पिछले कुछ दिनों में भारत के विश्वविद्यालयों से जुड़ी कई ख़बरें सामने आई हैं. चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ में एक शिक्षिका को आजीवन परीक्षा संबंधी कार्यों से अयोग्य घोषित कर दिया. दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई कॉलेज की प्राचार्य ने कक्षा की दीवारों को गोबर से लीपा और यह तर्क दिया कि गर्मी से बचने का यह देशी तरीक़ा है.
इसी प्रकार आंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में विद्यार्थियों को निलंबित किया गया क्योंकि उन्होंने अपने कुलपति के भाषण की आलोचना की थी, जिसमें ‘राम मंदिर निर्माण’ को सही ठहराया गया था. इन विद्यार्थियों का साथ दे रहे अध्यापक कौस्तुभ बनर्जी को कारण बताओ नोटिस दिया गया.
ताज़ा मामला यह है कि दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर और जाने-माने बौद्धिक अपूर्वानंद को अमेरिका के न्यूयार्क शहर में एक संस्था में जाकर व्याख्यान देने तथा अन्य अकादमिक गतिविधियों के लिए छुट्टी नहीं दी गई. यह भी मालूम पड़ा कि प्रोफेसर अपूर्वानंद से दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलसचिव ने कहा कि वे अमेरिका जाकर क्या बोलेंगे उस का एक लिखित पाठ विश्वविद्यालय को उपलब्ध कराएं.
इतना ही नहीं, प्रोफेसर अपूर्वानंद को यह भी कहा गया कि उन्हें अमेरिका जाने के लिए छुट्टी दी जाए या नहीं इस बारे में विश्वविद्यालय को शिक्षा मंत्रालय से संपर्क करना होगा.
ऊपर उल्लिखित घटनाओं को समझने की कोशिश करें, तो कुछ बातें स्पष्ट होती हैं. चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय की शिक्षिका पर परीक्षा के कार्यों से इसलिए रोक लगा दी क्योंकि उन्होंने एक प्रश्न के विकल्प में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उल्लेख किया था, जो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् को नागवार गुजरा. उसने विवाद खड़ा किया जिसके कारण उक्त शिक्षिका को यह सजा दी गई. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् भारतीय जनता पार्टी द्वारा समर्थित संगठन है.
पिछले दस वर्षों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् ने अपनी इस ताक़त का उपयोग कर विश्वविद्यालयों के काम-काज में अत्यंत गहरे जाकर दखलंदाजी की है. इससे साफ़ है कि भारत के विश्वविद्यालयों में शिक्षक-शिक्षिका की अकादमिक जिम्मेदारी का निर्वहन भी दूसरों पर निर्भर हो गया है. इससे यह भी साफ़ है कि केंद्रीय सरकार तो अपने निर्देशों (जो अक्सर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली द्वारा दिए जाते हैं) से विश्वविद्यालयों के रोजमर्रा के जीवन को अस्त-व्यस्त करती ही रहती है, लेकिन उससे जुड़े संगठन भी ऐसा आसानी से करते हैं.
दूसरी घटना, जो गोबर लीपने से जुड़ी है, उसके बारे में आसानी से समझा जा सकता है कि उन प्राचार्य ने ऐसा क्यों किया?
वर्तमान केंद्रीय सरकार भारत के अतीत की एक कल्पित लेकिन आधारहीन छवि लोगों के मन में बैठाना चाहती है. इस छवि में होता यह है कि भारत पहले यानी प्राचीन काल में बहुत महान था और उसने वह सब कुछ हासिल कर लिया था जो आज के वैज्ञानिक अथक परिश्रम तथा शोध से कर रहे हैं. भारत अतीत में महान था और बाद में इसलिए पिछड़ गया क्योंकि इस देश में मुसलमानों का (दिल्ली सल्तनत और मुग़ल काल) एवं अंग्रेजों का शासन आ गया.
इस प्रक्रिया से समझा जा सकता है कि भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठन एक मिथ्या गौरवबोध तथा उसके आधार पर भारत के मुसलमानों तथा ईसाइयों के प्रति नफ़रत का भाव हिंदुओं के मन में भरना चाहते हैं. इसके लिए वे भारत के अतीत की कल्पित लेकिन आधारहीन छवि का सहारा लेते हैं. दो साल पहले ‘इसरो’ के अध्यक्ष ने कहा था कि वैज्ञानिक खोजें वेदों में थीं जो बाद में अरब के रास्ते यूरोप तक पहुंचीं. इससे स्पष्ट है कि भारत के उच्च संस्थानों के प्रमुख अब अकादमिक श्रेष्ठता के उन्नायक नहीं बल्कि सरकार के प्रति वफ़ादार हैं. वे किसी बड़ी कंपनी के मैनेजर की तरह कार्य करते हैं.
