2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के ‘महानायकत्व’ में अकेली अपने बूते देश की सत्ता में आने के बाद भारतीय जनता पार्टी इन दिनों पहली बार अपने विपक्ष के मुकाबले परसेप्शन और नैरेटिव की लड़ाई में मात खाती दिख रही है- संसद में भी और सड़क पर भी.
तिस पर अयोध्या में राममंदिर के चढ़ावे की चोरी को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार में गहरा रहे अंतर्विरोध भी उसकी मुश्किलें बढ़ाने में लगे हैं, जिससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बहुप्रचारित छवि पर खरोंचों की संख्या बढ़ती जा रही है.
अभी बहुत दिन नहीं हुए, जब वह परसेप्शनों की लड़ाई की ऐसी चैंपियन थी कि लगता था कि न कभी उसका सूरज डूबेगा और न ही वह कभी हारेगी. लेकिन अब उसकी और उसके नेताओं की कथनी व करनी के अंतर्विरोध पलटकर उस पर कुछ इस तरह गहराने लग गए हैं कि ‘ओखली में सिर है तो मूसल क्या गिनने’ वाली कहावत चरितार्थ हो गई लगती है.
बात को इस तरह भी कह सकते हैं कि अपवादों को छोड़कर चुनावों में उसकी दिग्विजय जारी रहने के बावजूद कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां अब उसे छकाना व निरुत्तर करना सीख गई हैं. कई बार तो वे उसे उसकी ही जमीन पर पटखनी दे देती हैं. लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी तो कहते भी हैं कि भाजपा ने बार-बार पीटकर उनको ‘बहुत कुछ’ सिखा दिया है. लेकिन अब सवाल खुद भाजपा के सामने है कि बिहार में जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर के हाथों अपने अध्यक्ष नितिन नवीन की बांकीपुर विधानसभा सीट गंवा देने को लेकर वह कुछ सीखेगी या नहीं? नहीं सीखेगी तो मात के इस मौसम के पार कैसे जाएगी?
बहरहाल, धारणाओं की लड़ाई में उसके पिछड़ने और कोई नया नैरेटिव सेट करने में असमर्थ दिखने की शुरुआत गत जून जुलाई में जंतर-मंतर पर छात्रों के आंदोलन से हुई. शुरू में, चीफ जस्टिस सूर्यकांत की एक टिप्पणी की प्रतिक्रिया में गठित कॉकरोच जनता पार्टी की राह में उसने यह सोचकर कुछ गलीचे बिछाए थे कि अकेला चना भाड़ तो फोड़ नहीं पायेगा. उल्टे बहुत संभव है कि उसके दोनों हाथों में लड्डू धर दे: पेपर लीक समेत शिक्षा व्यवस्था की अनेक विडंबनाओं से क्षुब्ध छात्रों को विपक्षी कांग्रेस के पाले में एकजुट होने से रोककर अपने झंडे तले यानी अलग एकजुट कर ले और चुनाव में मतों का विभाजन कराकर उसका काम बना दे या फिर राहुल गांधी किसी दिन उसके मंच पर चले जाएं और उसको सारे आंदोलन को कांग्रेस की साज़िश बताने की सहूलियत हासिल हो जाए.
तिलिस्म टूटा
लेकिन उसका दुर्भाग्य कि न कॉकरोच जनता पार्टी ने उसे ऐसा कोई लड्डू दिया, न ही किसी विपक्षी पार्टी ने और उसे उनकी ऐसी दूरंदेशी कहें या समन्वय से सामना करना पड़ा कि उसकी एक नहीं चली. जमीन पर तो उसकी अजेयता का तिलिस्म टूटा ही, सोशल मीडिया पर भी टूटा. जब भी और जिसको भी ट्रोल कराने लग जाने वाली उसकी ‘अजेय’ सोशल मीडिया टीम तो ऐसी असहाय हो गई कि उसके गालियां देने व दिलवाने वाले नेता खुद को दी जाने वाली गालियों का रोना रोने लगे. अंततः उसे हारकर यह टीम ही बदल देनी पड़ी.
