क्या हिंदुत्व द्वारा दहशतगर्दी फैलाने का कोई प्रोजेक्ट देश में मौजूद है?

21वीं सदी के पहले दशक में कई ऐसे आतंकी हमले हुए जिनमें मुस्लिम धार्मिक या सांस्कृतिक सभाओं या आम नागरिकों को निशाना बनाकर धमाके किए गए. पुलिस ने शुरू में मुस्लिम पुरुषों पर आरोप लगाए और उन्हें जेल में डाल दिया, लेकिन समय के साथ- कभी-कभी तो दशकों बाद- इन्हें बरी और रिहा किया गया. इसके बाद नई जांच शुरू हुई, जिसमें 'हिंदुत्व' संगठनों के सदस्यों के ख़िलाफ़ आरोप दायर किए गए.

समझौता एक्सप्रेस धमाके के बाद की तस्वीर. (फोटो: पीटीआई)

‘यह कहते हुए मुझे गर्व हो रहा है कि कोई भी हिंदू कभी आतंकवादी नहीं हो सकता.’ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दिसंबर 2025 में संसद के शीतकालीन सत्र में यह घोषणा की. लंबे समय से भाजपा सरकारों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के नेताओं ने हिंदुत्व या ‘भगवा’ आतंकवाद के अस्तित्व, या इसकी संभावना से भी इनकार किया है. हालांकि, बड़े हिंदुत्व समूह से जुड़े कुछ संदिग्ध संगठनों- जैसे अभिनव भारत, जय वंदे मातरम और सनातन संस्था- के चिंताजनक उभार के पुख़्ता सबूत मौजूद हैं.

आज हमारे पास यह मानने का भी आधार है कि वास्तव में एक सुनियोजित हिंदुत्व आतंकी ढांचा मौजूद है. यह ढांचा गुपचुप तरीक़े से परदे के पीछे रहकर, आतंकी हमलों को अंजाम देता है. इस तरह से हमले करता है कि इसका दोष भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के मुसलमानों पर आ जाए.

(दो भागों में विभाजित इस श्रृंखला में मैं इन दोनों ही पहलुओं पर चर्चा करूंगा. यह पहला भाग है.)

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बम धमाकों की, वे घटनाएं जिन्होंने पहली बार ‘हिंदुत्व आतंकवाद’ का पर्दाफ़ाश किया

अप्रैल 2006 में महाराष्ट्र के नांदेड़ में एक घर में बम धमाका हुआ. यह घर लक्ष्मण गुंडैया राजकोंडवार का था, जो आरएसएस के सदस्य थे और नांदेड़ के पीडब्ल्यू से एग्जीक्यूटिव इंजीनियर के तौर पर रिटायर हुए थे. इस धमाके में दो लोगों की मौत हो गई और चार अन्य घायल हो गए. सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि इस घटना में जो लोग मारे गए या घायल हुए सभी व्यक्ति बजरंग दल के कार्यकर्ता थे.

शुरुआत में स्थानीय पुलिस ने घायल कार्यकर्ताओं की इस बात को मान लिया कि यह धमाका एक हादसा था. ऐसा दावा किया गया था कि राजकोंडवार अपने घर से पटाखों का कारोबार करते थे. किसी ने पटाखों के पास सिगरेट पीते समय लापरवाही बरती, जिसके कारण यह धमाका हो गया.

लेकिन जल्द ही पुलिस को एक बिल्कुल अलग और बेहद परेशान करने वाली बात पता चली. पुलिस को जानकारी मिली कि बजरंग दल के कार्यकर्ता इस जगह पर बम बना रहे थे, और ग़लती से बम फट गया.

पुलिस महानिरीक्षक ने मीडिया को बताया कि मारे गए और घायल लोगों के शरीर पर ‘बम के छर्रे’ मिले हैं. उन्हें घटनास्थल पर एक ‘लाइव’ (सक्रिय) पाइप बम भी मिला. आगे की जांच करने पर पुलिस को पता चला कि मारे गए और घायल लोग मुसलमानों के पूजा स्थलों को निशाना बनाने के लिए बम बना रहे थे.

वे अपने पूरे ऑपरेशन को इस तरह से अंजाम दे रहे थे, जिससे यह लगे कि यह किसी मुस्लिम आतंकवादी संगठन द्वारा किया गया हमला है. जिन लक्ष्मण गुंडैया राजकोंडवार के घर बम बनाया जा रहा था वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य निकले. बम धमाके में इनका बेटा नरेश भी मारा गया था.

