इतिहास की किताबों में 1947 एक तारीख है. राजनीतिक दस्तावेजों में यह सत्ता हस्तांतरण और दो देशों के जन्म का वर्ष है. स्मृतियों में यह घर छूटने, रेलगाड़ियों के भर जाने और लाखों लोगों के विस्थापन का समय है. लेकिन स्त्रियों की स्मृति में विभाजन का अर्थ शायद इससे भी अधिक गहरा है. उनके लिए यह वह समय था जब घर की चौखट अचानक सीमा बन गई, परिचित रास्ते अनजान हो गए और उनकी देह तक को सामुदायिक प्रतिशोध का मैदान बना दिया गया.
नक्शे पर खिंची एक रेखा ने भूगोल बदला, लेकिन उस रेखा का सबसे गहरा निशान स्त्रियों के जीवन पर पड़ा. विभाजन की हिंसा में कितनी महिलाएं प्रभावित हुईं, इसका कोई पूर्ण और निर्विवाद आंकड़ा आज उपलब्ध नहीं है. विभिन्न अध्ययनों और सरकारी अभिलेखों में हजारों महिलाओं के अपहरण, यौन हिंसा, जबरन धर्म परिवर्तन और जबरन विवाह का उल्लेख मिलता है. 1950 के आसपास किए गए आधिकारिक आकलनों में भारत और पाकिस्तान के दोनों ओर हजारों महिलाओं के अपहरण की बात सामने आई थी. लेकिन यहां संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण वह सवाल है, जिसे आंकड़े अक्सर छिपा देते हैं- इन संख्याओं के पीछे आखिर कौन थीं?
वे किसी रिपोर्ट की पंक्तियां नहीं थीं. वे मां थीं, बेटियां थीं, बहनें थीं, पत्नियां थीं. वे महिलाएं थीं जिनकी सुबह रसोई, खेत, दुकान, बच्चों और परिवार से शुरू होती थी और जिन्हें एक दिन अचानक ऐसी यात्रा पर निकलना पड़ा, जिसका गंतव्य उन्हें मालूम था, लेकिन यह नहीं मालूम था कि उस यात्रा में वे अपने भीतर क्या-क्या पीछे छोड़ आएंगी.
विस्थापन स्त्री के लिए केवल घर बदलना नहीं था. घर उसके लिए स्मृतियों का संसार था. उसकी शादी की पहली साड़ी, बच्चों के जन्म की यादें, आंगन में लगे पेड़, पड़ोस की आवाजें, मायके से आई चीजें- सब कुछ उसी घर में बसा था. जब वह घर छूटा तो उसके साथ केवल संपत्ति नहीं गई; उसके जीवन का एक हिस्सा वहीं रह गया. बहुत-सी महिलाएं बच्चों को गोद में लेकर, सिर पर गठरी रखकर या किसी अनजान वाहन में बैठकर चलीं. वे अपने परिवार को बचाने की कोशिश कर रही थीं, जबकि इतिहास उनके चारों ओर टूट रहा था.
लेकिन विभाजन की त्रासदी में सबसे भयावह बात केवल हिंसा नहीं थी. भयावह यह था कि स्त्री को एक स्वतंत्र मनुष्य के बजाय परिवार और समुदाय की ‘इज्जत’ में बदल दिया गया. उसकी देह पर उन संघर्षों का बोझ डाल दिया गया, जिनका निर्णय उसने कभी नहीं लिया था. किसी महिला के साथ हिंसा को दूसरे पक्ष के खिलाफ प्रतिशोध माना गया. इस तरह स्त्री अपराध की शिकार होने के साथ-साथ बदले की राजनीति का प्रतीक भी बना दी गई.
यहीं विभाजन हमें एक असहज सवाल के सामने खड़ा करता है- जिस समाज ने स्त्री को अपनी इज्जत कहा, क्या उसने कभी उसकी इच्छा को भी उतना ही महत्व दिया? विभाजन के बाद बिछड़ी और अपहृत महिलाओं को खोजने और वापस लाने के लिए भारत और पाकिस्तान दोनों ने प्रयास किए. हजारों महिलाएं बरामद की गईं. देखने में यह एक मानवीय और आवश्यक कदम था, लेकिन इसके भीतर भी एक जटिल विडंबना छिपी थी. कई महिलाएं वर्षों तक दूसरी परिस्थितियों में रह चुकी थीं. कुछ के बच्चे हो गए थे. कुछ ने नया जीवन बना लिया था. कुछ अपने पुराने परिवारों के पास लौटना चाहती थीं, कुछ नहीं. लेकिन कई बार उनके जीवन का फैसला उनकी इच्छा से अधिक राज्य, परिवार और समाज की धारणाओं ने किया.
