नई दिल्ली: बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने अपने उस आदेश के लिए माफी मांगी है, जिसे बाद में वापस ले लिया गया था। इस आदेश में राज्य बार काउंसिलों से नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के स्नातक बैच के छात्रों का नामांकन नहीं करने को कहा गया था।
यह 13 अगस्त, गुरुवार से जारी उनका चौथा पत्र है। उसी दिन उन्होंने उन छात्रों के खिलाफ कई निर्देश जारी किए थे, जिन्होंने नालसार के दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत को आमंत्रित किए जाने का विरोध किया था।
स्वतंत्रता दिवस पर जारी अपने पत्र में मिश्रा ने लिखा, ‘अगर मौजूदा विवाद से जुड़ी किसी बात, मेरे किसी शब्द या पत्र से हमारे कानून के छात्रों की भावनाएं आहत हुई हैं, तो मुझे इसका खेद है और मैं इसके लिए माफी मांगता हूं।’
उन्होंने स्वीकार किया कि उनके कदमों से छात्रों के बीच चिंता पैदा हुई है।
14 अगस्त को देर रात जारी एक बयान में नालसार की स्टूडेंट बार काउंसिल (एसबीसी) ने मिश्रा से उनकी टिप्पणियों के लिए माफी मांगने की मांग की थी। एसबीसी को खास तौर पर उनके पत्रों में इस्तेमाल की गई भाषा पर आपत्ति थी। मिश्रा ने पत्रों में छात्रों और शिक्षकों पर ‘गुटबाजी’, ‘गंदी राजनीति’ जैसे आरोप लगाए थे. इसके अलावा कुछ अन्य आरोप भी लगाए थे.
15 अगस्त को भेजे गए अपने ताज़ा पत्र में मिश्रा ने लिखा, ‘न्यायपालिका, बार, विश्वविद्यालयों और कानून के छात्रों के बीच संबंध किसी भी अस्थायी विवाद से कहीं अधिक गहरा और स्थायी है।’
मिश्रा, जो भाजपा के राज्यसभा सांसद भी हैं, ने बिना कोई कारण बताए यह भी लिखा कि ‘खेद व्यक्त करना प्रतिष्ठा या अहंकार का विषय नहीं है।’ उन्होंने कहा कि यह ‘सिर्फ़ इस बात की स्वीकारोक्ति है कि हमारे छात्रों की भावनाएं और चिंताएं मायने रखती हैं।’
हालांकि, उनके ताज़ा पत्र में विशेष रूप से नालसार, सीजेआई, वापस लिए गए नामांकन संबंधी आदेश या ‘गुटबाजी’, ‘गंदी राजनीति’, शिक्षकों, पूर्व छात्रों आदि से जुड़े विशेष आरोपों का कोई उल्लेख नहीं किया गया है।
बीसीआई के कदमों के विरोध में और छात्र शामिल हुए
इस बीच, नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु के स्नातक छात्रों और पूर्व छात्रों ने भी मिश्रा के कदमों की निंदा की। उन्होंने नालसार के छात्रों और शिक्षकों के ‘स्वतंत्र रूप से बोलने और अपनी बात रखने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करने की कोशिश’ के लिए बिना शर्त माफी की मांग की।
उन्होंने बीसीआई से उस आधिकारिक लेटरहेड के इस्तेमाल को लेकर भी स्पष्टीकरण मांगा, जिस पर मिश्रा लगातार पत्र जारी कर रहे थे।
दूसरी ओर, मिश्रा ने शनिवार को लिखा कि इस मुद्दे को ‘बाहरी प्रभाव के जरिए राजनीतिक या अन्य किसी अनावश्यक रंग में नहीं रंगने दिया जाना चाहिए।’ साथ ही उन्होंने लिखा कि छात्रों की चिंताओं को ‘धैर्य, संवेदनशीलता और सम्मान के साथ सुना जाना चाहिए।’
छात्रों ने सीजेआई सूर्यकांत की उस टिप्पणी और बाद में अदालत में की गई उनकी टिप्पणियों के बाद उनके दीक्षांत समारोह में शामिल होने का विरोध किया था, जिसमें उन्होंने छात्रों को ‘कॉकरोच’ कहा था। मिश्रा के नालसार के कुलपति को भेजे गए पहले ही पत्र के मुताबिक, छात्रों का यह विरोध इस बात का संकेत था कि वे वकील बनने के योग्य नहीं हैं।
इसके बाद उन्होंने नालसार के कुलपति प्रोफेसर श्रीकृष्ण देव राव को निर्देश दिया कि वे सीजेआई को आमंत्रित किए जाने को लेकर छात्रों द्वारा चलाए गए कथित ‘अभियान’ का प्रमाणित विवरण ‘तीन दिनों के भीतर’ उपलब्ध कराएं। इसमें उन लोगों की पहचान करने को भी कहा गया था, जो दीक्षांत समारोह में सीजेआई के आने के विरोध को शुरू करने, आयोजित करने, मसौदा तैयार करने, प्रसारित करने, समन्वय करने या लोगों को जुटाने में ‘मुख्य रूप से शामिल’ थे।
