नई दिल्ली: फ्रेशर्स यानी नौकरी की शुरुआत करने की चाह रखने वाले लोगों को मौजूदा समय काम ढूंढने में खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है.
नौकरी तलाश करने में मदद करने के उद्देश्य से बने ऑनलाइन जॉब सर्च पोर्टल ‘इनडीड’ (Indeed) की ‘फ्रेशर हायरिंग रिपोर्ट’ का हवाला देते हुए फाइनेंशियल एक्सप्रेस ने बताया है कि पांच साल पहले की तुलना में अब फ्रेशर्स के लिए काम की दुनिया में कदम रखना मुश्किल हो गया है.
रिपोर्ट के मुताबिक, नौकरी चाहने वाले हर 10 में से 7 युवा को अपनी पहली नौकरी पाने में कठिनाई हो रही है. वहीं, 3-5 साल पहले की तुलना में अभी फ्रेशर्स के लिए इंटर्नशिप के मौके कम हैं.
सर्वे में शामिल 72% लोगों का कहना है कि एंट्री-लेवल नौकरियों के लिए भी पहले के अनुभव की मांग की जाती है, और 61% लोगों को आवेदन करने के बाद शायद ही कोई जवाब मिलता है.
इस अध्ययन का एक अहम नतीजा यह है कि सीखने और लंबे समय के करिअर लक्ष्यों पर ध्यान देने की इच्छा के बावजूद नौकरी चाहने वाले युवाओं को अपने लक्ष्यों और आदर्शों के मुताबिक भूमिकाओं के बजाय अपनी ज़रूरतों को प्राथमिकता देनी पड़ती है.
सर्वे में शामिल लोगों में से सिर्फ़ 14% ने कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि उनकी पहली नौकरी उनकी पसंद की भूमिका, कंपनी और लोकेशन के हिसाब से होगी.
अख़बार के अनुसार, सर्वे में शामिल लोगों में से एक बड़े हिस्से (43%) ने कहा कि उनके करिअर से जुड़े फैसलों पर आर्थिक दबाव और अवसर की कमी का असर पड़ रहा है.
यह स्टडी इस बात पर ज़ोर देती है कि मौजूदा समय में ऐसे मौकों की कमी है जिनसे उम्मीदवार जॉब मार्केट में आने से पहले अनुभव हासिल कर सकें.
सर्वे में शामिल लोगों में से सिर्फ़ 20% ने कहा कि उन्हें अपनी पढ़ाई के दौरान पेड इंटर्नशिप का मौका मिला, जबकि 18% ने कहा कि उन्हें इंटर्नशिप, प्रोजेक्ट, प्लेसमेंट या फ्रीलांस काम का कोई मौका नहीं मिला.
वहीं, लगभग आधे लोगों (49%) ने कहा कि उनकी सबसे बड़ी चुनौती अपनी पहचान बनाना थी, जबकि 61% ने कहा कि नौकरी के लिए अप्लाई करने के बाद उन्हें शायद ही कभी या कभी भी कोई जवाब मिलता है.
इस स्टडी में एक चिंताजनक बात यह सामने आई है कि लगभग 64% लोगों ने कहा कि बार-बार अप्लाई करने और रिजेक्ट होने से उनके आत्ममविश्वास या मनोबल पर बुरा असर पड़ा है, जबकि सिर्फ़ 20% लोगों ने कहा कि उन्हें लगता है कि वे अपने चुने हुए करिअर के रास्ते पर सही चल रहे हैं.
इनडीड में टैलेंट स्ट्रैटेजी एडवाइजर रोहन सिल्वेस्टर ने अखबार को बताया कि यह एक लंबा और अनिश्चित दौर बनता जा रहा है जिसमें लगातार नौकरी के लिए आवेदन करना, देर से जवाब मिलना और समझौता करने का बढ़ता दबाव शामिल है.
वे आगे बताते हैं कि जो नियोक्ता (एम्प्लॉयर) शुरुआत के लिए रास्ते बनाते हैं, काबिलियत में निवेश करते हैं और युवा उम्मीदवार को नौकरी के दौरान सीखने के मौके देते हैं, वे लंबे समय में बेहतर टैलेंट तैयार करने की बेहतर स्थिति में होंगे.
