पिछले दिनों देश की राजधानी दिल्ली में मालवीय नगर स्थित एक होटल नाना प्रकार की लापरवाहियों के चलते आग के हवाले होकर उसमें ठहरने वालों के लिए लाक्षागृह बन गया, तो उसके मालिक लवकेश बजाज ने पुलिस की गिरफ्त में आने के बाद एक ऐसी बात कही, जो किसी भी मायने में सिस्टम (यानी व्यवस्था) के गालों पर झन्नाटेदार थप्पड़ से कम नहीं थी.
इस कारण वह व्यापक विचार-विमर्श की मांग करती थी. इसकी मांग भी कि व्यवस्था खुद उसके आईने में अपना चेहरा देखे और संभव हो तो अपनी उस शर्म को पुनर्जीवित करे, जिसे बहुत पहले मार आई है. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और बात आई गई हो गई.
दरअसल, होटल में बारह विदेशियों सहित 21 लोगों (जिनमें ज्यादातर पास के एक अस्पताल में इलाज के लिए आए देसी-विदेशी मरीज या तीमारदार थे) की मौत और लगभग इतने ही लोगों के अस्पताल के बिस्तर, आईसीयू और वेंटिलेटर तक पहुंच जाने के बाद पुलिस जागी और मुख्य आरोपी लवकेश को गिरफ्तार किया तो पूछताछ में, जैसा कि बहुत स्वाभाविक था, पूछा कि उसने सारे नियम-कायदों को बुरी तरह ठेंगा दिखाते हुए होटल में अवैध निर्माण और सुरक्षा मानकों का घोर उल्लंघन क्यों किया?
इस पर लवकेश का किसी भी तरह की हिचक या अपराध बोध के बिना बिल्कुल सीधा जवाब था, ‘दिल्ली में सब चलता है!’
इस ‘सब चलता है’ का विस्तार यह था कि चूंकि उसके पास खुद होटल संभालने का समय नहीं था, इसलिए उसने उसकी जिम्मेदारियां किसी दूसरे व्यक्ति को सौंप दी थी, जिसके चलते बिलिंग व हिसाब-किताब समेत होटल की पूरी व्यवस्था वह दूसरा व्यक्ति ही संभाल रहा था.
उसकी इमारत में बदलाव (जिसमें कमरों का आकार बढ़ाना और उनमें फेरबदल करना भी शामिल था) भी दूसरे व्यक्ति ने ही सुझाए थे और उस दूसरे को भी भरोसा था कि चूंकि दिल्ली में इस तरह के इंतज़ाम ‘आम बात’ हैं और ‘सब कुछ चलता है’, इसलिए सब कुछ ऐसे ही चलता चला जाएगा. अग्निकांड से पहले तक चलता आ भी रहा था.
लवकेश का यह जवाब और उसका ‘भाष्य’ एकदम स्पष्ट था- यह कि होटल में ढेर सारी लापरवाहियों का एक साथ इंतजाम इसलिए संभव हुआ क्योंकि वह पूरी तरह ‘सामान्य’ इंतजाम था.
अपने लंबे तजुर्बे के कारण इस ‘सामान्यता’ को उससे पूछताछ करने वाले तो समझते ही थे, वे भी समझते थे, जिन्होंने उससे पूछताछ की खबर लिखी या कैमरे में कैद करके दिखाई. वे भी, जिन्होंने विभिन्न समाचार माध्यमों पर उसे देखा, सुना या पढ़ा.
व्यवस्था के लिए भी वह ऐसी नहीं ही थी, जिससे वह एकदम से समझ ही नहीं पाए कि वह लवकेश के अपराध में उसकी साफ-साफ मिलीभगत व भ्रष्टाचार पर भी टिप्पणी है. ऐसी दो टूक टिप्पणी जो होटल को लाक्षागृह बना देने में उसकी हिस्सेदारी लवकेश की जिम्मेदारी से बड़ी कर देती है.
लेकिन विडंबना यह कि इनमें से किसी का भी मुंह नहीं खुला. खुले भी भला कैसे, प्रतिवाद की कोई गुंजाइश ही नहीं थी और स्वीकार करने का अर्थ था खुद अपने हाथों अपने मुंह पर कालिख पोतना और ‘आ बैल मुझे मार’ कहना. इसलिए ‘बैल और जिसे भी मारे, अपनी सारी कालिख के साथ हम बचे रहें’ वाला रास्ता अपना लिया गया.
गौरतलब है कि ऐसा तब हुआ, जब हालात को बयान या उसकी तर्जुमानी करने वाली अन्य खबरों पर तरह-तरह से विचार भी किए जा रहे थे और विमर्श भी.
