नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश सरकार ने अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में श्रद्धालुओं के चढ़ावे के कथित गबन और वित्तीय अनियमितताओं की जांच के लिए गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) का पुनर्गठन किया है।.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, नई एसआईटी का नेतृत्व पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) किरण एस. करेंगे. इसके अन्य सदस्य पुलिस उपमहानिरीक्षक (डीआईजी) सोमेन वर्मा और अयोध्या के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) गौरव ग्रोवर हैं.
एसआईटी के पुनर्गठन का फैसला 13 जुलाई को हुई सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद लिया गया. सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा था कि वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े इस मामले की जांच अनुभवी पुलिस अधिकारियों द्वारा की जानी चाहिए. अदालत ने राज्य सरकार को एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी के नेतृत्व में नई एसआईटी गठित करने और 27 जुलाई तक स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था.
बताया गया है कि नई एसआईटी को आगे की कार्रवाई का काम सौंपा गया है, जिसमें ट्रस्ट के पिछले पांच वर्षों के खातों का संभावित दोबारा ऑडिट भी शामिल है, ताकि व्यापक वित्तीय अनियमितताओं, निर्माण कार्यों पर हुए खर्च और गहनों जैसी कीमती वस्तुओं के प्रबंधन की जांच की जा सके.
ज्ञात हो कि यह विवाद जून 2026 की शुरुआत में तब शुरू हुआ जब विपक्षी नेताओं, जैसे समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक पवन पांडे ने आरोप लगाया कि करोड़ों रुपये के दान (अनुमान अलग-अलग थे, कुछ लोग सार्वजनिक चर्चा में 7-7.5 करोड़ रुपये या उससे अधिक की बात कर रहे थे) का गबन किया गया है.
इन आरोपों के बाद श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने जांच की मांग की, जिसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने 13-14 जून 2026 के आसपास तीन सदस्यों वाली शुरुआती एसआईटी का गठन किया. इस टीम में लखनऊ डिविजनल कमिश्नर विजय विश्वास पंत (अध्यक्ष), आईजी किरण एस और स्पेशल सेक्रेटरी (वित्त) नील रतन कुमार शामिल थे.
करीब 23 जून को सौंपी गई प्रारंभिक जांच रिपोर्ट में एसआईटी ने चढ़ावे की गिनती के दौरान चोरी और धन की हेराफेरी के प्रथमदृष्टया प्रमाण मिलने की बात कही.
सीसीटीवी फुटेज की जांच (27 अप्रैल से 5 जून के बीच उपलब्ध लगभग 45 दिनों की रिकॉर्डिंग) में कथित तौर पर करीब 70 घटनाएं सामने आईं, जिनमें चढ़ावे की गिनती करने वाले कर्मचारी नकदी को अपने कपड़ों, जेबों, जूतों और अन्य जगहों पर छिपाते दिखाई दिए. कुछ मामलों में कर्मचारी एक-दूसरे की मदद करते या चोरी को छिपाने का प्रयास करते भी नजर आए.
इसके अलावा प्रक्रिया में कमियां भी पाई गईं, जैसे कि चढ़ावे के प्रबंधन, गिनती और जमा करने के लिए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के साथ तय स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर का पालन न करना; सीसीटीवी मॉनिटरिंग का न होना या ठीक से काम न करना; हुंडी (दान पेटी) की चाबियों का कथित तौर पर ड्राइवर के पास होना; और निगरानी में कमी.
उस समय चोरी में ट्रस्ट के बड़े पदाधिकारियों की सीधी भूमिका का कोई सबूत नहीं मिला, हालांकि निगरानी और प्रशासन से जुड़ी कमियां सामने आईं, खासकर पूर्व ट्रस्टी अनिल मिश्रा की देखरेख और नियुक्तियों में भूमिका को लेकर.
एसआईटी की जांच और ट्रस्ट के एक सदस्य की शिकायत के आधार पर 25 जून को एफआईआर दर्ज की गई. कैश और कीमती सामान की गिनती से जुड़े आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया: अविनाश शुक्ला, अनुकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा, मनीष कुमार यादव, करुणेश पांडे, रमाशंकर मिश्रा, सुभाष श्रीवास्तव (रिटायर्ड बैंक सुपरवाइजर) और रमाशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव.
पुलिस ने कई आरोपियों से लगभग 80 लाख रुपये कैश (और कुछ विदेशी मुद्रा) बरामद की. कुछ आरोपी आपस में रिश्तेदार थे या उन्होंने गिनती करने वाली टीम में एक-दूसरे की नियुक्ति में मदद की थी. आरोपियों पर भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत चोरी, आपराधिक विश्वासघात और साजिश जैसे अपराधों के लिए केस दर्ज किया गया.
मामले के सामने आने के बाद ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने इस्तीफा दे दिया, जिन्हें जुलाई की शुरुआत में स्वीकार कर लिया गया. ट्रस्ट ने कृष्ण मोहन को अंतरिम महासचिव नियुक्त किया, नए सीईओ पद सहित संगठनात्मक बदलावों की घोषणा की और प्रक्रियाओं की समीक्षा शुरू की. ट्रस्ट ने पिछले कुछ वर्षों में मिले भारी दान और निर्माण व कामकाज पर खर्च की जानकारी दी है.
