नृत्य कलाकार और दर्शक दोनों की कल्पना से आकार पाता है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: नृत्य हमारे सामने की जगह पर नहीं अन्यत्र होता है- नृत्य का यह अनिवार्य अन्यत्र है. नृत्य हमें दूसरे काल में भी ले जाता है- वह काल हमारे एकरैखिक दिए हुए काल से अलग और दूर होता है.

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(प्रतीकात्मक फोटो साभार: पिक्साबे/Dshah)

हाल ही में नृत्यवृक्ष नाम के संस्थान ने मुझे जब शास्त्रीय नृत्य पर बोलने के लिए आमंत्रित किया तो मैंने विषय चुना ‘डांसिंग अवे’ यानी ‘नृत्य का अन्यत्र’. मुझे याद आई सागर में अपने मुहल्ले के तिगड्डे पर हुई रामलीला जिसमें एक दृश्य में राम-लक्ष्मण एक चक्कर लगाते हैं और किष्किन्धा पर्वत पहुंच जाते हैं. उसी समय सहगायक ने चौपाई गायी ‘किष्किन्धा पर्वत नियराया’. शास्त्रीय नर्तक या नर्तकी नाचते तो यहां और अभी हैं पर हमें पहुंचा देते हैं वहां और तब. पर इस पर कुछ और विचार थोड़ा बाद में. अभी तो वे जादुई क्षण याद करना है जो पिछले लगभग साठ वर्षों में मैंने निजी तौर पर शास्त्रीय नृत्य देखते हुए महसूस किए. उसमें कुछ ही.

मैं दिल्ली में छात्र था और पता चला कि आइफ़ैक्स हाल में बाल सरस्वती का नृत्य है. बड़ी भीड़ थी. बाल सरस्वती जब मंच पर आईं तो ख़ासी मोटी लग रही थीं और उन्होंने एक साधारण साड़ी पहन रखी थी. थोड़ी देर बाद जब उन्होंने ‘कृष्णानी बेगानी बारो’ प्रस्तुत करना शुरू किया तो वे इतनी सहजता से यशोदा और बालकृष्‍ण बनती गईं कि हम दर्शक उनका मोटापा और वस्त्रभूषा का निपट घरेलूपन भूल गए. वे जैसे अपने मोटापे और साधारणता से दूर किसी दिव्य स्पेस में नाचने लगीं.

थोड़े दिन बाद, सूचना आई कि कुचिपुड़ी कि प्रख्यात नतर्क वेदान्तम सत्यनारायण शर्मा सप्रू हाउस में अपनी प्रस्तुति देंगे. बस से वहां पहुंचने में देर हुई और जब मैं हॉल में पहुंचा तो एक युवती, बहुत लालित्य और ऐंद्रियता के साथ, नाच रही थी. मैंने सोचा कि शायद शर्मा जी ने अपनी प्रस्तुति के पहले अपनी किसी शिष्या को पेश किया है. लेकिन उस युवती का मनोरम नाच अगले दो घंटे चलता रहा और पूर्वान्तिम प्रस्तुति के पहले घोषणा हुई कि वेदान्तम उस दिन के कार्यक्रम का समापन करेंगे. हम वेदान्तम को एक युवती के रूप में नाचते देखते रहे थे!

हमने खजुराहो नृत्य समारोह शुरू किया था और पहले कुछ वर्ष वह अस्थायी मंच बनाकर मंदिर के परिसर में होता था. कन्‍दरिया महादेव मन्दिर के कन्दरा जैसे लगते प्रवेश द्वार से निकलकर नाचते हुए यामिनी कृष्‍णमूर्ति आईं तो लगा कि जैसे मंदिर पर शिल्पित अप्सराओं में से एक जीवित होकर आ गई हो. नर्तकी प्रतिमा बेदी द्वारा अपने नृत्यग्राम में आयोजित वसंतहव्बा समारोह में पहली बार केलुचरण महापात्र और बिरजू महाराज की जुगलबंदी देखी जिसमें केलु बाबू राधा और बिरजू कृष्ण बने थे. केलु बाबू ने, अपनी कृशकाया और गंजे सिर के बावजूद, अपने शरीर में जो ऐंद्रियता और लालित्य की उद्भावना की वह अपूर्व थी.

