बंगनामा: सरकारी विभाग का ‘रास्ता बताओ तो आगे चलो’ का दायित्व

'तमलुक आने के कुछ दिनों बाद मैंने पाया कि मेरा हर सोमवार और शुक्रवार कलकत्ता उच्च न्यायालय में बीत रहा है. ऐसा लगने लगा था कि हरेक मामले में ही ज़िला भूमि व भूमि संस्कार अधिकारी, तमलुक ने न्यायालय की अवमानना की है.' बंगनामा की इस क़िस्त में एक पुराना विभागीय क़िस्सा.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

अगस्त 1995 के अंत में बांकुड़ा से मेरा तबादला हो गया था. लाल माटी के देश से विदा लेकर मैं मिदनापुर ज़िले में रूपनारायण नदी के किनारे बसे तमलुक पहुंच गया, ज़िला भूमि व भूमि संस्कार अधिकारी तथा अतिरिक्त ज़िला मजिस्ट्रेट के पद पर. 90 लाख लोगों का घर कहलाने वाला अविभक्त मिदनापुर ज़िला इतना विस्तृत हुआ करता था कि भूमि की प्रबंध व्यवस्था के लिए इसे दो भूमि प्रशासन ज़िलों में बांटा गया था.

एक भूमि ज़िले का दफ़्तर मिदनापुर शहर में था, जहां ज़िला मजिस्ट्रेट भी अवस्थित थे, और दूसरे का मुख्यालय तमलुक में. इस दूसरे भूमि ज़िला में, चार सबडिवीज़न थे, ज़मीन तीन फसल देती थी तथा आबादी क़रीब 55 लाख थी. इसलिए इस क्षेत्र में ज़मीन से जुड़े विवाद और बखेड़े भी अनुपातिक रूप में कहीं अधिक थे.

तमलुक आने के कुछ दिनों बाद मैंने पाया कि मेरा हर सोमवार और शुक्रवार कलकत्ता उच्च न्यायालय में बीत रहा है.

‘… हैरत की बात है कि अभी पिछले सप्ताह ही मेरे सामने तमलुक के ज़िला भूमि व भूमि संस्कार दफ़्तर का ऐसा ही एक मामला पेश किया गया था,’ कलकत्ता उच्च न्यायालय के जस्टिस चिंतित भाव से बोल रहे थे. डेढ़ वर्ष पूर्व इस अदालत ने वहां के ज़िला भूमि व भूमि संस्कार अधिकारी को निर्देश दिया था कि दो महीने के अंदर आवेदक को बुला कर शिकायत की सुनवाई करें तथा तथ्य संगत आदेश पारित करें. लेकिन सुनवाई अभी तक नहीं की गई है. आज के इस मामले में भी ऐसी ही स्थिति है.’

‘दरअसल, मिलोर्ड, आपके समक्ष आए ज़िला भूमि व भूमि संस्कार अधिकारी कुछ ही दिनों पहले तमलुक स्थानांतरित हो कर आए हैं,’ सरकारी वकील ने खिसियाई मुस्कान के साथ सफ़ाई देने की कोशिश की, ‘इसलिए वह इस बारे में कुछ कर नहीं पाए हैं…’

इस भड़काऊ बात को सुनकर भी जज साहब ने संयम नहीं खोया. मेरी तरफ़ देखते हुए उन्होंने कहा, ‘आशा करता हूं कि ज़िला भूमि व भूमि संस्कार अधिकारी, तमलुक इस मामले में सुनवाई अगले दो महीनों में पूरी कर के आदेश पारित करेंगे तथा यह भी सुनिश्चित करेंगे कि उनके दफ़्तर में लंबित पड़े मामलों की सुनवाई शीघ्रातिशीघ्र पूरी की जाएगी.’

सितंबर 1995 के अंतिम शुक्रवार को भूमि व भूमि संस्कार अधिकारी, तमलुक के विरुद्ध न्यायालय की अवमानना की एक और सुनवाई इस तरह समाप्त हुई.

अदालत से निकलकर सरकारी वकील मुझे धैर्यपूर्वक सलाह देने लगे कि वो पहले भी कई बार यह बात कह चुके हैं कि कम से कम उन पुराने मामलों में कार्रवाई पूरी कर लेनी चाहिए जिनमें माननीय उच्च न्यायालय ने आदेश दे रखे हैं. पर यह हो नहीं रहा है और बार-बार उन्हें (यानी मुझे) जज साहब से खरी-खोटी सुननी पड़ती थी.