लेकिन उससे पहले जिस मोदी सरकार में कभी मंत्रियों के इस्तीफे होते ही नहीं थे, उसमें शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को ‘बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले’ की गति को प्राप्त हो जाना पड़ा और छात्रों पर अमर्यादित पुलिस बल प्रयोग को लेकर प्रधानमंत्री व गृहमंत्री ऐसे घिरे कि संसद के पूरे मानसून सत्र में उनसे वह घेरा तोड़कर बाहर निकलना संभव नहीं हो पाया.
बात-बात पर राष्ट्र के नाम संदेश प्रसारित करने वाले प्रधानमंत्री न न्यूज चैनलों पर आकर देश को कुछ बता पाए, न ही संसद में और इंस्टाग्राम की रीलें ही उनका तिनके का सहारा रह गईं. तिस पर छात्रों से समझौते में उनकी मांगें पूरी करने के लिए उनसे किए वादों को निभाना अभी भी समस्या बना हुआ है.
इतना ही नहीं, ‘वंदेमातरम्’ और ‘दिमागी नक्सल’ के बहाने अपने संकीर्ण राष्ट्रवाद की काठ की हांडी दोबारा चढ़ाकर डिस्कोर्स बदलने की रणनीति भी इस लड़ाई में उसके कुछ काम नहीं आ रही.
पूरे वंदेमातरम् को सम्मानपूर्वक गाने को कानूनन अनिवार्य कर देने के बाद वह कांग्रेस के इस फैसले के लिए उसको कोसने व घेरने में लगी ही थी कि वह तो 1937 के अपने पुरखों के फैसले के मुताबिक अपने कार्यक्रमों में उसके वे दो ही छंद गाएगी, जिनको लेकर सर्वानुमति है, कि तभी राहुल गांधी ने साहिल लोचब नामक युवा (जिसे छात्रों के आंदोलन के दौरान पैलेट गन के छर्रे लगे और एकआंख की रोशनी भी प्रभावित हुई) की एफआईआर दर्ज कराने के लिए राजधानी दिल्ली के संसद मार्ग थाने में आठ घंटे धरना देकर जैसे उसके सारे अरमानों को धो डाला. फिर पुणे में उसके द्वारा पोषित पितृसत्ता को भी.
जहां तक स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री द्वारा बोले गए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द की बात है, उसे लेकर संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू को जिस तरह फौरन सफाई पर उतरना पड़ा, उसी से साफ है कि हालत ‘क्या बने बात जहां बात बनाए न बने’ जैसी हो गई है. लेकिन वंदेमातरम् के मामले में उनके पक्ष की शिकस्त की पीड़ा कहीं ज्यादा गहरी है.
आपको याद होगा, ‘घर घर तिरंगा’ अभियान को लेकर भाजपा और नरेंद्र मोदी सरकार दोनों द्वारा चार साल से लगातार दावा किया जाता रहा है कि इस अभियान ने देशवासियों में उसे वांछित देशभक्ति की जड़ें बहुत गहरी कर दी हैं. लेकिन अब उन्हें इस सवाल का सामना करना पड़ रहा है कि वास्तव में ऐसा हुआ होता तो वंदेमातरम् के इतिहास व महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए उस देशव्यापी अभियान की जरूरत ही नहीं पड़ती, जिसकी भाजपा ने घोषणा की है.
कानून बनाकर वंदेमातरम् का जन-गण-मन जैसा सम्मान सुनिश्चित करने की जरूरत भी तब नहीं ही पड़ती और उसे लेकर हो रहे विवाद भी इस तरह के उलझाव नहीं पैदा करते.
लेकिन आज वस्तुस्थिति यही है कि कानून बनाकर पूरे वंदेमातरम् का गायन सुनिश्चित करने की सत्ता पक्ष की जिद ने वंदेमातरम् व उसके रचयिता बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय को लेकर ऐसी बहुत-सी नकारात्मकताओं को, जो समय के साथ तली में बैठ गईं और भुला दी गई थीं, एकबारगी फिर सतह पर ला दिया है.
खुद मियां फजीहत…!
