25 जून 2025 को, विदेश मंत्रालय के एक अज्ञात अधिकारी ने अनौपचारिक तौर पर यह बोलकर विवाद खड़ा कर दिया कि भारतीय पासपोर्ट बस एक यात्रा दस्तावेज़ है और इससे नागरिकता प्रमाणित नहीं होती है.
जैसे कि यह बात अपने आप में कम चिंताजनक थी कि नरेंद्र मोदी सरकार इस और भी खतरनाक दावे पर अड़ी हुई है कि भारत सरकार द्वारा विधिवत जारी किया गया और हर दृष्टि से वैध व प्रामाणिक माना जाने वाला पासपोर्ट भी किसी भारतीय की नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है.
हालांकि, इस दावे की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि सरकार आधिकारिक तौर पर सामने आने के बजाय अनाम ‘सूत्रों’ और बिना सवाल किए उनकी बात मान लेने वाले मीडिया के जरिए आगे बढ़ा रही है. इससे ही इस दावे की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो जाते हैं.
हैरानी की बात यह है कि मोदी सरकार में ऐसा एक भी वरिष्ठ मंत्री या अधिकारी सामने नहीं आया, जो अपना नाम सार्वजनिक रूप से जोड़ते हुए देश के पासपोर्ट की विश्वसनीयता और गरिमा पर किए जा रहे इस राजनीतिक हमले का जिम्मा लेने को तैयार हो.
फ़र्ज़ी तर्क
सरकार के करीबी मीडिया में जिन अनाम ‘सूत्रों’ के हवाले से बातें कही जा रही हैं, वे दो मुख्य तर्क दे रहे हैं, और दोनों ही पूरी तरह भ्रामक हैं.
पहला तर्क यह है कि पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 20 सरकार को यह अधिकार देती है कि यदि उसे लगे कि सार्वजनिक हित में ऐसा करना जरूरी है, तो वह किसी ऐसे व्यक्ति को भी भारतीय पासपोर्ट जारी कर सकती है जो भारतीय नागरिक न हो.
इसी आधार पर यह कहा जा रहा है कि किसी व्यक्ति के पास भारतीय पासपोर्ट होना उसकी भारतीय नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जा सकता.
असल में, पासपोर्ट अधिनियम की धारा 20 एक अपवाद स्वरूप प्रावधान (एक्सेप्शनल सेविंग क्लॉज़) है. संभवतः इसे इसलिए बनाया गया था कि विशेष परिस्थितियों में भारत अपने किसी विदेशी खुफिया सहयोगी, एजेंट या मित्र देश के किसी व्यक्ति की मदद के लिए उसे भारतीय पासपोर्ट जारी कर सके.
लेकिन क्या इस एक अपवाद के आधार पर यह कहा जा सकता है कि 99.9999 प्रतिशत भारतीय पासपोर्ट धारकों, जो वास्तव में भारतीय नागरिक हैं, उनके लिए भी पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जाएगा?
यह भी ध्यान देने योग्य है कि सरकार उन गिने-चुने विदेशी नागरिकों की सूची को बेहद गोपनीय रखती है, जिन्हें धारा 20 के तहत भारतीय पासपोर्ट जारी किया गया है. मान लें कि 1967 से अब तक ऐसे लोगों की संख्या सैकड़ों में भी पहुंच गई हो, तब भी आज वैध भारतीय पासपोर्ट रखने वाले ऐसे लोगों की संख्या संभवतः बहुत कम होगी.
ऐसी स्थिति में नागरिकता को लेकर यदि किसी व्यक्ति पर कोई संदेह हो, तो गृह मंत्रालय के सुरक्षित डेटाबेस में एक साधारण सर्च के जरिए यह तुरंत पता लगाया जा सकता है कि वह भारतीय नागरिक है या नहीं. यानी सरकार के पास ऐसा रिकॉर्ड मौजूद है, इसलिए यह कहना कि ‘पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं हो सकता क्योंकि कुछ गैर-भारतीयों को भी पासपोर्ट मिले हैं’ एक कमजोर दलील है.
जिस दूसरी दलील को प्रचारित किया जा रहा है, वह 2013 में बॉम्बे हाईकोर्ट के एक फैसले पर आधारित है. यह मामला चार कथित बांग्लादेशी नागरिकों से जुड़ा था, जिन पर धोखाधड़ी करके भारतीय पासपोर्ट, जन्म प्रमाणपत्र और आधार कार्ड सहित कई भारतीय दस्तावेज़ हासिल करने का आरोप था.
