नई दिल्ली: ‘मैं यह कहने वाले किसी व्यक्ति से सहमत नहीं हूं कि नारीवाद सिमोन द बोउवार से शुरू हुआ. …द्रौपदी पहली नारीवादी हैं’
यह कथन दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की कुलपति प्रो. शांतिश्री धुलिपुडी पंडित का है, जो उन्होंने सोमवार (10 अगस्त) से काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में शुरू हुए तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में मुख्य वक्ता के तौर अपने वक्तव्य में कहा.
द्रौपदी को ‘पहली नारीवादी’ बताने के साथ ही उन्होंने जेएनयू को ‘भिखारी’ और जेएनयू के इतिसकारों को ‘तथ्यों और व्याख्या का क्रम उलट देने वाला’ कहा.
बता दें कि इस सम्मेलन का आयोजन बीएचयू के पं. दीनदयाल उपाध्याय पीठ की ओर से ‘भारतीय ज्ञान परंपरा एवं पंडित दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन: वैश्विक परिप्रेक्ष्य एवं समकालीन प्रासंगिकता’ विषय पर किया गया था.
भारतीय ज्ञान परंपरा पर आयोजित इस ‘अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन’ के पहले दिन मुख्य अतिथि के तौर पर हिंदू संत मिथिलेशनंदिनी शरण को आमंत्रित किया गया था.
‘सिमोन द बोउवार से नारीवाद शुरू नहीं हुआ, द्रौपदी पहली नारीवादी’
अपने वक्तव्य में भारतीय परंपरा में महिलाओं की भूमिका का जिक्र करते हुए जेएनयू की कुलपति ने कहा कि भारतीय नारीवाद को पश्चिमी नारीवादी विचार के आधार पर नहीं समझा जाना चाहिए. उन्होंने कहा, ‘मैं यह कहने वाले किसी व्यक्ति से सहमत नहीं हूं कि नारीवाद सिमोन द बोउवार से शुरू हुआ. मैं कहूंगी कि भारतीय नारीवाद का पितृसत्ता से कोई संबंध नहीं है.’
इसके बाद उन्होंने महाभारत की द्रौपदी को ‘पहली नारीवादी’ बताया. उन्होंने कहा, ‘द्रौपदी पहली नारीवादी हैं. उन्होंने अपने पति से जो सवाल पूछे, उन्हें देखिए. आज भी शायद कोई ऐसे सवाल नहीं पूछेगा.’
उन्होंने भारतीय परंपरा में देवी उपासना का उल्लेख करते हुए चामुंडेश्वरी और मदुरै मीनाक्षी जैसी देवियों का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि इन परंपराओं में देवी किसी की अनुमति के बिना वरदान दे सकती है, श्राप दे सकती है और निर्णय ले सकती है.
‘जेएनयू भिखारी है, यहां बाबा वेंकटेश्वर का मंदिर ले आओ’
अपने वक्तव्य में कुलपति ने मदन मोहन मालवीय को आधुनिक भारतीय शिक्षा का मॉडल बताते हुए कहा, ‘उन्होंने कहा था कि जहां सरस्वती रहती हैं, वहां शोध के लिए धन भी चाहिए. महालक्ष्मी आएंगी, तभी आप दुर्गा बनेंगे. उन्हें आधुनिक भारतीय शिक्षा के लिए एक मॉडल बनाया जाना चाहिए. जहां-जहां आप विश्वविद्यालय शुरू करना चाहते हैं, वहां मालवीय जी के मॉडल को देखना चाहिए कि उन्होंने विश्वविद्यालय के लिए आय के स्रोत कैसे जुटाए.’
कुलपति ने आगे जोड़ा,
आपके विश्वनाथ मंदिर के बाद मैंने जेएनयू से कहा था कि क्योंकि हम भिखारी हैं, इसलिए बाबा वेंकटेश्वर का मंदिर यहां ले आओ. मैं आंध्र से हूं, इसलिए इससे बहुत पैसा आएगा.
भारतीय दक्षिणपंथ विश्वविद्यालयों, शोध केंद्रों, प्रकाशन और अकादमिक संस्थानों के निर्माण में निवेश की सलाह देते हुए उन्होंने आगे कहा, ‘दुर्भाग्य से, वामपंथ ने विश्वविद्यालयों, पत्रिकाओं, प्रकाशन संस्थानों, शोध नेटवर्क और सैद्धांतिक स्कूलों के जरिए लंबे समय में एक अकादमिक व्यवस्था विकसित की. वहीं भारतीय दक्षिणपंथ ने संस्थान निर्माण में आम तौर पर उतना निवेश नहीं किया.’
वह आगे कहती हैं,
दक्षिणपंथ का बहुत-सा बौद्धिक काम आज भी प्रतिक्रियात्मक, तात्कालिक और घटनाओं पर आधारित है, जबकि उसे लगातार विकसित होने वाले सिद्धांत और शोध पर आधारित होना चाहिए. टिकाऊ विचारों के लिए लगातार शोध, पीयर रिव्यू, अभिलेखागार, अनुवाद, शोध केंद्र और डॉक्टरेट स्तर की शिक्षा जरूरी है.
