपरिक प्रथाओं और मेघालय की मातृसत्तात्मक व्यवस्था को समाप्त या कमजोर न कर दिया जाए.’
उन्होंने याद दिलाया कि जब पहली बार यूसीसी पर चर्चा शुरू हुई थी, तब आदिवासी समुदायों में यह व्यापक आशंका थी कि उनके विशिष्ट कानूनों और परंपराओं पर असर पड़ेगा. लेकिन असम और उत्तराखंड में लागू यूसीसी-संबंधी कानूनों का अध्ययन करने के बाद उन्हें ‘कुछ हद तक सहजता’ महसूस हुई, क्योंकि दोनों राज्यों ने आदिवासी पारंपरिक कानूनों को इसके दायरे से बाहर रखा है.
संगमा ने आगे कहा कि आदिवासी अधिकारों की सुरक्षा के लिए किए गए प्रावधानों ने इस बहस के संदर्भ को कुछ हद तक बदल दिया है. फिर भी उन्होंने जोर देकर कहा कि मेघालय सरकार किसी भी भविष्य के प्रस्ताव का कानूनी और राजनीतिक – दोनों दृष्टिकोणों से सावधानीपूर्वक जांच करती रहेगी, और उसके बाद ही अंतिम निर्णय लेगी.
मुख्यमंत्री ने दोहराया कि राज्य की सबसे बड़ी चिंता उसकी मातृसत्तात्मक व्यवस्था और मूल आदिवासी परंपराओं की सुरक्षा है.
पिछले 25 वर्षों में पूर्वोत्तर भारत में वायु प्रदूषण में तेज़ी से वृद्धि: अध्ययन
एक हालिया वैज्ञानिक अध्ययन में पाया गया है कि पिछले दो दशकों में पूर्वोत्तर भारत में वायु प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ा है. कभी भारत के सबसे स्वच्छ क्षेत्रों में गिने जाने वाले इस इलाके के कई हिस्से अब गंभीर प्रदूषण वाले क्षेत्रों में बदलते जा रहे हैं.
कोलकाता स्थित बोस इंस्टिट्यूट के शोधकर्ताओं ने 25 वर्षों (2000 से 2024) के सैटेलाइट डेटा का विश्लेषण किया और पाया कि इस अवधि के दौरान क्षेत्र में पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) प्रदूषण में काफी बढ़ोतरी हुई है.

अध्ययन के अनुसार, 2000 से 2024 के बीच विभिन्न प्रकार के प्रदूषकों के स्तर में 20 प्रतिशत से लेकर लगभग 50 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई.
शोध के निष्कर्ष बताते हैं कि वर्ष 2010 से 2019 के दौरान पीएम की सांद्रता (कंसन्ट्रेशन) पिछले दशक (2000–2009) की तुलना में 20 प्रतिशत से अधिक बढ़ गई थी.
अध्ययन में यह भी पाया गया कि ऑर्गेनिक कार्बन एरोसोल – जो मुख्यतः धुएं से जुड़े सूक्ष्म कण होते हैं – की मात्रा 2000–2009 की तुलना में लगभग 50 प्रतिशत बढ़ गई.
शोधकर्ताओं के अनुसार, 2020 के बाद भी यह वृद्धि जारी रही और 2024 तक ऑर्गेनिक कार्बन से जुड़ा प्रदूषण 30 से 40 प्रतिशत और बढ़ गया. इसके परिणामस्वरूप पूर्वोत्तर भारत के बड़े हिस्से अब उच्च प्रदूषण श्रेणी वाले क्षेत्रों में शामिल हो गए हैं.
अध्ययन में पाया गया कि अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों का विस्तार लगातार होता गया.
असम, मेघालय और त्रिपुरा में पहले जो भारी कार्बन प्रदूषण के छोटे-छोटे क्षेत्र थे, वे धीरे-धीरे बड़े क्षेत्रों में फैल गए और अंततः बांग्लादेश तथा निचले इंडो-गंगा मैदान तक फैले प्रदूषण गलियारों से जुड़ गए हैं.