एक स्त्री पहले हिंसा की शिकार हुई और फिर उसकी ‘पवित्रता’ पर सवाल खड़े हुए. अपराध किसी और ने किया, लेकिन शर्म का बोझ उसी के कंधों पर रख दिया गया. यह केवल 1947 की त्रासदी नहीं थी; यह उस पितृसत्तात्मक सोच का आईना था जिसमें महिला के साथ हुई हिंसा को भी उसकी सामाजिक पहचान का हिस्सा बना दिया जाता है.
फिर भी इन स्त्रियों को केवल पीड़िता के रूप में याद करना उनके साथ दूसरा अन्याय होगा. उन्होंने टूटे हुए संसार को फिर से खड़ा किया. उन्होंने बच्चों को संभाला, शरणार्थी शिविरों में जीवन जिया, छोटे काम किए, परिवारों को आर्थिक सहारा दिया और नए शहरों में नए घर बनाए. जिनके पास अपना अतीत बचाने के लिए कुछ नहीं था, उन्होंने अपने बच्चों का भविष्य बचाया. इतिहास के बड़े फैसलों में उनका नाम भले न हो, लेकिन स्वतंत्र भारत के पुनर्निर्माण में उनका मौन श्रम दर्ज है.
चुप्पी में छिपा अतीत
विभाजन की एक और त्रासदी उसका मौन है. कितनी ही महिलाएं ऐसी रहीं जिन्होंने अपने साथ हुई हिंसा के बारे में जीवन भर किसी से बात नहीं की. किसी ने बच्चों को कुछ नहीं बताया, किसी ने पति से अतीत छिपाया और किसी ने अपने भीतर एक पूरा जीवन दफन कर दिया.
यह मौन केवल डर का नहीं था; इसमें परिवार की प्रतिष्ठा, समाज का निर्णय और अगली पीढ़ी को बचाने की कोशिश भी शामिल थी. इसलिए विभाजन का पूरा इतिहास सरकारी दस्तावेजों में नहीं मिलेगा. वह किसी बूढ़ी महिला की अचानक नम हो जाती आंखों में मिलेगा. किसी पुराने संदूक में रखी तस्वीर में मिलेगा. किसी ऐसे गांव के नाम में मिलेगा जिसे उसने जीवन भर याद रखा, लेकिन फिर कभी देख नहीं सकी. वह उन कहानियों में मिलेगा जिन्हें दादी ने आधा सुनाया और आधा अपने साथ ले गई.

आज, लगभग आठ दशक बाद, विभाजन की पीढ़ी धीरे-धीरे विदा हो रही है. इसलिए सवाल यह नहीं है कि हम उस इतिहास को कितना याद रखते हैं; सवाल यह है कि हम उसे किस तरह याद रखते हैं. क्या हम उसे नफरत की विरासत बनाएंगे या चेतावनी की?
विभाजन को याद करना किसी समुदाय के खिलाफ आरोप-पत्र तैयार करना नहीं है. यह समझना है कि जब राजनीति, भय और सांप्रदायिक उन्माद मनुष्य से उसकी मनुष्यता छीन लेते हैं, तब सबसे असुरक्षित वही होता है जिसके पास शक्ति सबसे कम होती है. स्त्री उसी असमान शक्ति-संबंध की सबसे बड़ी कीमत चुकाने वालों में थी.
किसी मां का बच्चा उससे बिछड़ता है तो उस आंसू का कोई धर्म नहीं होता. किसी बेटी का घर छूटता है तो उसकी स्मृति किसी सीमा में बंद नहीं होती. किसी स्त्री की अस्मिता पर हमला होता है तो वह किसी राष्ट्र की हार या जीत नहीं, पूरी मनुष्यता की हार होती है. इसलिए विभाजन की स्त्रियों को याद करना केवल अतीत को याद करना नहीं है. यह वर्तमान से सवाल करना है.
यह पूछना है कि क्या हमने सचमुच सीखा है कि किसी स्त्री का शरीर किसी समुदाय की संपत्ति नहीं, उसका अपना अस्तित्व है? क्या हमने समझा है कि हिंसा का बदला किसी निर्दोष से नहीं लिया जा सकता? और क्या हमने यह स्वीकार किया है कि पीड़िता को शर्म नहीं, सम्मान चाहिए.
नक्शे पर खिंची वह सरहद आज दिखाई नहीं देती, लेकिन उसकी स्मृतियां अब भी जीवित हैं. विभाजन ने देशों के बीच सीमा बनाई थी; स्त्रियों ने उस सीमा को अपने जीवन में महसूस किया. उन्होंने घर खोए, रिश्ते खोए, सुरक्षा खोई और कई बार अपनी आवाज भी खो दी- लेकिन उन्होंने जीवन को हारने नहीं दिया.
(लेखक आगरा के डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं.)