‘जेएनयू के इतिहासकारों ने इतिहास की परिभाषा ही उलट दी’
जेएनयू की कुलपति ने अपने ही विश्वविद्यालय के इतिहासकारों की आलोचना करते हुए कहा कि इतिहास में तथ्य महत्वपूर्ण होते हैं, जबकि उनकी व्याख्या अलग-अलग हो सकती है. उन्होंने कहा, ‘तथ्य पवित्र होते हैं, व्याख्याएं अलग-अलग हो सकती हैं. लेकिन हमारे जेएनयू के इतिहासकारों ने इसे उलट दिया. उन्होंने कहा कि व्याख्या पवित्र है और तथ्य बदल सकते हैं.’
जेएनयू को लेकर वह आगे कहती हैं, ‘वह विश्वविद्यालय ठीक से काम नहीं कर सकता और न ही विकसित हो सकता है, जहां किसी एक विचारधारा का यह तय करने पर एकाधिकार हो जाए कि कौन-सा ज्ञान मान्य है और कौन-सा नहीं, जैसा कि हमने जेएनयू में देखा.’
उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को ‘वाम’ और ‘दक्षिणपंथ’ के खांचे से अलग बताते हुए कहा कि यह एक समग्र परंपरा है. उन्होंने ‘वोकिज्म’ और वामपंथी बौद्धिक एकाधिकार की भी आलोचना की.
‘भारतीय सभ्यता दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से’
जेएनयू कुलपति ने भारतीय सभ्यता की प्राचीनता को लेकर भी कई दावे किए. उन्होंने कहा कि भारतीयों को अपनी सभ्यता पर गर्व करना चाहिए और यह धारणा नहीं बनानी चाहिए कि मुगलों या अंग्रेजों ने भारत को सभ्य बनाया. उन्होंने कहा, ‘मुगल यहां आकर हमें सभ्य नहीं बना गए. हम दुनिया की सभी सभ्यताओं से पुराने हैं.’
उन्होंने कार्बन डेटिंग और प्राचीन स्थलों का हवाला देते हुए भारतीय सभ्यता को करीब 10,000 साल पुराना बताया. उन्होंने यह भी कहा कि भारत को लोकतंत्र या राजनीतिक संस्थाओं की अवधारणा पश्चिम से नहीं मिली.
उन्होंने चोलों के उत्तरमेरूर अभिलेख का उदाहरण देते हुए कहा कि यह मैग्ना कार्टा से भी पुराना है.
‘हमने चीन को हराया’
कुलपति का कहना था कि भारतीय ज्ञान प्रणाली को किसी एक भाषा, क्षेत्र, परंपरा या समुदाय तक सीमित कर दिया गया तो वह अपनी मूल सभ्यतागत भावना को ही कमजोर कर देगी.
वह कहती हैं, ‘अगर भारतीय ज्ञान परंपरा को एक भाषा, एक क्षेत्र, एक परंपरा या एक समुदाय तक सीमित कर दिया गया, तो यह अपनी ही सभ्यतागत नींव को कमजोर कर देगी. एक असल भारतीय ज्ञान परंपरा भारत के हर क्षेत्र के योगदान से स्वाभाविक रूप से विकसित होनी चाहिए. इसमें तमिल संगम साहित्य, शैव और वैष्णव परंपराएं, आलवार और नयनार, बौद्ध दर्शन, जैन ज्ञानमीमांसा, जनजातीय पर्यावरणीय ज्ञान, मौखिक परंपराएं, लोक विज्ञान और समुद्री परंपराएं शामिल होनी चाहिए.’
इसके बाद वह सवाल करती हैं, ‘क्या आपमें से ज्यादातर लोग जानते हैं कि भारतीय राजा महान जहाज निर्माता थे? मराठा भी महान जहाज निर्माता थे. कान्होजी आंग्रे का उदाहरण देखिए, जिन्होंने पश्चिमी हिंद महासागर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. राजेंद्र चोल की बात करें तो उनका दक्षिण-पूर्व एशिया से संबंध था. क्या आप जानते हैं कि हमने दक्षिण-पूर्व एशिया तक विजय हासिल की और चीन को हराया? शायद आपमें से किसी को इसकी जानकारी नहीं है. लेकिन अपनी सभ्यता पर गर्व कीजिए.’
कुलपति ने आगे कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली को केवल ब्रांडिंग या प्रचार तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन, गणित और दूसरे क्षेत्रों में भारत के योगदान को वैश्विक अकादमिक विमर्श का हिस्सा बनाया जाना चाहिए.
उन्होंने कहा कि भविष्य में ऑक्सफोर्ड, टोक्यो, हार्वर्ड, हाइडलबर्ग और केपटाउन जैसे विश्वविद्यालयों में भारतीय चिंतकों को प्लेटो, कन्फ्यूशियस और कांट के साथ पढ़ाया जाना चाहिए.
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि ‘पाणिनि को चॉम्स्की के साथ, कौटिल्य को मैकियावेली के साथ, चार्वाक को हिप्पोक्रेट्स के साथ और आर्यभट्ट को न्यूटन के साथ पढ़ाया जाना चाहिए. अभिनवगुप्त को अरस्तू के साथ और बौद्ध तर्कशास्त्र को विश्लेषणात्मक दर्शन के साथ पढ़ाया जाना चाहिए.’
बीएचयू के पं. दीनदयाल उपाध्याय पीठ की ओर से आयोजित यह तीन दिवसीय सम्मेलन 10 अगस्त से 12 अगस्त तक चला. बीएचयू के मुताबिक, सम्मेलन का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा और पं. दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन को वैश्विक और समकालीन संदर्भ में अकादमिक विमर्श का हिस्सा बनाना है.
