बात 2001 के शुरुआती दिनों की है. कलकत्ता के लगभग सभी समाचार पत्रों के मुख्यपृष्ठ पर संक्षिप्त खबर के साथ एक फ़ोटो छपी थी जो कुछ दिनों तक चर्चा का विषय बनी रही. तस्वीर में ग्रामीण संध्या के अर्ध अंधकार में संकरे, कच्चे रास्ते पर एक वैन रिक्शा के पीछे बैठे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री को कहीं जाते हुए दिखाया गया था. छवि के नीचे बताया गया था कि कुछ ही दिनों पूर्व बने मुख्यमंत्री दक्षिण 24 परगना के ज़िला मजिस्ट्रेट के साथ वैन रिक्शा पर बैठ ज़िले के उस दूरवर्ती गांव में आक्रांत परिवारों से मिलने जा रहे हैं जहां पिछली रात एक बड़ी डकैती घटी थी.
उस समय ज़्यादातर लोगों की इस तस्वीर को देखकर प्रतिक्रिया थी: ‘दैखो तो, सीएम निजे भैन रिक्शा ते चेपे डाकाती आक्रांत लोक देर शोंगे दैखा कोरते गिएचेन (देखो ज़रा, मुख्यमंत्री खुद वैन रिक्शा पर बैठ कर डकैती के शिकार लोगों से मिलने जा रहे हैं). परंतु इस फ़ोटो को देखते ही मेरे मन में बात आई कि चलो इसी बहाने वैन रिक्शा को कुछ तो पहचान मिली, क्योंकि व्यापक रूप से व्यवहार किए जाने वाले इस वाहन के लिए मेरे मन में बहुत श्रद्धा थी.
मैंने पहली बार वैन रिक्शा, या रिक्शा वैन ज़िला प्रशिक्षण के समय 1990-91 में उत्तर 24 परगना में देखा था, परंतु कलकत्ता के समीप होने के कारण और विभिन्न तरह के मोटर वाहनों की बहुतायत की वजह से वहां इनका चलन सीमित था. 1992 में मिदनापुर ज़िले के कॉनटाई, यानी कांथी, सबडिवीज़न के सबडिवीज़नल ऑफिसर (एसडीओ) का पद ग्रहण करने के बाद वैन रिक्शा से मेरा परिचय गहरा होता गया.
ज़िला प्रशिक्षण के दौरान ब्लॉक में काम करते हुए कीचड़ रूपी रास्ते पर राशायी होकर मैं पक्के रास्ते की अहमियत समझ चुका था. वैन रिक्शा को देखकर मुझे जान पड़ा कि बदलते हुए परिवेश में पक्के रास्तों के अभाव में भी किस तरह पश्चिम बंगाल के ग्रामांचल के वासियों ने उपयुक्त परिवहन की व्यवस्था करने में सफलता पाई.
जिन पाठकों ने वैन रिक्शा नहीं देखा है, उन्हें बता दूं कि यह एक बहुत ही सरल वाहन है. बस, समझिए कि सवारी वहन करने वाला मनुष्य चालित तिपहिया रिक्शा है जिसकी गद्देदार सीट हटाकर उसके ढांचे पर लकड़ी का क़रीब साढ़े चार फुट लंबा और साढ़े तीन फुट चौड़ा चौकोर पटरा बिठा दिया गया है. आपने देश के कई शहरों में इसे छोटी दूरियों के बीच माल ढोने का काम करते देखा होगा. लेकिन तैंतीस वर्ष पहले पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाक़ों में मैंने वैन रिक्शा को एक बहुउद्देशीय वाहन की भूमिका में पाया.
अक्सर दौरा करते वक्त गांव-देहात की कच्चे, पतले पथों पर मैंने वैन रिक्शे पर कभी क़रीब आधा टन ईंट लदा पाया, तो कभी वैन रिक्शे को पीछे पटरी पर लेटे हुए मरीज़ को अस्पताल ले जाते देखा, कभी इस पर किसी मछली व्यवसायी को विशाल अलुमिनियम के तसलों में मछली के बच्चे ले जाते देखा तो कभी पांच-छह सवारियों को कड़ी धूप में सिर के ऊपर छाता ताने गप्प लड़ाते देखा.
मैंने पाया कि ऋतुओं के अनुसार वैन रिक्शे की सवारी भी बदलती रहती है. बरसात की शुरुआत में वैन रिक्शे द्वारा पहले कृषि उपकरण, फिर बोआई का बीहन और खाद खेतों में पहुंचाये जाते हैं तो ढाई तीन महीने बाद, कटनी के समय इन पर पहले धान के बोरे और फिर पुआल के गट्ठे खेतों से घरों और खलिहानों में पहुंचाए जाते हैं.
शरदोत्सव के आने पर बाज़ार से वैन रिक्शा पर पंडाल के लिए बल्ले और तिरपाल लादकर और कुम्हारों के घर से मां दुर्गा की प्रतिमा को बिठा कर पंडाल में ले जाया जाता है. शीत काल में कृषि कार्य के लिए यह वाहन बीज, बीहन और खाद के साथ डीज़ल पम्प सेट भी ढोता है, तो जात्रा टोलियों के शामियाने, जेनरेटर सेट, कुर्सियां और जनप्रिय जात्राओं के तारकाओं को भी कटे खेतों के बीचों-बीच बने मंचन स्थल तक पहुंचाता है.