पुलिस को वहां से कई अन्य आपत्तिजनक डायरियां, दस्तावेज़, संदिग्ध नक़्शे, मोबाइल फोन नंबर, रेखाचित्र और अन्य काग़ज़ात भी मिले. ये सभी चीज़ें बम बनाने और उन्हें जमा करने तथा देश में दहशत फैलाने के मक़सद से संभावित ठिकानों की पहचान से जुड़ी हुई थीं.

इस पर जानी-मानी पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ ने टिप्पणी करते हुए कहा, ‘एक तरह से देखा जाए तो, संघ परिवार के सदस्य अपने ही घर के तहख़ाने में बमों के साथ रंगे हाथों पकड़े गए थे.’

इस मामले की जांच की ज़िम्मेदारी महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) को सौंप दी गई. आतंकवाद निरोधक दस्ते की चार्जशीट में आरोप लगाया गया कि नांदेड़ में बम बनाने में शामिल आरोपी इससे पहले पास के ज़िलों में हुए तीन बम धमाकों के लिए भी ज़िम्मेदार थे. ये धमाके परभणी की मोहम्मदिया मस्जिद (नवंबर 2003) में, जालना की क़ादरिया मस्जिद (अगस्त 2004) में, और परभणी ज़िले के पूर्णा में स्थित मेराज-उल-उलूम मदरसा/मस्जिद (अगस्त 2004) में हुए थे.

इसके अलावा 5-6 अप्रैल 2006 को जो बम उनके ही हाथों में फट गए थे, उनसे वे औरंगाबाद की एक मस्जिद को नशाना बनाने वाले थे. पुलिस की जांच में ऐसे सबूत भी मिले जिनसे यह साबित हुआ कि ये सभी लोग आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे हिंदुत्ववादी संगठनों के सक्रिय सदस्य थे.

जांच ​​से पता चला कि आरोपी 2003 में पुणे के पास स्थित सिंहगढ़ क़िले की तलहटी में बने ‘आकांक्षा रिज़ॉर्ट’ गए थे, जहां उन्हें पाइप बम और टाइमर बम बनाने का प्रशिक्षण दिया गया था. उन्होंने नागपुर के भोंसला मिलिट्री स्कूल में 40 दिनों का प्रशिक्षण भी लिया था.

भोंसला मिलिट्री स्कूल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा यह शिविर आयोजित किया गया था, जिसका उद्देश्य प्रतिभागियों को कराटे, ज़मीनी बाधाओं को पार करने और रिवॉल्वर चलाने का प्रशिक्षण देना था.

दो सेवानिवृत्त पूर्व सैनिकों ने प्रतिभागियों को रिवॉल्वर चलाने का प्रशिक्षण दिया. तलाशी अभियान के दौरान भेस बदलने का सामान- जैसे नक़ली दाढ़ी, शेरवानी आदि- भी बरामद हुआ, जिनका इस्तेमाल मुस्लिम जैसा दिखने के लिए किया जाता था. यह मक़सद साफ़ था, वे आतंकवादी हमले करके इसका इल्ज़ाम मुसलमानों पर मढ़ना चाहते थे, ताकि उनके प्रति नफ़रत और बढ़ाई जा सके.

महाराष्ट्र के आतंकवाद निरोधक दस्ते के बेहद सम्मानित प्रमुख हेमंत करकरे ने पत्रकारों से कहा कि ठाणे-पनवेल-वाशी बम धमाकों की जांच से पता चला है कि ये धमाके ‘निश्चित रूप से आतंकवादी कृत्य थे, क्योंकि इन्हें एक ख़ास विचारधारा से प्रेरित लोगों ने अंजाम दिया था.’

उन्होंने आगे कहा कि ये लोग जिन संगठनों से जुड़े थे, अगर वे इन घटनाओं की योजना बनाने या उन्हें अंजाम देने में शामिल पाए जाते हैं, तो आतंकवाद निरोधक दस्ता ‘निश्चित रूप से केंद्र सरकार को पत्र लिखकर उन पर प्रतिबंध लगाने की मांग करेगा.’

