विनोद कुमार शुक्ल: बड़बोले, बेसुरे नायकों से आक्रांत समय में अनायकता के गाथाकार

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: विनोद कुमार शुक्ल रूमानी गांव या चमकते महानगर के नहीं, बल्कि मुख्यतः घर-परिवार के, हमारे लगभग नीरस और नीरंग पड़ोस के, छोटे कस्बाई शहर के कवि-कथाकार हैं.

/
विनोद कुमार शुक्ल. (स्क्रीनग्रैब साभार: चार फूल हैं और दुनिया है/अचल मिश्रा)

कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल को ताज़ा पुरस्कार ज्ञानपीठ मिला है- इससे पहले उन्हें कई पुरस्कार, जिनमें अंतरराष्ट्रीय नाबोकोव पुरस्कार और साहित्य अकादेमी पुरस्कार शामिल हैं, मिल चुके हैं. याद आता है कि उन्हें मिला पहला पुरस्कार रज़ा पुरस्कार था, 1983 में मिला था, जिसे न दिए जाने का अनुरोध वे मुझसे एक निजी पत्र में कर चुके थे. रज़ा ने भोपाल में अपनी कलाकृतियों की बिक्री से आई सारी धनराशि मध्य प्रदेश कला परिषद को ललित कला और हिंदी युवा कविता का पुरस्कार स्थापित करने के लिए दी थी.

विनोद जी ने अपना पहला उपन्यास ‘नौकर की कमीज’ मध्य प्रदेश शासन की मुक्तिबोध फ़ेलोशिप के अंतर्गत लिखा था. उनका पहला कविता-संग्रह ‘लगभग जयहिंद’ हमारी ‘पहचान’ सीरीज़ में प्रकाशित हुआ था.

विनोद जी हिंदी में कवि-उपन्यासकारों की एक विरल धारा में आते हैं जिनमें उनसे पहले प्रसाद, अज्ञेय, नरेश मेहता, श्रीकांत वर्मा आदि रहे हैं. वे हिंदी में बीसवीं शताब्दी में शुरू हुई साधारण जीवन और साधारण मनुष्य की प्रतिष्ठा और महिमा की व्यापक प्रवृत्ति के एक अनोखे शिल्पकार रहे हैं.

‘मंगल ग्रह’ को ‘मंगलू’ के पड़ोस में ले आने वाला यह कवि रूमानी गांव या चमकते महानगर का नहीं, बल्कि मुख्यतः घर-परिवार का, हमारे लगभग नीरस और नीरंग पड़ोस का, छोटे कस्बाई शहर का कवि-कथाकार रहा है जिसके यहां निहायत घरेलू और ज्योतित नक्षत्र एक-दूसरे के पड़ोस में रहते आए हैं. उनके यहां जो होता है, वह कभी समाप्त नहीं होता: वह होता रहता है. उनके एक संग्रह का शीर्षक ही है- ‘सब कुछ होना बचा रहेगा’. कई बार लगता है कि सब कुछ अपने आप नहीं बचता- विनोद जी की कविता सब कुछ को बचाने का एक ईमानदार उद्यम है.

विनोद जी एक अदम्य अर्थ में हमारे इस बेहद बड़बोले, बेसुरे नायकों से आक्रांत समय में अनायकता के गाथाकार और गायक हैं- मंद लय में, बहुत कमबोले. वे कस्बाई ज़िंदगी के रोज़मर्रापन में रसी-बसी अपनी कविता और कथा दोनों में केंद्र में रखते हैं अनायक-साधारण को, जो भले ‘एक दूसरे को नहीं जानते’ पर ‘साथ चलने को जानते’ हैं.

विनोद जी एक विचित्र अर्थ में निरे समकालीन को ही अपना उपजीव्य बनाते हैं- ऐसे समकालीन को जिसमें न मिथकीय अनुगूंजें हैं, न इतिहास की कोई सजीव स्मृति. शायद उन्हें आधुनिक के बजाय, इस संदर्भ में, उत्तर-आधुनिक कहना अधिक उपयुक्त है.

‘अपने मूल निवास का यही तिलिस्म है’ यह पहचान सकने वाले विनोद जी विपुलता के बजाय थोड़ेपन के आग्रही हैं: ‘थोड़े से में रहकर/थोड़े से को देखकर/थोड़े से लोगों से मिलकर/थोड़े समय में पूरा समय/मेरा सब पड़ोस में रखा मिला जाएगा.’

हमारे समय में भीड़ को लगातार जनता का समतुल्य बनाया जा रहा है. उसके बरक़्स विनोद जी कहते हैं:

‘भीड़ से जनता घटा दो/तो जनता अकेली एक बचती./मैं जनता से जाकर मिलता तो/गिनती में दो होता/सड़क पर दोनों के दो के जुलूस में मिलते/लोगों के सुख-दुख की बात करते/भीड़ के हल्ले में/कभी ज़ोर से नारों में बात करते.’ वे यहीं नहीं रुकते.

अन्यत्र वे कहते हैं: ‘मैं अकेला नहीं/मुझमें लोगों की भीड़ इकट्ठी है/मुझे ढूंढ़ो मत/मैं सब लोग हो चुका हूं/मैं सबके मिल जाने के बाद/आख़िरी में मिलूंगा या नहीं मिलूंगा/मेरे बदले किसी और से मिल लेना.’

छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के संकट का उन्हें मान है. वे कहते हैं: ‘एक आदिवासी/कहीं भी आदिवासी नहीं/चलते-चलते/राह के एक पेड़ के नीचे खड़ा हुआ नहीं/दूर चलते-चलते/दूसरे पेड़ के नीचे, थककर भी बैठा नहीं,/जंगल से बाहर हुआ आदिवासी/एक पेड़ के लिए भी आदिवासी नहीं.’

अपने बुढ़ापे की छबि वे इस तरह उकेरते हैं: ‘चलने फिरने में इनते धीमे हो गए/कि छोटा घर बड़ा लगता/हम आसपास होते/एक-दूसरे को वहीं ढूंढ़ते और वहीं मिल जाते’.

विनोद जी पर लगभग आधी सदी पहले लिखे गए निबंध में, जो कि संयोगवश उन पर हिंदी में लिखा गया पहला आलोचना-निबंध भी है, मैंने उनकी कविता के मुहल्लेपन, रोज़मर्रा की ज़िंदगी की काव्यात्मक और रूपाकात्मक संभावना और अपस्फीति को लक्ष्य किया था. उसके बाद के चार से अधिक दशकों में फैली उनकी कविता में ये सभी तत्त्व मौजूद और सक्रिय हैं- उनमें विस्तार और परिष्कार आया है. उनके मुहल्ले में अब छत्तीसगढ़ और सकल ब्रह्माण्ड आ गए हैं.

बचाना एक तरह से विनोद जी की केंद्रीय चिंता और क्रिया है: वे आश्वस्त तो हैं कि ‘सब कुछ होना बचा रहेगा’ पर बचाने में वे अपनी कोशिश से इनकार या अपसरण नहीं करते. उनकी एक कविता का शीर्षक ही है: ‘मुझे बचाना है.’ हमारे बेहद कठिन और क्रूर हो गए समय में कविता यही कर सकती है कि वह सच को, सचाई को, मनुष्यता की शायद कम होती गरमाहट और दीप्ति को बचाये या कम से कम भाषा में उसकी ईमानदार और साहसिक कोशिश करे.

विनोद जी कहते हैं, ‘मुझे बचाना है/एक एक कर/अपनी प्यारी दुनिया को/बुरे लोगों की नज़र है/इसे ख़त्म कर देने को.’

आसक्ति और निस्संगता दो परस्पर विरोधी भाव हैं जीवन में, पर कविता में उनका एक साथ होना संभव है: विनोद जी की कविता में यह हुआ है. वे अक्सर निरलंकार और वाग्वैभव से विहीन भाषा में लिखते हैं जो एक तरह से निस्संग लगती है लेकिन उसका विन्यास संसार से गहरी आसक्ति का इज़हार है. कवि छोटी-तुच्छ-अलक्षित चीज़ों और छवियों से एक ऐसा संसार रचता है जो अपने सत्व में कोमल और वेध्य है.

वे संसार के टेढ़ेपन और उसकी विडंबनाओं को बखूबी जानते-पहचानते हैं और वे सब उनकी संवेदना के व्यापक भूगोल में जगह रखते हैं पर वही संवेदना इस जाल-झंखाड़ में कुछ बचाने लायक खोज लेती है. कई चीज़ें इस भूगोल में आकर जैसे बच जाती हैं: कविता का काम बचाना हो जाता है. चीज़ें ही नहीं, अनेक साधारण घटनाएं जैसे ‘घर का बन्द दरवाज़ा खटखटाता है तो मैं सुन लेता हूं’  और कविता के अंत में यह प्रतीति होती है कि ‘यह भी सच है कि/अपना दरवाज़ा खोलने पर (कविता इसी सजगता में आती है) ‘और पता बताने पर/वह मेरा ही पता होता है.’

यह प्रभाव पड़ना लाज़िमी है कि यह एक ऐसा कवि है जिसकी आकांक्षा सब कुछ को अपने घर में लाने और बचाने की है. यह घर घर भी है और कविता भी. दोनों का वितान इतना फैला है कि उसमें सब कुछ समा सकता है: सब कुछ अलग-अलग अपनी निजी इयत्ता में और सामूहिक रूप से बना और बचा रह सकता है. उनकी कुछ कविताओं के शीर्षक हैं: ‘यह मेरा पैतृक घर है’, ‘पहले हम एक ही घर में रहते थे’, ‘मेरा पता शुरू से नहीं बदला’, ‘चाहता हूं पड़ोस में पूरा घर रहने लगे’, ‘गेंद का घर, मेरा घर’.

हम सभी किसी न किसी रूप में अपना घर गंवा चुके लोग हैं. विनोद कुमार शुक्ल की कविता घर-वापसी की कविता है: वह हमें फिर घर ले जाती है. लाखों को उत्साह से बेघरबार करनेवाले क्रूर कुसमय में कविता यह कर पाती है तो वह हमें अपने अधूरे जीवन को भरपूर जीने का उत्साह और अपने घर लौटने का न्योता देकर हमें अपनी मनुष्यता को सत्यापित करने का अवसर देती है.

विनोद कुमार शुक्ल एक आदमी हैं जो कविता में रहते हैं और वहां उनसे, उनकी पूरी आदमियत में, हम अपनी पूरी आदमियत के साथ, सहज मिल सकते हैं. सिर्फ़ कविता का दरवाज़ा खटखटाने भर की देर है.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)