स्वतंत्रता की 79वीं वर्षगांठ के अवसर पर द वायर हिंदी ‘आज़ादी के मायने’ नाम से एक श्रृंखला शुरू कर रहा है, जहां हम समकालीन लेखकों-विचारकों के लिए आज़ादी क्या है, इस बारे में उनके विचारों से रूबरू होंगे. एक तरह से यह श्रृंखला स्वतंत्रता को आज के संदर्भो में, उसके रोज़ाना के अर्थों में समझने का, उसके मायनों से वाक़िफ़ होने का अवसर है. प्रस्तुत है 16वीं क़िस्त.
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अली सरदार जाफ़री जब कहते हैं कि..
कौन आज़ाद हुआ?
किस के माथे से सियाही छूटी
मेरे सीने में अभी दर्द है महकूमी का
मदर-ए-हिन्द के चेहरे पे उदासी है वही
तो मैं भी सोचने लगती हूं कि जिसे आधी आबादी कहकर पुकारा जाता है, क्या वह आधी आबादी आज़ाद है? आज़ादी के इतने बरसों बाद भी स्त्रियों के नाम पर होने वाली अच्छी-अच्छी बातों, दावों के बावजूद हमारी जगह कहां है?
मुझे दुनिया के बारे में तमाम बड़ी बातें नहीं पता, मैं एक ऐसी दुनिया में रहती हूं जिसका दायरा कुल डेढ़ किलोमीटर का है. यानी मेरे लिए डेढ़ किलोमीटर की दुनिया में स्त्री की आज़ादी कितनी है, वही मायने रखता है. मैं जहां हूं, जिस समाज और जिस परिवार में हूं, फिलहाल वही मेरी पूरी दुनिया है, मेरा पूरा देश है.
एक तरह से देखें, तो मेरी दुनिया पितृसत्ता के संरक्षण में बरसों से चैन से जीती हुई दुनिया है. यहां इतनी गरीबी नहीं कि रोज़ त्राहि-त्राहि मचे और इतनी अमीरी भी नहीं कि उसके जलवे दिखाई दें. यहां न बाढ़ आती है, न सूखा पड़ता है. बेटों की चाह में कन्या भ्रूण हत्या करवाना यहां किसी बुराई की तरह नहीं बल्कि बुद्धिमानी की तरह देखा जाता है. किसी को पहली संतान लड़की हो गई तो बिना भ्रूण का लिंग जांच करवाए दूसरी संतान नहीं पैदा की जाती. हालांकि एक दो घर अपवाद में हैं जिन्होंने दूसरी संतान लड़की पैदा होने तक इंतज़ार किया और तीसरी संतान लड़का ही पैदा हो यह सुनिश्चित किए बिना संतान को जन्म नहीं दिया.
जबकि हर सोनोग्राफी सेंटर पर बोर्ड लगा हुआ है कि यहां लिंग जांच नहीं की जाती, लिंग जांच करना कानूनन अपराध है. बावजूद इसके अच्छी बात यह है कि लड़कियां पैदा हो रहीं हैं, स्कूल जा रही हैं. पढ़ी-लिखी लड़कियां बहू बनकर आ रहीं जिनमें कुछ बहुएं आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं, कुछ आशा वर्कर हैं, कुछ सरकारी नौकरियों में हैं. हर जाति और हर धर्म की मिली-जुली आबादी वाला मेरा गांव, सच कहूँ तो एक छोटा-सा भारत ही है.
ऊपर से देखने पर सब चंगा है. कुछ प्रगतिशील घरों में बहुओं को घर में सलवार कुर्ता पहनने की परमिशन है, उन्हें बस घर के बाहर ही साड़ी पहनना पड़ता है. कुछ लड़कियां जींस-टॉप पहनती हैं, साइकिल-स्कूटी चलाकर स्कूल-कॉलेज जाती हैं. लेकिन इस चंगेपन के भीतर एक ऐसी बेशर्म व्यवस्था है जिसे कोई देखना ही नहीं चाहता. पर मैं बेचैन हो उठती हूं,अपने स्तर पर बगावत करती हूं.