26/11 के हमलों के दौरान मारे जाने से ठीक एक महीने पहले सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेपी) से बात करते हुए उन्होंने ख़ुलासा किया, ‘हमारी जांच से कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं. हिंदू जनजागृति समिति, धर्मक्रांति सेना और सनातन संस्था जैसे संगठनों में तो पूर्णकालिक सदस्य हैं. इसके अलावा ‘गुरु कृपा प्रतिष्ठान’ भी है. सनातन संस्था का आश्रम काफ़ी बड़ा है, जिसमें सौ लोग रह सकते हैं, ज़ाहिर तौर पर वे वहां योग सीखते हैं… हमारी जांच में यह सवाल उठ रहा है कि क्या हम इन संगठनों पर आरोप लगा सकते हैं? क्या ये कृत्य इन संगठनों के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए किए गए थे? ये सभी संगठन चैरिटी कमिश्नर के पास पंजीकृत हैं. हम चैरिटी कमिश्नर की मदद से इनके फ़ंडिंग के स्रोतों की जांच कर रहे हैं. क्या इनके फ़ंडिंग के स्रोत एक ही हैं? क्या इन्हें हिंसक सामग्री जुटाने से जोड़ा जा सकता है?’

दुख की बात है कि ठीक एक महीने बाद करकरे मुंबई में कई जगहों पर एक साथ हमला करने वाले आतंकवादियों का बहादुरी से मुक़ाबला करते हुए शहीद हो गए.

2008 में जब हिंदुत्ववादी आतंकी संगठनों के बारे में सबूत सामने आने लगे थे और संघ तथा उसके सहयोगी संगठनों के असली चरित्र पर चर्चा करना उतना ख़तरनाक नहीं था, जितना 2014 के बाद हो गया. तब हैदराबाद विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर ज्योतिर्मय शर्मा ने एक ऐसी बात पर टिप्पणी की जिसे उन्होंने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का एक ‘मज़ेदार तमाशा’ बताया.

जब मैं यह लेख लिख रहा हूं तब भी यह तमाशा जारी है.

शर्मा ने ज़ोर देकर कहा कि ‘हिंदू आतंकवाद’ जैसी कोई चीज़ नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे ‘इस्लामी/मुस्लिम आतंकवाद’ जैसी कोई चीज़ नहीं है. लेकिन ‘संघ परिवार आतंकवाद’ जैसी कोई चीज़ ज़रूर है, ठीक वैसे ही जैसे ‘अल-क़ायदा आतंकवाद’ है. ऐसा इसलिए है क्योंकि न तो साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और न ही ओसामा बिन लादेन अपने-अपने धर्मों का प्रतिनिधित्व करते हैं. जिस तरह ओसामा अफ़ग़ानिस्तान के अभेद्य पहाड़ों में छिपा था, उसी तरह प्रज्ञा जैसे लोग ‘जनता की इच्छा’ के लोकतांत्रिक आड़ में छिपते हैं. वे भविष्य को लेकर असाधारण रूप से दूरदर्शी थे.

उन्होंने 2019 में भाजपा के टिकट पर प्रज्ञा के सांसद चुने जाने की भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी. वे कहते हैं, ‘शांति, सहिष्णुता, शिष्टता और सत्य को चुनना कमज़ोरी की निशानी नहीं है- जैसा कि हिंसा और बदले की भावना के पैरोकार लोगों को यक़ीन दिलाना चाहते हैं- बल्कि यह हमारे भीतर के पशु-स्वभाव को ऊंचा उठाने का एक तरीक़ा है. बुद्ध, महावीर और गांधी कमज़ोर लोग नहीं थे. तो फिर, उनके आध्यात्मिक वंशज इतना अहम क़दम उठाने से क्यों डरते हैं?’

अजमेर शरीफ़, मक्का मस्जिद और समझौता एक्सप्रेस धमाके: वे आतंकी अपराध जिनके लिए मुस्लिम पुरुषों पर झूठे आरोप लगाए गए

इस ज़ोरदार खंडन के बावजूद कि हिंदुत्व आतंकवाद असंभव है यह साफ़ हो गया कि असलियत इससे बिल्कुल अलग थी. शायद इसलिए क्योंकि हिंदुओं के बारे में यह दावा किया जाता है कि वे सांस्कृतिक रूप से स्वाभाविक ढंग से अहिंसक और शांतिप्रिय होते हैं. यह भी कहा जाता है कि सभी आतंकवादी मुस्लिम होते हैं, ऐसा नैरेटिव इसलिए फैलाया जाता है ताकि हिंदुत्व की दुनिया में इस्लाम को एक ऐसे धर्म के रूप में बदनाम किया जा सके जो हिंसा का उपदेश देता है.

