हार्वर्ड बनाम ट्रंप: प्रशासन के अरबों डॉलर की फंडिंग रोकने के ख़िलाफ़ कोर्ट पहुंचा विश्वविद्यालय

ट्रंप प्रशासन द्वारा 2.2 अरब डॉलर की फंडिंग फ्रीज़ के ख़िलाफ़ हार्वर्ड कोर्ट पहुंचा है. बोस्टन की संघीय अदालत में दायर याचिका में विश्वविद्यालय ने कहा कि सरकार यह नहीं बता पाई कि एंटीसेमिटिज़्म की चिंताओं का उन वैज्ञानिक शोध परियोजनाओं से क्या संबंध है, जिनका अनुदान रोका गया है.

/
हार्वर्ड विश्वविद्यालय (फोटो: एक्स/@Harvard)

नई दिल्ली: हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने सोमवार को घोषणा की कि उसने संघीय सरकार द्वारा 2.2 अरब डॉलर से अधिक के अनुसंधान अनुदान (रिसर्च ग्रांट्स) पर लगाई गई रोक को चुनौती देने के लिए अदालत में याचिका दायर की है.

ट्रंप प्रशासन का यह कदम विश्वविद्यालय द्वारा उन मांगों को ठुकराने के बाद उठाया गया था, जिनमें कैंपस में छात्र आंदोलनों पर नियंत्रण की बात कही गई थी.

ज्ञात हो कि इस महीने की शुरुआत में ट्रंप प्रशासन ने हार्वर्ड को एक पत्र लिखकर विश्वविद्यालय में नेतृत्व और प्रशासन से जुड़े व्यापक बदलावों की मांग की थी. इसमें प्रवेश नीतियों में संशोधन, कैंपस में विविधता से जुड़े नजरिए की समीक्षा, और कुछ छात्र संगठनों की मान्यता समाप्त करने की बात शामिल थी.

हार्वर्ड के अध्यक्ष एलन गार्बर ने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय सरकार की इन शर्तों के आगे नहीं झुकेगा. इसके कुछ ही घंटे बाद सरकार ने अरबों डॉलर की संघीय फंडिंग को फ्रीज़ कर दिया.

बोस्टन की संघीय अदालत में दायर याचिका में विश्वविद्यालय ने कहा, ‘सरकार यह नहीं बता पाई है, और न ही बता सकती है, कि यहूदी-विरोधी (एंटीसेमिटिज़्म) को लेकर जताई गई चिंताओं का उन मेडिकल, वैज्ञानिक, तकनीकी और अन्य शोध परियोजनाओं से क्या तार्किक संबंध है, जिन्हें रोक दिया गया है. ये परियोजनाएं अमेरिकी जीवन, सुरक्षा और नवाचार से जुड़ी हैं.’

याचिका में आगे कहा गया है, ‘सरकार यह भी स्वीकार नहीं कर रही कि इस फंडिंग को अनिश्चितकाल तक रोकने से हार्वर्ड के शोध कार्यक्रमों, उनसे लाभ पाने वाले लोगों और अमेरिका के नवाचार को गंभीर नुकसान होगा.’

11 अप्रैल को भेजे गए पत्र में प्रशासन ने हार्वर्ड से यह भी कहा कि वह प्रदर्शनकारियों पर सख्त अनुशासन लागू करे और अंतरराष्ट्रीय छात्रों की जांच करे ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे ‘अमेरिकी मूल्यों के प्रति शत्रुतापूर्ण’ न हों.

सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि विश्वविद्यालय अपने फैकल्टी और छात्रों का ऑडिट करे ताकि सभी विभागों में वैचारिक विविधता सुनिश्चित की जा सके. इसके लिए जरूरत पड़ने पर नए छात्रों को दाखिला देने और नए फैकल्टी सदस्यों की नियुक्ति की बात भी कही गई.

पिछले सोमवार को हार्वर्ड ने इन मांगों को खारिज करते हुए अमेरिका के संविधान के पहले संशोधन का हवाला दिया. अगले दिन ट्रंप ने अपने ‘ट्रुथ सोशल’ प्लेटफॉर्म पर लिखा, ‘क्या हार्वर्ड का टैक्स-फ्री दर्जा खत्म कर देना चाहिए अगर वह राजनीतिक, वैचारिक और आतंक-समर्थक ‘बीमारी’ को बढ़ावा देता है?’

इसके साथ ही ट्रंप प्रशासन ने विश्वविद्यालय को अंतरराष्ट्रीय छात्रों को दाखिला देने से रोकने की भी धमकी दी.

हार्वर्ड ने सरकार की इन शर्तों को केवल एक विश्वविद्यालय पर हमला नहीं, बल्कि अमेरिकी विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर सीधा खतरा बताया है, जिसे लंबे समय से सुप्रीम कोर्ट का संरक्षण प्राप्त है.

ट्रंप प्रशासन के जिस प्रयास के तहत वह अमेरिकी विश्वविद्यालयों में वैचारिक बदलाव लाना चाहता है, उसमें हार्वर्ड पहला बड़ा अवरोध बनकर सामने आया है. रिपब्लिकन नेताओं का कहना है कि विश्वविद्यालय अब उदारवादी सोच और यहूदी-विरोधी विचारधारा के केंद्र बनते जा रहे हैं.

उल्लेखनीय है कि हार्वर्ड उन कई आइवी लीग शैक्षणिक परिसरों में से एक है, जिन्हें ट्रंप प्रशासन द्वारा दबाव बनाने के अभियान में निशाना बनाया गया है. इससे पहले प्रशासन उसके एजेंडा का अमला न करने पर यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया, ब्राउन और प्रिंसटन यूनिवर्सिटी की फेडरल निधि को भी रोक चुका है.

एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, यह टकराव संघीय सरकार और उन विश्वविद्यालयों के बीच दशकों पुराने संबंधों को ख़राब कर रहा है, जो सरकारी फंडिंग के सहारे वैज्ञानिक नवाचार को आगे बढ़ाते रहे हैं. जो फंडिंग अब तक जनहित के शोध का आधार मानी जाती थी, वही अब ट्रंप प्रशासन के लिए दबाव का हथियार बन गई है.

हार्वर्ड अध्यक्ष गार्बर ने सोमवार को विश्वविद्यालय समुदाय को संबोधित करते हुए लिखा, ‘आज हम उन मूल्यों के साथ खड़े हैं जिन्होंने अमेरिकी उच्च शिक्षा को दुनिया के लिए एक मिसाल बनाया है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘हम मानते हैं कि देश भर के विश्वविद्यालय अपने कानूनी दायित्वों का पालन करते हुए, बिना सरकारी दखल के समाज में अपनी भूमिका निभा सकते हैं. यही रास्ता है जिससे हम शैक्षणिक उत्कृष्टता, विचारों की स्वतंत्रता और अग्रणी शोध को कायम रखते हैं, और अपने देश को एक बेहतर भविष्य की ओर ले जाते हैं.’