क्या जवाहरलाल नेहरू 1947 से 1952 तक ‘निर्वाचित प्रधानमंत्री’ नहीं थे?

अंतरराष्ट्रीय इतिहासकार, संवैधानिक विशेषज्ञ और वैश्विक संस्थाएं नेहरू को 15 अगस्त, 1947 से ही भारत का पूर्ण रूप से वैध प्रधानमंत्री मानती हैं. इसी दौरान नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व किया, कई वैश्विक संधियां कीं और 1952 से पहले ही दुनिया में भारत की विदेश नीति की मजबूत नींव रखी. काश, इन सबके आलोक में ये भक्त समझ पाते कि नेहरू के 1947 से 1952 तक के कार्यकाल को नकारना या उसकी हेठी करना देश के बुनियादी इतिहास को नकारने जैसा है.

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(इलस्ट्रेशन: कैनवा)

क्या 14 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि नई दिल्ली में संसद भवन के केंद्रीय कक्ष (सेंट्रल हॉल) में संविधान सभा के समक्ष अपने ऐतिहासिक ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ भाषण (जिसे खासकर इस कथन के लिए याद किया जाता है कि ‘आज रात ठीक बारह बजे, जब पूरी दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जाग उठेगा.’) देने और अगली सुबह साढ़े आठ बजे गवर्नर-जनरल लॉर्ड माउंटबेटन से भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करने वाले पंडित जवाहरलाल नेहरू ‘निर्वाचित प्रधानमंत्री’ नहीं थे?

इस सवाल का अब एक बहुत सीधा-सा जवाब है: उन महानुभावों की निगाह में तो नहीं ही थे, जो आजकल यह जताने के लिए किसी भी सीमा तक चले जा रहे हैं कि हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत 10 जून को लगातार 4399 दिन तक निर्वाचित प्रधानमंत्री बने रहकर 4398 दिन के निर्वाचित प्रधानमंत्रित्व काल का पंडित नेहरू का रिकार्ड तोड़ दिया है.

यों, हम जानते हैं कि पंडित नेहरू 15 अगस्त, 1947 से 27 मई, 1964 को अपनी अंतिम सांस तक कुल मिलाकर लगभग सत्रह वर्ष देश के प्रधानमंत्री रहे. लेकिन उक्त महानुभाव अब तक सबसे लंबी अवधि तक प्रधानमंत्री रहने के उनके रिकार्ड को मोदी के हाथों टूटा बताने के लिए कह रहे हैं कि 15 अगस्त, 1947 से 13 मई, 1952 तक वे ‘निर्वाचित प्रधानमंत्री’ नहीं थे. इन महानुभावों के अनुसार निर्वाचित प्रधानमंत्री तो वे 13 मई, 1952 को बने, जब पहले आम चुनाव के बाद लोकसभा गठित हुई और उन्होंने पुनः प्रधानमंत्री पद की शपथ ली.

आइए, इस सवाल की पड़ताल करें कि क्या वाकई ऐसा है या इन महानुभावों ने अपनी मोदी भक्ति को पराकाष्ठा पर ले जाने के लिए रिकॉर्ड तोड़ने की कोई नई प्रणाली विकसित कर दी है? ऐसी प्रणाली, जिसमें किसी भी अटूट रिकार्ड को संदिग्ध करार देकर मानने से इनकार कर दिया जाए, फिर उसको टूटा हुआ बता दिया जाए?

निर्वाचित प्रधानमंत्री नहीं तो क्या?

दोनों ही स्थितियों में सबसे बड़ा प्रति प्रश्न यह है कि नेहरू 15 अगस्त, 1947 से 13 मई, 1952 तक निर्वाचित नहीं तो कैसे प्रधानमंत्री थे – नामजद, मनोनीत, अंतरिम या कार्यवाहक?

जानकार बताते हैं कि उस वक्त वे तत्कालीन केंद्रीय व्यवस्थापिका परिषद (सेंट्रल लेजिस्लेटिव काउंसिल) की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के विधिवत निर्वाचित नेता थे और अंतरिम संसद कहलाने वाली यह परिषद भी मनोनीत नहीं थी. उसका भी बाकायदा चुनाव हुआ था.

यह परिषद ब्रिटिश भारत में केंद्रीय स्तर पर कानून बनाने वाली सर्वोच्च संस्था थी. 1853 के चार्टर अधिनियम द्वारा गवर्नर-जनरल की परिषद की कार्यकारी और विधायी शक्तियों को अलग करके इसका गठन किया गया था. इसने देश में पहली बार खुली चर्चा के रास्ते कानून-निर्माण प्रक्रिया की शुरुआत की थी.

बाद में भारतीय परिषद अधिनियम 1861 के तहत इसे ‘इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल’ का नया नाम और विस्तारित रूप दिया गया. समय-समय पर (विशेष रूप से 1892 के अधिनियम द्वारा) इसमें भारतीय सदस्यों को नामांकित करने की अनुमति भी दी गई. अनंतर, भारत सरकार अधिनियम, 1919 (मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार) के तहत इसे एक द्विसदनीय केंद्रीय विधानमंडल में बदल दिया गया.