फसल कटने के बाद और शीत काल के आरंभ से ही गांवों में निर्माण का भी काम शुरू हो जाता है जो ग्रीष्म काल तक चलता रहता है. इस दौरान पूर्व उल्लेखित सामानों के अलावा वैन रिक्शों पर लदी मिलती है ईंट, रेत, लोहे की छड़ें, सीमेंट, छत के लिए बांस और लोहे की पतली चादरें— यानी निर्माण हेतु हर प्रकार की वस्तु.
ज़ाहिर है कि 1990 के दशक में ग्रामीण बंगाल में वैन रिक्शा जन वाहन के रूप में उभर चुका था और बड़ी तादाद में काम में लाया जा रहा था. इसकी बढ़ती लोकप्रियता का कारण जानने के लिए हमें इसके पहले के दशकों में कृषि क्षेत्र में हो रहे कुछ मौलिक परिवर्तनों पर नज़र दौड़ानी होगी.
1970 के प्रथम कुछ वर्षों में इस राज्य में औसत भूमि जोत लगभग तीन एकड़ था जो कि राष्ट्रीय औसत का लगभग आधा था. बढ़ती जनसंख्या के साथ-साथ पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सरकार द्वारा परिचालित ‘ऑपरेशन बरगा’ द्वारा बटाईदारों को जोत का अधिकार तथा उनमें तथा छोटे किसानों में निहित भूमि का व्यापक वितरण भी औसत जोत के संकुचित हो जाने के कारण थे. 1990 के दशक के आने तक यह औसत घटकर क़रीब डेढ़ एकड़ रह गया था तथा पश्चिम बंगाल के 90% कृषक सीमांत किसान की श्रेणी में गिने जा रहे थे.
हरित क्रांति के बाद 1970 और 1980 के दशकों में समूचे देश में कृषि का मशीनीकरण हो रहा था तथा ट्रैक्टर इस बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण नायक था. पश्चिम बंगाल में छोटे जोत के कारण ट्रैक्टर की उपयोगिता आर्थिक रूप से छोटे कृषकों के लिए साध्य तो न हो पायी, लेकिन 1970 के आरंभ से ही पावर टिलर इस राज्य के ग्रामांचल में दिखने लगे थे. पावर टिलर का दाम तथा इसके परिचालन की लागत तुलनात्मक रूप से ट्रैक्टर से कहीं कम थी, छोटे-छोटे धान के खेतों में उसे चलाना सहज था और सरकार ने भी कई प्रकल्पों में सहायकी देकर छोटे कृषकों के बीच इसे बढ़ावा दिया. 1990 के दशक के आने तक पश्चिम बंगाल पावर टिलर का सबसे बड़ा बाज़ार बन चुका था.
1980 के दशक के मध्य तक बैलगाड़ी ही देहात में परिवहन का, विशेषतः माल वाहन का, मुख्य साधन था, परंतु इसी दशक में राष्ट्रीय और राज्य प्रकल्पों के अंतर्गत पश्चिम बंगाल में ग्रामीण रास्तों का भी सबसे अधिक विकास हुआ. गांवों को जोड़ने के लिए नए रास्ते बने और मौजूदा रास्तों को मज़बूत बनाया गया. पावर टिलर के वृहत आगमन, सड़कों के विस्तार और कृषि कार्यों में बैलों की बढ़ती निरर्थकता के इस परिवेश में धीरे-धीरे वैन रिक्शा ग्रामीण बंगाल का भरोसेमंद वाहन बन गया.
वैन रिक्शा की सफलता के तीन बड़े कारण थे, पहला, इसका दाम. 1992 में नए वैन रिक्शा का दाम मात्र रु 800/- से रु 1000/- तक था. चूंकि यह एक बहु-उपयोगी वाहन था जिस पर आलू की बोरियों से लेकर नव-विवाहित दंपत्ति तक सफ़र करते थे, सवारी ढोने वाले रिक्शों की तरह इसमें साज-सज्जा, चमक-दमक, रिबन और आइनों की न तो आवश्यकता थी और न ही इन सब का खर्च. इस वाहन के कम दाम के कारण इसे ख़रीदने और चलाने वालों की संख्या में सबसे अधिक, 90% से ज़्यादा, भूमिहीन मज़दूर थे जिन्हें अन्यथा पूरे वर्ष में छह-सात महीनों से अधिक काम नहीं मिलता था. वैन रिक्शा चलाना शुरू करने के बाद वे ही मज़दूर अब साल भर प्रति दिन औसतन रु 25/- से रु 40/- कमा लेते थे, जो उस समय के न्यूनतम मज़दूरी के बराबर था.
दूसरा कारण इसकी डिज़ाइन की सरलता थी, जिसके कारण आरंभिक हज़ार रुपये के निवेश के पश्चात रख-रखाव का खर्च न के बराबर था. न तो वैन रिक्शा को चारा खिलाने की आवश्यकता थी और न ही इसके उपचार की चिंता. बैलों और बैलगाड़ियों की तुलना में इसे रखने के लिए बहुत छोटी जगह की ज़रूरत थी.
वैन रिक्शा की कामयाबी का तीसरा कारण था कि उपरोक्त लाभों के बावजूद वैन रिक्शा बैलगाड़ियों की तरह ही खेत, खलिहान, सड़क और पगडंडी कहीं भी जा सकता था. इसीलिए तो पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ने भी मोटर गाड़ी को छोड़कर पतली सड़क पर वैन रिक्शा का सहारा लिया. संभवतः उन्हें पता था:
रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहां काम आवे सुई, कहा करे तलवारि।
(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)
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