नई दिल्ली: बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले की जांच के लिए गठित लिब्रहान आयोग की अध्यक्षता करने वाले और अपने सार्वजनिक जीवन के उत्तरार्ध में इसी वजह से सबसे अधिक पहचाने जाने वाले सेवानिवृत्त जज मनमोहन सिंह लिब्रहान का 87 वर्ष की आयु में निधन (2 अगस्त, 2026) हो गया है.
11 नवंबर, 1938 को जन्मे लिब्रहान ने अपने करिअर की शुरुआत अंबाला में वकालत से की थी. बाद में वे चंडीगढ़ स्थित पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में प्रैक्टिस करने लगे. उस समय वे केवल ‘मनमोहन सिंह, एडवोकेट’ के नाम से जाने जाते थे. चंडीगढ़ में मनमोहन सिंह नाम के कई वकील होने के कारण अक्सर भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती थी. इसी वजह से एक न्यायाधीश ने उन्हें सलाह दी कि वे अपनी उपजाति (सब-कास्ट) का नाम अपने सरनेम के रूप में जोड़ लें. इसके बाद उन्होंने ‘लिब्रहान’ उपनाम अपनाया.
इसके बाद वह जज बने. बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की सरकार ने उन्हें अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के पीछे की साजिश की जांच की जिम्मेदारी सौंपी. 6 दिसंबर 1992 को हुई इस घटना ने पूरे देश को गहरे संकट में डाल दिया था और इसके बाद भड़की हिंसा में भारत के विभिन्न हिस्सों में सैकड़ों लोगों की जान गई थी.
लिब्रहान आयोग को अपनी रिपोर्ट मार्च 1993 तक सौंपनी थी, लेकिन 43 बार समयसीमा बढ़ाए जाने के बाद आयोग ने अंततः 30 जून 2009 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की. इस लंबे कार्यकाल के बीच लगभग छह वर्षों तक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार सत्ता में रही.
इसी अवधि में वर्ष 2001 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी भी आयोग के सामने पेश हुए. बाबरी मस्जिद आंदोलन का प्रमुख रणनीतिकार माने जाने वाले आडवाणी उन लोगों में भी शामिल थे जिनके खिलाफ सीबीआई ने आरोपपत्र दायर किया था. आयोग के समक्ष उन्होंने कहा था कि बाबरी मस्जिद का विध्वंस ‘दुर्भाग्यपूर्ण और पीड़ादायक’ था तथा ‘उस दिन जितना निराश और व्यथित मैं महसूस कर रहा था, वैसा जीवन में बहुत कम अवसरों पर हुआ है.’
साल 2009 में उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में बताया था कि अयोध्या मामले से जुड़े सभी दस्तावेज़ उन्होंने 16 बार पढ़े थे. उन्होंने कहा था कि ऐसा इसलिए करना पड़ा क्योंकि उनके वकील बीच में ही मामला छोड़कर चले गए थे.
जस्टिस लिब्रहान को एक सख्त, स्पष्टवादी और बिना लाग-लपेट अपनी बात रखने वाले जज के रूप में जाना जाता था. उन्होंने यह भी कहा था कि उन्हें उन लोगों से खीझ होती है जो ‘प्रचार पाने के लिए बयान’ देते हैं. उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा था, ‘जजों की पहचान उनके फैसलों से होनी चाहिए, उनके भाषणों से नहीं.’
उन्होंने यह भी कहा था कि उन्हें इस बात से खीझ होती है कि आजकल कई जज अपना समय मुकदमों की फाइलें और दस्तावेज़ पढ़ने के बजाय समारोहों का उद्घाटन करने, पार्टियों में शामिल होने या गोल्फ खेलने जैसी गतिविधियों में अधिक बिताते हैं, जबकि उन्हें अपना ध्यान न्यायिक कार्यों पर केंद्रित करना चाहिए.
उन्होंने कहा था, ‘आप सिर्फ जजों से यह पूछिए कि अपने पूरे कार्यकाल के दौरान उन्होंने जजों की लाइब्रेरी से कितनी किताबें ली हैं. इसका जवाब आपको चौंका देगा.’
इसी साक्षात्कार में लिब्रहान ने उन न्यायिक फैसलों पर भी सवाल उठाया था जो केवल कानून की व्याख्या तक सीमित नहीं रहते. उन्होंने कहा था, ‘जजों को हम पर अपने विचार और अपनी राय थोपने की ज़रूरत ही क्यों पड़ती है?’
उन्होंने कहा था, ‘अगर कोई जज किसी हत्या का प्रत्यक्षदर्शी है, तो उसे गवाह के कटघरे में जाकर बयान देना चाहिए. उसे जज की हैसियत से अपने निजी ज्ञान के आधार पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए. जजों को अपनी पृष्ठभूमि या निजी विचार हम पर नहीं थोपने चाहिए. उनका काम केवल कानून की निष्पक्ष व्याख्या करना है, और उन्हें उसी दायित्व का पालन करना चाहिए.’
लिब्रहान ने हरियाणा के महाधिवक्ता (एडवोकेट जनरल) के रूप में भी सेवाएं दी थीं. वर्ष 1997 में उन्हें मद्रास उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया. इसके अलावा वह आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के भी मुख्य न्यायाधीश रहे. उनका कानूनी करियर लगभग चार दशकों तक फैला रहा और इस दौरान उन्होंने न्यायपालिका में महत्वपूर्ण योगदान दिया.