इस सबके बावजूद 15 अगस्त, 1947 को शपथ ग्रहण करने वाले नेहरू कुछ महानुभावों की निगाह में निर्वाचित प्रधानमंत्री नहीं बन पाए तो भला और कैसे बन सकते हैं?

तथ्य यह है कि 1935 के भारत परिषद अधिनियम के अनुसार 1946 तक प्रांतीय विधान परिषदों के जो चुनाव हुए थे, उनमें कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी. असम, बिहार, बंबई, सेंट्रल प्राविंस ऐंड बरार, मद्रास, यूनाइटेड प्राविंस, उड़ीसा और उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत में उसको पूर्ण बहुमत मिला था. बाद में इन्हीं प्रांतीय विधान परिषदों के निर्वाचित सदस्यों ने संविधान सभा के 389 सदस्यों का चुनाव किया था.

ब्रिटेन और अमेरिका की तरफ देखिए

हां, इस चुनाव में वयस्क मताधिकार नहीं था. मतदाता सूची में शिक्षा व संपत्ति के आधार पर कुल आबादी के 10-15 प्रतिशत वयस्कों के ही नाम थे और उनको ही मत देने का अधिकार था. लेकिन इस मतदाता सूची के आधार पर बाकायदा चुनाव, मतगणना और नतीजों की घोषणा हुई थी.

लेकिन यहां जो बात सबसे काबिल-ए-गौर है, वह यह कि उक्त महानुभाव अपने कारणों से (जिनमें मोदी भक्ति प्रमुख है) इस चुनाव में वयस्क मताधिकार न होने के कारण नेहरू को निर्वाचित प्रधानमंत्री नहीं मानते तो उनको 1920 से पहले के अमेरिका के किसी भी राष्ट्रपति तथा 1928 से पहले के ब्रिटेन के किसी भी प्रधानमंत्री को निर्वाचित कहने से परहेज़ करना चाहिए. क्योंकि तब तक इन देशों में सभी महिलाओं को मताधिकार प्राप्त नहीं था और ‘आधी आबादी’ मतदान प्रक्रिया से ही बाहर थी.

दरअसल, अमेरिका और ब्रिटेन में लंबे समय तक सीमित मताधिकार की व्यवस्था रही, जिसमें केवल संपत्ति वाले पुरुषों या श्वेत आबादी को वोट देने का अधिकार था. इसके बावजूद, उन दिनों चुने गए उनके राष्ट्रपतियों व प्रधानमंत्रियों को निर्वाचित ही माना जाता है. इस आधार पर कि वे तत्कालीन संवैधानिक प्रक्रियाओं के तहत चुने गए थे. वे क्या करते अगर तब सरकारें इसी लोकतांत्रिक मानक से चुनी जाती थीं?

भारत में 1947 में प्रांतीय विधान परिषदों द्वारा चुनी गई जिस संविधान सभा (अंतरिम संसद) के माध्यम से नेहरू प्रधानमंत्री बने, वह भी अपने समय की स्थापित लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत ही चुनी गई थी, जिसे वैश्विक स्तर पर पूरी मान्यता प्राप्त थी.

यह सभा संविधान सभा के रूप में तो काम करती ही थी, केंद्रीय व्यवस्थापिका परिषद के रूप में भी काम करती थी. संविधान सभा के रूप में उसका दायित्व संविधान का निर्माण करना था तो केंद्रीय व्यवस्थापिका परिषद के रूप में कानून बनाना. विभाजन के बाद इसके जो 229 भारतीय सदस्य बचे थे, उनमें 192 कांग्रेस के थे और नेहरू उनके नेता थे. बाद में इन सदस्यों में देशी रियासतों के प्रतिनिधि भी जुड़े.

तिस पर पंडित नेहरू की पहली कैबिनेट में कांग्रेस के ही नहीं अन्य पार्टियों के भी मंत्री थे. (इसके पीछे एक बहुप्रचारित तर्क यह था कि आज़ादी देश को मिली है, सिर्फ कांग्रेस को नहीं.) इन मंत्रियों में हिंदू महासभा के डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी और अनुसूचित जाति संघ के डॉक्टर भीमराव आंबेडकर भी शामिल थे, जिनसे उसका चरित्र और लोकतांत्रिक हो गया था. लेकिन क्या पता, अब उक्त महानुभाव डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी की नेहरू मंत्रिमंडल में साझेदारी को किस रूप में देखते हैं! वे नेहरू को ही निर्वाचित प्रधानमंत्री नहीं मानते तो मुखर्जी को निर्वाचित मंत्री क्या ही मानते होंगे!