हालांकि जस्टिस केयू चांदीवाल का फैसला ऑनलाइन उपलब्ध नहीं है, लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया ने 3 सितंबर 2013 को इस मामले पर ‘पासपोर्ट अलोन नो प्रूफ ऑफ सिटिजनशिप: बॉम्बे हाईकोर्ट’ (केवल पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट) शीर्षक से खबर प्रकाशित की थी.
यदि इन ‘सूत्रों’ ने उस खबर को वास्तव में पढ़ने की जहमत उठाई होती, तो उन्हें पता चलता कि (i) खबर में कहीं भी न्यायाधीश के हवाले से वह बात नहीं कही गई है, जो उसकी हेडलाइन में लिखी गई है, और (ii) यदि मान भी लिया जाए कि जज ने अपने फैसले (जो अब उपलब्ध नहीं है) में हेडलाइन में कही गई बात स्पष्ट रूप से लिखी थी, तब भी जिस मामले की सुनवाई हो रही थी, उसमें संबंधित पासपोर्ट पहले ही ‘निरस्त’ किए जा चुके थे, संभवतः इसलिए क्योंकि सरकार को पता चल गया था कि वे धोखाधड़ी करके हासिल किए गए थे.
बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति और तीन अन्य लोगों को राहत देने से इनकार कर दिया, जिन पर अवैध प्रवासी होने का आरोप था, जबकि उन्होंने यह साबित करने के लिए कि वे भारतीय हैं, पासपोर्ट (जो बाद में निरस्त कर दिए गए), आधार कार्ड और जन्म प्रमाणपत्र पेश किए थे.
दूसरे शब्दों में, यह सवाल कि क्या एक वैध भारतीय पासपोर्ट अपने-आप में नागरिकता का प्रमाण माना जा सकता है, अभी तक अदालतों द्वारा अंतिम रूप से तय नहीं किया गया है.
धोखाधड़ी साबित होने तक नागरिकता की मान्यता
जहां सरकार ने मीडिया में गुमनाम और कमजोर तर्कों के सहारे अपना पक्ष रखने का रास्ता चुना है, वहीं यह अच्छा है कि पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राव ने विदेश मंत्रालय के इस दावे, कि पासपोर्ट को नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जा सकता, को अधिक तर्कसंगत ढंग से समझाने की कोशिश की है.
उन्होंने कहा:
एक पासपोर्ट तभी जारी किया जाता है जब सरकार इस बात से संतुष्ट हो जाती है कि आप एक भारतीय नागरिक हैं. अतः आम जीवन के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय यात्राओं में भी यह नागरिकता का एक प्रबल प्रमाण है. लेकिन यदि अदालत में नागरिकता को लेकर कोई कानूनी विवाद हो, तो उस स्थिति में नागरिकता अधिनियम ही लागू कानून रहेगा और पासपोर्ट ऐसा अंतिम एवं निर्णायक प्रमाण नहीं है, जो अन्य सभी साक्ष्यों को अप्रासंगिक कर दे.
एक स्तर पर देखें, तो यह ऐसी सामान्य कानूनी बात है, जो उन सभी मामलों पर लागू होती है, जहां किसी कानूनी दस्तावेज़ की वैधता को चुनौती दी जाती है. मान लीजिए किसी व्यक्ति को अपने किसी दिवंगत रिश्तेदार की संपत्ति वसीयत के आधार पर मिलती है. वह वसीयत उस संपत्ति पर उसके वैध कब्ज़े और स्वामित्व का मजबूत प्रमाण होती है. लेकिन यदि वसीयत को लेकर अदालत में विवाद खड़ा हो जाए, तो उस मामले में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम लागू होगा और यह भी संभव है कि वसीयत को ऐसा अंतिम और निर्णायक प्रमाण न माना जाए, जो अन्य सभी साक्ष्यों को अप्रासंगिक कर दे.