देश के बंटवारे के समय हुए दंगों के बाद से सांप्रदायिक हिंसा की बार-बार होने वाली घटनाओं में मुसलमानों को अपने हिंदू पड़ोसियों द्वारा की गई हिंसा की तुलना में कहीं ज़्यादा क्रूर हिंसा का शिकार होना पड़ा है. 2014 के बाद से हिंदुत्व संगठनों के सदस्यों और समर्थकों द्वारा की गई नफ़रती लिंचिंग (पीट-पीटकर हत्या) की ज़्यादातर घटनाओं का निशाना मुसलमान ही रहे हैं.

लेकिन सिर्फ़ यही नहीं. ख़ास तौर पर 2000 के दशक से बड़ी संख्या में ऐसे आतंकी हमले हुए हैं जिनमें हिंदुत्व संगठनों के सदस्य संलिप्त रहे हैं. हालांकि, 2014 के बाद उनके ख़िलाफ़ मामले लगातार कमज़ोर पड़ते गए और अंतत: ख़ारिज हो गए.

21वीं सदी के पहले दशक में कई ऐसे आतंकी हमले हुए जिनमें मुस्लिम धार्मिक या सांस्कृतिक सभाओं या आम नागरिकों को निशाना बनाकर विस्फोटक धमाके किए गए. पुलिस ने शुरू में मुस्लिम पुरुषों पर आरोप लगाए और उन्हें जेल में डाल दिया, लेकिन समय के साथ, कभी-कभी तो दशकों बाद इन पुरुषों को बरी किया गया और जेलों से रिहा कर दिया गया, और नई जांच शुरू हुई जिसमें अब हिंदुत्व संगठनों के सदस्यों के ख़िलाफ़ आरोप दायर किए गए.

मैं इस हिस्से में तीन प्रमुख आतंकी हमलों- अजमेर शरीफ़, मक्का मस्जिद और समझौता एक्सप्रेस धमाकों पर विस्तार से चर्चा करूंगा.

समझौता एक्सप्रेस धमाका 2007

समझौता एक्सप्रेस ट्रेन भारत और पाकिस्तान के लोगों के बीच सद्भावना बढ़ाने के लिए शुरू की गई थी. लेकिन 19 फरवरी 2007 को हरियाणा के पानीपत के पास ट्रेन में बम धमाके हुए, जिसमें 68 लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए. पीड़ितों में 43 पाकिस्तानी नागरिक और 10 भारतीय शामिल थे. बाक़ी 15 लोगों की पहचान नहीं हो पाई.

भारत सरकार ने तुरंत ही पाकिस्तान-समर्थित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की संलिप्तता की ओर इशारा किया. हालांकि, हरियाणा पुलिस के पूर्व अधिकारी विकास नारायण राय, जिन्होंने 2007 से 2010 की शुरुआत तक विशेष जांच दल (एसआईटी) का नेतृत्व किया था, ने द वायर को बताया कि एसआईटी को शुरुआती तौर पर पाकिस्तान-स्थित आतंकवादी समूह या स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) जैसे संगठन पर शक था, लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, यह साफ़ हो गया कि वे इसमें शामिल नहीं हैं.

उन्होंने कहा, ‘ये धमाके फरवरी 2007 में हरियाणा के पानीपत के पास हुए थे और दो या तीन दिनों के भीतर ही एसआईटी का गठन कर दिया गया था. उन डिब्बों में रखे ज्वलनशील उपकरणों के कारण दो बोगियों में आग लग गई थी. हम बहुत भाग्यशाली थे कि हमें एक ऐसा ज्वलनशील उपकरण मिल गया जिसमें धमाका नहीं हुआ था. यह उपकरण एक सूटकेस में रखा हुआ था. जब हमने इस उपकरण को खोला, तो हमने (बम में मौजूद) सभी चीज़ों के मूल स्रोत की तलाश शुरू कर दी. हमने उपकरण के हर हिस्से के निर्माताओं से संपर्क किया. हमने स्टॉकिस्टों से संपर्क किया. हमने ख़ुदरा विक्रेताओं की तलाश की.

