अयोध्या के राम मंदिर को लेकर हाल के दिनों में कुछ विवाद सामने आए हैं. चढ़ावे के प्रबंधन को लेकर उठे सवाल, कुछ लोगों के खिलाफ दर्ज हुई एफआईआर, और मंदिर ट्रस्ट से जुड़े कुछ वरिष्ठ लोगों के इस्तीफों या इस्तीफे की पेशकश की खबरों ने एक बार फिर जवाबदेही और पारदर्शिता पर चर्चा शुरू कर दी है.
इन विवादों का अंतिम सच जो भी हो, उन्होंने एक पुराने सवाल को फिर से जीवित कर दिया है – जब धार्मिक संस्थाएं बहुत शक्तिशाली हो जाती हैं, तब उनसे सवाल कौन पूछता है?
करीब तीन दशक पहले अयोध्या में एक पुजारी यही सवाल पूछ रहा था. उसका नाम था लाल दास.
आज अधिकांश लोग उन्हें केवल रामलला के पूर्व पुजारी के रूप में जानते हैं, जिनकी 1993 में हत्या कर दी गई थी. लेकिन लाल दास की पहचान इससे कहीं बड़ी थी. वे उन गिने-चुने धार्मिक लोगों में थे जिन्होंने राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान उसके राजनीतिक स्वरूप पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए थे.
वे राम मंदिर के विरोधी नहीं थे. वे रामभक्ति के विरोधी नहीं थे. लेकिन उनका मानना था कि धार्मिक आस्था को राजनीतिक शक्ति हासिल करने का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए.
एक ऐसा रास्ता जो कभी अपनाया नहीं गया
आज पीछे मुड़कर देखने पर लगता है कि अयोध्या विवाद का अंत वही होना था जो हुआ. लेकिन इतिहास इतना सीधा नहीं था. एक समय ऐसा भी था जब बातचीत और समझौते के जरिए समाधान की संभावना मौजूद थी. यह समय था तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का.
1990 के अंत में जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने, तब देश राम जन्मभूमि आंदोलन को लेकर गहरे तनाव से गुजर रहा था. लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा ने माहौल को बेहद गर्म कर दिया था.
ऐसे समय में चंद्रशेखर सरकार ने विवाद को बातचीत के जरिए सुलझाने की कोशिश की.
सरकार ने विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के बीच औपचारिक वार्ता शुरू करवाई. दोनों पक्षों से कहा गया कि वे अपने दावों के समर्थन में ऐतिहासिक दस्तावेज, पुरातात्विक प्रमाण और अन्य साक्ष्य प्रस्तुत करें.
कुछ महीनों तक यह प्रक्रिया चली. विशेषज्ञों ने दस्तावेजों की जांच की. दोनों पक्षों के बीच बातचीत हुई. कई लोगों का मानना था कि समाधान की दिशा में वास्तविक प्रगति हो रही थी.
लाल दास और समझौते की कोशिश
अयोध्या के वरिष्ठ पत्रकार ओम प्रकाश सिंह ने हाल ही में इस लेखक से फोन पर हुई बातचीत में बताया कि लाल दास उस प्रतिनिधिमंडल से जुड़े हुए थे जो चंद्रशेखर सरकार की पहल के दौरान बातचीत की प्रक्रिया में शामिल था.
ओम प्रकाश सिंह, जो स्वयं को उस प्रक्रिया का सहभागी बताते हैं, कहते हैं कि लाल दास बातचीत के जरिए समाधान के पक्षधर थे.
उनके अनुसार वार्ता काफी आगे बढ़ चुकी थी, ‘कमरे के अंदर सब कुछ लगभग तय हो गया था. सहमति बन गई थी. लेकिन बाहर निकलने के बाद वीएचपी ने अपना रुख बदल लिया और समझौता नहीं हो सका.’
इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध सरकारी अभिलेखों से नहीं हो सकी है. फिर भी यह उस व्यक्ति की प्रत्यक्ष स्मृति है जो स्वयं को उस प्रक्रिया का हिस्सा बताता है.
यदि यह विवरण सही है, तो यह संकेत देता है कि अयोध्या विवाद एक समय बातचीत से भी सुलझ सकता था. लाल दास इसी रास्ते के समर्थक थे.
आंदोलन के भीतर असहमति की आवाज
लाल दास की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे बाहर से आलोचना नहीं कर रहे थे.
वे स्वयं रामलला के पुजारी रहे थे. वे रामभक्त थे. इसलिए उनकी बातों को केवल ‘विरोध’ कहकर खारिज करना आसान नहीं था.
उनका कहना था कि भगवान राम को राजनीतिक संघर्ष का प्रतीक नहीं बनाया जाना चाहिए.