तिस पर उसके पूरे गायन को लेकर भाजपा नेताओं की खराब याद्दाश्त और अनभ्यास ने उसे बरबस ‘खुद मियां फजीहत दीगरां नसीहत’ की स्थिति में डाल दिया है. ऐसे वीडियोज की भरमार-सी हो गई है, जिनमें वंदेमातरम् सुनाने को कहे जाने पर भाजपा नेता उसके सभी छ: कौन कहे दो छंदों में ही अटक कर रह जाते हैं और जवाहरलाल नेहरू की उस बात को सही सिद्ध करने लग जाते हैं, जो उन्होंने पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बिधानचंद्र राय के वंदेमातरम् को राष्ट्रगान बनाने को लेकर भेजे पत्र के जवाब में 15 जून,1948 को लिखी थी: ‘जहां तक वंदे मातरम की भाषा का सवाल है तो ज्यादातर लोग इसे समझ नहीं पाते. निश्चित तौर पर मैं भी इसे समझ नहीं पाता.’
लेकिन जैसे इतना कम हो, मध्य प्रदेश के ऊर्जा मंत्री राकेश शुक्ला ने यह कहकर लोगों के जले पर नमक छिड़क दिया है कि उनके जीवन में चीनी से नहीं वंदेमातरम् से मिठास आएगी, इसलिए उनको चीनी की महंगाई के बजाय कांग्रेस द्वारा किए गए वंदेमातरम् के अपमान पर बात करनी चाहिए. दूसरी ओर उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष सतीश महाना ने तो उन्नाव में गजब ही ढा दिया है- जन-गण-मन को बजता छोड़कर बीच में ही अपने लाव-लश्कर के साथ चलते बनकर.
सोचिए जरा, अपने पाले में ऐसे महानुभावों के रहते हुए भाजपा और नरेंद्र मोदी सरकार किस मुंह से कांग्रेस के कार्यक्रम में वंदेमातरम् के वक्त उसके अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे व सोनिया के असहज होने पर सवाल उठा सकती हैं? खासकर, जब आज की तारीख में भी उनके अनेक कद्दावर नेता वंदेमातरम् की सभी कौन कहे, चार छह पंक्तियां तक न कंठाग्र रख पाते हैं, न सही-सही पढ़ पाते हैं.
लेकिन बात सिर्फ उन्हें कंठाग्र रखने तक ही सीमित नहीं है. हिंदी के सुपरिचित आलोचक विजय बहादुर सिंह देश के स्वरूप को लेकर रवींद्रनाथ टैगोर और बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के विचारों की तुलना करते हुए इस सिलसिले में कई असुविधाजनक सवाल उठाते हैं:
वंदेमातरम् भले ही शक्तिपूजक शाक्तों का गीत है और उसमें काली व दुर्गा आदि की वंदना ही है, सो भी मुस्लिम शासन को निशाने पर लिए और अंग्रेजी शासन के प्रति भक्तिभाव प्रदर्शित करते, तथापि अपने शस्यश्यामल बंगाल का यशोगान करते हुए….लेकिन यह देश अकेले किसी का है कहां? यह जितना शैवों व शाक्तों का है, उतना ही वैष्णवों का भी. जितना सगुणोपासकों का है, उतना ही निर्गुणियों व नास्तिकों का भी. बौद्धों व जैनियों का तो है ही, सनातनियों व आर्यसमाजियों का भी है. मूर्तिपूजकों के साथ-साथ मूर्तिपूजा को नकारने वालों का भी. कबीरपंथियों और नानकपंथियों का भी, मुसलमानों और ईसाइयों का भी. साथ ही आदिवासियों व गिरिजनों आदि का भी….आज हम दक्षिण वालों से कहना चाहें कि वे शिव को भूल जाएं, या उत्तर भारत वालों से राम, कृष्ण व शिव तीनों को ही भूल जाने को कहें तो कह भी पाएँगे क्या? तिस पर देश में तीर्थंकर महावीर और तथागत बुद्ध भी हैं.
लेकिन ‘जन-गण-मन जितने ही सम्मान के पात्र’ वंदेमातरम् में ये सब नहीं हैं!