पूरे भारत में कई जगह खोज की. आख़िरकार, हम इंदौर पहुंचे. वहां, हम उस बाज़ार का पता लगाने में सफल रहे जहां से उस ‘ज्वलनशील उपकरण’ के सभी हिस्से ख़रीदे गए थे. ये ख़रीदारी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके सहयोगी संगठनों से जुड़े लोगों द्वारा की गई थी. उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य सुनील जोशी और उसके दो साथियों की पहचान की जो इस अपराध में शामिल थे. हालांकि, इससे पहले कि वे जोशी से पूछताछ कर पाते, उसकी हत्या कर दी गई. उसके दोनों साथियों का अभी तक पता नहीं चल पाया.’

राय ने आगे बताया कि दूसरी जांच एजेंसियों के साथ हुई संयुक्त बैठकों में ही उन्हें पता चला कि मक्का मस्जिद धमाके (2007), अजमेर शरीफ़ धमाके (2007), मालेगांव धमाके (2006) और समझौता एक्सप्रेस बम धमाके में एक जैसा ही पैटर्न था.

राय ने कहा, ‘बिल्कुल वैसे ही डिवाइस, बिल्कुल वैसा ही तरीक़ा इस्तेमाल किया गया था… हमने हिंदुत्व से जुड़ी गतिविधियों में सक्रिय लोगों की एक लिस्ट तैयार की. ये ऐसे लोग थे जिन्हें (इस विचारधारा में) पूरी तरह से ढाल दिया गया था.’

राय ने द वायर को बताया, ‘हमें अगली बड़ी सफलता 2008 में मिली, जब मालेगांव में दूसरा धमाका हुआ. मुझे जानकारी मिली थी कि महाराष्ट्र के आतंकवाद निरोधक दस्ते के प्रमुख हेमंत करकरे को कुछ बहुत ही अहम सुराग़ हाथ लगे हैं. अक्टूबर 2008 में मेरी उनसे बातचीत हुई थी. उन्होंने मुझे बताया था कि प्रज्ञा सिंह ठाकुर की मोटरसाइकिल के ज़रिए वे हिंदुत्व नेटवर्क में शामिल कर्नल पुरोहित और असीमानंद जैसे दूसरे लोगों तक पहुंच सकते हैं. उन्होंने कहा था कि 15-20 दिनों में सारे सबूतों को एक साथ जोड़ने के बाद वे मुझसे दोबारा मिलेंगे, लेकिन ऐसा हो न सका, क्योंकि 26 नवंबर 2008 को मुंबई हमले में उनकी जान चली गई.’

राष्ट्रीय जांच एजेंसी की जांच को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ नेता स्वामी असीमानंद के क़बूलनामे से और भी बल मिला. मक्का मस्जिद और अजमेर शरीफ़ धमाका मामलों में न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने गवाही देते हुए उन्होंने क़बूल किया कि 2006 का मालेगांव धमाका और 2007 का समझौता एक्सप्रेस धमाका भी उसी आतंकी समूह का काम था, जिसने अजमेर शरीफ़ और मक्का मस्जिद में धमाके किए थे, और वे ख़ुद भी इस साज़िश में शामिल थे. इसी आधार पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने जून 2011 में आरएसएस, अभिनव भारत और जय वंदे मातरम से जुड़े निम्नलिखित आठ आतंकवादियों के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर की.

मुक़दमा लगभग आठ साल तक चला. 20 मार्च 2019 को अपने फ़ैसले में अदालत ने उन सभी चार आरोपियों को बरी कर दिया, जिन पर मुक़दमा चल रहा था, यानी स्वामी असीमानंद, लोकेश शर्मा, देवेंद्र गुप्ता और भरत भाई, क्योंकि उनके ख़िलाफ़ कोई विश्वसनीय सबूत नहीं मिला. सुनील जोशी की दिसंबर 2007 में हत्या कर दी गई थी. बाक़ी तीन- अमित चौहान, रामचंद्र कलसांगरा और संदीप डांगे- को भगोड़ा अपराधी घोषित कर दिया गया.

अदालत ने अपने 160 पन्ने के फ़ैसले में गहरा खेद व्यक्त करते हुए कहा कि वह आरोपियों को ‘दर्द और पीड़ा के साथ’ बरी कर रही है.

