नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार (6 जुलाई) को ताजमहल के सर्वेक्षण की मांग वाली एक याचिका पर केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) से जवाब तलब किया है.
यह याचिका उस दीवानी मुकदमे के संदर्भ में दायर की गई है, जिसमें दावा किया गया है कि यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल ताजमहल मूल रूप से ‘तेजोमहालय’ नामक भगवान शिव का एक मंदिर था.
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल ने केंद्र सरकार और एएसआई को नोटिस जारी कर याचिका पर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया.
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से एक एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करने की मांग की है, जो ताजमहल का निरीक्षण करे और उसकी तस्वीरें ले. यह मांग इससे पहले दो बार निचली अदालतों द्वारा खारिज की जा चुकी है- पहली बार 2019 में आगरा की ट्रायल कोर्ट ने और दूसरी बार अप्रैल 2026 में पुनरीक्षण (रिवीजन) अदालत ने. इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया.
यह याचिका भगवान श्री अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर विराजमान तेजो महालय मंदिर पैलेस की ओर से उनके कानूनी संरक्षक हरि शंकर जैन और अन्य श्रद्धालुओं द्वारा दायर की गई है.
द हिंदू के अनुसार, हरि शंकर जैन इससे पहले भी राम जन्मभूमि स्वामित्व विवाद और कृष्ण जन्मभूमि और काशी विश्वनाथ-ज्ञानवापी मस्जिद विवाद जैसे सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील मामलों में पक्षकारों की ओर से पेश हो चुके हैं.
ताजमहल के निरीक्षण की मांग के पीछे क्या है दावा?
इस मामले का मूल दीवानी मुकदमा 2015 से आगरा की एक अदालत में लंबित है. इसमें यह घोषणा करने की मांग की गई है कि ताजमहल, मुगल सम्राट शाहजहां द्वारा मुमताज महल का मकबरा बनाए जाने से पहले भगवान शिव का मंदिर था. याचिकाकर्ताओं ने ताजमहल परिसर के भीतर हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-अर्चना करने की अनुमति भी मांगी है.
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पूजा-अर्चना करने का उनका अधिकार संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित है, जो धर्म की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्रदान करता है.
उन्होंने यह आरोप भी लगाया है कि एएसआई ने मुस्लिम समुदाय को परिसर के भीतर नमाज़ अदा करने की अनुमति देकर अवैध रूप से पक्षपात किया है.
ताज़ा याचिका में कहा गया है कि ताजमहल की वास्तुकला और संरचनात्मक विशेषताओं का दस्तावेज़ीकरण जरूरी है, क्योंकि ऐसे तथ्यों को केवल मौखिक गवाही के आधार पर प्रभावी ढंग से साबित नहीं किया जा सकता है. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि चूंकि ताजमहल एएसआई के संरक्षण में है, इसलिए वे स्मारक के उन हिस्सों तक स्वतंत्र रूप से नहीं पहुंच सकते और न ही उनकी तस्वीरें ले सकते हैं, जिनके बारे में उनका दावा है कि वे ताजमहल के कथित ‘हिंदू अतीत’ के प्रमाण हैं. इसलिए वे इसके लिए एक एडवोकेट कमिश्नर की नियुक्ति की मांग कर रहे हैं.
याचिका में खास तौर पर गुंबद के शिखर पर लगे फिनियल (कलशनुमा शिखर), कमल के डिजाइन और एएसआई के अभिलेखों में कथित रूप से ‘गौशाला’ के रूप में वर्णित एक संरचना का उल्लेख किया गया है. याचिकाकर्ताओं का दावा है कि स्मारक के कई हिस्से आम लोगों की पहुंच से बाहर हैं और उनके सर्वेक्षण की निगरानी अदालत द्वारा कराई जानी चाहिए.
2019 में ट्रायल कोर्ट ने इस आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करने का कोई औचित्य नहीं है. इस वर्ष पुनरीक्षण अदालत ने भी इस निर्णय को बरकरार रखा. अदालत ने कहा था कि याचिकाकर्ता संबंधित संपत्ति की पहचान करने वाले राजस्व अभिलेख प्रस्तुत करने में विफल रहे हैं और मुकदमे में दी गई भूमि का विवरण प्रतिवादियों द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज़ों से मेल नहीं खाता.
बार एंड बेंच के अनुसार, निचली अदालतों के इन निर्णयों के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में दलील दी कि उनका आवेदन ऐसे आधारों पर खारिज किया गया, जिनका इस प्रश्न से कोई संबंध नहीं था कि विवाद के निपटारे के लिए स्थानीय जांच आवश्यक है या नहीं. याचिका में सुप्रीम कोर्ट के 2019 के अयोध्या फैसले का भी हवाला दिया गया है. इसमें कहा गया था कि सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश 26, नियम 9 के तहत दीवानी अदालतों को ऐसे मामलों में, जहां तथ्यात्मक विवाद स्पष्ट करने के लिए स्थानीय जांच जरूरी हो, कमिश्नर नियुक्त करने का अधिकार है.
हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अब तक याचिकाकर्ताओं के दावों के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है. फिलहाल अदालत ने केवल केंद्र सरकार और एएसआई से जवाब मांगा है. उनके जवाब प्राप्त होने के बाद ही यह तय किया जाएगा कि ताजमहल का अदालत की निगरानी में निरीक्षण कराने की अनुमति दी जाए या नहीं.
