सदस्यों का ही सम्मान हासिल न कर पाने वाली बार काउंसिल लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं: जस्टिस नागरत्ना

एनएलयू, दिल्ली के 13वें दीक्षांत समारोह में जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि संवैधानिक लोकतंत्र के लिए एक स्वतंत्र बार बेहद जरूरी है. उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब नालसार यूनिवर्सिटी के छात्रों के पूरे बैच को बैन करने की कोशिश के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया के प्रमुख मनन कुमार मिश्रा के इस्तीफ़े की मांग उठ रही है.

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना. (फोटो: पीटीआई / अतुल यादव)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी. नागरत्ना ने शनिवार (29 अगस्त) को कहा कि संवैधानिक लोकतंत्र के लिए एक स्वतंत्र बार (वकीलों का समुदाय) बेहद जरूरी है. उन्होंने कहा कि जब किसी बार काउंसिल को उसके अपने सदस्यों का सम्मान हासिल नहीं होता, तब यह कानूनी पेशे के लिए अच्छा संकेत नहीं है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने कहा, ‘बार काउंसिल, चाहे वह केंद्रीय हो या राज्य स्तरीय, उन्हें पेशेवर नैतिकता, नैतिक मूल्यों और पेशेवर दक्षता को बनाए रखने में अपनी भूमिका और महत्व पर आत्ममंथन करना चाहिए. जब किसी बार काउंसिल को उसके सदस्यों का सम्मान हासिल नहीं होता, तब यह कानूनी पेशे के लिए अच्छा संकेत नहीं है.’ 

जस्टिस नागरत्ना ने यह टिप्पणी नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (एनएलयू) दिल्ली के 13वें दीक्षांत समारोह में की. उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद मनन कुमार मिश्रा के इस्तीफे की मांग की जा रही है. मिश्रा ने नालसार लॉ यूनिवर्सिटी के छात्रों के एक पूरे बैच पर बैन लगाने की कोशिश की थी.

नालसार और एनएलएसआईयू बैंगलोर समेत कई विधि विश्वविद्यालयों के छात्रों ने मिश्रा से बिना शर्त माफी मांगने की मांग की थी. आरोप था कि मिश्रा ने छात्रों के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं और 2026 में स्नातक होने वाले छात्रों के पूरे बैच के खिलाफ कार्रवाई करने की कोशिश की थी. इन छात्रों में से कुछ ने अपने दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत को आमंत्रित किए जाने का विरोध किया था.

बाद में मिश्रा ने छात्रों का नामांकन नहीं करने का अपना निर्देश वापस ले लिया था.

जस्टिस नागरत्ना ने यह भी कहा कि स्वतंत्र बार वकीलों को उनके निजी लाभ के लिए दिया गया कोई अधिकार नहीं है, बल्कि इसकी जरूरत इसलिए है क्योंकि संवैधानिक लोकतंत्र को ऐसे पेशेवरों की आवश्यकता होती है जो स्वतंत्र होकर काम कर सकें.

उन्होंने कहा, ‘बार की स्वतंत्रता वकीलों को उनके निजी लाभ के लिए दिया गया कोई अधिकार नहीं है.’

उन्होंने कहा, ‘यह इसलिए मौजूद है क्योंकि संवैधानिक लोकतंत्र को ऐसे पेशेवरों की जरूरत होती है जो राज्य, बाजार या यहां तक कि अपने मुवक्किलों से भी अनुमति लिए बिना सलाह दे सकें, बहस कर सकें, सवाल उठा सकें और लोगों का प्रतिनिधित्व कर सकें.. एक सफल करिअर बनाने की कोशिश आपको यह भूलने न दे कि आखिर वह क्या है, जिसकी वजह से इस पेशे को संरक्षित रखना जरूरी है. इसकी स्वतंत्रता की रक्षा करें.’

जस्टिस नागरत्ना ने यह भी कहा कि कानून का पेशा ‘विश्वास का दायित्व’ है और कोई वकील ‘ऐसे व्यक्ति तक सीमित नहीं हो सकता जो घंटे के हिसाब से कानूनी ज्ञान बेचता है.’