सावन के स्लेटी आकाश के तले बरामदे या बालकोनी की आड़ से झमाझम वर्षा का आनंद लेते हुए बिहार या उत्तर प्रदेश में जिस तरह अक्सर लोगों को गर्म पकौड़ियों और मीठी दूधिया चाय की तलब महसूस होती है, उसी तरह बंगाल में प्रायः प्रस्ताव उठता है, ‘की गो, आज के खिचूड़ी आर माछ भाजा होय जाक (क्यों प्रिय, आज खिचड़ी और भुनी मछली हो जाए)?’ और सामान्यतः यह सुझाव मान भी लिया जाता है.
पश्चिम बंगाल में यह विचार मात्र एक अभिमत नहीं वरन् एक सिद्धांत के रूप में स्थापित है कि हर ऋतु का सर्वग्राही रसास्वादन करने के लिए उस काल की आबोहवा के संग उसके पूरक पकवान का सेवन नितांत आवश्यक है. उमड़ते मानसून में गरमा-गरम ‘खिचुड़ी’ इस बात का एक उत्तम उदाहरण है. पर अपने देश के हर क्षेत्र में यह बात नहीं है.
जैसे कि बिहार में, जहां मैं पला-बढ़ा, खिचड़ी साप्ताहिक भोजन है. बचपन से ही हमारे घर में शनिवार को दिन में खिचड़ी खाने का रिवाज रहा है. अगर किसी कारणवश दिन में न बन सकी हो तो रात के भोजन में खिचड़ी की अपेक्षा रहती थी. सामान्यतः यह चावल तथा मसूर या मूंग की दाल की बनाई जाती थी और बिल्कुल पतली होती थी. इसमें कोई सब्ज़ी नहीं पड़ती थी. केवल सर्दियों में कई बार मेरी मां खिचड़ी में मटर भी डाला करती थीं. मटर-दार खिचड़ी मुझे बहुत पसंद थी पर विवाह के पश्चात पता चला कि कुछ लोगों के नज़र में यह मिलावट है.
हर शनिवार को खिचड़ी क्यों बनती है?
बचपन में ही मैंने सीखा कि ‘खिचड़ी के चार यार, घी, दही, पापड़, अचार’. लेकिन एक-दो व्यंजन और भी हैं जिन्हें इस छंद में जगह नहीं मिली है मगर जिनका खिचड़ी के साथ परोसा जाना अनिवार्य है- आलू का चोखा या बैंगन का भरता या फिर दोनों ही. बिहार में इसके अलावा मौसम के अनुसार खिचड़ी के साथ ‘चक्का-बचका’ (बेसन या चावल के आटे के घोल में लपेट कर छने आलू, लौकी तथा कोहड़े के पतले टुकड़े) तथा तिलौरी भी खाई जाती है.
छुटपन में मैंने अपनी मां से जानना चाहा था कि हर शनिवार को खिचड़ी क्यों बनती है? मां ने बताया था कि वैसे तो लोग कहते हैं कि इससे शनि महाराज शांत रहते हैं लेकिन उन्हें लगता था कि चूंकि खिचड़ी सुपाच्य है यह प्रथा पेट को सप्ताह में एक दिन आराम देने के लिए बनाई गई थी. खिचड़ी हल्का खाना है इसीलिए तो इसे बीमार लोग भी आसानी से पचा लेते हैं.
ऐसा शायद इसलिए भी था चूंकि बिहारी खिचड़ी में अंत में दिए छौंक को छोड़कर मसाले न के बराबर होते हैं. शनिवार के अलावा खिचड़ी तब बनाई जाती थी जब घर में कोई अस्वस्थ हो या किसी के पेट में तकलीफ़ हो.
बंगाल में शनि महाराज की कद्र कुछ कम है, इसलिए यहां शनिवार को कुछ लोग निरामिष भोजन तो करते हैं लेकिन यहां निरामिष भोजन का अर्थ खिचड़ी नहीं माना जाता है. हां, यहां भी बीमार लोगों को अक्सर खिचड़ी खिलाई जाती है. इसके अलावा खिचड़ी मुख्यतः जुड़ी है बरसात के भीगे मौसम से, शीत के कंपकंपाते दिनों से तथा दुर्गा पूजा के वार्षिक महोत्सव से.