यह बेचैनी इस सवाल से पैदा होती है कि आज़ादी के इतने वर्षों बाद गांव की स्त्री वास्तव में कितनी आज़ाद हुई है? कागज़ पर उसके अधिकार बढ़े हैं, अवसर बढ़े हैं, शिक्षा बढ़ी है, राजनीति में भागीदारी बढ़ी है. लेकिन क्या उसके बैठने की जगह बदली है? क्या उसकी आवाज़ का वजन बढ़ा है? क्या परिवार और समाज के निर्णयों में उसकी वास्तविक हिस्सेदारी बढ़ी है? मुझे मेरी बात समझाने के लिए अपनी इसी डेढ़ किलोमीटर की दुनिया के कुछ दृश्य दिखाने दीजिए.
आज़ादी के अस्सी साल हो चुके हैं. गांव में लगभग डेढ़ किलोमीटर के फासले पर दो सरकारी विद्यालय हैं जिसमें एक प्राथमिक विद्यालय है और दूसरा उच्च प्राथमिक है. दोनों में विभागीय निर्देश के अनुसार अभिभावक-शिक्षक बैठक होती है. एक विद्यालय में आने वाले हर अभिभावक के लिए कुर्सी है, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री. दूसरे विद्यालय में पुरुष अभिभावकों के लिए कुर्सियां हैं और स्त्रियां जमीन पर बैठती हैं.
दोनों विद्यालय एक ही ग्रामसभा में हैं. प्रधान एक ही हैं. प्रधान दोनों विद्यालयों में बारी-बारी से आते हैं. शिक्षक भी देखते हैं. अभिभावक भी देखते हैं. लेकिन किसी को यह असामान्य नहीं लगता कि एक मां के लिए ज़मीन और एक पिता के लिए कुर्सी क्यों? लोगों ने ज़मीन पर बैठी स्त्रियों वाले दृश्य को इतना सहज, सामान्य मान लिया है कि दूसरे विद्यालय में बड़ी मुश्किल और बरसों के जद्दोज़हद के बाद कुर्सी पर बैठती स्त्रियों वाले दृश्य उन्हें असामान्य लगते हैं.
आपको लगेगा कि यह स्त्रियां अनपढ़ और गरीब घरों से होती हैं, इसीलिए इनका जमीन पर बैठना किसी को अस्वाभाविक नहीं लगता. पर आपको बताना चाहूंगी कि मेरी मां जो फ़ैज़ाबाद जैसे शहर में पैदा हुई थीं, वहीं पढ़ी-लिखी थीं और वहीं शिक्षक की नौकरी करती थीं, अस्सी के दशक में जब पारिवारिक कारणों से पापा ने उनका ट्रांसफर गांव में करवाया तो वह भी ज़मीन पर चटाई बिछाकर बैठती थीं और बच्चों को पढ़ाती थीं. मैं बचपन में मां के साथ उनके स्कूल पढ़ने जाती थी, तब सारे बच्चे ज़मीन पर ही बैठकर पढ़ते थे. मुझे शौक लगता था कि काश मेरी मां भी कुर्सी पर बैठकर पढ़ाती तो कभी-कभार मुझे भी कुर्सी पर बैठने मिलता. किंतु मां कभी कुर्सी पर नहीं बैठीं और इस कारण उनकी बहुत वाहवाही भी होती थी कि इतना पढ़ने लिखने और शहर की होने के बावजूद उन्होंने अपने संस्कार नहीं छोड़े.
यही पितृसत्ता की सबसे मजबूत दीवार है जो हमेशा ऊंची आवाज़ में आदेश नहीं देती; कई बार वह सामान्य व्यवहार बनकर हमारे बीच बैठी रहती है और कालांतर में वह एक ऐसे अलिखित नियम में रूढ़ हो जाती है, जिसे बदलने, तोड़ने का साहस लोग खो देते हैं.
मां आजीवन ज़मीन पर बैठकर पढ़ाती रहीं और 2004 में उनकी मृत्यु हो गई. मैं उन दिनों फ़ैज़ाबाद में नौकरी करती थी. मां की मृत्यु के बाद मुझे एक तरह से ज़िद हो गई कि मैं भी गांव वापस लौटूंगी और वहीं पढ़ाऊंगी. संयोग से 2005 में जब मेरा ट्रांसफर हुआ तो मुझे वही स्कूल मिला जहां मां पढ़ाती थीं.