उन्होंने आंदोलन के बढ़ते राजनीतिक स्वरूप पर चिंता जताई. वे रथयात्रा और टकराव की राजनीति के आलोचक बताए जाते हैं. उनका मानना था कि धार्मिक आस्था का उपयोग राजनीतिक उद्देश्यों के लिए नहीं होना चाहिए.
फिल्मकार आनंद पटवर्धन की चर्चित डॉक्यूमेंट्री राम के नाम में भी लाल दास दिखाई दिए थे. इस फिल्म ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई.
6 दिसंबर 1992 और उसके बाद
बाबरी मस्जिद का विध्वंस भारतीय राजनीति का निर्णायक मोड़ था. जहां आंदोलन के समर्थकों ने इसे ऐतिहासिक उपलब्धि माना, वहीं लाल दास ने इस पर सवाल उठाए.
विभिन्न विवरणों के अनुसार उन्होंने कहा कि यह रास्ता भगवान राम के आदर्शों के अनुरूप नहीं है.
उस समय तक आंदोलन के भीतर असहमति की आवाजें बहुत कम बची थीं. लाल दास उनमें सबसे प्रमुख थे.
हत्या और उठते सवाल
16 नवंबर 1993 को लाल दास की गोली मारकर हत्या कर दी गई.
हत्या के बाद पुलिस ने स्थानीय विवादों और अन्य संभावित कारणों की जांच की.
लेकिन उनके समर्थकों और कई स्वतंत्र पर्यवेक्षकों को लगा कि मामले के राजनीतिक पहलू को पर्याप्त गंभीरता से नहीं देखा गया.
उनका तर्क था कि लाल दास ने उन संगठनों की आलोचना की थी जो उस समय बेहद प्रभावशाली थे. उन्होंने आंदोलन की रणनीति पर सवाल उठाए थे. वे बातचीत के पक्षधर थे. और बाबरी विध्वंस की आलोचना कर चुके थे.
इसी वजह से हत्या के पीछे राजनीतिक कारण होने की आशंका भी जताई गई.
‘मानुषी’ ने क्या सवाल उठाए?
लाल दास की हत्या पर सबसे महत्वपूर्ण पड़तालों में से एक पत्रिका मानुषी ने की थी. पत्रिका ने हत्या का रहस्य सुलझाने का दावा नहीं किया था. लेकिन उसने कई ऐसे सवाल उठाए जो आज भी पूरी तरह शांत नहीं हुए हैं.
मानुषी ने इस बात पर ध्यान दिलाया कि लाल दास जैसे प्रमुख और चर्चित व्यक्ति की हत्या के मामले में राजनीतिक पहलू को अपेक्षित गंभीरता से नहीं जांचा गया.
पत्रिका ने उनके परिचितों और समकालीन लोगों से बातचीत की और यह दिखाने की कोशिश की कि उपलब्ध आधिकारिक व्याख्याएं कई लोगों को संतुष्ट नहीं कर पा रही थीं.
हालांकि मानुषी ने किसी संगठन या व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया.
संदेह और प्रमाण में फर्क
यह बात स्पष्ट रूप से समझना जरूरी है कि संदेह और प्रमाण एक ही चीज नहीं हैं. लाल दास के समर्थकों और कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने समय-समय पर विश्व हिंदू परिषद और व्यापक रूप से संघ परिवार से जुड़े संगठनों पर संदेह व्यक्त किया.
लेकिन किसी अदालत ने कभी वीएचपी, आरएसएस, भाजपा, बजरंग दल या किसी अन्य संगठन को लाल दास की हत्या के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया.
आज तक ऐसा कोई न्यायिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है जो राजनीतिक साजिश को साबित करता हो.
फिर भी यह भी सच है कि मामले का कोई ऐसा निष्कर्ष सामने नहीं आया जिसने सभी सवालों को पूरी तरह खत्म कर दिया हो.
लाल दास आज क्यों महत्वपूर्ण हैं?
लाल दास का महत्व केवल उनकी हत्या में नहीं है. उनका महत्व इस बात में है कि वे एक वैकल्पिक सोच का प्रतिनिधित्व करते थे. वे मानते थे कि बातचीत टकराव से बेहतर है.
वे मानते थे कि धार्मिक आस्था के साथ जवाबदेही भी जरूरी है. वे मानते थे कि बड़े से बड़ा आंदोलन भी सवालों से ऊपर नहीं होना चाहिए.
आज जब अयोध्या फिर से जवाबदेही और पारदर्शिता से जुड़े सवालों के बीच चर्चा में है, तब लाल दास की कहानी हमें याद दिलाती है कि ऐसे सवाल नए नहीं हैं.
तीन दशक पहले भी एक पुजारी यही सवाल पूछ रहा था. उसकी हत्या का रहस्य शायद कभी पूरी तरह न सुलझे. लेकिन उसके द्वारा पूछे गए सवाल आज भी हमारे सामने खड़े हैं.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