अब यही मान्यता है कि ग्राम हो या शहर खिचुड़ी वर्षा काल में पश्चिम बंगाल का ‘कंफर्ट फूड’ है. पर कुछ लोगों के हिसाब से वर्षा ऋतु में खिचुड़ी की लोकप्रियता का कारण रूमानी भोजन प्रेम नहीं स्थितिपरक विवशता है. अगर कई दिनों तक, विशेषकर ग्रामीण इलाकों में, मेघाच्छादित आकाश से अविराम वृष्टि होती रहे और हाट-बाज़ार बंद हो जाएं तो फिर घर में उपलब्ध चावल-दाल, नमक, हल्दी, और आलू जैसे सामान्य सामग्री से सहज भोजन पकाने के अलावा उपाय ही क्या रह जाता है?
लेकिन मजबूरी का नाम खिचुड़ी शायद इसलिए नहीं बन पाया क्योंकि गुणी बंगाली गृहिणियों के कौशल ने सादे खिचुड़ी को भी एक पकवान में परिवर्तित कर दिया है.
खिचुड़ी एक विधि अनेक
बंगाल में खिचुड़ी किसी एक निश्चित नुस्खे तक सीमित नहीं है. यह मौसम के अनुसार, क्षेत्र के अनुसार (तटीय बनाम भीतरी इलाके, पूर्व बनाम पश्चिम, शहरी बनाम ग्रामीण), धार्मिक अवसर के अनुसार, समुदाय के हिसाब से (हिंदू/मुस्लिम, घोटी/बांगाल), और यहां तक कि जाति या वर्ग के अनुसार भी बदलती रहती है. फिर भी यह कहा जा सकता है कि इस राज्य में मोटे तौर पर तीन तरह की खिचड़ी पकाई जाती है जिनमें उक्त कारणों से विविधता आ जाती है.
प्रथम, आम तौर पर बरसात में बंगाली रसोई में बनने वाली खिचुड़ी मसूर दाल और चावल से बनाई जाती है तथा इसमें शुरुआत में ही कुछ मसाले भी पड़ते हैं. चावल की गुणवत्ता तबके तथा स्थानीय उपलब्धि पर निर्भर करती है. कमजोर वर्ग के घरों में मोटे उसना चावल का उपयोग किया जाता है तथा समर्थ परिवारों में महीन ख़ुशबूदार चावल जैसे दक्षिण बंगाल में गोविंदभोग, तथा उत्तर बंगाल में चिनीगुड़ा या कालों नोनिया का व्यवहार किया जाता है. इन्हीं कारणों से मसूर को मूंग दाल से भी बदल दिया जाता है.
साथ ही मौसम के अनुसार जो भी सब्ज़ी मौजूद हो उन्हें भी खिचड़ी में मिलाय जाता है. मसूर दाल और छोटे दाने वाले चावल से बनी घी से लैस पतली खिचुड़ी के साथ बेगुन या पटल (परवल) भाजा तथा, अगर खिचुड़ी में आलू न पड़ा हो तो, आलू का चोखा अवश्य ही परोसा जाता है. साथ में आमलेट या भुनी मछली का सेवन कमनीय है.
बरसात के विदा लेने के बाद को ऋतु को बंगाल में शरद न कहकर शायद पूजा ऋतु कहना उचित होगा क्योंकि 15 सिंतबर के दिन विश्वाकर्मा पूजा के शंखनाद से आरंभ हो कर एक के बाद एक कई देवी-देवताओं की पूजा अनुष्ठित होती हैं जनवरी में सरस्वती पूजा तक. इनमें से तीन पूजाओं में, दुर्गा पूजा, काली पूजा तथा सरस्वती पूजा में देवी को खिचड़ी का भोग चढ़ाया जाता है. इनमें से सबसे वृहद् दुर्गा महोत्सव में साधारणतः अष्टमी के दिन का चढ़ावा अवश्य ही खिचड़ी होता है, हालांकि कई पूजा पंडालों में मुझे अन्य दिनों भी भोग के प्रसाद में खिचड़ी ही मिली है.