मैंने अपने दफ़्तर के भूमि विधि अधिकारी की ओर देखा तो वो वकील साहब के मुखड़े को निहारने लगे. विधि अधिकारी को अगले दिन सुबह ठीक 10 बजे मेरे दफ़्तर में आने को कहकर मैं वापस तमलुक के लिए रवाना हो गया.

रास्ते में मुझे ध्यान आया कि भारतीय प्रशासनिक सेवा में नियुक्ति के बाद 18 अगस्त 1989 की रात मैं राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी जाने के लिए दिल्ली के अंतरराज्यीय बस अड्डे से मसूरी जाने वाली बस में जा बैठा था. बस चलने से ठीक पहले मेरे विचारशील मित्र अजय ने मुझे श्रीलाल शुक्ल का ‘राग दरबारी’ पकड़ाते हुए मुस्कराकर कहा था, ‘इसे पढ़ लेना.’

प्रिय पाठक, चूंकि आप निश्चय ही इस पुस्तक के अद्वितीय व्यंग का रसास्वादन कर चुके हैं, मुझे विश्वास है कि उपरोक्त घटना को पढ़कर आपके मस्तिष्क में इस कृति का एक किरदार लौट आया होगा. जी हां, उस दिन उच्च मुख्यालय से तमलुक लौटते समय मेरे दिमाग़ में भी शिवपालगंज गांव का जीवट वाला वही गरीब ‘लंगड़’ घूमता रहा.

लंगड़ ने अपनी ज़िंदगी अफ़सर-बाबू से जूझते, कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते, वकील-पेशकार की मिन्नतें करते, अपनी ज़मीन के मुक़द्दमों के पीछे दौड़ते-भागते हुए ही बिता दी थी. लेकिन मुझे वह अब कहानी का किरदार कम और मेरे कर्म जीवन का अंश अधिक दिखता था. ऐसे वक्त पर यह अहसास भी होता था कि मैं स्वयं व्यवस्था से व्यथित अनगिनत लंगड़ जैसे पीड़ितों के वास्तविक संघर्ष में एक किरदार बन गया हूं. कलकत्ता से तमलुक का रास्ता तय करता हुआ मैं सोचता रहा कि इस रंगमंच पर कैसी होगी मेरी भूमिका.

ज़मीन से संबंधित मुक़दमों के जज साहब, न्यायालय की अवमानना की सुनवाई सप्ताह के इन्हीं दो दिनों- सोमवार और शुक्रवार में करते थे और ऐसा लगने लगा था कि हरेक मामले में ही ज़िला भूमि व भूमि संस्कार अधिकारी, तमलुक ने न्यायालय की अवमानना की है. मुझे रह-रहकर लंगड़ याद आ जाता था. उस दिन जज साहेब की फटकार के बाद स्थिति असहनीय हो गई.

अगले दिन सुबह दफ़्तर खुलने के साथ दस बजे ही अस्त-व्यस्त खिचड़ी बालों के तले उनींदी आंखों वाले दीर्घाकार भूमि विधि अधिकारी संजीव चटर्जी मुझसे मिलने आ गए. मुझे पता था कि चटर्जी ढाई घंटे लोकल ट्रेन तथा बस से यात्रा करके ऑफिस पहुंचते हैं, इसीलिए मैंने उन्हें दफ़्तर खुलते ही हाज़िर होने के लिए कहा था.

अब अपने सामने बिठाकर उनसे मैंने जानने कि कोशिश की कि बार-बार उच्च न्यायालय में हमें एक ही तरह की बात क्यों सुनने को मिलती है? क्यों ऐसे मुक़दमों की सुनवाई समय पर नहीं हो रही है? हमारे दफ़्तर में पड़े विचाराधीन मामलों की निगरानी करने का तरीक़ा क्या है?

भूमि विधि अधिकारी ने अपनी सफ़ाई ‘र’ से रामायण से आरंभ की. उन्होंने मुझे अपने दायित्व भार के विस्तार से अवगत कराने का प्रयास किया- चार सबडिवीज़नों वाला यह भूमि ज़िला कितना विशाल है, इस इलाक़े में जनसंख्या का घनत्व ग्रामीण बंगाल में सर्वाधिक है, इस इलाक़े में ज़मीन कितनी उर्वर तथा महंगी है, और इसी वजह से यहां के लोग कितने कुटिल, झगड़ालू, और मुक़दमेबाज हैं, इत्यादि.

दफ़्तर में पड़े मुक़दमों पर कार्रवाई पूरी करने की प्रक्रिया समझाने के अलावा चटर्जी महोदय जब मुझे सब कुछ बता चुके तो मैंने उनसे एक सरल सवाल किया, ‘आमादेर दफ़्तरे हाई कोर्टेर ऐइ धरणे मोट कौटा मामला पड़े रोयचे? आर काहिनी ना शुनीए शठीक संख्या देबेन (हम लोगों के दफ़्तर में उच्च न्यायालय में इस तरह के कितने मुक़दमे लंबित हैं. मुझे और क़िस्से न सुनाकर सही संख्या बताइए).’