मिसाल के तौर पर छह कमरों की अनुमति थी, लेकिन होटल में पच्चीस (कुछ खबरों के अनुसार इनसे भी बहुत ज्यादा) बना लिए थे… बिना मंजूरी के बनी उसकी बहुमंजिला इमारत में आने-जाने का एक ही रास्ता था… किसी भी मंजिल पर बालकनी नहीं थी और छत का दरवाजा बंद था….किचन भी गैरकानूनी ढंग से बने बेसमेंट में थी और आग लगते ही कुक शटर बंद करके भाग गया था… उसने किसी को भी अलर्ट करना जरूरी नहीं समझा था…
और…लगभग पांच महीने पहले सात जनवरी को दिल्ली हाईकोर्ट ने अफसरों को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के होटलों, रेस्तरांओं और अन्य आतिथ्य प्रतिष्ठानों में अग्नि सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को तत्काल दूर करने का जो निर्देश दिया था, उस पर अमल की जरूरत नहीं समझी गई थी….नियम-कायदों के पेंचों का फ़ायदा उठाकर फायर एनओसी नहीं ली गई थी, सो अलग. वगैरह-वगैरह.
यहां पर एक पल रुककर सोचिए जरा, ‘सब’ नहीं चलता तो भी हद दर्जे की लापरवाही की पर्याय इन सारी जानकारियों को आम होने के लिए उक्त ‘फ्लरिश स्टे बेड एंड ब्रेकफास्ट (बी एंड बी) होटल’ में भीषण अग्निकांड का इंतजार होता क्या? क्यों होता भला? अग्निकांड के फौरन बाद उपलब्ध हो गईं ये जानकारियां उसे रोकने के लिए जिम्मेदार अमले के पास पहले ही क्यों नहीं होतीं? और होतीं तो समय रहते उनका इस्तेमाल न करके होटल को लाक्षागृह क्यों बन जाने दिया जाता?
इस क्यों का विस्तार करें तो ‘सब’ नहीं चलता तो भला नगर नियोजन की नीति ही भला इतनी लचर क्यों होती कि देश में जहां कहीं भी ऐसे अग्निकांड होते, वहां ऐसी या इनसे मिलती-जुलती लापरवाहियां ही सामने आतीं?
फिर एक प्रेक्षक यह बात ही क्यों कहता कि दूसरे शहरों व राजधानियों में भी ऐसे मालवीय नगरों की कोई कमी नहीं है, जहां ऐसे अग्निकांडों की आशंका बलवती हो. कारण यह कि ‘सब चलता है’ के कारण स्थिति यह है कि किसी को ठीक से पता नहीं होता कि किसी पूरी तरह आवासीय क्षेत्र को अचानक व्यावसायिक क्षेत्र में कैसे बदल दिया गया? उसके नजदीक किसी नामी अस्पताल के खुलने के बाद उसके हर घर में होटल. रेस्तरां या पैथलैब कैसे खुल गईं? किसने इसकी इजाजत दी और लैंड यूज कैसे बदल गया?
बात को इस तरह भी कह सकते हैं कि बात पता सबको होती है, लेकिन चूंकि व्यवस्था में फैली भ्रष्टता की प्रवृत्ति से लेकर उसके शिकार महानुभावों के अनियंत्रित होते जा रहे लोभ-लालच तक जाती है, इसलिए कहीं या सुनी नहीं जाती. चूंकि ‘सब चलता है’ इसलिए वहां तक उसका पीछा करना गवारा नहीं किया जाता. इसलिए लापरवाही का कोई भी लाक्षागृह अंतिम भी नहीं सिद्ध होता.
सिद्ध भी कैसे हो? बहुत पहले की बात छोड़ भी दें तो इसी साल, 14 अप्रैल को अग्निशमन सेवा दिवस मनाए जाने के बाद देश भर में अग्निकांडों का सिलसिला-सा शुरू हो गया तो भी उनके शमन के लिए जिम्मेदार अमले को सचेत होना गवारा नहीं हुआ.
मिसाल के तौर पर अग्निशमन सेवा दिवस के महज चार दिन बाद नवी मुंबई में उरण के गावन फाटा स्थित एक कार्गो हैंडलिंग गोदाम में विस्फोटों के बीच भीषण आग लगी तो 20 अप्रैल को पुणे के भोसरी एमआईडीसी इलाके की एक फैक्ट्री में. इससे एक दिन पहले 19 अप्रैल को मुंबई सेंट्रल के बीआईटी चॉल इलाके में आग लगने से तीन लोगों की मौत हुई तो इसी सुबह दक्षिण मुंबई के प्रसिद्ध क्रॉफर्ड मार्केट (महात्मा ज्योतिबा फुले मंडई) में तीन दुकानें जलकर खाक हो गईं. भिवंडी में एक फैक्ट्री व बदलापुर के एक डाइंग यूनिट में भी आग लगने की बड़ी घटनाएं हुईं.
इससे पहले 16 अप्रैल को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के विकास नगर क्षेत्र में हुए भीषण अग्निकांड में 250 से ज्यादा झुग्गियां जलकर खाक और दो मासूम बच्चों की मौत हो गई थी.