इसी टिप्पणी में विजय बहादुर सिंह आगे लिखते हैं: गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर भी बंकिमचन्द्र वाले बंगाल के ही थे. उनके बाद के भारत के. ‘गीतांजलि’ के एक गीत में वे कहते हैं: ये जो भारत देश है, महामानवों का सागर तीर्थ है. यहां आर्य और अनार्य तो आए ही, द्रविड़ व चीनी ही क्यों, शक, हूण, मंगोल, अफगान और मुगल वगैरह भी आए और सारे मिलकर एक देह-एक प्राण हो गए– कोटि धार दुर्वार स्रोत में आए मनुज- समुच्चय, कहां कहां से, किस पुकार पर? आकर हुए यहीं लय. … लेकिन वंदेमातरम् में बंकिम की भावनाएं दुर्गा-काली तथा बंगमाटी से बाहर जातीं ही नहीं, जबकि गीतांजलि में एक आधुनिक वैश्विक भारत के ऐतिहासिक अनुभवों से उद्दीप्त बहुधर्मी, बहुजातीय और बहुविश्वासी देश का अपूर्व साक्षात्कार होता है. हमारा राष्ट्रगान भी गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के इसी उदात्त चेतना वाले दिव्य मानस की देन है.
पूरा गाने की जिद
ऐसा कहने वाले विजय बहादुर सिंह अकेले नहीं हैं. वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन तो यह भी पूछ लेते हैं कि जब ‘जन गण मन’ पूरा नहीं गाया जाता तो वंदे मातरम् को ही पूरा गाने का शिगूफ़ा क्यों छेड़ दिया गया है?
वे प्रश्न करते हैं कि यदि किसी रचना, श्लोक या मंत्र के एक स्वीकृत अंश को इसलिए अधूरा माना जाएगा कि उसका पूरा मूल पाठ नहीं पढ़ा गया तो यह ‘सिद्धांत’ देश के ध्येय-वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ पर भी क्यों न लागू किया जाए, जो मुण्डक उपनिषद् 3.1.6 के पूरे मंत्र का केवल आरंभिक अंश है. पूरा मंत्र है : सत्यमेवजयतेनानृतं, सत्येन पन्था विततो देवयानः, येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम्॥
वे कहते हैं कि अगर ‘अंश नहीं, पूरा’ ही सिद्धांत है तो ‘सत्यमेव जयते’ पर रुक जाने के बजाय पूरा मुण्डक उपनिषद् पढ़िए.
वे इस तरह के कई और उदाहरण भी देते हैं: सर्वोच्च न्यायालय का सूत्र ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ (यानी जहां धर्म है, वहीं विजय है) भी स्वतंत्र रूप से आकाश से नहीं उतरा; महाभारत से आता है. तो न्यायालय में यह सूत्र देखते ही क्यों न कहा जाए कि केवल इतने शब्दों से कैसे काम चलेगा? पूरा महाभारत पढ़िए.
इसी तरह श्रीमद्भगवत गीता से महज ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ क्यों? पूरा श्लोक पढ़िए. फिर श्लोक पर ही क्यों रुकें? पूरी गीता पढ़िए. और गीता भी आखिर महाभारत का ही हिस्सा है तो फिर तर्क को उसकी अंतिम मंजिल तक पहुंचाइए और पूरा महाभारत पढ़िए.
फिर यही कसौटी वंदे मातरम् पर लगाइए! उसके प्रचलित अंश के बजाय पूरी कविता पढ़ना ही राष्ट्रभक्ति की परीक्षा है तो कविता पर भी क्यों रुकना? वंदे मातरम् जिस उपन्यास ,’आनंदमठ’ में आया है, वह पूरा पढ़वाइए. और वह सब कीजिए जो बंकिम बाबू ने लिखा है. आज़ादी का पूरा इतिहास परे धरिए और लाल किले की प्राचीर से कहिए कि बंकिम बाबू का ‘आनंदमठ’ पढ़कर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि अंग्रेज़ हमें सभ्य बनाने आए थे, गुलाम बनाने नहीं. वे मुक्ति दिलाने आए थे, वे ही आज़ादी लेकर आए थे और उन्होंने ही हमें सभ्य बनाया. अंग्रेजों ने हमारे महान् धर्म की रक्षा की.
बंकिम बाबू ने लिखा ही हुआ है ‘आनंद मठ’ में कि अंग्रेज़ हमें सभ्य और सुसंस्कृत बनाएगा. तो हम उसी से सभ्य और सुसंस्कृत हुए हैं. उससे पहले तो हम असभ्य और सुसंस्कृत भी नहीं थे. आधुनिकता का और हमारा क्या लेना-देना!