लेकिन कल्पना कीजिए कि यदि कल अमित शाह यह घोषणा कर दें कि विधिवत पंजीकृत (दर्ज) वसीयत को अब उत्तराधिकार का प्रमाण नहीं माना जाएगा, तो उसके क्या गंभीर और दूरगामी परिणाम होंगे, इसका सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
हालांकि इस बात पर कोई विवाद नहीं हो सकता कि नागरिकता से जुड़े मामलों में नागरिकता अधिनियम ही सर्वोपरि कानून है, लेकिन निरुपमा राव की इस व्याख्या में एक महत्वपूर्ण बात जोड़ना जरूरी है. जब तक किसी विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत यह साबित न हो जाए कि भारतीय पासपोर्ट धोखाधड़ी, जालसाजी या छल-कपट के जरिए हासिल किया गया है, तब तक भारतीय पासपोर्ट के साथ नागरिकता की एक मजबूत कानूनी मान्यता जुड़ी रहनी चाहिए.
यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता को लेकर कानूनी विवाद उत्पन्न होता है और बाद में यह साबित हो जाता है कि उसने पासपोर्ट पासपोर्ट अधिनियम या नागरिकता अधिनियम का उल्लंघन करते हुए धोखाधड़ी या फर्जी दस्तावेजों के आधार पर हासिल किया था, तो कानून सरकार को उस पासपोर्ट को जब्त करने या रद्द करने का अधिकार देता है.
दरअसल, पासपोर्ट को रद्द करने का यह प्रावधान इसलिए ही बनाया गया है, ताकि पासपोर्ट की विश्वसनीयता और पवित्रता की रक्षा की जा सके.
चूंकि पासपोर्ट होना भारतीय नागरिक होने की अनिवार्य शर्त नहीं है, भारत के केवल लगभग 10 प्रतिशत लोगों के पास ही पासपोर्ट है, इसलिए केवल पासपोर्ट रद्द हो जाने भर से यह नहीं माना जा सकता कि कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं रह गया.
नागरिकता अधिनियम स्पष्ट करता है कि भारतीय नागरिकता निम्न आधारों पर प्राप्त की जा सकती है, (1) अगर भारत में आपका जन्म 1987 से पहले हुआ है; या (2) अगर भारत में आपका जन्म 1987 के बाद हुआ है तो माता पिता में से कम से कम एक अभिभावक भारतीय हो; (3) 2003 के बाद भारत में जन्म लेने पर, यदि माता-पिता में से कम-से-कम एक भारतीय नागरिक हो और दूसरा माता-पिता भारत में अवैध रूप से रह रहा व्यक्ति न हो; (4) भारत में निवास, विवाह, वंश, शरणार्थी दर्जे अथवा कानून में निर्धारित अन्य आधारों पर पंजीकरण के माध्यम से.
हालांकि, इन सभी मामलों में यह शर्त लागू होती है कि संबंधित व्यक्ति ने किसी अन्य देश की नागरिकता ग्रहण न की हो.
किसी व्यक्ति को एक भारतीय पासपोर्ट जारी करने के समय यह अपेक्षा की जाती है कि भारत सरकार ने यह सुनिश्चित कर लिया होगा कि आवेदक उपरोक्त किसी भी श्रेणी में आता है, क्योंकि केवल भारतीय नागरिक ही भारतीय पासपोर्ट के लिए आवेदन करने के योग्य होते हैं. दरअसल पासपोर्ट अधिनियम के सेक्शन 6(2) के अंतर्गत पासपोर्ट के आवेदन को रद्द करने का जो सबसे पहला आधार है वो है: ‘आवेदक भारत का नागरिक नहीं है.’
प्रत्येक आवेदक को अपनी नागरिकता की स्थिति (जन्म/पीढ़ी/देशीकरण के द्वारा) बताने के लिए चेकलिस्ट में एक बॉक्स में टिक करना होता है, लेकिन बाद में अगर यह पता चलता है कि उन्होंने इस बारे में झूठी जानकारी देकर पासपोर्ट प्राप्त किया है, तब पासपोर्ट जारी करने वाले अधिकारी को पासपोर्ट अधिनियम के सेक्शन 10 के अंतर्गत यह अधिकार है कि वो पासपोर्ट को जब्त/निरस्त कर दे.
2025 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने क्या कहा
दरअसल, 2025 में बॉम्बे हाईकोर्ट का एक फैसला भी आया था, जिसमें जस्टिस अमित बोरकर ने 2013 वाले मामले से काफी मिलते-जुलते एक विवाद पर सुनवाई की थी. यह फैसला इस पूरे मुद्दे को बेहतर ढंग से समझने में मदद करता है.
