बंगनामा: छत से झूलते पंखे और पंखा-चालक के वे दिन

यह कहना सही नहीं होगा कि छत से झूलता पंखा भारत में अंग्रेज लेकर लाए. उनके आने से पहले भी राज प्रासादों और दरबारों में हस्त चलित पंखे मौजूद थे. लेकिन बंगाल की गर्मी से त्रसित अंग्रेजों ने अठारहवीं सदी में इन्हें अपनाया, सुधारा तथा कई जगहों पर ले गए. बंगनामा की बाइसवीं क़िस्त.

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पुराने तरीके का पंखा और उसे कमरे के बाहर से चलाता पंखा पुलर. (साभार: servantspasts.wordpress.com)

लगभग डेढ़ साल पहले जब मेरी सेवानिवृत्ति के पश्चात हम लोग दिल्ली से वापस कलकत्ता आकर अपने नए फ्लैट में रहने की तैयारी कर रहे थे तब हमारे समक्ष एक दुविधा आ खड़ी हुई. घर के लिए विभिन्न उपकरणों के साथ कुछ सीलिंग फ़ैन भी लेने थे. मुझे अंदेशा न था कि हमारे गर्म देश में पंखों की दुनिया ग्रीष्म के झुलसते आकाश की ही तरह विस्तृत है. जब मैंने पूछताछ आरंभ की कि हमें अपने नए घर के लिए कौन सा सीलिंग पंखा लेना चाहिए तो इस विषय में लोगों ने हमारा ज्ञान विस्तार करने का बीड़ा उठा लिया.

कुछ मित्रों का मानना था कि हमें किसी नामी ब्रांड के स्टैंडर्ड पंखे लेने चाहिए जिनके रखरखाव में बार-बार का झमेला न हो और जो वर्षों तक चलते रहें. कुछ अन्य मित्रों ने हवा दी कि अगर हमने साधारण पंखे लिए तो हमारा फ्लैट न रहने लायक रहेगा, न दिखाने लायक. उनका मत था कि हमारी छत से डिज़ाइनर पंखे झूलने चाहिए, जिनका आकार, रंग, और रूप मनमोहक़ हो ताकि पंखों के साथ-साथ वह झाड़-फ़ानूस की भूमिका भी निभा सकें. अगर उनमें रोशनी की व्यवस्था भी हो तो क्या कहने हैं, पंखों के साथ हमारी छतों पर चार चांद लग जाएंगे. उनकी बातें सुन मेरा दम फूलता देख श्रीमती जी ने मुझे जल्दी से उठाया और हम लोगों ने उन रसिक मित्रों से विदा ली.

हमारे मकान में काम कर रहे ठेकेदार के अनुसार हमें सूचना प्रौद्योगिकी के युग में स्मार्ट पंखे लेने चाहिएं. यह देखने में स्मार्ट और रिमोट द्वारा तो चलाए ही जाते हैं, इन्हें पूर्व-निर्धारित रूप से चलाया या बंद भी किया जा सकता है, तथा ऊर्जा की बचत भी होती है. स्वाभाविक था कि इतने गुणों के साथ लैस यह पंखे सबसे महंगे भी थे. अंत में हमारे बच्चों ने कहा कि हमें रंग-रूप, स्मार्ट-अनस्मार्ट इत्यादि की चिंता न कर सादे, ऊर्जा बचत करने वाले पंखे लेने चाहिए.

पंखों को देखने-समझने के लिए हम बाज़ार के कई चक्कर भी लगा आए और एमेज़ॉन और फ्लिपकार्ट का परिदर्शन भी किया. फिर हमने सीधा-साधा, ऊर्जा बचाने वाला, बिना रिमोट से चलने वाला पंखा ख़रीद लिया. ख़रीदने के पश्चात यह ख़याल आया कि पंखे जैसे एक सामान्य घरेलू यंत्र ने कितनी तरक़्क़ी कर ली है जब कि हम जहां थे वहीं रह गए हैं. लेकिन तब मुझे 32 वर्ष पहले खेजूरी ब्लॉक ऑफिस में दिखे उस छत पंखे की याद आई और मैंने खुद को समझाया कि हम भी काफ़ी आगे बढ़ गए हैं.

1991 में जब मैंने मिदनापुर ज़िले के कॉनटाई सबडिवीज़न के एसडीओ का पदभार ग्रहण किया था तो मुझे पता था कि 13 ब्लॉक और बीस लाख से अधिक जनसंख्या के साथ यह पश्चिम बंगाल का सबसे बड़ा ग्रामीण सब्डिविज़न है. परंतु मुझे न तो यह अंदाज़ था कि इलाक़ा कितना बड़ा है और न ही यह कि ‘ग्रामीण’ का अर्थ सिर्फ़ लहलहाते खेत नहीं होता बल्कि आधारभूत संरचना का अभाव भी होता है.

मैं ऑफिस में न बैठ गांव-देहात में घूमकर सरकारी कार्यों को ख़ुद देखने और लोगों से मिलकर बातें करने में विश्वास करता था. कुछ दिनों में मुझे यह एहसास होने लगा कि शिक्षा, फसल और इतिहास की दृष्टि से समृद्ध यह इलाक़ा पक्के रास्तों, पाइप जलापूर्ति, तथा बिजली की व्यवस्था जैसे मूलभूत मामलों में अभी और तरक्की कर सकता है.

ख़ैर, गांवों, ब्लॉकों, तथा क़स्बों का दौरा करते करते मैं मार्च 1992 की एक सुबह खेजूरी 1 ब्लॉक दफ़्तर पहुंचा. बंगाल की खाड़ी पर स्थित पुरातन खेजूरी ब्लॉक का विभाजन दो भागों में कर दिया गया था— खेजूरी 1 एवं 2. यह ब्लॉक कांथी सबडिवीज़न के 13 में से उन चार ब्लॉकों में से था जहां के लोग उत्सुकता से विद्युत के आने का इंतज़ार कर रहे थे.

