नई दिल्ली: हाल के सालों में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में पुलिस का दिखना, सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी एक आसामान्य दृश्य नहीं रहा है. आए दिन परिसरों में सुरक्षाकर्मियों की उपस्थिति, खासकर अगर विद्यार्थी किसी मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं, आम मंज़र होती जा रही है.
अब इसी कड़ी में आगे बढ़ते हुए जामिया मिल्लिया इस्लामिया और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) समेत देश के कई अन्य प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों की तरह हाल ही में आईआईटी दिल्ली ने भी अपने छात्रों के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन से निपटने के लिए पुलिस को कैंपस में बुलाया था.
दिल्ली पुलिस के मुताबिक, आईआईटी दिल्ली के मुख्य सुरक्षा अधिकारी द्वारा 25 अगस्त को लिखित पत्र देकर पुलिस को कैंपस में बुलाया गया था. पुलिस की एक टीम वर्दी में जबकि कुछ पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में प्रदर्शनकारी छात्रों के आसपास तैनात थे.
ध्यान रहे, आईआईटी दिल्ली में यह पुलिस तैनाती ऐसे समय हुई है जब पिछले करीब एक सप्ताह से छात्र विभिन्न मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे. 22 अगस्त को छात्र ऋषिकेश कुमार की कथित आत्महत्या के बाद शुरू हुआ यह प्रदर्शन फिलहाल अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया गया है. पिछले 30 महीनों में संस्थान के आठ छात्रों की कथित आत्महत्या के बाद छात्रों ने मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था, संस्थागत जवाबदेही और पारदर्शिता से जुड़े सवाल उठाए हैं.
29 अगस्त की रात हुई बैठक में प्रदर्शनकारी छात्रों ने तय किया कि ऋषिकेश की मौत की जांच के लिए गठित बाहरी जांच समिति की रिपोर्ट सभी छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों के साथ साझा किए जाने तक विरोध प्रदर्शन स्थगित रहेगा. हालांकि, छात्रों ने स्पष्ट किया है कि उनकी अन्य मांगों और संस्थान में मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े सवालों पर उनका संघर्ष जारी रहेगा.
दूसरी तरफ आईआईटी दिल्ली ने इस बारे में पूछे जाने पर चुप्पी का चुनाव किया है. द वायर हिंदी को इस सवाल का जवाब नहीं मिला कि आखिर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के बीच कैंपस के भीतर पुलिस को क्यों बुलाया गया?
पुलिस बुलाने से पहले छात्रों पर अनुशासनहीनता के आरोप
30 अगस्त को जारी प्रेस रिलीज़ में छात्रों ने कहा कि पिछले एक सप्ताह के विरोध के दौरान उन्होंने संयम बरता और प्रदर्शन को तय सीमाओं के भीतर रखा. यह प्रेस रिलीज़ संस्थान के डायरेक्टर रंगन बनर्जी द्वारा 28 तारीख को भेजे गए ईमेल के जवाब में आया है. ईमेल में बनर्जी ने प्रदर्शनरत छात्रों पर अनुशासनहीनता के आरोप लगाए थे.
छात्रों ने प्रदर्शन को लेकर संस्थान की ओर से लगाए गए कथित अनुशासनहीनता या व्यवधान के आरोपों को भी खारिज किया है.
उनका कहना है कि नारे संस्थागत जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग तक सीमित थे और उनका उद्देश्य किसी हॉस्टल या आवासीय क्षेत्र में प्रवेश करना या कोई दूसरी कार्रवाई करना नहीं था. प्रेस रिलीज़ में विशेष रूप से उस नारे का उल्लेख किया गया है जिसमें शिक्षकों से उनके साथ खड़े होने की अपील की गई थी. जैसे कि ‘प्रोफेसर्स बाहर आओ, हमारा साथ दो.’
छात्रों का कहना है कि अस्पताल और स्वास्थ्य सुविधाओं के आसपास नारेबाजी से परहेज किया गया, प्रदर्शन मुख्य आवागमन वाली सड़कों तक सीमित रहा और छात्रों द्वारा आवासीय हॉस्टल परिसर में प्रवेश नहीं किया गया. महिला हॉस्टलों के आसपास मार्च नहीं करने का फैसला भी सुरक्षा, निजता और महिलाओं के आवासीय स्थानों से जुड़े सवालों को ध्यान में रखकर लिया गया था.
सादे कपड़ों में पुलिस की तैनाती, छात्रों ने रिकॉर्डिंग का आरोप लगाया
छात्रों ने प्रदर्शन के दौरान पुलिस और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कड़ी आपत्ति जताई है.