ठाणे के निवासी बाबू अब्दुल रऊफ सरदार को अधिकारियों ने बांग्लादेशी नागरिक बताते हुए गिरफ्तार किया था. हाईकोर्ट में जमानत याचिका दायर करते हुए उन्होंने कहा कि उनके पास आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र (वोटर आईडी), पैन कार्ड और पासपोर्ट जैसे सक्षम भारतीय प्राधिकरणों द्वारा जारी कई वैध दस्तावेज़ हैं. अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि ये सभी दस्तावेज़ धोखाधड़ी से हासिल किए गए थे. इसके समर्थन में उसने सरदार के मोबाइल फोन से बरामद उनके कथित बांग्लादेशी जन्म प्रमाणपत्र की प्रति का हवाला दिया.
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस अमित बोरकर ने कहा:
मेरे विचार में भारत में किसी व्यक्ति की राष्ट्रीयता (नागरिकता) से जुड़े प्रश्नों का फैसला करने वाला प्रमुख और निर्णायक कानून नागरिकता अधिनियम, 1955 है. यही वह कानून है, जो तय करता है कि कौन भारतीय नागरिक हो सकता है, नागरिकता कैसे प्राप्त की जा सकती है और किन परिस्थितियों में उसे खोया जा सकता है. केवल आधार कार्ड, पैन कार्ड या मतदाता पहचान पत्र जैसे दस्तावेज़ होना अपने-आप में किसी व्यक्ति को भारत का नागरिक नहीं बना देता.
ये दस्तावेज़ पहचान स्थापित करने या विभिन्न सेवाओं का लाभ लेने के लिए जारी किए जाते हैं, लेकिन ये नागरिकता अधिनियम में निर्धारित मूल कानूनी आवश्यकताओं का स्थान नहीं ले सकते.
दिलचस्प बात यह है कि जज ने अपने फैसले में आधार और पैन कार्ड (जिनके नियमों के तहत गैर-नागरिक भी आवेदन कर सकते हैं) तथा मतदाता पहचान पत्र (जिसके लिए केवल भारतीय नागरिक ही आवेदन कर सकते हैं) का उल्लेख किया, लेकिन उन दस्तावेज़ों की सूची में पासपोर्ट को शामिल नहीं किया, जिनके बारे में उन्होंने कहा था कि उनका होना ‘अपने-आप में किसी व्यक्ति को भारत का नागरिक नहीं बना देता.’
हालांकि, सरदार के वकील ने अदालत के सामने उनके भारतीय पासपोर्ट का भी हवाला दिया था. भले ही इसे जज की एक चूक माना जाए, लेकिन जस्टिस बोरकर के फैसले से यह स्पष्ट होता है कि इस मामले में असली सवाल किसी दस्तावेज़ (जैसे- पासपोर्ट) की नागरिकता के प्रमाण के रूप में स्थिति का नहीं था, बल्कि यह आरोप था कि वह दस्तावेज़ कहीं धोखाधड़ी के जरिए तो हासिल नहीं किया गया था:
जब यह आरोप हो कि किसी व्यक्ति की पहचान फर्जी है या वह विदेशी मूल का है, तो अदालत केवल उसके पास मौजूद कुछ पहचान संबंधी दस्तावेज़ों के आधार पर मामले का फैसला नहीं कर सकती. ऐसे मामलों में नागरिकता के दावे की जांच नागरिकता अधिनियम, 1955 के प्रावधानों के अनुसार ही की जानी चाहिए.
कानूनी स्थिति का सार यह है कि यदि किसी व्यक्ति पर धोखाधड़ी करके पासपोर्ट हासिल करने का आरोप लगाया जाता है, तो स्वाभाविक रूप से यह जांच करनी होगी कि क्या वह वास्तव में पासपोर्ट पाने का पात्र था. इसके लिए उसके मामले की शुरुआत से नए सिरे से नागरिकता अधिनियम के प्रावधानों के आधार पर जांच की जानी चाहिए.
लेकिन यदि किसी व्यक्ति पर धोखाधड़ी का न तो आरोप है और न ही उसका कोई संदेह है, तो यह मानने का कानूनी आधार होगा कि वैध भारतीय पासपोर्ट रखने वाला व्यक्ति भारतीय नागरिक ही है.
