श्रीनगर: जम्मू की एक अदालत ने सोमवार (13 जुलाई) को स्कूल की किताबों से जुड़े एक मामले की जांच के सिलसिले में तीन प्रकाशकों को 10 दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया है.
मालूम हो कि जम्मू की काउंटर इंटेलिजेंस यूनिट (सीआईजे) ने इन तीनों प्रकाशकों को ‘आपत्तिजनक’ सामग्री वाली किताबों के प्रकाशन और वितरण के मामले में गिरफ्तार किया है. इन गिरफ्तारियों से पहले इस संबंध में जम्मू और दिल्ली में संयुक्त छापेमारी अभियान भी चलाया गया था.
आरोपियों की पहचान जम्मू के ओबेरॉय बुक सर्विस के इंदरपाल सिंह और नोएडा स्थित डोमिनेंट प्रकाशन के अमरदीप सिंह और गिरीश अरोड़ा के तौर पर हुई है. उन्हें वर्चुअल तरीके से अदालत के सामने पेश किया गया, जिसके बाद अदालत ने इन्हें दस दिन की हिरासत में भेज दिया है.
उल्लेखनीय है कि यह विवाद दो किताबों की 251 प्रतियों को लेकर है. पहली किताब का नाम ‘पर्सनालिटी एंड लेजेंड्स ऑफ जम्मू एंड कश्मीर’ है, जिसे हिलाल अहमद और संतोष मीनम ने मिलकर लिखा है और जम्मू के ओबेरॉय बुक सर्विस ने प्रकाशित किया है. वहीं, दूसरी किताब का नाम ‘ग्रेट पर्सनालिटी ऑफ जम्मू एंड कश्मीर’ है, जिसे सुशांत गिरि ने लिखा है और दिल्ली के अनुराग प्रकाशन ने प्रकाशित किया है.
ये दोनों किताबें केंद्र सरकार की ‘समग्र शिक्षा योजना’ के तहत सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी में भेजी गई थीं. अलग-अलग पार्टियों के नेताओं ने इन किताबों के सामग्री की निंदा की है.
अधिकारियों का दावा है कि ब्लैकलिस्ट की गई इन दोनों किताबों में अलगाववाद को बढ़ावा देने वाला कंटेंट था और इनसे इलाके में कानून-व्यवस्था बिगड़ने का खतरा था.
जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल के प्रशासन ने 4 जुलाई को स्कूल की लाइब्रेरी से किताबें हटाने का एक बड़ा आदेश जारी किया था. साथ ही किताब की समीक्षा प्रक्रिया से जुड़े स्कूल शिक्षा विभाग के आठ अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है.
इसके अलावा एक अनुबंधित कर्मचारी को भी हटाया गया है और लेखकों व प्रकाशकों को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है. प्रशासन ने किताबों के चयन की प्रक्रिया की उच्च-स्तरीय जांच के आदेश भी दिए है.
गौरतलब है कि यह विवाद तब शुरू हुआ जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों ने इन किताबों पर आपत्ति जताई. उनका आरोप था कि केंद्र सरकार के ‘समग्र शिक्षा अभियान’ के तहत वितरित इन किताबों में ‘अनुचित सामग्री’ थी.
जांच एजेंसी, काउंटर-इंटेलिजेंस कश्मीर (सीआईके) ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत एफआईआर दर्ज की है. इसमें आपराधिक साजिश, भारत की संप्रभुता और अखंडता को खतरे में डालने, दुश्मनी को बढ़ावा देने और आपत्तिजनक सामग्री फैलाने जैसे आरोप शामिल हैं.
मालूम हो कि सीआईके ने 6 जुलाई को जम्मू और नोएडा में प्रकाशकों के ठिकानों पर तलाशी ली थी.
‘संस्थानों के प्रमुखों को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है’
अधिकारियों ने बताया कि जांच में किताबें छापने और बांटने में प्रकाशकों की भूमिका की पड़ताल की जा रही है. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि और गिरफ्तारियों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.
उपराज्यपाल के प्रशासन ने एक उच्च स्तरीय रिव्यू मीटिंग की और जम्मू-कश्मीर के सभी यूनिवर्सिटी, कॉलेज, स्कूल और लाइब्रेरी को निर्देश दिया कि वे सत्यापित करें कि उनके परिसर में ऐसी कोई सामग्री मौजूद नहीं है. संस्थानों के प्रमुखों को चेतावनी दी गई कि किसी भी चूक के लिए वे व्यक्तिगत रूप से ज़िम्मेदार होंगे और उनके ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई हो सकती है.
बयान के अनुसार, अधिकारियों ने रिव्यू मीटिंग में बताया कि कुछ शिक्षण संस्थानों से अलगाववाद को बढ़ावा देने वाली किताबें मिली हैं. उपराज्यपाल ने भविष्य में एकेडमिक मटीरियल की खरीद के लिए एक सिस्टम बनाने का निर्देश दिया, जिसमें शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों और वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा समय-समय पर समीक्षा शामिल होगी. डिजिटल रिपॉजिटरी और यूनिवर्सिटी की वेबसाइटों की भी जांच की जा रही है.
विशेषज्ञ समितियों की सिफारिश के बाद, समग्र शिक्षा योजना के तहत 18,328 सरकारी स्कूलों और 394 पीएम-श्री स्कूलों में वितरण के लिए 364 प्रकाशकों की 463 किताबों को मंज़ूरी दी गई थी.
यह एफआईआर, बीएनएस की धारा 49 (उकसावा), 61(2) (आपराधिक साजिश), 152 (भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले काम), 196 (दुश्मनी को बढ़ावा देना) और 353 (झूठे बयान, अफवाहें या रिपोर्ट छापना या फैलाना) के साथ-साथ यूएपीए की धारा 13 के तहत दर्ज की गई है.
इस विवाद ने शैक्षणिक सामग्री की निगरानी और केंद्र शासित प्रदेश के संस्थानों में इस्तेमाल के लिए किताबों को चुनने की प्रक्रिया के बारे में भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.
हालांकि प्रशासन का कहना है कि इन उपायों का मकसद ऐसी सामग्री को शिक्षण संस्थानों में आने से रोकना है जो छात्रों को गुमराह कर सकता है या उन्हें कट्टरपंथी बना सकता है, लेकिन शिक्षाविदों और नागरिक समाज के सदस्यों का तर्क है कि इतिहास और असहमति पर बहस लोकतांत्रिक समाजों का अहम हिस्सा है.
कश्मीर के लेखक और पत्रकार राव फरमान अली ने ‘द वायर’ से कहा, ‘कोई प्रकाशन उचित है या नहीं, यह तय करने का काम सिर्फ़ सुरक्षा-आधारित नज़रिए पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए. स्वायत्त शैक्षणिक निकायों – जिनमें वाइस-चांसलर, प्रिंसिपल और विषय विशेषज्ञों की समितियां शामिल हैं – को ऐसे मटीरियल की जांच करनी चाहिए और उसकी शैक्षणिक प्रासंगिकता तय करनी चाहिए.’
प्रशासन ने एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) का प्रस्ताव भी दिया है, जिसके तहत शिक्षण संस्थानों में आने वाली किताबों की छात्रों को उपलब्ध कराने से पहले स्क्रीनिंग और समय-समय पर समीक्षा की जाएगी.
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