अपने लोकतंत्र का, पिछले कुछ वर्षों से, जो वर्णन किया जाता रहा है उसमें उसे अक्सर संकटग्रस्त, सिकुड़ता-संकीर्ण होता, अपने भूगोल से करोड़ों लोगों को निष्कासित करने की कोशिश करता, झूठ और घृणा, हिंसा और हत्या से परिचालित, संविधान और उसके बुनियादी मूल्यों स्वतंत्रता-समता-न्याय-बंधुता से विरत होता, डरा हुआ लोकतंत्र बताया जाता रहा है. इसमें कुछ भी अतिरंजना नहीं है.
इस बार जब हमें स्वतंत्र हुए 79 वर्ष और कुछ ही महीनों में लोकतंत्र बने 77 वर्ष होने वाले हैं तो एक बड़ा फ़र्क यह पड़ा है कि अब हमने डर से मुक्त होने की शुरुआत कर दी है. रास्ता हमें ऐसे ही निडर होकर आंदोलन करने वाले युवाओं ने दिखाया है.
उन्हें कॉकरोच कहकर सर्वोच्च न्यायालय के स्तर से अपमानित-लांछित किया गया; उन्हें निज़ाम ने बार-बार सार्वजनिक परीक्षाओं में घपले कर ईमानदार स्पर्धा और खुले अवसरों से वंचित किया; उन पर पुलिस ने, उनके आंदोलन के पूरी तरह से शांतिपूर्ण और अहिंसक होने के बावजूद, अत्यधिक हिंसा की. वे निडर रहकर अपनी मांग पर अड़े रहे और निज़ाम को, अपनी सारी हेकड़ी और अकड़ के बावजूद, झुकना पड़ा.
भाजपा-संघ निज़ाम अब इनमें से कई युवाओं के परिवारों की शिनाख़्त कर उन्हें तंग और परेशान करने की शर्मनाक कार्रवाई में व्यस्त हो गया है. उसकी कोशिश अपने अंधभक्त और वफ़ादार युवाओं को जुटाकर इन निडर युवाओं से कहीं अधिक संख्या में जमाकर उन्हें अप्रासंगिक बनाने की है. इस कोशिश का जो भी नतीजा निकले, निडर युवाओं ने बहुत बड़ी संख्या में समाज के अनेक तबकों को डर से मुक्त रहने का सबक सिखा दिया है.
इस सबक के लोकतंत्र के हित में परिणाम हो सकते हैं. निज़ाम बदस्तूर तंगदिल, कुंदज़हन और सख़्त है. लेकिन उसमें पड़ती दरारें हम साफ़ देख सकते हैं. अब लोग नहीं, सत्ताधारी डर रहे हैं.
यह डर सत्ता को, हो सकता है, और क्रूर, और तिकड़मी, और आक्रामक, और षड्यंत्रकारी बना दे. वह बदला लेने पर उतारू हो जाए. अपना शिकंजा और सख़्त कर दे. डर का भूगोल फिर फैलने लगे. पर इतनी सारी कोशिशों से डर वापस नहीं आ पायेगा. उसका प्रतिरोध भी अब और तेज़ होगा. धर्मनेता, अभिनेता, राजनेता, मीडिया, स्वामिभक्त अकादेमिक आदि फिर डर का राज फैलाने में सक्रिय भूमिका निभाएंगे. संविधान और लोकतंत्र को बचाने का संघर्ष, फिर भी, व्यापक होता जाएगा.
हम सयाने लोग एक बार फिर देखेंगे कि निडर और स्वप्नदर्शी युवा परिवर्तन का नेतृत्व और पहल करेंगे. इस स्वतंत्रता दिवस पर हम यह सोचकर कुछ आशान्वित हो सकते हैं कि इस बार कुछ कम डरा और कुछ अधिक निडर, कुछ अधिक मुखर और सक्रिय लोकतंत्र है जिसमें हम रह रहे हैं.