खेजूरी 1 ब्लॉक का दफ्तर खेजूरी नामक गांव में स्थित था. ठंड जा चुकी थी और सूर्य का ताप दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा था. बीडीओ ने बैठक का इंतज़ाम अपने आधिकारिक कक्ष में किया था जिसकी ऊंची खिड़कियों से प्रकाश और हवा दोनों ही स्वच्छंद रूप से आ रहे थे. लेकिन 11 बजते-बजते कमरा काफ़ी गर्म हो चला था. मैंने जब सामने मेज पर रखे खजूर के पत्ते से बने हाथ पंखे को उठाया तो बीडीओ ने एक कर्मचारी से कहा, ‘एकटू पांखा पुलर के पांखा टानते बोलो तो’ (जरा पंखा पुलर को पंखा खींचने बोलो तो). बात मेरी समझ में नहीं आई पर मिनट भर बाद हवा चलने का एहसास हुआ. नज़र उठा के देखा तो हमारी मेज़ के ठीक ऊपर पुरानी, ऊंची छत से एक कपड़े का बना विशाल चौकोर पंखा झूल रहा था. इस पंखे का निचला अंश एक रस्सी से जुड़ा था जो हमारे पीछे की दीवार के एक छेद में लुप्त हो जा रही थी. बाहर से कोई इस रस्सी को खींच रहा था जिसकी वजह से यह पंखा पूरे कमरे में हवा का संचार कर हम सबों को राहत दे रहा था. यह देखकर मेरे मन में अनेक वर्षों पूर्व पढ़ी किताब में चित्रित पंखा पुलर की सशक्त आकृति तैर आई.

ईएम फ़ॉस्टर की किताब ‘ए पैसेज टू इंडिया’ में उपन्यास की नायिका ऐडेला क्वेसटेड जब नायक अज़ीज़ के विरुद्ध चल रहे मुक़दमे की सुनवाई में अदालत पहुंची तो उसकी निगाह उस कक्ष के मध्य बैठे पंखा खींचने वाले पर ठहर गई. फ़ॉस्टर के उस ‘लगभग नग्न, सुगठित शरीर’ वाले बलिष्ठ एवं सुंदर व्यक्ति के निरूपण के साथ-साथ, उस परिस्थिति में उसकी दैविक निर्लिप्तता के वर्णन का विभिन्न आलोचकों ने नाना प्रकार से विवेचन किया है. कुछ लोगों ने इसे फ़ॉस्टर का रोमैंटिसिज़्म बताया है तो कुछ को इसमें व्यंग्य्य बाण दिखे हैं, और वहीं कुछ अन्य ने इसे ब्रिटिश भारत की विडंबना का चित्रण भी माना है.

बैठक के बीच में चाय के दौरान मैं पीछे के दरवाज़े से बाहर निकला. देखा कि बीडीओ के कक्ष के पीछे बरामदे पर कमरे की दीवार की ओर मुंह किए दुबला-पतला, पसीने से लथपथ, एक अधेड़ व्यक्ति चरमराती हुई कुर्सी पर बैठा, अपने पैरों को दीवार पर जमाए, पंखे की रस्सी खींच रहा है. इस दृश्य में मुझे कुछ भी रूमानी या दैविक नहीं दिखा. इसमें तीक्ष्ण व्यंग्य ज़रूर था, व्यंग्य जो मसूरी में राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी के द्वार के सामने से गुज़रते या कलकत्ता ग्रांड होटल के समक्ष चौरंगी पर हाथ से खींचे जानेवाले रिक्शे में जुते व्यक्ति में देखकर महसूस होता था.

यह कहना सही नहीं होगा कि छत से झूलता पंखा भारत में अंग्रेज लेकर लाए. उनके आने से पहले भी राज प्रासादों और दरबारों में हस्त चलित पंखे मौजूद थे. लेकिन बंगाल की गर्मी से त्रसित अंग्रेजों ने अठारहवीं सदी में इन्हें अपनाया, सुधारा तथा प्रसारित किया. 1775 तक बंगाल, मद्रास तथा बॉम्बे में यह छत पंखा ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों तथा व्यापारियों के दफ़्तरों तथा निवासों में, कचहरियों और बैरकों में ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था को सुगमता से परिचालित करने का एक छोटा परंतु सार्थक साधन बन गया था.

मोटे कपड़े या खजूर अथवा ताड़ के पेड़ के पत्तों से बने, अक्सर काठ या बांस के चौकोर ढांचे में सजे इन पंखों को रात-दिन चलाने वाले लोग अधिकतर दलित थे, जिनकी पगार तो कम थी ही उनके आराम का अंतराल भी न्यूनतम होता था.

बीसवीं सदी की शुरुआत में विद्युत संचालित पंखों ने धीरे-धीरे हस्त पंखों की जगह ले ली थी. 1960 था 1970 के दशक तक जैसे-जैसे विद्युतिकरण बढ़ा, शहरों से ग़ायब होकर अन्य हस्तचालित यंत्रों के साथ यह छत पंखे और इसके चालक भी ग्रामीण क्षेत्रों में सिमटते चले गए. परंतु 1992 में खेजूरी ब्लॉक के दफ़्तर में छत से टंगे पंखे को खींचता पंखा पुलर शहर और गांव के बीच विकास के विशाल फ़ासले को बलपूर्वक रेखांकित कर रहा था.

(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)

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