ग्रेट निकोबार परियोजना पर जनजातीय परिषद की आपत्तियों की जानकारी नहीं: सरकार

नवंबर 2022 में ग्रेट निकोबार की जनजातीय परिषद ने विवादास्पद ग्रेट निकोबार टाउनशिप और अन्य परियोजनाओं के लिए दी गई भूमि संबंधी एनओसी वापस ले ली थी. अब केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्री ने राज्यसभा में कहा कि मंत्रालय को ग्रेट निकोबार परियोजना पर परिषद द्वारा उठाई गई किसी भी आपत्ति की जानकारी नहीं है.

ग्रेट निकोबार द्वीप पर स्थित गलाथिया राष्ट्रीय उद्यान. (प्रतीकात्मक फोटो साभार: andamantourism.gov.in/VASHALE DEVI)

नई दिल्ली: केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्री जुआल ओराम ने बुधवार को राज्यसभा में कहा कि जनजातीय मामलों के मंत्रालय को ग्रेट निकोबार मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना पर लिटिल और ग्रेट निकोबार की जनजातीय परिषद द्वारा उठाई गई किसी भी आपत्ति की जानकारी नहीं है.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, वह टीएमसी सांसद साकेत गोखले द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब दे रहे थे, जिन्होंने पूछा था कि क्या जनजातीय मामलों का मंत्रालय इस बात की पुष्टि कर सकता है कि ग्रेट निकोबार की जनजातीय परिषद ने जनजातीय रिजर्व और ग्रेट निकोबार के अन्य क्षेत्रों में अपने गांवों को गैर-अधिसूचित करने का लगातार विरोध किया है?

उन्होंने जनजातीय परिषद के 22 नवंबर, 2022 के पत्र पर मंत्रालय की प्रतिक्रिया भी मांगी, जिसमें परिषद द्वारा परियोजना को पहले दिए गए एनओसी (अनापत्ति प्रमाण पत्र) को वापस ले लिया गया था?

ओराम ने कहा कि मंत्रालय को जनता की ओर से किसी भी तरह की आपत्ति के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है.

अखबार के अनुसार, लिटिल और ग्रेट निकोबार की जनजातीय परिषद ने नवंबर 2022 में विवादास्पद ग्रेट निकोबार टाउनशिप और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए भूमि के डायवर्जन के लिए उस वर्ष अगस्त में दिए गए अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) को वापस ले लिया था – जिसमें से लगभग आधी आदिवासी आरक्षित भूमि है. परिषद ने कहा कि उसे सूचित नहीं किया गया था कि जनजातीय रिजर्व से विमुक्त किए जाने वाले क्षेत्र वास्तव में उनके गांव हैं जहां वे 2004 की सुनामी से पहले रहते थे जिसने ग्रेट निकोबार को तबाह कर दिया था.

गोखले ने कहा कि यह मुद्दा शोम्पेन और निकोबारी जनजातियों से संबंधित है, जो 2004 की सुनामी के दौरान विस्थापित हुए थे.

उन्होंने कहा, ‘ये विशेष रूप से कमज़ोर जनजातियां हैं जिनका इस सदन में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है. उन्होंने दुनिया से बहुत कम संपर्क के साथ अलग-थलग जीवन जिया है. मैं अपना प्रश्न प्रस्तुत करना चाहता हूं. वे ग्रेट निकोबार द्वीप के मूल निवासी हैं, उन्हें अस्थायी रूप से बसाया गया था और अब वे उन द्वीपों पर वापस जाने का अनुरोध कर रहे हैं. यह एक लंबे समय से लंबित अनुरोध है. आज भी वे वृक्षारोपण, चारागाह के लिए इन क्षेत्रों पर निर्भर हैं और ये भूमि उनके लिए बहुत पवित्र है.’

ओराम ने दावा किया कि, ‘इस क्षेत्र से एक भी व्यक्ति को विस्थापित नहीं किया जा रहा है. 7.144 वर्ग किलोमीटर आदिवासी आरक्षित भूमि का उपयोग किया जाएगा और अन्य वन भूमि अलग है. इसलिए किसी को भी विस्थापित नहीं किया जा रहा है.’