दरअसल, चूंकि जन्म प्रमाणपत्रों में बायोमेट्रिक पहचान नहीं होती, इसलिए यदि कभी भारत में या विदेश में किसी भारतीय नागरिक को अपनी नागरिकता साबित करने की आवश्यकता पड़े, तो पासपोर्ट ही ऐसा दस्तावेज़ है, जिसके जरिए वह आसानी से अपनी नागरिकता साबित कर सकता है.
इस पूरे विवाद को समझने का एक और तरीका यह है कि जाली दस्तावेज़ों के आधार पर हासिल किए गए भारतीय पासपोर्ट की तुलना नकली (जाली) भारतीय मुद्रा से की जाए. दोनों ही ऊपर से देखने पर भारत सरकार द्वारा जारी किए गए प्रतीत होते हैं, लेकिन उनकी पहचान कर उन्हें प्रचलन से बाहर करना आवश्यक होता है.
लेकिन जिस तरह नकली नोटों के कारण भारतीय रुपया लेन-देन के वैध माध्यम के रूप में अपनी पहचान नहीं खो देता और न ही उसका मूल्य कम हो जाता है. और सरकार के ‘सूत्र’ भी कभी यह नहीं कहेंगे कि भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी नोट इस बात का प्रमाण नहीं है कि वह असली मुद्रा है.
उसी तरह यदि कुछ गैर-नागरिक धोखाधड़ी करके भारतीय पासपोर्ट हासिल कर भी लें, तो इससे भारतीय पासपोर्ट को नागरिकता के प्रमाण के रूप में अमान्य नहीं ठहराया जा सकता.
जनसंख्या को लेकर डर फैलाने की राजनीति
नागरिकता के सबूत के तौर पर पासपोर्ट को अमान्य घोषित करने के सरकार के निर्णय ने जो खलबली पैदा की है, उसकी दो वजहें हैं.
करीब एक दशक पहले तक सरकारी सेवाओं और सुविधाओं तक पहुंच लगभग सार्वभौमिक थी. यानी किसी व्यक्ति की नागरिकता पर आम तौर पर सवाल नहीं उठाया जाता था. लेकिन नरेंद्र मोदी की जनसांख्यिकीय असुरक्षा की आक्रामक राजनीति के दौर में स्थिति बदल गई है. अब लाखों गरीब भारतीयों, विशेष रूप से मुसलमानों, को मतदान के अधिकार, सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लाभ और यहां तक कि अधिवास (डोमिसाइल) संबंधी अधिकारों से भी वंचित किया जा रहा है.
दूसरी वजह है, राजनीति से प्रेरित प्रशासनिक मनमानी के आधार पर नागरिकता को नए सिरे से परिभाषित करने का मोदी सरकार का प्रयास.
मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण से यह स्पष्ट है कि इसका लक्ष्य है उन व्यक्तियों को मताधिकार के अधिकार से वंचित कर दंडित करना जिन्हें सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी राजनीतिक तौर पर संदिग्ध मानती है.
अंत में सरकार का लक्ष्य वास्तविक (बोनाफाइड) भारतीय नागरिकों की नागरिकता तक छीनने का भी हो सकता है. नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के जरिए अमित शाह यही करने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन असम में इस प्रक्रिया के नतीजे ऐसे आए कि मुसलमानों की तुलना में कहीं अधिक हिंदू ‘विदेशी’ की श्रेणी में आ गए.

आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य अपनी प्रशासनिक व्यवस्था को मनमाने फैसलों और भ्रष्टाचार से बचाने के लिए स्पष्ट नियम और प्रक्रियाएं बनाते हैं.
पासपोर्ट के मामले में भी भारतीय राज्य ने पासपोर्ट अधिनियम (और परोक्ष रूप से नागरिकता अधिनियम) के आधार पर ऐसे नियम बनाए हैं, जो सभी पर समान रूप से लागू होते हैं. हर आवेदक को इन नियमों और शर्तों को पूरा करना होता है, तभी उसे पासपोर्ट जारी किया जाता है.
