एसआईआर का एक साल: अवैध प्रवासियों की कोई संख्या नहीं, नागरिकों के हक़ों पर रोक, हर राज्य में अलग नियम

मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) शुरू होने के सालभर बाद भी निर्वाचन आयोग ने नहीं बताया है कि 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हुई इस कवायद में मतदाता सूचियों में कितने कथित 'विदेशी अवैध प्रवासी' पाए गए. इस प्रक्रिया में 5 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए. वहीं, आयोग ने बिना कोई स्पष्ट कारण बताए अलग-अलग राज्यों में एसआईआर के लिए अलग तरीके अपनाए.

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मतदाताओं को फॉर्म भरने में मदद करते बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ). (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: 24 जून 2025 को जब भारत चुनाव आयोग ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर)- वो शब्द जिनका जिक्र चुनाव नियमावली में नहीं है- की घोषणा की, तब उसने कहा कि यह प्रक्रिया कई कारणों से आवश्यक हो गई है, जिनमें ‘विदेशी अवैध प्रवासियों के नाम मतदाता सूची में शामिल होना’ भी शामिल है.

लेकिन एसआईआर प्रक्रिया शुरू होने के सालभर बाद भी आयोग अब तक यह नहीं बता पाया है कि 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में की गई इस कवायद के दौरान मतदाता सूचियों में कथित ‘विदेशी अवैध प्रवासियों’ की कुल कितनी संख्या पाई गई.

हालांकि, पिछले एक वर्ष में इस प्रक्रिया से कुछ अन्य आंकड़े सामने आए हैं. इन 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 5 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए, जबकि केवल पश्चिम बंगाल में ही लगभग 27 लाख मतदाता अप्रैल में हुए विधानसभा चुनाव में मतदान नहीं कर सके और वे अब भी अपनी अपीलों पर न्यायाधिकरणों (ट्राइब्यूनल) के फैसले की प्रतीक्षा कर रहे हैं.

इस प्रक्रिया के कारण अभूतपूर्व स्तर पर अधिकारों से वंचित किए जाने की स्थिति भी पैदा हुई है. एसआईआर में जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, उन्हें पश्चिम बंगाल और बिहार में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नए मुख्यमंत्रियों द्वारा कल्याणकारी योजनाओं का लाभ देने से भी इनकार किया जा रहा है.

जबकि पिछले महीने एसआईआर को वैध ठहराने वाले अपने आदेश में शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा था कि निर्वाचन आयोग केवल मतदाता सूची तैयार करने के उद्देश्य से नागरिकता का सत्यापन कर सकता है; नागरिकता का अंतिम निर्धारण केंद्र सरकार के अधिकारक्षेत्र में आता है.

जब बिहार में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इस प्रक्रिया की घोषणा हुई थी, तब इसके समय को लेकर सवाल उठे थे. बीते एक साल में आयोग ने अलग-अलग राज्यों में एसआईआर के लिए अलग-अलग तरीका अपनाया – बिहार में एक तरीका, पश्चिम बंगाल में दूसरा और असम में तो बिल्कुल ही अलग प्रक्रिया है- लेकिन ऐसा करने का कोई ठोस कारण नहीं आयोग द्वारा नहीं बताया गया है.

द वायर ने एसआईआर के एक साल पूरे होने पर इसके प्रभावों का आकलन किया है.

मतदाता सूची में ‘विदेशियों’ की कोई संख्या नहीं

एसआईआर शुरू होने के बाद से भाजपा ने मतदाता सूची पुनरीक्षण को कथित अवैध प्रवासियों के मुद्दे को राजनीतिक रूप से आगे बढ़ाने के एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया है. चुनावी रैलियों से लेकर संसद तक, भाजपा सरकार ने इस प्रक्रिया का बचाव करते हुए कहा कि करोड़ों मतदाताओं से नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण मांगना उसकी ‘पहचान करो, हटाओ और निर्वासित करो‘ (Detect, Delete and Deport) नीति का हिस्सा है.

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि एसआईआर के परिणामस्वरूप केवल उन्हीं मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं जो ‘भारतीय नागरिक नहीं थे.’

बिहार में एसआईआर के पायलट चरण के पूरा होने के कुछ दिन बाद 5 अक्टूबर को पटना में आयोजित एक प्रेस वार्ता में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने मतदाता सूची में मिले विदेशी ‘अवैध प्रवासियों’ की संख्या के बारे में कोई जानकारी नहीं दी. लेकिन उसी महीने, जब आयोग ने 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में एसआईआर शुरू करने की घोषणा की, तब उसने फिर कहा कि मतदाता सूचियों में ‘विदेशियों को गलत तरीके से शामिल किए जाने’ जैसी समस्याएं मौजूद हैं.

27 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा, ‘हाल के समय में राजनीतिक दलों ने चुनाव आयोग के समक्ष मतदाता सूचियों की गुणवत्ता से जुड़े मुद्दे उठाए हैं. 1951 से 2004 के बीच लगभग आठ बार विशेष गहन पुनरीक्षण किया जा चुका है और पिछली बार यह प्रक्रिया 2002 से 2004 के बीच, यानी 21 वर्ष पहले हुई थी.’

उन्होंने आगे कहा, ‘इन दो दशकों में मतदाता सूचियों में अनेक परिवर्तन हुए हैं. लगातार होने वाले पलायन के कारण कई मतदाता एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत हो गए हैं, मृत मतदाताओं के नाम नहीं हटाए गए हैं, या विदेशियों को गलत तरीके से मतदाता सूची में शामिल कर लिया गया है. इन्हीं कारणों से चुनाव आयोग ने चरणबद्ध तरीके से पूरे देश में एसआईआर कराने का निर्णय लिया है. पहला चरण बिहार में सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है.’

