नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य के जंगलों में स्थित केते एक्सटेंशन इंटीग्रेटेड कोयला ब्लॉक में खनन के लिए केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पर्यावरणीय मंजूरी (ईसी) दे दी है. इस परियोजना में प्रतिवर्ष 90 लाख टन कोयले के उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 24 जून को जारी की गई यह मंजूरी परियोजना को मिली सैद्धांतिक वन मंजूरी (इन-प्रिंसिपल फॉरेस्ट क्लीयरेंस) के तुरंत बाद आई है.
मंत्रालय की कोयला खनन संबंधी विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति ने जनवरी 2025 में ही परियोजना के लिए पर्यावरणीय मंजूरी की सिफारिश कर दी थी, लेकिन अंतिम मंजूरी को वन मंजूरी से जोड़ा गया था, जो 9 जून को जारी हुई.
हसदेव के जंगलों में मंजूरी पाने वाला यह तीसरा बड़ा कोयला क्षेत्र है. इससे पहले परसा और परसा ईस्ट केते बासन (पीईकेबी) ओपन-कास्ट खदानें पहले से संचालित हैं. कभी इन जंगलों को वन और वन्यजीव संरक्षण के लिए खनन निषिद्ध (नो-गो) क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया था.
सरगुजा जिले में 1,760 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला यह कोयला ब्लॉक वर्ष 2015 में राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड को आवंटित किया गया था. अडानी समूह इस खदान का डेवलपर और ऑपरेटर है. यहां से निकाला गया कोयला राजस्थान के छबड़ा और सूरतगढ़ ताप विद्युत संयंत्रों को भेजा जाएगा.
यह मंजूरी ऐसे समय दी गई है जब 2021 में भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) द्वारा हसदेव-अरण्य कोलफील्ड पर किए गए जैव विविधता आकलन में कहा गया था कि पहले से संचालित पीईकेबी खदान को छोड़कर जंगलों में कोई नया खनन नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे जैव विविधता पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है.
1,502 वर्ग किलोमीटर में फैला हसदेव-अरण्य कोयला क्षेत्र मध्य भारत के सबसे बड़े घने जंगलों में से एक है. यहां घने साल और सागौन के वन हैं, जो वनस्पति विविधता से समृद्ध हैं. यह क्षेत्र हाथियों, तेंदुओं और बाघों सहित अनेक वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण आवास और आवागमन गलियारा भी है.
भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) ने डब्ल्यूआईआई के साथ किए गए अध्ययन में कहा था कि केते एक्सटेंशन परियोजना पर निर्णय लेते समय सतही जल प्रबंधन और जैव विविधता संरक्षण से जुड़े कड़े पर्यावरणीय उपाय लागू किए जाने चाहिए, क्योंकि यहां अत्यधिक घना और मध्यम घना वन क्षेत्र और वन्यजीव मौजूद हैं.
स्थानीय आदिवासी समुदायों और कांग्रेस ने इस परियोजना तथा केंद्र सरकार द्वारा दी गई मंजूरियों का विरोध किया है. उनका कहना है कि कोयला खनन के कारण बड़े पैमाने पर वनों की कटाई होगी.
आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार परियोजना के लिए 1,742.6 हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन किया जाएगा. 4.48 लाख पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव है, हालांकि इसे कोयले की जरूरत के अनुसार चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा. पहले पांच वर्षों में लगभग 98,000 पेड़ काटे जाएंगे, जबकि छठे से दसवें वर्ष के बीच लगभग 60,000 पेड़ों की कटाई होगी. राज्य सरकार को 60 सेंटीमीटर से कम घेराई वाले 67,414 पेड़ों का प्रत्यारोपण (ट्रांसलोकेशन) करने और बाकी पेड़ों की कटाई भी चरणबद्ध तरीके से करने का निर्देश दिया गया है.
इस परियोजना से सरगुजा जिले की उदयपुर तहसील के केंते, बासन, चकेरी और परोगिया गांवों के 56 परिवार प्रभावित होंगे. इन परिवारों का पुनर्वास राज्य सरकार द्वारा स्वीकृत राहत एवं पुनर्वास योजना के तहत किया जाएगा.
गौरतलब है कि वर्ष 2017 में पर्यावरण मंत्रालय की वन सलाहकार समिति ने इस कोयला ब्लॉक में खोजी कार्य (प्रॉस्पेक्टिंग) के लिए सैद्धांतिक मंजूरी देते समय जैव विविधता अध्ययन कराने की शर्त रखी थी. आईसीएफआरई और डब्ल्यूआईआई के अध्ययन ने निष्कर्ष निकाला था कि खनन से भूमि उपयोग में होने वाले परिवर्तन जंगलों के क्षेत्रफल और घनत्व पर नकारात्मक प्रभाव डालेंगे.