पासपोर्ट के लिए आवेदन करते समय व्यक्ति को एक निर्धारित फॉर्म भरना होता है, जिसमें जन्मस्थान, नागरिकता का आधार (जैसे जन्म, वंश या देशीयकरण) सहित अपनी अन्य व्यक्तिगत जानकारियां देनी होती हैं. इसके साथ उसे जन्मतिथि और निवास के प्रमाण भी जमा करने होते हैं.
इसके बाद इन जानकारियों की पुष्टि के लिए पुलिस द्वारा सत्यापन किया जाता है. सत्यापन पूरा होने और सभी शर्तें पूरी पाए जाने पर ही पासपोर्ट जारी किया जाता है.
यह ध्यान देने योग्य है कि भारतीय पासपोर्ट आवेदन फॉर्म में 1987 के बाद जन्मे आवेदकों से उनके माता-पिता की नागरिकता का प्रमाण नहीं मांगा जाता. इतना ही नहीं, आवेदन के साथ जन्म प्रमाणपत्र जमा करना भी अनिवार्य नहीं है और न ही जन्मस्थान का दस्तावेजी प्रमाण देना जरूरी है.
ऐसा इसलिए है क्योंकि सरकार जानती है कि देश के अधिकांश लोगों के लिए ऐसे दस्तावेज़ जुटाना आसान नहीं होगा. इसलिए आवेदक एक स्व प्रमाणित घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर करता है और सरकार उन जानकारियों की पुष्टि पुलिस सत्यापन के जरिए करती है. जब सरकार किसी आवेदक के भारतीय मूल या नागरिकता से जुड़े दस्तावेजी प्रमाणों की जगह पुलिस सत्यापन को पर्याप्त मानकर पासपोर्ट जारी करती है, तो बाद में वह यह नहीं कह सकती कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है.
एक बार पासपोर्ट जारी हो जाने के बाद, उसे इस बात का प्रमाण माना जाना चाहिए कि पासपोर्ट अधिनियम के तहत भारतीय सरकार द्वारा निर्धारित सभी नियमों का पालन किया गया है. इन नियमों के अनुसार, जो व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं है, उसे भारतीय पासपोर्ट जारी नहीं किया जा सकता (सिवाय धारा 20 में दिए गए एक सीमित अपवाद के, जिसकी चर्चा पहले की जा चुकी है).
दूसरे शब्दों में, जब तक यह साबित न हो जाए कि पासपोर्ट के लिए आवेदन करते समय आवेदक ने फर्जी दस्तावेज़ या झूठी जानकारी दी थी और इस आधार पर उसका पासपोर्ट जब्त या रद्द नहीं कर दिया गया है, तब तक भारतीय पासपोर्ट को भारतीय नागरिकता का प्रमाण माना जाना चाहिए.
यह उन सभी परिस्थितियों में लागू होना चाहिए, जहां नागरिकता साबित करना आवश्यक हो, जैसे मतदान का अधिकार, सरकारी या अन्य रोजगार, संवैधानिक पदों पर नियुक्ति या कुछ सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त करना.
एक बार सक्षम प्राधिकारी किसी व्यक्ति को पासपोर्ट जारी कर देता है, तो सरकार का कोई दूसरा अधिकारी या विभाग यह नहीं कह सकता कि ‘यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि आप भारतीय नागरिक हैं.’
जब तक इसके विपरीत संदेह करने का कोई ठोस आधार न हो, तब तक यह माना जाना चाहिए कि भारतीय पासपोर्ट धारक भारतीय नागरिक है.
यदि सरकार के किसी विभाग को किसी व्यक्ति की नागरिकता पर संदेह है, तो उसे स्वयं पासपोर्ट की वैधता पर सवाल उठाने के बजाय इसकी जानकारी सक्षम प्राधिकारी को देनी चाहिए. इसके बाद वही प्राधिकारी तय करेगा कि क्या पासपोर्ट को रद्द या जब्त करने जैसी कोई कार्रवाई आवश्यक है या नहीं.
मनमानी बनी व्यवस्था का हिस्सा
यदि नागरिकता को लेकर कोई कानूनी विवाद पैदा होता है, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि उस मामले में नागरिकता अधिनियम ही लागू कानून होगा. लेकिन भारतीय पासपोर्ट के महत्व को लेकर बिना किसी ठोस आधार के संदेह पैदा करके मोदी सरकार ने ‘घुसपैठ’ को लेकर अपने भय फैलाने वाले अभियान को और भी खतरनाक दिशा में पहुंचा दिया है.