गोखले ने जनजातीय परिषद की आपत्तियों की एक वीडियो रिपोर्ट की ओर इशारा किया जिसे मानवविज्ञानी विश्वजीत पंड्या ने रिकॉर्ड किया और प्रस्तुत किया, लेकिन ओराम ने इस बात से इनकार किया कि उनके मंत्रालय को ‘उल्लिखित मानवविज्ञानी की कोई वीडियो रिपोर्ट’ प्राप्त हुई है.

राज्यसभा में यह संक्षिप्त चर्चा उस समय हुई जब ओराम ने परियोजना पर एक प्रश्न के लिखित उत्तर में कहा कि चूंकि मामला न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए इस पर कोई टिप्पणी नहीं की जा रही है.

इस पर कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने कहा कि राज्यसभा के सभापति ने पिछली बार कहा था कि सदन को संविधान के अनुच्छेद 121 को छोड़कर हर चीज पर चर्चा करने का अधिकार है, जो सुप्रीम कोर्ट या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के आचरण से संबंधित है.

उन्होंने कहा, ‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया गया है. यह परियोजना पर्यावरणीय और मानवीय आपदा का कारण बन सकती है.’

ओराम ने कहा कि इस प्रश्न को कभी भी स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए था और उन्होंने क्षेत्र के ‘रणनीतिक’ महत्व का उल्लेख किया.

अखबार के अनुसार, ग्रेट निकोबार द्वीप में महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए निर्धारित क्षेत्र की तीन ग्राम पंचायतों में से दो ने विकास क्षेत्र अधिसूचना पर सहमति दे दी है, लेकिन इस बात पर जोर दिया कि बनाई जा रही सुविधाओं और उपयोगिताओं से स्थानीय लोगों को लाभ मिलना चाहिए और उचित मुआवजा प्रदान किया जाना चाहिए.

हालांकि, लिटिल निकोबार और ग्रेट निकोबार की जनजातीय परिषद ने वर्तमान में आदिवासियों के लिए आरक्षित कुछ क्षेत्रों को लेकर आपत्ति जताई है.

ये वे खास गांव हैं जहां मुख्य रूप से शोम्पेन और निकोबारी आबादी रहती है, जिसमें गैलाथिया खाड़ी में चिंगनेह, किरासिस और कुर्चिनोम शामिल हैं; पेम्मया खाड़ी और कोकेन में इन हेंग लोई और पुलो बहा; नानजप्पा खाड़ी के पश्चिमी भाग में बुई-जया और पुलो पक्का.

पत्र में यह भी कहा गया है कि शोम्पेन समूह हैं जो विजयनगर और लक्ष्मीनगर गांवों से सटे जंगलों में चारा ढूंढते हैं और द्वीप के पूर्व पश्चिम और उत्तर दक्षिण सड़कों के साथ विशिष्ट स्थानों का उल्लेख किया गया है.

मालूम हो कि इस परियोजना में ग्रेट निकोबार द्वीप की 16,610 हेक्टेयर भूमि पर एक अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (आईसीटीटी), एक ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, एक टाउनशिप और 450 एमवीए गैस और सौर-आधारित बिजली संयंत्र आदि विकसित करना शामिल है.

इन विकास परियोजनाओं के निर्माण के लिए 130 वर्ग किलोमीटर जंगल को परिवर्तित करना भी शामिल है. यह द्वीप पर रहने वाले स्वदेशी शोम्पेन और निकोबारी समुदायों को भी प्रभावित करेगा.

पारिस्थितिकीविदों, मानवविज्ञानियों, सांसदों और नागरिक समाज संगठनों ने इस परियोजना का विरोध किया है क्योंकि इससे स्थानीय लोगों पर संभावित प्रतिकूल सांस्कृतिक प्रभाव पड़ेगा. दस लाख से अधिक पेड़ों की कटाई, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील तटीय क्षेत्रों के आसपास निर्माण और पर्यटन के लिए आगंतुकों की आमद के कारण संभावित पारिस्थितिक प्रभावों के लिए भी इसकी आलोचना की गई है.