कई और हल्कों में भी कहा जा रहा है कि बंकिमचंद के विचारों में तत्कालीन अंग्रेजी राज को लेकर एक ‘जटिल व्यावहारिक दृष्टिकोण’ दिखाई देता है. भले ही वे सीधे-सीधे उस राज के भक्त न रहे हों, एक समय आधुनिक ज्ञान और व्यवस्था के लिए उस राज को जरूरी मानते थे. तब तक, जब तक देश में हिंदू समाज बौद्धिक और नैतिक रूप से पूरी तरह मजबूत नहीं हो जाए. इसी राज में वे लगभग 32 वर्षों तक ‘ईमानदार’ डिप्टी मजिस्ट्रेट व डिप्टी कलेक्टर रहे थे.
उनके विपरीत रवींद्रनाथ टैगोर अपनी एक कविता में आजादी को लेकर बेहद उदात्त स्वप्न देखते हैं: जहां उड़ता फिरे मन बेखौफ/और सिर हो शान से उठा हुआ/जहां ज्ञान हो सबके लिए बेरोकटोक बिना शर्त रखा हुआ/जहां घर की चौखट सी छोटी सरहदों में न बंटा हो जहां/जहां सच की गहराइयों से निकले हर बयान/जहां बाजू बिना थके कुछ मुकम्मल तराशें/जहां सही सोच को धुंधला न पाएं उदास मुर्दा रवायतें/जहां दिलो-दिमाग तलाशें नए खयाल और उन्हें अंजाम दें/ऐसी आजादी के स्वर्ग में, ऐ भगवान, मेरे वतन की हो नई सुबह!
एकता या प्रतिद्वंद्विता!
निस्संदेह, टैगोर भी वंदेमातरम् के शुरुआती दो छंदों के मुक्त कंठ प्रशंसक थे. इतिहासकार व लेखक सुगत बोस के अनुसार 1937 के अक्टूबर-नवंबर महीनों में कलकत्ता (अब कोलकाता) में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) की बैठक के समय सुभाषचंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू ने साथ मिलकर काम किया और रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर कांग्रेस ने इस बैठक में निर्णय लिया कि अब से पार्टी की राष्ट्रीय बैठकों में गीत का केवल पहला भाग गाया जाएगा, जो हमारे देश के राष्ट्रीय वैभव का एक सुंदर उद्घोष है.
ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि टैगोर को लगता था कि हमें अपने राष्ट्रवादी आंदोलन में एकता एवं सहमति की जरूरत है और वह विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं चाहते थे.
ऐसे में पूरे वंदेमातरम् को जन-गण-मन जैसा कानूनी संरक्षण देने वाली भाजपा और नरेंद्र मोदी सरकार इस सवाल का जवाब दें या नहीं कि आज वे टैगोर के विपरीत, विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच एकता व सहमति के बजाय प्रतिद्वंद्विता क्यों चाहती है, जवाब दे या नहीं, देशवासी उनकी नीयत को पहचानने में कोई ग़लती नहीं करने वाले.
क्योंकि वे जानते हैं कि वंदेमातरम् कभी भी उस सम्मान का मोहताज नहीं रहा, जिसे देने के नाम पर आज वे अपना राजनीतिक हित साधने के फेर में हैं. पराधीनता के दौर में क्रांतिकारी और मुक्तिसंग्रामी उसे अपना गीत ही नहीं, उद्घोष बनाकर, अपने प्राणों की आहुतियां देकर और समस्त भारतीयों में वलिदान की भावना का संचार कर तो उसे भरपूर सम्मान दे ही गए हैं, आजादी के बाद भी उसके मान व गौरव में कभी नहीं आई है.
गुलामी के दिनों में यह मातृभूमिभक्ति की जो भावना जगाता था, उसके लिए आजादी के बाद भी राष्ट्रगीत का मान देकर देश उसके प्रति अपनी भरपूर कृतज्ञता ज्ञापित करता रहा है. लेकिन पूरे स्वतंत्रता संघर्ष में अनुपस्थित रही जमात के वारिस वर्तमान भाजपाई सत्ताधीश अब उसे लेकर जो खेल-खेल रहे हैं, उससे अंदेशे पैदा हो रहे हैं कि वे अपने हाथों में लगा कीचड़ इसे भी न लगा बैठें. लेकिन क्या ऐसा करके भी वे परसेप्शन की अपनी हारी हुई लड़ाई जीत सकेंगे? लगता तो नहीं है.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