कुछ क्षणों तक चटर्जी मुझे दर्द भरी आंखों से देखते रहे, फिर धीरे से कहा, ‘बोलते पारबो ना, सर. आमी जानी ना (नहीं बता पाऊंगा सर. मुझे नहीं पता).’

भूमि विधि अधिकारी को लेकर उसी समय मैं विधि सेक्शन में पहुंचा. एक ऊंची छत वाले हॉल में दीवारों के किनारे-किनारे क़तारों में मेज़ लगी थीं और हर मेज़ पर था फाइलों का ढेर. स्टील की कुछ अलमारियां भी फाइलों से ठसाठस थीं. इसके अलावा नौ फुट की ऊंचाई पर चारों दीवारों पर लगातार चौड़ी ताक़ लगी हुई थी जिन पर भी धूल की बारीक चादर ओढ़े फाइलें सजी रखीं थीं.

लेकिन दफ़्तर का केस रजिस्टर, जहां इन सारी फाइलों का संक्षिप्त ब्योरा होना चाहिए और जिसके द्वारा उनकी अग्रगति पर निगरानी रखी जाती है, नदारद था. इसके बग़ैर क्रमगत रूप से मुक़दमों की प्रक्रिया को व्यवस्थित नहीं किया जा सकता था. मुझे भान हुआ कि इस हॉल के बाहर कई ‘लंगड़’ इंतज़ार कर रहे हैं.

मैंने चटर्जी महोदय को दो सप्ताह के अंदर केस रजिस्टर तैयार करने को कहा. जैसा अक्सर होता है, काम की नई जगह में वक्त तेज़ी से निकल जाता है. दो सप्ताह बाद मैंने चटर्जी से केस रजिस्टर मांगा तो उन्होंने कुछ और दिनों की मोहलत का आवेदन किया. मैंने कहा एक सप्ताह और सही.

क़रीब दस दिन बाद मैंने भूमि विधि अधिकारी को बुला कर पूछा तो सकपकाए हुए चटर्जी महोदय बुदबुदाने लगे, ‘सार, अनेक काज…, धूलो भोरती फाइल …, नामानोर लोक नेई … (सर, अत्याधिक काम …., धूल भरी फाइलें…, फाइलें उतारने वाले लोगों की कमी …).’ मैं समझ गया कि अगर अभी तक धूल से सनी फाइलें ही ताक़ से नहीं उतारी गई हैं तो केस रजिस्टर का श्री गणेश भी नहीं हुआ है. क्षोभ और क्रोध से मैं जल उठा पर अभी आपा खोने का समय न था.

मैं भूमि विधि अधिकारी को लेकर सीधा विधि सेक्शन में पहुंचा. दिन के बारह बजने लगे थे और सारे कर्मचारी अपनी-अपनी मेज़ों पर थे. घुसते ही मैंने एक मेज़ को दीवार के पास सरकाया और उस पर चढ़कर ऊंची आवाज़ में हॉल में उपस्थित सभी को संबोधित किया, ‘जे हेतु आपनारा केस रजिस्टर तोयरी कोरते पार्च्चेन ना, भाबची आमी ई कोरे दी (चूंकि आप सब केस रजिस्टर तैयार नहीं कर पा रहे हैं, सोचता हूं मैं ही कर दूं….).’ और फिर मैं दीवार पर लगी ताक़ से मोटी-मोटी फाइलें मेज़ पर डालने लगा.

फाइलों के गिरने की धड़-धड़ के साथ मेरे आसपास चारों ओर धूल के उठते बादलों के बीच से आवाजें आने लगी, ‘सार, दया कोरे आपनी हाथ देबेन ना… (सर, कृपया आप हाथ ना लगाएं.),’ ‘आमरा कोरे दीच्ची….(हम लोग कर देते हैं….).’ मैं फाइलें उतारता रहा पर जब अधिकतर कर्मचारी मेज़ को घेरकर अनुरोध करने लगे तो मैं रुक गया.

ठीक एक सप्ताह के बाद भूमि व भूमि संस्कार दफ़्तर, तमलुक का 10,500 से अधिक मामलों के विवरणों वाला केस रजिस्टर बन कर तैयार हो गया. अक्सर प्रशासन में जो जटिल या अरुचिकर काम केवल आदेश देने से नहीं होता, खुद हाथ लगाने से हो जाता है.

(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)

(इस श्रृंखला के सभी लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.