इसके बावजूद अब तक आयोग यह नहीं बता पाया है कि मतदाता सूची में कुल कितने विदेशी पाए गए.

विदेशी घोषित नहीं, फिर भी नागरिकों के अधिकार प्रभावित

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि नागरिकता का अंतिम निर्धारण केंद्र सरकार करेगी, न कि निर्वाचन आयोग, फिर भी एसआईआर में जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, वे केवल इसी आधार पर कई अधिकारों और कल्याणकारी लाभों से वंचित हो रहे हैं.

पश्चिम बंगाल सरकार ने घोषणा की कि महिलाओं को नकद सहायता देने वाली अन्नपूर्णा योजना का लाभ एसआईआर से हटाए गए लोगों को नहीं मिलेगा. इसी महीने सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के ‘अयोग्य’ लाभार्थियों की पहचान कर उनके नाम हटाने के लिए राज्यव्यापी सत्यापन अभियान भी शुरू किया, जिसे एसआईआर से जोड़ा गया.

दूसरी ओर, बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अप्रैल में कहा था कि एसआईआर के बाद 22 लाख राशन कार्ड पहले ही रद्द किए जा चुके हैं.

राज्य के 19 न्यायिक न्यायाधिकरणों में जिन नागरिकों की अपीलें लंबित हैं, उन्हें अन्य सरकारी प्रक्रियाओं में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है. उदाहरण के तौर पर, द टेलीग्राफ के पूर्व संपादक आर. राजगोपाल का पासपोर्ट नवीनीकरण एसआईआर में नाम हटाए जाने के बाद अटक गया है.

राज्य सरकारें ये कदम ऐसे समय उठा रही हैं जबकि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने एसआईआर को वैध ठहराते हुए स्पष्ट कहा था कि निर्वाचन आयोग के निर्णय का प्रभाव केवल मतदाता सूची में नाम शामिल होने या हटने तक सीमित है.

अदालत ने कहा, ‘इसका प्रभाव केवल व्यक्ति के मतदाता सूची में शामिल होने के अधिकार और इस प्रकार चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने के अधिकार तक सीमित है. इससे व्यक्ति की नागरिकता संबंधी दावेदारी समाप्त नहीं होती और न ही नागरिकता अधिनियम के तहत सक्षम प्राधिकारी द्वारा उस सवाल पर निर्णय लेने का रास्ता बंद होता है.’

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि जो लोग कानूनी शर्तों को पूरा नहीं करते, उनके मामलों को निर्वाचन आयोग केंद्र सरकार को भेजे.

अलग-अलग राज्यों में अलग नियम

एसआईआर को लागू करने के मामले में भी चुनाव आयोग ने अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरीका अपनाया.

बिहार में मतदाताओं से गणना (एन्यूमरेशन) फार्म भरवाए गए, जबकि दूसरे चरण में जिन 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों – जिनमें चुनाव वाले पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, असम और पुडुचेरी शामिल थे – वहां मतदाताओं से कहा गया कि वे अपना मिलान 2002 की मतदाता सूची से करें.

इसके अलावा, पश्चिम बंगाल में मतदाताओं को केवल 2002 की सूची से अपना मिलान ही नहीं करना पड़ा, बल्कि उन्हें बाद में जोड़े गए ‘तार्किक विसंगति’ (Logical Discrepancy) नामक नए मानदंड का भी सामना करना पड़ा. इसके कारण डुप्लीकेट प्रविष्टियों और नामों से जुड़ी विसंगतियां सामने आईं, जो अलग-अलग लिपियों में रूपांतरण और सख्त मिलान नियमों के कारण और बढ़ गईं.

इसका परिणाम यह हुआ कि राज्य का कुल मतदाता आधार लगभग 90 लाख कम हो गया, जबकि 27 लाख मतदाता चुनाव से दो सप्ताह पहले तक अपने मामलों पर 19 न्यायिक न्यायाधिकरणों के निर्णय की प्रतीक्षा करते रहे. यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया. मतदान से पहले न्यायाधिकरण केवल बहुत कम मामलों का ही निपटारा कर सके.

जहां बिहार, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में चुनाव से पहले एसआईआर कराया गया, वहीं असम, जो पश्चिम बंगाल की तरह ही एक सीमावर्ती राज्य है, वहां चुनाव से पहले एसआईआर नहीं कराया गया. वहां केवल संक्षिप्त पुनरीक्षण (Summary Revision) किया गया.

अब जिन 16 राज्यों और 3 केंद्रशासित प्रदेशों में एसआईआर का तीसरा चरण शुरू हो रहा है, उनमें से किसी में भी इस वर्ष चुनाव नहीं होने हैं. दूसरी ओर, दिल्ली, महाराष्ट्र, ओडिशा, झारखंड और हरियाणा जैसे राज्यों में पिछले दो वर्षों के भीतर ही चुनाव हो चुके हैं.

यह स्थिति मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा बिहार में चुनाव से ठीक पहले एसआईआर कराने के समय दिए गए उस तर्क से बिल्कुल विपरीत है, जिसमें उन्होंने पिछले वर्ष अक्टूबर में कहा था कि ‘चुनाव के बाद मतदाता सूची का पुनरीक्षण कानून के अनुरूप नहीं है.’

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)