ख़राब दुनिया
बरसों पहले पेरू के नोबेल पुरस्कृत लेखक मारियो वरगास योसा का एक वक्तव्य कहीं पढ़ा था कि जो लोग हमें बताते हैं कि यह दुनिया जैसी हमें मिली है ठीक है और वही संभव दुनिया है, झूठ बोल रहे होते हैं. साहित्य हमें बताता है कि यह दुनिया ख़राब बनी है, बेहतर बन सकती थी और दूसरी दुनिया संभव है. इस वक्तव्य को याद करते हुए यह ख़्याल भी आया कि दुनिया की ख़राबी और बेहतरी, दूसरी दुनिया के लिए हम ही ज़िम्मेदार हैं. यह दुनिया हम मनुष्यों ने बनाई है और हम ही इसके लिए जवाबदेह हैं.
हम जिस भारत में इस समय रह रहे हैं उसमें ऐसी मानसिकता बहुत फैल गई है कि किसी भी चीज़ के लिए कोई जवाबदेह नहीं है. ताज़ा उदाहरण है कि जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर पुलिस ने हिंसक कार्रवाई की, पैलेट छर्रे चलाकर कुछ को घायल किया गया और दो सप्ताह से अधिक संसद की कार्रवाई स्थगित होती रही और गृहमंत्री इस बारे में कुछ कहने नहीं आए, न प्रधानमंत्री ने कुछ कहा जबकि सारा विपक्ष इस पर अड़ा रहा.
करोंड़ों रुपयों से बनाई गई सड़कों में बहुत जल्दी गड्ढे हो रहे हैं; नए पुल उद्घाटन के बाद गिर रहे हैं, जनधन का अपव्यय हो रहा है और किसी की जवाबदेही नहीं है. अयोध्या के नवनिर्मित राम मंदिर में करोड़ों के चढ़ावे की चोरी या ग़बन हुए हैं और कोई असली जवाबदेह अब तक खोजा नहीं जा सका है इतनी सारी सार्वजनिक परीक्षाएं लगातार पेपर लीक हो जाने के कारण रद्द की जाती रही हैं और अब तक किसी अभियोगी को सज़ा नहीं मिल पायी है. करोड़ों लोगों को मतदाता सूचियों से बाहर किया जा रहा है, चुनाव आयोग मनमानी कर रहा है पर सर्वोच्च न्यायालय तक उसको जवाबदेह बनाने को तैयार नहीं. यह लगभग राजपोषित अराजकता, गैरजिम्मेदारी है. कब तक नागरिक यह लाचार देखते-सहते रहेंगे यह कहना मुश्किल है.
रोज़मर्रा की ज़िंदगी में नई टेक्नोलॉजी का सहारा लेकर तरह-तरह की कठिनाइयां आम हैं. इतने तरह के कार्ड बनाने पड़ रहे हैं और उनमें से कोई भी पर्याप्त नहीं है. नागरिकों का पैसा, समय, शक्ति तरह-तरह के दस्तावेज़ खोजने और बनवाने में लग रहे हैं. हर थोड़े समय बाद नागरिकों को कहीं न कहीं किसी न किसी फॉर्म या दस्तावेज़ के लिए लाइन में खड़ा होना पड़ रहा है.
आज पता चला, वह भी लाल किले पर दिए एक प्रधान भाषण से, कि इस देश की तबाही के लिए ज़िम्मेदार ‘दिमाग़ी नक्सली’ हैं जिन्हें पहचान कर अलग करना है.
इशारा उन लोगों की ओर है जो मौजूदा निज़ाम से असहमत हैं; उसकी कमियों और विफलताओं, उसके अलोकतांत्रिक मंसूबों, देश की दौलत कुछ लोगों के हाथ में सीमित करने आदि, सांप्रदायिक व्यवहार, नोटचोरी-वोटचोरी-चढ़ावा चोरी आदि का बौद्धिक विश्लेषण कर उसका पर्दाफ़ाश कर रहे हैं. ये सभी स्थितियां एक ख़राब भारत बन जाने या बनाए जाने के लक्षण हैं. जो इस ख़राबी के लिए जवाबदेह हैं, उनसे जवाब मांगा जाना चाहिए.
हमें बेहतर, ज़्यादा मानवीय, ज़्यादा उदार और समझदार, ज़्यादा वैचारिक विविधताओं वाला भारत चाहिए. इससे कम की हमारी कोशिश और आकांक्षा नहीं हो सकती.