विडंबना यह है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय स्वयं आधिकारिक तौर पर स्वीकार कर चुका है कि उसके पास भारत में बिना वैध दस्तावेज़ों के रह रहे विदेशियों की संख्या का कोई प्रामाणिक आंकड़ा नहीं है. इसके बावजूद नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने ऐसे कथित ‘विदेशियों’ को मतदाता सूची से बाहर करने के उद्देश्य से चुनाव आयोग से विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कराया.
चुनाव आयोग ने भी इस प्रक्रिया को जितनी मनमानी के साथ लागू किया जा सकता था, उतनी मनमानी के साथ लागू किया, जिसके परिणामस्वरूप बिहार, पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में लाखों भारतीय मतदाता मताधिकार से वंचित हो गए.
जैसा कि हम अभी पश्चिम बंगाल में देख रहे हैं, मतदान के अधिकार से वंचित किया जाना सिर्फ पहला कदम है. जिन नागरिकों को चुनाव आयोग ने मनमाने ढंग से मतदाता सूची से बाहर कर दिया, अब उनसे कहा जा रहा है कि वे सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लाभ पाने के भी पात्र नहीं रहेंगे. इसके बाद क्या होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है. ‘क्रोनोलॉजी समझिए.’
असल बात यह है कि आज किसी नागरिक के पास ऐसा कोई दस्तावेज़ नहीं बचा है, जिसे सरकार उसकी नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण मानने को तैयार हो. इसका मतलब है कि नागरिकता का फैसला अंततः अधिकारियों की व्यक्तिपरक व्याख्या और विवेक पर निर्भर करेगा.
मान लीजिए आपके पास वैध भारतीय पासपोर्ट है, फिर भी सरकार आपसे जन्म प्रमाणपत्र मांग सकती है. यदि आप किसी तरह वह भी प्रस्तुत कर दें, तो कोई अधिकारी आपसे यह भी मांग सकता है कि आप अपने जन्म का जियो-लोकेशन और समय (टाइमस्टैम्प) सहित वीडियो, जिसे गुजरात फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी ने विधिवत प्रमाणित किया हो, पेश करें.
और अगर किसी चमत्कार से आपके पास वह भी मिल जाए, तो आपसे यह साबित करने के लिए भी कहा जा सकता है कि आपकी मां की कोख से जन्म लेने वाला वह स्वस्थ-तंदुरुस्त शिशु वास्तव में आप ही हैं.
और यदि आपका जन्म 2003 के बाद हुआ है, तो आपकी मुश्किलें और बढ़ सकती हैं, क्योंकि तब आपसे यह भी साबित करने को कहा जा सकता है कि आपके माता या पिता में से कोई भी ‘अवैध प्रवासी’ नहीं था.
भारत सरकार के पास इतनी प्रशासनिक क्षमता नहीं है कि वह 140 करोड़ भारतीयों की नागरिकता की इस तरह जांच-पड़ताल कर सके. लेकिन यदि बूथ स्तर और ब्लॉक स्तर के मतदान पैटर्न को धर्म और जाति के आंकड़ों के साथ जोड़कर देखा जाए (और सत्ता में बैठे कुछ बेहद चतुर लोग यही काम कर रहे हैं) तो निशाने पर आने वाले लोगों की संख्या कहीं अधिक कम और मैनेज करने लायक हो जाती है.
पासपोर्ट विवाद को इसी संदर्भ में समझा जाना चाहिए. यह भारतीय मध्यवर्ग के लिए एक चेतावनी है कि पर्दे के पीछे इससे कहीं अधिक गहरी और भयावह प्रक्रिया चल रही है.
यह ऐसी प्रक्रिया है, जिसके तहत 2024 के लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत से नीचे पहुंच चुके प्रधानमंत्री मानो जनता को ही बदल देने की कोशिश कर रहे हैं. यह बर्टोल्ट ब्रेख्त के उस तीखे व्यंग्य की याद दिलाता है, जिसमें उन्होंने लिखा था कि जब नागरिक ‘सरकार का विश्वास खो दें’, तो सरकार के लिए सबसे आसान रास्ता होगा कि वह जनता को ही भंग कर दे और कोई दूसरी जनता चुन ले.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
(कुमार निशांत द्वारा अनूदित)