आंबेडकर विश्वविद्यालय की घटना यह बतलाती है कि अब विश्वविद्यालय में स्वतंत्र होकर सोचना संभव नहीं है. आदर्श स्थिति तो यह होती कि जिन विद्यार्थियों ने कुलपति के भाषण से अपनी असहमति व्यक्त की थी उसी विषय पर कुलपति ख़ुद आगे बढ़ कर उनसे खुला संवाद करते जो एक उदाहरण बनता. या यह किया जा सकता था कि विश्वविद्यालय में इस विवाद के बाद ‘राम मंदिर निर्माण’ पर खुली चर्चा होती, जिसमें कुलपति से लेकर विद्यार्थी सभी शामिल होते.
विश्वविद्यालय तर्क और संवाद की जगह है लेकिन ज़ाहिर है कि आज के समय में ऐसी बातें सोचना भी निरे भोलापन के अलावा कुछ नहीं. भारत के विश्वविद्यालयों का प्रशासन तर्क और संवाद को परे हटाकर दमन की कार्रवाई करता है जिसका परिणाम थोड़ी-सी भी स्वतंत्र सोचने की शक्ति रखने वाले कौस्तुभ बनर्जी जैसे अध्यापकों को झेलना पड़ता है और पड़ रहा है .
प्रोफेसर अपूर्वानंद को छुट्टी नहीं दी गई उसके पीछे के कारणों को समझा जा सकता है. पहली बात तो यही कि कुलपति या कुलसचिव जैसे पदों पर चयनित व्यक्ति स्वत: ही सरकार के प्रति वफ़ादारी प्रदर्शित करने के लिए ऐसी कार्यवाही कर सकते हैं क्योंकि उन्हें यह अच्छी तरह से मालूम है कि प्रोफेसर अपूर्वानंद वर्तमान सरकार के मुखर और निर्भीक आलोचक हैं.
दूसरी बात यह कि प्रोफेसर अपूर्वानंद से दिए जाने वाले व्याख्यान का पाठ मांगने के पीछे एक डर भी है. ऐसा इसलिए क्योंकि दुनिया भर में यह देखा गया है कि तानाशाही की सरकारों को अपनी छवि की बहुत चिंता रहती है.
भारतीय जनता पार्टी की वर्तमान केंद्रीय सरकार ने देश में अपने ‘आई-टी सेल’ के जरिये अपनी छवि को धवल बनाने में कामयाबी लगभग हासिल कर ली है. उसके समर्थकों के पास रोज इस छवि को और चमकदार बनाने के लिए वीडियो और संदेश भेजे जाते हैं. पर विदेश में ऐसा नियंत्रण और ‘सेंसरशिप’ कर पाना उसके लिए थोड़ा दुष्कर है. इसलिए अपने आलोचकों को विदेश जाकर कुछ बोलने से रोकना उसकी रणनीति का एक हिस्सा हो सकता है .
इस संक्षिप्त विवेचन से समझा जा सकता है कि भारत के विश्वविद्यालयों पर अभी क्या गुजर रही है. वहां सांस्थानिक स्वायत्तता और अकादमिक स्वतंत्रता का अब कोई मोल नहीं है. वहां किसी भी विषय पर इत्मीनान के साथ आलोचनात्मक नजरिये से विचार कर पाना संभव नहीं है. उदाहरण के लिए आज भारत के किसी भी विश्वविद्यालय में यह संभव नहीं जान पड़ता कि वहां ‘नक्सलवाद’ या फिर ‘राम कथा की विविधता’ पर उच्च स्तरीय अकादमिक चर्चा हो.
पाठ्यक्रमों में अजीब तरह के परिवर्तन किए जा रहे हैं जिनका कोई अकादमिक तर्क नहीं है. उदाहरण के लिए स्नातक स्तर पर ‘वैल्यू एडेड कोर्स’, ‘स्किल इन्हांसमेंट कोर्स’ और ‘ऐबिलिटी इन्हांसमेंट कोर्स’ आदि ‘कोर्स’ डाले गए हैं जिनके कारण विद्यार्थी अपना मूल विषय ही ठीक तरीक़े से पढ़ नहीं पा रहे. अध्यापकों के लिए होने वाले उन्मुखीकरण और पुनश्चर्या पाठ्यक्रमों में ‘इंडियन नॉलेज सिस्टम’ विषय के नाम पर अखंड ‘भारत-विलाप’ किया जाता है. इन स्पष्ट है कि वर्तमान समय भारत के विश्वविद्यालयों के लिए ‘मृत्यु-काल’ है जिस पर केवल क्रोधपूर्ण विलाप किया जा सकता है .
(लेखक दक्षिण बिहार के केंद्रीय विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक (हिंदी) के पद पर कार्यरत हैं.)