उज्जैन की कालिदास अकादेमी में 80 से दशक की आयु के कुड़िअट्टम के मूर्धन्य मणि माधव चाक्यार ने उघरे बदन एक साधारण सी कुर्सी पर बैठकर जब सिर्फ़ अपनी आंखों और हाथों से अभिनय करना शुरू किया तो वह लगभग एक घंटे अबाध चला और उससे अभिभूत हमने, जिनमें हबीब तनवीर और विजय मेहता शामिल थे, अवाक् देखा. मुंबई में नायिकाभेद पर एक संवाद में बिरजू महाराज अपने सामने उद्धृत रीति कविताओं पर तो कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं दे पा रहे थे पर उन्होंने यकायक सिर्फ़ अपनी आंखों से नायिका भेद, सात नायिकाएं दिखाकर हमें चकित कर दिया था.

शास्त्रीय नृत्य के लिए जो दी गई आधुनिक जगह होती है उसे नर्तक या नर्तकी बहुत जल्दी मंदिर, दरबार, उपवन, करीलकुंज, यमुना तट, वनप्रान्तर आदि में, पौराणिक स्थल या ऐतिहासिक जगह में बदल देता है. नृत्य हमारे सामने की जगह पर नहीं अन्यत्र होता है- नृत्य का यह अनिवार्य अन्यत्र है. नृत्य हमें दूसरे काल में भी ले जाता है- वह काल हमारे एकरैखिक दिए हुए काल से अलग और दूर होता है. इसका एक आशय है कि नृत्य हमें थोड़ी अवधि के लिए दूसरी जगह, दूसरे समय में ले जाता है. नृत्य दो शक्तियों का सहारा लेता है: जगह के रूप में स्मृति, समय के रूप में स्मृति. दोनों ही कायाकल्प के संस्करण हैं और कलाकार और दर्शक दोनों की कल्पना से आकार पाते हैं.

नृत्य हमारे लिए, किसी न किसी रूप में, सारे अस्तित्व की बहुलता, देश और काल की बहुलता, खोजता और हमारे अनुभव में लाता है. अकेला नर्तक या नर्तकी अपनी एकलता से बहुलता रचता या रचती है: एकोऽहं बहुस्याम! कोई भी शास्त्रीय नर्तक या नर्तकी बहुलता की लीला ही नाचते हैं और अगर वे अपनी कला के अध्यात्म के प्रति सजग हों तो वे ऐसे किसी निज़ाम या राजनीति का समर्थन नहीं कर सकते जो एकरूपता और एकनिष्ठता पर आधारित हो.

नृत्यकार कई रूप धरता है: देवता, देवी, नायक, नायिका, भक्त, इतिहास-पुरुष, पक्षी, पशु, वृक्ष आदि. नृत्य अस्तित्व की अन्यता को ध्यस्त करता है. हमारे समय में तो हर रोज़ नए-नए दूसरे बनाये जा रहे हैं. नृत्य ‘दूसरेपन’ को खारिज करता है.

नृत्य में दुहरी कल्पना सक्रिय होती है. शास्त्रीय शैलियों में कथानक प्रायः प्राचीन साहित्य ‘रामायण’, ‘महाभारत’ आदि से लिए जाते हैं जो प्रथमतः कल्पना की कृतियां हैं. फिर नृत्यकार अपनी निजी दृष्टि और कौशल से, अपनी कल्पना और कौशल से उनका पुनराविष्कार करता है. नृत्य में भक्ति और श्रृंगार के भावों की प्रमुखता होती है. हमारी शास्त्रीयता आध्यात्मिक और ऐंद्रिक में द्वैत को स्वीकार नहीं करती है. वह अपने को दोनों के बीच बहुत नाजुक रूप से संतुलित करती है. अगर वह भक्ति की तरफ़ ज़्यादा झुके तो धार्मिक और ऐंद्रियता की ओर ज्‍यादा तो अश्लील हो सकती है.