अब पितृसत्ता की चालाकी देखिए- वहां जितनी महिला शिक्षक थीं, सबको मां के उदाहरण के चलते कुर्सी नहीं मिलती थी, वह भी जमीन पर बैठकर पढ़ाती थीं, भले ही उनमें कोई सामान्य जाति से हो, पिछड़ी हो या अनुसूचित. मैं पापा के साथ स्कूल जॉइन करने गई थी, वहां का दृश्य देखकर मैं अवाक रह गई. मेरा बचपन गुज़र चुका था. मैं पढ़-लिखकर शिक्षक बन चुकी थी, पर मेरे आसपास की स्त्रियां अभी भी सरकारी स्कूल में कुर्सी पर नहीं बैठ पाती थीं, भले वह गांव की बेटी हो या बहू.
मैंने पापा से साफ़ कहा मैं ज़मीन पर बैठकर नहीं पढ़ाऊंगी. पापा ने मेरा साथ दिया और मैं उस स्कूल के इतिहास में पहली शिक्षक बनी जो कुर्सी पर बैठकर पढ़ाती थी.
हमने जाति के प्रश्न पर समाज में बहुत कुछ बदलते देखा है. धर्म की दूरियां भी कई जगह कम हुई हैं. आर्थिक परिस्थितियों ने पुराने सामाजिक संबंधों को बदला है. लड़कियां पहले से अधिक स्कूल जा रही हैं. महिलाएं सार्वजनिक जीवन में दिखाई देने लगी हैं. लेकिन जेंडर? वह अब भी हमारे रोज़मर्रा के व्यवहार में कहीं गहरे बैठा हुआ है. और राजनीति इसका सबसे बड़ा उदाहरण है.
73वें संविधान संशोधन ने स्थानीय स्वशासन में महिलाओं की भागीदारी का रास्ता खोला. आज देश में लगभग 14.5 लाख महिलाएं पंचायती राज संस्थाओं की निर्वाचित प्रतिनिधि हैं, जो कुल निर्वाचित प्रतिनिधियों का लगभग 46 प्रतिशत हैं. यह छोटी उपलब्धि नहीं है. लेकिन संख्या और सत्ता में अंतर होता है. किसी महिला के नाम के आगे प्रधान लिख देना और उसे वास्तव में निर्णय लेने की शक्ति दे देना दो अलग बातें हैं.
हमारे गांवों में आज भी चुनाव के समय एक परिचित दृश्य दिखाई देता है. सीट महिला के लिए आरक्षित हुई तो घर की महिला को चुनाव लड़ा दिया गया. वह जीत गईं. प्रमाणपत्र उनके नाम का आया. शपथ उन्होंने ली. लेकिन उसके बाद, प्रधान पति, प्रधान पुत्र या परिवार का कोई पुरुष सदस्य पंचायत का वास्तविक प्रशासक बन बैठता है. सबसे विचित्र यह है कि जिला स्तर की बैठकों में अधिकांश निर्वाचित महिला प्रधान की जगह उनका पति या पुत्र पहुंच जाता है और अधिकारी भी उसे उसी सम्मान और अधिकार के साथ स्वीकार कर लेते हैं, जो निर्वाचित प्रतिनिधि का होना चाहिए.
यह केवल किसी एक अधिकारी की गलती या किसी एक परिवार की चालाकी नहीं है. यह उस सामाजिक मानसिकता का परिणाम है जिसमें हम महिला को प्रतिनिधि तो मान लेते हैं, प्रतिनिधित्व करने वाली नहीं.
सरकार स्वयं अब प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व की इस समस्या को स्वीकार कर रही है. फरवरी 2026 में पंचायती राज मंत्रालय ने संसद में बताया कि महिलाओं के स्थान पर पुरुष परिजनों द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने की समस्या पर गठित समिति ने अपनी रिपोर्ट दी है और वास्तविक महिला नेतृत्व सुनिश्चित करने के लिए कानूनी सुरक्षा, क्षमता निर्माण, सामाजिक ऑडिट और दंडात्मक प्रावधानों जैसी सिफारिशें की गई हैं. अर्थात समस्या केवल हमें ही दिखाई नहीं दे रही बल्कि व्यवस्था भी अब उसे समस्या मान रही है.
मुझे इक्कीस साल हो गए शहर छोड़कर गांव आए हुए. इस अवधि में मेरे गांव में दो बार महिला प्रधान हुईं, एक बार सामान्य सीट पर और एक बार अनुसूचित सीट पर. कहना नहीं होगा कि दोनों महिला प्रधानों की जगह उनके पति और पुत्र ने न केवल कामकाज संभाला, मीटिंग्स में हिस्सा लिया बल्कि उनके नाम के हस्ताक्षर खुद बनाए. गांव में किसी ने कभी वास्तविक प्रधान को न कहीं देखा, न किसी को उनके न दिखने पर कोई हैरानी हुई. वह पूर्ववत अपनी रसोई से लेकर खेती का काम देखती रहीं और उनकी जगह उनके पति/पुत्र प्रशासन चलाते रहे.