छात्रों का आरोप है कि सादे कपड़ों में दिल्ली पुलिस के जवान कैंपस में प्रदर्शन कर रहे छात्रों की निगरानी के लिए आए थे और उन्होंने छात्रों की वीडियो रिकॉर्डिंग भी की.
जब छात्र कैंपस में बिना आई कार्ड और सादे कपड़ों में दिल्ली पुलिस के अधिकारियों की मौजूदगी तथा उनके द्वारा वीडियो रिकॉर्डिंग किए जाने पर सवाल उठा रहे थे, तब आईआईटी दिल्ली के मुख्य सुरक्षा अधिकारी कपिल कुमार को एक वीडियो में प्रदर्शनकारी छात्रों से यह कहते हुए सुना जा सकता है, ‘हमने (आईआईटी प्रशासन ने) किसी कारण से पुलिस को यहां बुलाया है. लेकिन पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में क्यों हैं और वे रिकॉर्डिंग क्यों कर रहे हैं, इस बारे में हम एसएचओ से पूछेंगे.’

वहीं, घटना के वीडियो में किशनगढ़ थाने के प्रभारी (एसएचओ) अजय कुमार यादव सादे कपड़ों में मौजूद एक व्यक्ति को दिल्ली पुलिस का कर्मी बताते हुए दिखाई देते हैं. छात्रों से बातचीत के दौरान यादव कहते हैं कि आईआईटी दिल्ली के मुख्य सुरक्षा अधिकारी ने प्रदर्शन को लेकर चिंता जताते हुए पुलिस को पत्र लिखा था.
उनके मुताबिक, प्रशासन को आशंका थी कि कोई बाहरी व्यक्ति कैंपस में प्रवेश कर माहौल खराब कर सकता है, इसलिए पुलिस को प्रदर्शनकारी छात्रों के आसपास तैनात रखने का अनुरोध किया गया था.
द वायर हिंदी से बातचीत में भी एसएचओ यादव ने इसकी पुष्टि की. पुलिस की मौजूदगी और सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों की तैनाती के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, ‘बाकायदा चिट्ठी लिखकर हमें बुलाया गया था. इसका मकसद ये था कि कोई बाहरी विरोध प्रदर्शन को, या आईआईटी के किसी इंफ्रास्ट्रक्चर को, या आईआईटी के अंदर रहने वाले किसी अधिकारी को कोई हानि न पहुंचाए. इसलिए सावधानी के तौर पर पुलिस को बुलाया गया था.’
हालांकि, सादे कपड़ों में मौजूद पुलिसकर्मियों द्वारा छात्रों की वीडियो रिकॉर्डिंग किए जाने के आरोप से एसएचओ ने इनकार किया. उन्होंने कहा, ‘वर वीडियो रिकॉर्ड नहीं कर रहे थे.’
उन्होंने जोड़ा कि कैंपस में पहले से सीसीटीवी कैमरों की व्यवस्था है, इसलिए पुलिस को अलग से वीडियो रिकॉर्ड करने की जरूरत नहीं थी.
सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों की तैनाती की वजह बताते हुए यादव ने कहा कि पुलिस की एक टीम वर्दी में थी, जबकि कुछ पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में छात्रों के अपेक्षाकृत नजदीक तैनात थे.
उनके मुताबिक, प्रदर्शनकारियों के पास पुलिसकर्मियों को वर्दी में खड़ा करना उचित नहीं लग रहा था, इसलिए कुछ कर्मियों को सादे कपड़ों में रखा गया था. उन्होंने यह भी कहा कि सादे कपड़ों में मौजूद पुलिसकर्मियों का एक उद्देश्य बाहरी लोगों की पहचान करना था.
इसके अलावा, छात्रों ने कैंपस के सुरक्षाकर्मियों पर भी प्रदर्शन के दौरान उनकी वीडियो रिकॉर्डिंग किए जाने का आरोप लगाया है. छात्रों का कहना है कि रिकॉर्डिंग के लिए सादे कपड़ों में एक व्यक्ति को भी बुलाया गया था.
28 अगस्त की इस घटना का एक वीडियो भी मौजूद है. वीडियो में देखा जा सकता है कि सादे कपड़ों में एक व्यक्ति छात्रों के विरोध के बावजूद उनकी वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहा है. इस दौरान कैंपस के सुरक्षाकर्मी और दिल्ली पुलिस के कर्मी भी वहां मौजूद थे.