अदालत ने बेहद गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘अभियोजन पक्ष ने सबसे अहम सबूतों को छिपा लिया और उन्हें रिकॉर्ड पर नहीं रखा; …अभियोजन पक्ष के सबूतों में कई बड़ी कमियां हैं: …पूरा अभियोजन मामला आरोपियों के ख़ुलासे वाले बयानों पर आधारित पाया गया, जिन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता, और जिनके आधार पर न तो कोई तथ्य सामने आया और न ही कोई सामग्री या वस्तु बरामद हुई. …आरोपियों को संबंधित अपराध से जोड़ने वाला कोई भी ठोस मौखिक, दस्तावेज़ी या वैज्ञानिक सबूत रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया है: …उल्लिखित कुछ स्वतंत्र गवाहों की कभी जांच ही नहीं की गई: …जहां गवाहों ने अभियोजन पक्ष का समर्थन नहीं करने का फ़ैसला किया, वहां उन्हें जिरह (cross-examination) के लिए विरोधी गवाह (hostile witness) घोषित नहीं किया गया.’

अजमेर शरीफ़ धमाका: पहला मामला जिसकी फिर से जांच की गई

11 अक्टूबर, 2007 की शाम को अजमेर शरीफ़ में ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में इफ़्तार के लिए कई श्रद्धालु जमा हुए थे. अचानक एक बम फट गया, इसमें तीन लोगों की मौत हो गई और 15 लोग घायल हो गए.

बम धमाका करने के लिए इस्तेमाल किए गए मोबाइल फोन का सिम कार्ड ढूंढने में पुलिस को चार दिन से भी कम समय लगा. उन्हें पता चला कि यह सिम कार्ड, ज़िला दुमका के कगोई गांव के रहने वाले बाबूलाल रामफ़ेर यादव के नाम पर एक जाली वोटर आईडी कार्ड का इस्तेमाल करके ख़रीदा गया था. वहां एक और बम भी था जो फटा नहीं.

इस घटना के चार दिनों के भीतर ही स्थानीय पुलिस को पता चल गया कि वह सिम कार्ड ख़रीदा गया था. धमाके से सिम कार्ड का संबंध होने की एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी. यह रिपोर्ट 15 अक्टूबर, 2007 के टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी थी.

मालेगांव 2008 विस्फोट मामले में अभिनव भारत की संलिप्तता के सबूतों के बारे में ख़बर प्रकाशित होने के बाद राजस्थान राज्य सरकार का रुख़ बदल गया. इसने आतंकी अपराध की दोबारा जांच के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया. इसने छह व्यक्तियों के ख़िलाफ़ निष्पक्षता और पेशेवर ईमानदारी के साथ 806 पन्ने का आरोपपत्र दायर किया.

आरोपपत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि सुनील जोशी मध्य प्रदेश के महू ज़िले के संघ के प्रचार प्रमुख थे, संदीप डांगे मध्य प्रदेश के शाजापुर ज़िले के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचार प्रमुख थे, देवेंद्र गुप्ता झारखंड के जामताड़ा ज़िले के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचार प्रमुख थे, चंद्रकांत लेवे मध्य प्रदेश के शाजापुर ज़िले के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचार प्रमुख थे.

इसके अलावा रामजी कलसांगरा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अभिनव भारत के एक कट्टर कार्यकर्ता थे, और लोकेश शर्मा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा जय वंदे मातरम के एक और कट्टर कार्यकर्ता का नाम भी इस आरोपत्र में था.

अप्रैल 2011 में इस मामले को राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सौंपा गया था. इस मामले में स्वामी असीमानंद ने सनसनीख़ेज इक़बालिया बयान दिया. जुलाई 2011 में आतंक के आरोपी 13 लोगों के ख़िलाफ़ आरोप पत्र दायर किया गया. इनमें एसआईटी की चार्जशीट में शामिल 6 लोग, स्वामी असीमानंद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अभिनव भारत तथा जय वंदे मातरम के 6 अन्य सदस्य शामिल थे.

2017 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी की एक विशेष अदालत ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दो पूर्व प्रचारकों- देवेंद्र गुप्ता और सुनील जोशी (जिनकी दिसंबर 2007 में हत्या कर दी गई थी) – को भावेश पटेल के साथ दोषी पाया. यह पहला मौक़ा था जब आरएसएस के सदस्यों को आतंकी अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया था.

हालांकि, 2018 में राजस्थान हाईकोर्ट ने गुप्ता और जोशी को ज़मानत पर रिहा कर दिया.

(हर्ष मंदर सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक हैं.)

(शोध सहायता के लिए सुमैय्या फ़ातिमा और सैयद रूबील हैदर ज़ैदी का आभार.)

(मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की ‘कोलिका’ नामक संस्था से जुड़े हैं.)