अटकलें
महफ़िल कुछ बुजुर्गों की थी, जिनमें कुछ भूतपूर्व सिविल सेवक, समाज चिंतक, डाक्टर, कवि आदि शामिल थे. डिनर और रसरंजन पर यों ही इकट्ठे. कई मुद्दों पर गपशप हुई. कम से कम दो ऐसे थे जो ज़रूरी थे. पहला कि जेन-7 ने जो स्वतःस्फूर्त पहल की है और सफलता प्राप्त की है, वह आगे क्या रूप ले सकती है. दूसरा यह कि हमको, जो उसी दिन लाल किले से दिमाग़ी नक्सल क़रार दिए गए थे क्योंकि हम भाजपा-संघ-हिंदुत्व के निज़ाम का प्रतिरोध कर रहे हैं, अपनी शक्ति सब तरह के मंचों पर नहीं, कुछ चुनकर एकाग्र करना चाहिए.
पहले मुद्दे पर चर्चा के दौरान यह आंकड़ा सामने आया कि इस जेन-7 की जनसंख्या 40 से 45 करोड़ के बीच है. इनमें से कुल 10-15 करोड़ ही प्रतियोगिता परीक्षाओं में बैठते होंगे. जो इस चक्र से बाहर हैं उनमें बड़ी संख्या उनकी है जो संघ-संचालित या प्रेरित या प्रभावित संस्थाओं में पढ़े हैं और किसी तरह के प्रतिरोध से बाहर रहेंगे. संघ और निज़ाम उन पर दबाव डालेगा और प्रलोभन भी देगा. फिर भी, सबको लगा कि कॉकरोच आंदोलन व्यापक प्रभाव पैदाकर रहा है और सब स्कूलों के बच्चों-बच्चियों ने बेहतर सुविधाएं और साधन मांगते हुए प्रदर्शन करने शुरू कर दिए हैं. इस पर हममें व्यापक सहमति थी कि व्यापक डर से मुक्ति की उतनी ही व्यापक शुरुआत हो गई है. बदलाव की उम्मीद का यह एक बड़ा मुक़ाम है.
दूसरे मुद्दे पर हममें से कई का यह सोचना है कि हालांकि शक्ति को छितराना नहीं चाहिए, स्थिति इतनी भयावह और व्यापक है कि हर स्तर पर प्रतिरोध ज़रूरी है. जिनमें हिम्मत और समझ है उनको ऐसा लिखकर, बोलकर, ऐसी सामूहिकता में यथासंभव शामिल होकर प्रतिरोध को सशक्त करना चाहिए.
हमें इसका ठीक पता नहीं है कि देश के अन्य भागों में कहां-कितने दूसरे लोग ऐसा ही सोच और कर रहे हैं. उनसे संवाद होना ज़रूरी है.
नई सिविल सुरक्षा की घोषणा की गई है. इसका असली उद्देश्य शायद प्रतिरोधक युवाओं के बरक़्स राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बजरंग दल आदि के अंधभक्त युवाओं को संगठित कर विरोध में सक्रिय करना हो सकता है, वह भी जनधन ख़र्चकर. यह बहुत सारे युवाओं के लिए, जो वैसे भी इन दिनों दंगे-फ़साद, सार्वजनिक हिंसा आदि में लगे रहते हैं, रोज़गार का रास्ता हो सकता है.
एक अच्छी बात यह है कि कॉकरोच जनता पार्टी ने अपना अगला अभियान देहाती स्कूलों में सुधार की मांग पर एकाग्र करने की घोषणा की है. उनके रास्ते में रोड़े अटकाने की योजना अब तक, तात्कालिक और दीर्घकालीन दोनों ही स्तरों पर, निज़ाम बना चुका होगा. पर प्रतिरोधक युवाओं को व्यापक रूप से सृजन और विचारशील समुदाय का समर्थन मिलते रहना चाहिए.
शाम के मित्रों में से एक ने कॉकरोच जनता पार्टी का एक नया गाना भेजा घर वापस पहुंचने के पहले जिसकी टेक है: ‘हम कीड़े हैं, फिर आएंंगे.’ उस शाम का यह प्रेरक समापन था. हमने एक उम्मीद का एकगीत सुना.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