वीडियो में छात्र उस व्यक्ति से पूछते हैं कि वह कौन है और उनकी रिकॉर्डिंग क्यों कर रहा है. इस पर वह खुद को पेशेवर फोटोग्राफर बताते हुए कहता है कि उसे संस्थान के सुरक्षा विभाग ने फिल्मिंग के लिए बुलाया है. हालांकि, जब छात्रों ने उससे इस संबंध में लिखित अनुमति दिखाने को कहा, तो उसके पास ऐसा कोई पत्र नहीं था.
इसी दौरान प्रदर्शनकारी छात्रों ने सुरक्षा विभाग के एक अधिकारी से भी रिकॉर्डिंग की अनुमति के बारे में सवाल किया. वीडियो में अधिकारी से संस्थान के निदेशक की लिखित अनुमति पत्र मांगे जाने पर वह कहते सुनाई देते हैं कि उनके पास ऐसी कोई लिखित अनुमति नहीं है.
इस संबंध में आईआईटी दिल्ली के सुरक्षा विभाग को सवाल भेजे गए हैं. जवाब मिलने पर खबर को अपडेट किया जाएगा.
छात्रा की रिकॉर्डिंग और धक्का देने का आरोप
छात्रों ने यह भी आरोप लगाया कि एक महिला प्रदर्शनकारी ने जब छात्रों की रिकॉर्डिंग किए जाने का विरोध किया, तब सुरक्षाकर्मी ने उसे धक्का दे दिया. घटना के एक वीडियो में देखा जा सकता है कि सादे कपड़ों में मौजूद व्यक्ति कैमरे से छात्रों की रिकॉर्डिंग कर रहा है. इसी दौरान वहां पहुंची एक छात्रा उससे रिकॉर्डिंग बंद करने के लिए कहती है, लेकिन वह कैमरा उसकी ओर किए रहता है और उसकी रिकॉर्डिंग जारी रखता है.
CheapTactics by IIT Admin and DelhiPolice continue. This time a proper cameraman (in civilian clothes) with policeman securing him recording protesters. Students oppose this cowardly action in security office. This is 5th day of the protest.
IIT Delhi
28.08.2026
11pm pic.twitter.com/qYFtlCUHs2— Arpit (@ARPITy26) August 28, 2026
संस्थान के एक छात्र ने द वायर हिंदी से कहा, ‘शुक्रवार (28 अगस्त) रात मार्च के बाद छात्र मुख्य भवन के पास जमा थे. तभी सादे कपड़ों में एक व्यक्ति डीएसएलआर कैमरा और गिंबल लेकर उनकी रिकॉर्डिंग करने लगा. वहां मौजूद अधिकांश छात्र पुरुष थे, लेकिन जैसे ही एक छात्रा वहां पहुंची, उसने अपना कैमरा सीधे उसकी ओर कर दिया और उसकी सहमति के बिना रिकॉर्डिंग जारी रखी.’
इस घटना का वीडियो भी मौजूद है, जिसमें देखा जा सकता है कि छात्रा के मना करने के बावजूद वह व्यक्ति उसे फ़िल्म करना जारी रखता है. छात्र के मुताबिक, ‘उसका यह व्यवहार छात्रा के लिए बेहद असहज और असुविधाजनक था.’
छात्र ने आगे कहा, ‘हमारे बार-बार अनुरोध करने के बावजूद वह व्यक्ति मुस्कुराता रहा और रिकॉर्डिंग करता रहा. मौके पर मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने भी इस पर हस्तक्षेप नहीं किया.’ इस बात की पुष्टि घटना के वीडियो से होती है, जिसमें सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी में व्यक्ति को रिकॉर्डिंग करते हुए देखा जा सकता है.
छात्रों की 30 अगस्त की प्रेस रिलीज़ के मुताबिक, ‘जब छात्रा कैमरामैन के पास जाकर रिकॉर्डिंग बंद करने के लिए कहने लगी, तब एक महिला सुरक्षाकर्मी ने उसे जोर से धक्का देकर दूर कर दिया, जिससे उसे शारीरिक चोट पहुंची.’
प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि उन्होंने इस दौरान टकराव बढ़ाने के बजाय संयम बरता, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि पुलिस या सुरक्षा से जुड़ा विवाद ऋषिकेश के लिए न्याय की उनकी मूल मांग को पीछे छोड़ दे. छात्रों ने कहा है कि उन्हें अब तक इस कथित निगरानी को लेकर कोई स्पष्ट स्पष्टीकरण नहीं मिला है. उनका कहना है कि वे यह मुद्दा प्रशासन के सामने उठाएंगे और जवाब मांगेंगे.
कौन थे ये सुरक्षाकर्मी?