दक्षिण बंगाल में साधारणतः भोग खिचड़ी छोटे दानों वाले सुगंधित गोविंदभोग चावल तथा सोना मूंग से ही बनाई जाती है. पहले अदरक, हल्दी, और गरम मसालों को तेल या घी में भूना जाता है और फिर चावल-दाल पतीले में दाल जाता है. थोड़ी चीनी मिलाने के कारण स्वाद में भोग खिचड़ी हल्की मीठी होती है.
इसकी विशेषता है इसका निरामिष होना, इस संदर्भ में निरामिष का अर्थ है प्याज़ तथा लहसुन रहित. इसके साथ प्रसाद में परोसा जाता है लेबड़ा, कई सब्ज़ियों से बनी तरकारी, बेगुनी- बैगन की पकौड़ी तथा पाइष यानी खीर.
बरसात की खिचुड़ी एवं भोग खिचुड़ी से बिल्कुल भिन्न है भाजा या भुनी खिचुड़ी. स्वाद-प्रेमी शौक़ीन बंगालियों का यह व्यंजन खिचुड़ी कम और पुलाव अधिक दिखता है. बनाते समय आरंभ में ही गोविंदभोग चावल तथा सोना मूंग दाल को घी में भूना जाता है जिसकी वजह से इसका नाम भाजा खिचुड़ी पड़ा है.
यह खिचड़ी बरसाती या भोग खिचुड़ी की तरह पतली नहीं होती, बल्कि सूखी होती है पुलाव जैसी जिसमें चावल और दाल के दाने पूरी तरह घुल नहीं जाते. इस खिचड़ी में मिलाए जाते हैं है आलू, गोभी, और मटर तथा प्याज़ लहसुन भी दिए जा सकते हैं. भुनी खिचड़ी के साथ खाई जाती है भुनी हुई मछली, विशेष रूप से हिलसा मछली.
अरे, मैं तो भूल ही गया. पश्चिम बंगाल में एक और तरह की खिचड़ी भी बनती है जिसका नाम न तो खिचड़ी है न खिचुड़ी- इसका नाम केजरी है. हालांकि पश्चिमी देशों, विशेषतः ब्रिटेन में, यह एक लोकप्रिय भोजन है, अंग्रेजों के द्वारा ईजाद किए इस व्यंजन को मुख्यतः अब कलकत्ता में एंग्लो-इंडियन परिवार बनाते हैं. इसमें चावल-दाल के साथ उबले अंडे और मछली डालकर बनाया जाता है.
पश्चिम बंगाल की खिचड़ी में भिन्नता ठीक उसी तरह की है जैसे देश में हर राज्य की खिचड़ी में विविधता है. उत्तर भारत में खिचड़ी प्रायः सादगी और पौष्टिकता का प्रतीक है तथा इस पूरे क्षेत्र में मकर संक्रांति के अवसर पर खिचड़ी का विशेष महत्व है, यहां तक कि संक्रांति के पर्व को कई जगहों में खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है.
ओडिशा में खिचड़ी धार्मिक परंपरा से जुड़ी है तथा जगन्नाथ मंदिर में महाप्रसाद के छप्पन व्यंजनों में से एक है. गुजरात की अपेक्षाकृत पतली राम खिचड़ी प्रायः कढ़ी, छाछ या दही के साथ खाई जाती है. राजस्थान की खिचड़ी में चावल की जगह बाजरा ले लेता है जब कि महाराष्ट्र में वरण भात खिचड़ी का एक अन्य रूप हैं जिसे मूंगफली और नारियल अनूठा बना देते हैं. कर्नाटक का बिसी बेले भात, तमिलनाडु का पोंगल तथा आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का कट्टे पोंगल भी खिचड़ी के दक्षिण भारतीय संबंधी हैं.
खिचड़ी एक होकर भी अनेक है- एक मूल व्यंजन जो स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अनगिनत रूप धारण करती रहती है. यह कहीं रोगी का भोजन है तो कहीं दैनिक जीवन का हिस्सा, कहीं पूजा का प्रसाद है तो कहीं त्योहार का प्रधान पकवान. सही मायने में खिचड़ी एक बहुरूपिया है.
(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)
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