नई दिल्ली: पीएम केयर्स फंड ने दो साल की देरी के बाद अपनी वेबसाइट पर वित्त वर्ष 2023-24 और 2024-25 के ऑडिट किए गए वित्तीय विवरण अपलोड किए हैं. ये दस्तावेज 17 अगस्त को वेबसाइट पर डाले गए.
अकाउंट्स का ऑडिट 6 अगस्त को पूरा हुआ और ऑडिटरों ने 7 अगस्त को उन पर हस्ताक्षर किए.
वित्त वर्ष 2024-25 के विवरण के मुताबिक, पीएम केयर्स फंड को दान और जमा राशि पर मिले ब्याज के जरिए 1,200 करोड़ रुपये से अधिक प्राप्त हुए.
31 मार्च 2025 को समाप्त वित्त वर्ष के दौरान फंड से 87 लाख रुपये खर्च किए गए. 31 मार्च 2025 तक पीएम केयर्स फंड के अकाउंट्स में 8,452 करोड़ रुपये मौजूद थे.
पीएम केयर्स फंड की स्थापना मार्च 2020 में कोविड-19 महामारी के फैलने के दौरान आपात स्थिति और आपदाओं से निपटने के लिए की गई थी. पहले तीन वर्षों में इस फंड में करीब 13,000 करोड़ रुपये जमा हुए थे. इनमें से लगभग 3,000 करोड़ रुपये अकेले पहले सप्ताह में जुटाए गए थे.
फंड के लिए धन जुटाए जाने के समय सरकार ने कहा था कि पीएम केयर्स फंड को कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) के तहत मिलने वाली राशि स्वीकार करने की अनुमति है, क्योंकि इसे केंद्र सरकार ने स्थापित किया था. मंत्रियों ने सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों से वेतन दान करने की ‘अपील’ भी की थी.
लेकिन जब लोगों ने फंड से जुड़ी जानकारी मांगनी शुरू की, तो सरकार ने दावा किया कि पीएम केयर्स ट्रस्ट कोई सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं है और इसलिए वह सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत जवाबदेह नहीं है.
हाल में प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने लोकसभा सचिवालय को बताया कि पीएम केयर्स फंड से संबंधित प्रश्न और संसद में किए जाने वाले अन्य हस्तक्षेप लोकसभा की कार्यप्रणाली और कार्य संचालन के नियमों के तहत स्वीकार्य नहीं हैं. फंड की ऑडिट रिपोर्ट्स के सार्वजनिक रूप से उपलब्ध न होने को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं.
पारदर्शिता के लिए काम करने वाली कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज सहित कई लोगों ने अदालतों और सूचना आयोगों के जरिए पीएम केयर्स फंड से जुड़ी अधिक जानकारी हासिल करने की कोशिश की है. सूचना आयोगों ने अतीत में कहा है कि ‘पारदर्शिता की यह कमी चुनावी बॉन्ड योजना को लेकर उठी चिंताओं जैसी है, जहां दानदाताओं की पहचान गुप्त रखे जाने से सार्वजनिक जवाबदेही सीमित हो गई थी.’
उन्होंने यह भी चेतावनी दी है कि जब बड़े पैमाने पर किए गए योगदान को सार्वजनिक जांच से बाहर रखा जाता है, तो इससे लेन-देन के बदले लाभ यानी ‘क्विड प्रो क्वो’ व्यवस्था के जरिए भ्रष्टाचार की संभावना पैदा होती है.
ऐसी अपारदर्शिता व्यवस्था को उसी तरह के दुरुपयोग के प्रति संवेदनशील बना सकती है, जैसे चुनावी बॉन्ड विवादों में सामने आए थे – जैसे कि लेन-देन के सौदे, नियमों के पालन में ढिलाई और जबरन वसूली.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