भक्ति और श्रृंगार ‘दूसरे’ का साक्षात् करने के प्रकार भी हैं. भक्ति में ‘दूसरा’ विराट् है जिसे वह स्पन्दित कर पाती है और श्रृंगार में ‘दूसरा’ आत्सात् होता है.

हमारी शास्त्रीय कलाएं बहुल तो हैं ही, वे हमारी सभ्यता का उत्तराधिकार भी हैं. यह उत्तराधिकार हमारी जातीय स्मृति को उद्बुद्ध करता है जो बहुल है. हर नृत्य शैली का अपना विशिष्ट सच होता है. इन दिनों जब अतीत को हिंसा और घृणा फैलाने के उद्देश्य से चुन-चुनकर याद किया जाता है तब नृत्य एक समृद्ध-बहुल-सघन अतीत उद्बुद्ध करता है- ऐसा अतीत जो मानवीय है, हमें अधिक मानवीय बनाता है.

कोई भी कला निरी अतीत की होने के आधार पर शास्त्रीय नहीं हो जाती है. असली शास्त्रीयता वहीं होती है जहां अतीत के साथ-साथ वह समकालीन भी हो सके. देह की ठोस उपस्थिति का अमूर्त अनुपस्थिति में बदलना ही उसे शास्त्रीय बनाता है और यह शास्त्रीयता सिर्फ़ अतीत की ही नहीं होती.

शास्त्रीय नृत्य और संगीत अपने आप में भंगुर हैं. वे ललित कलाओं, साहित्य आदि की तरह बचे नहीं रहते. वे होते-होते न होते रहते हैं: एक स्वर आता है और आते ही ग़ायब भी हो जाता है. एक मुद्रा बनती है और बनते ही ग़ायब भी हो जाती है. इसीलिए, एक अर्थ में, ये कलाएं स्वयं अपना संग्रहालय हैं. तिल्लाना या तत्कार को संरक्षित करने का एक ही उपाय है कि उन्हें लगातार पीढ़ी-दर-पीढ़ी नाचा जाता रहे. ठीक वैसे ही जैसे मालकौंस और अल्हैया बिलावल को बचाने का और कोई तरीका नहीं है सिवाय इसके कि उन्हें लगातार तरह-तरह से गाया-बजाया जाता रहे.

नृत्य का इस समय एक दूसरा ‘अन्यत्र’ भी है जो नकारात्मक है. विरासत को निरी आवृत्ति या अनुगमन से सर्जनात्मक रूप से आयत्त नहीं किया जा सकता. समकालीन शास्त्रीयता ने हमारी परंपरा में रसी-बसी कलाओं की अंतरनिर्भरता से अपने को दूर कर लिया है- उसे ख़बर ही नहीं है कि कविता-कला-रंगमंच में क्या हो रहा है. नृत्य से कई बार सूक्ष्मता, जटिलता और प्रश्नवाचकता लुप्त हो गए हैं. निरे कौशल या व्याकरण से आक्रान्ति ने नृत्य को निजी दृष्टि से दूर कर दिया है. नृत्य सक्षम है पर दृष्टि और कल्पनाहीन. कई बार सुरुचि नज़र आती है पर दृष्टि नहीं. दिए हुए अर्थसम्भार में नृत्य कोई नया अर्थ नहीं जोड़ता. दृष्टि का अर्थ होगा ऐसे प्रश्नों का सामना करना: नृत्य क्यों? किसके लिए नृत्य? आनन्द के अलावा नृत्य में क्या अंतर्दृष्टि या अनुभव चरितार्थ हो रहा है?

समकालीन सामाजिक-राजनीतिक सचाई का कोई अहसास नृत्य में नहीं है. नृत्य की ज़िम्मेदार आलोचना नहीं है और इसलिए उसे सराहने-समझने का कोई रसिक-विवेक भी विकसित नहीं हो पाया. यही कारण है कि नृत्य आज ज़्यादातर आध्यात्मिक होने बजाय धार्मिक हो रहा है. गहराई से नहीं सतह से उपज रहा है. समृद्ध सघनता के बजाय ख़ालीपन से अनुगुंजित हो रहा है. खोज के बजाय अनुगमन कर रहा है.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)