फिर उतनी दूर क्यों जाना? हम जिस अग्निकांड पर बात रहे हैं, उसके बाद भी अग्निकांडों का सिलसिला रुका नहीं है. बिहार स्थित मुजफ्फरपुर के ब्रह्मपुरा क्षेत्र के प्रसाद नामक निजी अस्पताल की आईसीयू में आग लगने से पांच मौतें हो गई हैं. जानकारी मिली है कि यह आग बिजली के शार्ट सर्किट के कारण लगी.
‘सब चलता है’ और सिर्फ दिल्ली में नहीं, दूसरी जगहों पर भी चलता है, इसलिए लापरवाहियों का यह सिलसिला अनंत है और तब भी जारी रहता है, जब सबको पता है कि हमारे जैसे गर्म देश में गर्मी की ऋतु में अग्निकांड कतई अप्रत्याशित नहीं होते और कहा जाता है कि गर्मी बाद में आती है, अग्निकांड पहले आ धमकते हैं.
सवाल है कि फिर भी हमारी व्यवस्था से उनको रोकने के प्रति गंभीर रुख अपनाकर उनसे होने वाली जनधन हानि को सीमित करना क्योंकर संभव नहीं होता? इसीलिए तो कि ‘सब चलता है’.
इसलिए अग्निकांड दिल्ली में हों, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र या सूरज के ताप से पीड़ित देश के दूसरे किसी इलाके में और महानगर में हों या गांव में, उनके पीछे लापरवाही की (वह नागरिकों की ओर से बरती जाए या सरकारी अमले की ओर से) एक जैसी भूमिका दिखाई देती है.
आग लगने पर कुंआ खोदने या अपनी लापरवाहियों को याद करने लगने की हमारी और हमारे निजाम की पुरानी आदत भी इसीलिए नहीं जा रही.
हालांकि, ‘जंगल की आग’ जैसा मुहावरा दे गए हमारे पुरखे तक इस तथ्य से अनजान नहीं थे कि आग जैसे भी लगे, लग जाती है तो बहुत तेजी से फैलती है. इसलिए वे इतनी सावधानी बरतने पर जोर देते थे कि वह लगे ही नहीं.
लेकिन आज हमारी जिस ‘सावधानी’ को लापरवाही का साफ-साफ विलोम होना चाहिए था, उसका आलम किसी को भी बताने की जरूरत नहीं है. इस कारण, क्या गांव और क्या शहर,
कभी स्टोव या सिलिंडर फटने से, कभी बिजली के शार्ट सर्किट से या उसके तारों अथवा टांसफार्मरों व जनरेटरों से निकली चिनगारियों से, कभी असावधानी से फेंकी गयी बीड़ी सेे, कभी चूल्हे की राख के भभक उठने सेे, कभी फुंके हुए सरकंडों वगैरह से तो कभी घर के चिराग यानी ढिबरी वगैरह से आग लग ही जाया करती है. और जब लग जाती है तो पता चलता है कि हम उसके लिए तैयार ही नहीं हैं. यह तो खैर सुविदित तथ्य है कि अग्निशमन की सरकारी व्यवस्था गांवों तो गांवों, महानगरों तक में भी अपर्याप्त ही है.
ऐसे में यकीनन, सावधानी ही अग्निकांडों से बचने का सबसे प्रमुख साधन है, लेकिन हम व्यक्तिगत व व्यवस्थागत दोनों स्तरों पर उससे हीन हैं. फिर उम्मीद किससे की जाए और कैसे?
एक पुराना वाकया याद आता है. याददाश्त के आधार पर बता रहा हूं. राजधानी में किसी बड़ी अवैध इमारत के ध्वस्तीकरण से जुड़े मामले की सुनवाई कर रहे दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज ने जिम्मेदार लोगों से पूछा कि आपके पास इतने जूनियर इंजीनियर हैं, वे अवैध निर्माणों को तभी क्यों नहीं रोक देते, जब वे शुरू किए जाते हैं? वे ऐसा नहीं करते तो आप उन पर सख्त कार्रवाई क्यों नहीं करते? उसे बताया गया कि जूनियर इंजीनियर इस सीमा तक भ्रष्ट हो चुके हैं कि हम उन पर कार्रवाई शुरू कर दें तो हमारे पास कोई काम करने वाला जूनियर इंजीनियर बचेगा ही नहीं! इसलिए हम उनसे जैसे-तैसे काम चला रहे हैं.
आप ही बताइए, ऐसे में ‘सब’ नहीं तो और क्या चलेगा भला? और व्यवस्था आग लगने से पहले कुंआ खोदना क्यों शुरू करेगी भला? ऐसा ही रहे तो कौन जाने किसी दिन आग लगने पर भी कुंए खोदने का चलन न रह जाए! अलबत्ता, आप चाहें तो अभी भी पूछ सकते हैं – यह सब क्या और क्यों चल रहा है भाई? लेकिन इस ‘सब चलता है’ के बीच आपको जवाब कौन देगा भला? परीक्षाओं के पेपर लीक वगैरह के भुक्तभोगियों को दे रहा है क्या?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