हम चालक लोग हैं. पहले कहते थे ‘पढ़ी-लिखी लड़की से कौन शादी करेगा’ तो उसे पढ़ाया नहीं जाता था. बदलते आर्थिक सामाजिक कारणों से अब ‘अनपढ़ लड़की से शादी कौन करेगा’ के डर से लड़कियों का पढ़ना ज़रूरी हुआ तो हमने कहा लड़की पढ़े, लेकिन यह नहीं सोचना चाहा कि पढ़कर वह क्या चुनेगी?
हमने आर्थिक मजबूरियों के कारण कहा बहू नौकरी करे. लेकिन यह मानने में कठिनाई हुई कि नौकरी के साथ घर के निर्णयों में उसकी भी बराबर की आवाज़ होगी.
हमने कहा महिला प्रधान बने. लेकिन उसके पति को प्रधान जी कहने की आदत नहीं छोड़ी. हमने कहा महिला सभा में आए, लेकिन उसके लिए कुर्सी रखना अभी भी ज़रूरी नहीं समझा. यानी किसी तरह हमने स्त्री की उपस्थिति तो स्वीकार की, उसकी स्वायत्तता नहीं.
भारत में महिलाओं की शिक्षा की स्थिति, राजनीतिक प्रतिनिधित्व की स्थिति निश्चित रूप से बदली है. 2024 के लोकसभा चुनाव में 75 महिलाएं निर्वाचित हुईं, जो लगभग 14 प्रतिशत प्रतिनिधित्व है. 1952 की पहली लोकसभा में यह संख्या केवल 22 थी. लेकिन संसद से लेकर पंचायत तक एक सवाल लगातार पीछा करता है कि क्या प्रतिनिधित्व का अर्थ निर्णय लेने की शक्ति भी बन रहा है? यही वह जगह है जहां आंकड़े खत्म होते हैं और समाजशास्त्र शुरू होता है, क्योंकि किसी महिला के हाथ में नियुक्ति पत्र होना और उसके हाथ में अपने जीवन का निर्णय होना एक ही बात नहीं है.
किसी लड़की का स्कूल जाना और उसे अपने जीवन के बारे में बोलने का अधिकार मिलना एक ही बात नहीं है. किसी महिला का पंचायत चुनाव जीतना और पंचायत चलाना एक ही बात नहीं है. और किसी महिला को कुर्सी पर बैठा देना और उसे बराबरी का मनुष्य समझना भी एक ही बात नहीं है.
मुझे अक्सर लगता है कि स्वतंत्रता की हमारी सबसे बड़ी भूल यही रही कि हमने आज़ादी को बहुत बड़े-बड़े शब्दों में समझा. देश आज़ाद हुआ. संविधान बना. मताधिकार मिला. चुनाव हुए. कानून बने. आरक्षण मिला. लेकिन आज़ादी का एक बहुत छोटा-सा अर्थ हम रोज़मर्रा के जीवन में भूल गए और वह है एक स्त्री को एक व्यक्ति के तौर पर देखना. हमारी पीढ़ी के सामने चुनौती यही है कि हम स्त्री को अबला कहकर उसकी रक्षा करने वाली व्यवस्था न बनाएं, बल्कि उसे इतना सक्षम और स्वतंत्र बनाएं कि उसे किसी संरक्षक की आवश्यकता ही न पड़े. क्योंकि पितृसत्ता का सबसे उदार चेहरा भी अंततः संरक्षण देता है, बराबरी नहीं.
मेरी दुनिया भले ही सिर्फ डेढ़ किलोमीटर की हो, लेकिन भारत में स्त्रियों की असली तस्वीर शहरों की चमक, संसद के भाषण और बड़े-बड़े महिला सशक्तिकरण अभियानों से दूर इसी डेढ़ किलोमीटर में कहीं छिपी है. जब यहां स्त्रियां एक मनुष्य के तौर पर देखी, चीन्ही और स्वीकार की जाएंगी तभी मेरे लिए असली आज़ादी आएगी.
(ममता सिंह उच्च प्राथमिक विद्यालय, नरायनपुर, अग्रेसर (अमेठी) में शिक्षक हैं.)
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