कीर्ति बनाम करिश्मा

लेकिन उनके दुर्भाग्य से पंडित नेहरू प्रधानमंत्री भर नहीं थे और न ही उनकी कीर्ति उनके इस पद की मोहताज थी. वे आज़ादी की लड़ाई के अग्रणी सेनानी तो थे ही, 1929, 1935, 1936 और 1946 में कांग्रेस के अध्यक्ष तथा कुल मिलाकर लगभग नौ साल (3259 दिन) ब्रिटिश सरकार की जेलों में रहे.

आज़ादी के बाद उनके नेतृत्व में 1952, 1957 तथा 1962 के लगातार तीन चुनावों में कांग्रेस ने लोकसभा में दो तिहाई बहुमत प्राप्त किया. 1952 के आम चुनाव में उसने 489 सीटों में से 364 पर जीत हासिल की तथा 45.5 प्रतिशत मत पाए, जबकि 1957 में 494 सदस्यीय लोकसभा में 371 सीटें तथा 47.8 प्रतिशत मत. इसी तरह 1962 में उसे लोकसभा की 496 सीटों में से उसको 361 सीटें तथा 44.7 प्रतिशत मत मिले.

मोदी के ‘करिश्माई’ बताए जाने वाले ‘रिकार्डतोड़’ व्यक्तित्व से इसकी तुलना की जाए तो उनके नेतृत्व में भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में कुल 545 में से 281 सीटें तथा 31.1 प्रतिशत मत पाए, जबकि 2019 में 303 सीटें व 37.7 प्रतिशत मत. 2024 में तो वह साधारण बहुमत का आंकड़ा भी नहीं छू पाई और उसे महज 240 सीटें व 36.5 प्रतिशत मत ही मिले.

इस लिहाज से मोदी एक बार भी पंडित नेहरू द्वारा खींची गई लकीर के आसपास भी नहीं फटक पाए. फिर भी कुछ लोग उनको अप्रतिम रिकार्ड तोड़क सिद्ध करना चाहते हैं.

यहां पंडित नेहरू और मोदी द्वारा प्रधानमंत्री के तौर पर किए गए कामों का जिक्र अनावश्यक है, क्योंकि उनमें से एक के उत्तरी तो दूसरे के दक्षिणी ध्रुव होने के कारण वे सर्वथा अतुलनीय हैं.

नरेंद्र मोदी की भक्ति में लीन महानुभाव भी इस बात को जानते हैं. इसलिए आम तौर पर उनके प्रधानमंत्री पद पर रहने की अवधि को ही दोनों की तुलना का आधार बनाते हैं. इस काम में भी उनकी मुश्किल यह है कि नेहरू का 1947 से 1964 तक का समूचा प्रधानमंत्रीकाल आज भी रिकार्ड है और मोदी अभी भी उससे बहुत दूर हैं.

इसलिए उनसे उसे तोड़वाने को अधीर उनके भक्तगण उसको चुनाव प्रणाली के ऐसे तकनीकी आधार पर विभाजित कर देते हैं. ये भक्त इस पर भी गौर नहीं करते कि नेहरू अपनी आखिरी सांस तक प्रधानमंत्री रहे और उनके ही समय में संविधान के निर्माताओं ने 1950 में उसके लागू होने के पहले ही दिन से हर भारतीय को बराबर का मताधिकार दिया. (यह तब था जब पश्चिमी देशों, जैसे अमेरिका और ब्रिटेन, को अपने देश में सभी महिलाओं और अश्वेतों/गरीबों को पूर्ण मताधिकार देने में सैकड़ों साल लगे थे.)

अनंतर, नेहरू ने ही देश में स्वतंत्र चुनाव आयोग, निष्पक्ष न्यायपालिका और मजबूत संसदीय परंपराओं की नींव रखी. इसी नींव का लाभ उठाकर मोदी 2014 में प्रधानमंत्री पद तक पहुंच पाए और अब उसे खोद डालने पर आमादा है.

बुनियादी इतिहास का नकार

गौर कीजिए: ऐसे में जब नाशुक्रे मोदीभक्त नेहरू के 1947 से 1952 के प्रधानमंत्री काल को अंतरिम भी नहीं, सीधे अनिर्वाचित करार देने में लगे हैं, दुनिया भर में उसे अगाध मान्यता प्राप्त है. अंतरराष्ट्रीय इतिहासकार, संवैधानिक विशेषज्ञ और वैश्विक संस्थाएं नेहरू को 15 अगस्त, 1947 से ही भारत का पूर्ण रूप से वैध प्रधानमंत्री मानती हैं. इसी दौरान नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व किया, कई वैश्विक संधियां कीं और 1952 से पहले ही दुनिया में भारत की विदेश नीति की मजबूत नींव रखी.

काश, इन सबके आलोक में ये भक्त समझ पाते कि नेहरू के 1947 से 1952 तक के कार्यकाल को नकारना या उसकी हेठी करना देश के बुनियादी इतिहास को नकारने जैसा और इस कारण सर्वथा अक्षम्य है. इस कारण और कि इतिहास हमेशा अपने को आंकड़ों और संख्याओं से ही नहीं, बल्कि निष्पक्षता व समुचित संदर्भों के साथ देखे जाने की अपेक्षा करता है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)