पुलिस की निगरानी को लेकर पीएचडी के एक छात्र कहते हैं, ‘अभी कुछ दिन पहले दीक्षांत समारोह में प्रधानमंत्री मुख्य अतिथि थे. उससे पहले करीब दो हफ्तों तक और उसके बाद भी सुरक्षा व्यवस्था इतनी कड़ी थी कि कैंपस में दिन के अलग-अलग समय पर कई जगहों पर हमसे बार-बार आईडी कार्ड मांगे जाते थे.’
वे आगे जोड़ते हैं, ‘ऐसे में सादे कपड़ों में कोई पुलिसकर्मी डायरेक्टर को जानकारी दिए बिना कैंपस में कैसे आ सकता है? जहां तक मेरी जानकारी है, पुलिस को कैंपस में प्रवेश करने के लिए डायरेक्टर/वीसी की अनुमति की जरूरत होती है. फिर इस अनुमति को लेकर इतनी गोपनीयता क्यों बरती जा रही है? कैंपस के लगभग हर हिस्से में सीसीटीवी कैमरे लगे हैं, तो पुलिस अधिकारियों या दूसरे लोगों को महिलाओं को असहज करने, उनकी रिकॉर्डिंग करने और उन्हें डराने के लिए बुलाने की जरूरत ही क्यों है?’
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब प्रदर्शन के दौरान छात्रों के खिलाफ संभावित अनुशासनात्मक कार्रवाई को लेकर भी चिंता बनी हुई थी.
ज्ञात हो कि आईआईटी दिल्ली के डायरेक्टर रंगन बनर्जी ने छात्रों को भेजे एक ईमेल में छात्रों को अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी थी. 28 अगस्त को भेजे गए इस ईमेल में बनर्जी ने कहा था कि 27 अगस्त की रात करीब 10:30 बजे से 12:30 बजे तक प्रदर्शनकारी छात्रों के एक समूह ने विरोध को कैंपस के आवासीय इलाकों तक ले गए और फैकल्टी आवासों के सामने प्रदर्शन किया.
उनके मुताबिक, प्रदर्शन के दौरान ‘आपत्तिजनक, अपमानजनक और धमकी भरी भाषा’ वाले नारे लगाए गए. उन्होंने ईमेल में कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से कैंपस के संचालन में बाधा डालने वाले व्यक्तियों के खिलाफ संस्थान अनुशासनात्मक कार्रवाई करेगा.
छात्रों ने दोहराया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों के खिलाफ आईआईटी प्रशासन, दिल्ली पुलिस या किसी अन्य बाहरी एजेंसी की ओर से दंडात्मक या बदले की कार्रवाई नहीं होनी चाहिए.
जांच समिति पर बनी सहमति
प्रदर्शन के दौरान ऋषिकेश की मौत की स्वतंत्र जांच छात्रों की प्रमुख मांगों में से एक थी. इस मांग पर प्रशासन और छात्रों के बीच व्यापक सहमति बन गई है. प्रशासन ने एक बाहरी जांच समिति गठित करने की मांग स्वीकार कर ली थी. प्रेस रिलीज़ के मुताबिक, समिति के अध्यक्ष और उसमें शामिल छात्र सदस्यों के नाम प्रदर्शनकारी छात्र स्वयं तय करेंगे.
समिति की जांच का दायरा केवल ऋषिकेश की मौत की परिस्थितियों तक सीमित नहीं रहेगा. प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि समिति उन परिस्थितियों की भी जांच करेगी, जिसके कारण मामला इस हद तक बिगड़ा. इसके अलावा, समिति संबंधित छात्रों, शिक्षकों और प्रशासनिक कार्यालयों से बात करेगी तथा संस्थान की नीतियों और प्रक्रियाओं की समीक्षा कर अपनी सिफारिशें देगी.
छात्रों ने जांच समिति में उन अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की मांग की है, जिन पर वे प्रशासनिक चूक का आरोप लगा रहे हैं. इस मांग पर प्रशासन ने कहा है कि संबंधित अधिकारियों को जांच लंबित रहने तक छुट्टी पर भेजने का फैसला जांच समिति निष्पक्ष प्रक्रिया के तहत करेगी.
प्रदर्शनकारी छात्रों ने शुरुआत में समिति के अध्यक्ष के रूप में उत्तराखंड के पूर्व डीजीपी और आईआईटी दिल्ली के छात्र रह चुके अशोक कुमार की नियुक्ति पर आपत्ति जताई थी. उनकी मांग थी कि समिति की अध्यक्षता हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त जज को दी जाए. बाद में प्रशासन ने समिति के पुनर्गठन पर सहमति जताई और दिल्ली हाईकोर्ट की सेवानिवृत्त जज मुक्ता गुप्ता को इसका अध्यक्ष नियुक्त किया.
