दिल्ली पुलिस पर मारपीट का आरोप लगाने वाले वकील पहुंचे सुप्रीम कोर्ट, स्वतंत्र जांच की मांग

जंतर-मंतर पर सीजेपी के नेतृत्व वाले छात्र आंदोलन के दौरान हिरासत में लिए गए छात्रों की रिहाई की मांग को लेकर निजामुद्दीन थाने पहुंचे वकील मानिक गुप्ता ने आरोप लगाया था कि दिल्ली पुलिस ने उनके साथ मारपीट की और उन्हें गैरकानूनी हिरासत में रखा. अब उन्होंने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है.

भारत के सर्वोच्च न्यायालय की इमारत. फोटो: विकिमीडिया कॉमन्स.

नई दिल्ली: दिल्ली के वकील मानिक गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है. उन्होंने आरोप लगाया है कि 23 जुलाई को वह जंतर-मंतर पर चल रहे कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व वाले छात्र आंदोलन में शामिल छात्रों की रिहाई की मांग को लेकर निजामुद्दीन थाने पहुंचे थे. वहां दिल्ली पुलिस ने उनके साथ मारपीट की और उन्हें अपमानित किया.

इससे पहले मानिक गुप्ता ने द वायर को बताया था कि 23-24 जुलाई की दरम्यानी रात जब वह हिरासत में लिए गए छात्रों की मदद के लिए निजामुद्दीन थाने पहुंचे, तब पुलिसकर्मियों ने उन्हें थप्पड़ और मुक्के मारे तथा गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा. हालांकि, दिल्ली पुलिस ने मारपीट के आरोपों से इनकार किया था.

मानिक गुप्ता ने 24 जुलाई को दक्षिण-पूर्व जिले के पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) को एक शिकायत भेजकर अपने साथ हुई कथित हिरासत में हिंसा का विवरण दिया था. गुप्ता ने द वायर को बताया कि उन्हें डीसीपी या किसी अन्य पुलिस अधिकारी की ओर से अब तक कोई जवाब नहीं मिला है.

अब सुप्रीम कोर्ट में दायर एक आवेदन में गुप्ता ने शीर्ष अदालत से इस पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराने का निर्देश देने की मांग की है.

यह आवेदन छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई से जुड़े मामले शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी बनाम भारत संघ में दायर याचिका में शामिल (इम्पलीड) किया गया है.

सुप्रीम कोर्ट में दायर आवेदन में कहा गया है, ‘23 जुलाई 2026 की रात करीब 11:30 बजे आवेदक को कई फोन कॉल आए, जिनमें बताया गया कि कुछ छात्रों को निजामुद्दीन चौराहे से गुजरते समय पुलिस ने हिरासत में ले लिया है. इसके बाद आवेदक अकेले रात करीब 12 बजे निजामुद्दीन थाने पहुंचे, ताकि छात्रों को हिरासत में लेने का कारण जान सकें. उस समय थाने में दिल्ली विश्वविद्यालय की समाजशास्त्र की एक प्रतिष्ठित प्रोफेसर और एक वरिष्ठ पत्रकार, जो एक समाचार एजेंसी के संस्थापक हैं, मौजूद थे. यदि यह माननीय न्यायालय चाहे तो दोनों आवेदक के आचरण के संबंध में हलफनामा देने को तैयार हैं. इसके बाद पुलिस ने आवेदक को भी हिरासत में ले लिया और उनके साथ हिरासत में हिंसा की. इस संबंध में दिल्ली पुलिस आयुक्त और दक्षिण-पूर्व जिले के पुलिस उपायुक्त को शिकायत भी दी जा चुकी है.’

आवेदन में आगे कहा गया है, ‘हिरासत में हुई हिंसा के बाद आवेदक का लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज अस्पताल में चिकित्सकीय परीक्षण कराया गया. 24 जुलाई 2026 की मेडिकल लीगल रिपोर्ट (एमएलसी) में गर्दन पर सॉफ्ट टिश्यू में चोट, सूजन, रीढ़ के पास दर्द और गर्दन पर लाल निशान दर्ज हैं.’

आवेदन में कहा गया है कि गुप्ता की शिकायत के आधार पर अब तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई है.

आवेदन के अनुसार, ‘24 जुलाई 2026 की विस्तृत लिखित शिकायत में पुलिस स्टेशन निजामुद्दीन के पुलिसकर्मियों द्वारा गलत तरीके से बंधक बनाना, गंभीर चोट पहुंचाना और आपराधिक धमकी जैसे संज्ञेय अपराधों का आरोप लगाया गया है. इसके बावजूद अब तक न तो कोई एफआईआर दर्ज की गई है, न ही प्रतिवादियों की ओर से कोई जवाब दिया गया है और न ही संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई की गई है. इसी तरह उनके खिलाफ कोई विभागीय कार्रवाई भी शुरू नहीं की गई है.’

गुप्ता ने अपने वकील के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि 23-24 जुलाई 2026 की घटना की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए या किसी स्वतंत्र प्राधिकरण अथवा सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी में कराई जाए.

उन्होंने निजामुद्दीन थाने के पुलिसकर्मियों, जिनमें थाना प्रभारी (एसएचओ) भी शामिल हैं, के खिलाफ उचित विभागीय और अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने की भी मांग की है.