अपने मूल पत्र में उन्होंने नालसार के शिक्षकों पर भी निशाना साधा था। उन्होंने लिखा था, ‘यह बहुत गंभीर मामला है। शिक्षक अपने अध्यापन कार्य पर ध्यान देने के बजाय कैंपस में गंदी राजनीति कर रहे हैं।’
विश्वविद्यालय से इस मुद्दे पर जमा किए गए अभ्यावेदन, याचिका या ज्ञापन के साथ-साथ अपने आधिकारिक रिकॉर्ड में मौजूद सभी हस्ताक्षरकर्ताओं की पूरी सूची भी उपलब्ध कराने को कहा गया था। इसके अलावा, छात्रों के सोशल मीडिया अकाउंट और उनकी अन्य जानकारियों की भी जांच करने को कहा गया था।
नालसार की स्टूडेंट बार काउंसिल के बयान में इन सभी पहलुओं का जिक्र किया गया। एसबीसी ने कहा कि मिश्रा न केवल एक वैधानिक नियामक संस्था के प्रमुख हैं, बल्कि सत्तारूढ़ दल के मौजूदा राज्यसभा सदस्य भी हैं और खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थक बताते हैं।
एसबीसी ने लिखा कि इस पृष्ठभूमि में, असहमति के पीछे शिक्षकों, पूर्व छात्रों, शोधार्थियों और ‘बाहरी लोगों’ की पहचान करने की कोशिश उस परिचित राजनीतिक कवायद जैसी लगती है, जिसमें असहमति को साज़िश, मतभेद को विध्वंसक गतिविधि और विरोध को बाहरी हस्तक्षेप के रूप में पेश किया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट की फटकार, मिश्रा के इस्तीफे की मांग
शुक्रवार, 14 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट भी इस विवाद में शामिल हुआ। सीजेआई सूर्यकांत ने बीसीआई के हस्तक्षेप पर कड़ी नाराज़गी जताई। उन्होंने कहा, ‘बीसीआई बेवजह कार्रवाई कर रहा है।’ उन्होंने कहा कि अगर छात्रों के पास विरोध करने का कोई कारण है, तो ‘उन्हें विरोध करने का अधिकार है।’ उन्होंने बीसीआई की कार्रवाई को ‘पूरी तरह अनावश्यक’ बताया और कहा कि यह मामला छात्रों और उनके बीच बातचीत से सुलझाया जाना चाहिए।
पिछले कुछ दिनों में मिश्रा के इस्तीफे की मांग तेज़ हो गई थी। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के लीगल टीम के कई लोगों और अन्य लोगों ने सवाल उठाए।
सीजेपी के प्रवक्ता सौरव दास ने शुक्रवार सुबह एक्स पर लिखा, ‘नैतिक ज़िम्मेदारी की मांग है कि मनन कुमार मिश्रा इस्तीफा दें। अदालत के अंदर और बाहर मौजूद कॉकरोचों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसा हो।’
सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने एक्स पर लिखा कि मिश्रा ‘खुद को तानाशाह की तरह व्यवहार करने में सक्षम समझते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि व्यवस्था उनके नियंत्रण में है।’
इस बीच, मिश्रा एक और पत्र जारी कर चुके थे, जिसमें उन्होंने अपने पहले के रुख से महत्वपूर्ण रूप से पीछे हटते हुए इस्तीफे की मांगों पर कहा था कि वह ‘सीजेआई से बात करने के लिए तैयार हैं।’ उन्होंने यह भी स्वीकार किया था कि बीसीआई के अन्य सदस्य 13 अगस्त को ‘जल्दबाजी में जारी’ किए गए उनके आदेश से सहमत नहीं थे।
उन्होंने कहा, ‘छात्रों के खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई का कोई सवाल ही नहीं है।’ उन्होंने कहा कि वह यह बात (सीजेपी के संस्थापक अभिजीत) दिपके जी और (सीजेपी प्रवक्ता) सौरव दास जी तक पहुंचाना चाहते हैं।
इससे पहले मिश्रा ने दावा किया था कि जंतर-मंतर पर परीक्षा में अनियमितताओं के खिलाफ सीजेपी के प्रदर्शन में ‘राष्ट्रविरोधी’ लोग शामिल हो गए हैं।
मिश्रा की माफी की खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए दास ने शनिवार को एक्स पर लिखा, ‘छात्र एकता ज़िंदाबाद! युवा एकता ज़िंदाबाद!’