मुआवजे की मांग पर बदला रुख
छात्रों ने शुरुआत में ऋषिकेश के परिवार के लिए एक करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की थी. प्रशासन की ओर से मेडिकल खर्च की भरपाई, छह लाख रुपये के बेनेवोलेंट फंड और आईआईटी के पूर्व छात्रों तथा कर्मचारियों से अतिरिक्त धन जुटाने का प्रस्ताव दिया गया था.
हालांकि, प्रेस रिलीज़ में छात्रों ने कहा है कि ऋषिकेश की मां ने किसी भी मौद्रिक मुआवजे से इनकार कर दिया है. इसके बजाय उन्होंने प्रशासन से यह सुनिश्चित करने को कहा है कि मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे छात्रों के लिए कैंपस में रहने की ऐसी व्यवस्था हो, जिससे किसी छात्र को ऋषिकेश की तरह कैंपस से बाहर न रहना पड़े.
प्रशासन ने इस सुझाव पर विचार करने और ऋषिकेश की स्मृति में कैंपस में कुछ करने की बात कही है. छात्रों ने कहा है कि इस मुद्दे पर आगे की बातचीत परिवार और प्रशासन के बीच ही रखी जाएगी.
डीन श्रीदेवी की भूमिका की जांच की मांग बरकरार
छात्रों ने स्टूडेंट अफेयर्स और स्टूडेंट वेलफेयर से जुड़े अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए थे. विशेष रूप से स्टूडेंट वेलफेयर की एसोसिएट डीन प्रोफेसर श्रीदेवी के कथित असंवेदनशील बयानों को लेकर छात्रों ने उनके इस्तीफे की मांग की थी.
प्रशासन ने कहा है कि जांच समिति संबंधित अधिकारियों की भूमिका और संभावित चूकों की जांच करेगी. छात्रों ने प्रोफेसर श्रीदेवी के कथित असंवेदनशील बयानों से जुड़े सबूत भी समिति के सामने रखने की बात कही है.
अधूरी मांगों के बावजूद प्रदर्शन स्थगित
पीएचडी के एक छात्र ने प्रदर्शन स्थगित करने के फैसले को लेकर कहा कि वह इससे पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं, क्योंकि जवाबदेही की पहली मांग के तौर पर एसोसिएट डीन स्टूडेंट वेलफेयर और अन्य संबंधित डीन को उनके पदों से हटाने की मांग पूरी नहीं हुई है. छात्र के मुताबिक, संस्थान में पहले भी ऐसी कई जांचें हो चुकी हैं, लेकिन उनके नतीजे संतोषजनक नहीं रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘कैंपस में छात्रों की लगातार हो रही मौतें और जवाबदेही तय न होना इसका स्पष्ट उदाहरण है.’
हालांकि, उनके मुताबिक इस बार स्थिति में एक अहम अंतर है. जांच समिति में छात्रों की भागीदारी और प्रशासन द्वारा समिति के अध्यक्ष को बदलने पर सहमत होना कुछ हद तक पारदर्शिता का भरोसा देता है. उन्होंने कहा, ‘फिलहाल रणनीतिक तौर पर थोड़ा रुकना और पहली रिपोर्ट का इंतजार करना ठीक है. अगर जरूरत पड़ी तो उसके बाद आंदोलन को फिर से संगठित किया जा सकता है.’
उन्होंने कहा कि प्रदर्शन स्थगित करने का फैसला इस आश्वासन पर भी आधारित है कि विरोध में शामिल छात्रों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी.
मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर पारदर्शिता की मांग
ऋषिकेश की मौत के बाद छात्र संस्थान की मौजूदा मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था और उससे जुड़े प्रोटोकॉल को सार्वजनिक करने की मांग कर रहे हैं. प्रशासन ने संस्थान में मानसिक स्वास्थ्य सहायता से जुड़े स्थापित प्रोटोकॉल को सार्वजनिक करने की मांग स्वीकार की है.
छात्रों का कहना है कि जब तक छात्रों को यह पता ही न हो कि मानसिक स्वास्थ्य संकट की स्थिति में संस्थान की अलग-अलग इकाइयों की जिम्मेदारी क्या है.. किसी नए शिकायत निवारण तंत्र या मेंटर व्यवस्था की घोषणा पर्याप्त नहीं होगी. उन्होंने पहले से मौजूद प्रोटोकॉल में संभावित खामियों की समीक्षा और उसमें जरूरी बदलाव की मांग भी दोहराई है.हैं
