नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय ने हाल ही में अपने कश्मीरी छात्रों से आधार संख्या और दिल्ली में उनके निवास की जानकारी मांगी है. विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर ऑफिस की ओर से आयी इस मांग ने छात्रों को असहज कर दिया है.
द वायर हिंदी ने विश्वविद्यालय के इस फैसले को लेकर कश्मीरी छात्रों से बातचीत की. उनका कहना है कि यह कदम न सिर्फ उनकी निजता का हनन है बल्कि उनके साथ भेदभावपूर्ण बर्ताव का संकेत भी देता है.
जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के राष्ट्रीय संयोजक नासिर खुएहामी ने कहा, ‘पहले ही देश के अलग-अलग हिस्सों में कश्मीरी छात्रों को निशाना बनाया जा रहा है. ऐसे में इस तरह का सर्कुलर आना तो डर की बात है ही. एक तरफ सरकार कहती है कि हम कश्मीरियों को पूरे देश से जोड़ना चाहते हैं, दूसरी तरफ हमारी अलग से पहचान की जा रही है.’
विश्वविद्यालय प्रशासन पर पूर्वाग्रही होने का आरोप लगाते हुए खुएहामी सवाल करते हैं, ‘क्या यह प्रोफाइलिंग यह संकेत देने की कोशिश है कि कश्मीरी छात्र अलग हैं, संदिग्ध हैं या इस देश के बराबर नागरिक नहीं हैं?’
कश्मीरी छात्रों की चिंताओं को लेकर जब हमने विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर से सवाल किया तो उनका कहना था कि ये सब कश्मीरी छात्रों की सुरक्षा के लिए किया जा रहा है.
विश्वविद्यालय के इस फैसले के खिलाफ अब जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट्स एसोसिएशन ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को पत्र लिखा है.
गृह मंत्रालय को लिखे पत्र में क्या मांग है?
गृह मंत्रालय को लिखे पत्र में जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट्स एसोसिएशन ने बताया है कि दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े कई कॉलेजों ने विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर के छात्रों से उनका व्यक्तिगत डाटा मांगा है—जैसे पता, फोन नंबर, ईमेल और कोर्स विवरण—जबकि भारत के अन्य राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों के छात्रों से ऐसा नहीं मांगा गया. इससे यह संदेह पैदा होता है कि सिर्फ कश्मीरी छात्रों पर निगरानी या प्रोफाइलिंग की जा रही है, जो संविधान में दिए गए समानता, गरिमा और निजता के अधिकारों का उल्लंघन है.
पत्र में बताया गया है कि कश्मीरी छात्रों के मन में भय और असुरक्षा का माहौल बन गया है, क्योंकि उन्हें नहीं पता कि उनका डाटा कैसे और किस मकसद से इस्तेमाल किया जाएगा. यह भी कहा गया है कि पहलगाम हमले के बाद पहले से ही देशभर में कश्मीरी छात्रों को निशाना बनाया जा रहा है और यह कदम उस स्थिति को और बिगाड़ देगा. विश्वविद्यालय प्रशासन का यह तर्क कि यह निर्देश गृह मंत्रालय से आया है, भी ठोस नहीं है क्योंकि यह जानकारी पहले से ही दाखिले के वक्त ली जाती है.

गृहमंत्री अमित शाह को संबोधित इस पत्र में तीन मुख्य मांगें हैं:
- इस निर्देश या सर्कुलर को तुरंत वापस लिया जाए.
- दिल्ली विश्वविद्यालय स्पष्ट रूप से ऐसी किसी भी भेदभावपूर्ण नीति से खुद को अलग करे.
- सभी शैक्षणिक संस्थानों को निर्देशित किया जाए कि वे किसी भी आधार पर—क्षेत्र, धर्म या जाति—छात्रों की प्रोफाइलिंग न करें.
विश्वविद्यालय प्रशासन का क्या कहना है?
द वायर हिंदी से बातचीत में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रॉक्टर प्रोफेसर राजनी अब्बी ने बताया कि उनसे इंटेलिजेंस (गृह मंत्रालय) ने पूछा था कि कश्मीर के कितने स्टूडेंट्स हैं, इसलिए उन्होंने कॉलेजों और हॉस्टल से डेटा मंगाया.
प्रोफेसर रजनी स्पष्ट करती हैं कि उन्हें इसके लिए लिखित में कोई निर्देश नहीं मिला था बल्कि कॉल आया था.
जब हमने जानना चाहा कि क्या दूसरे राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों के छात्रों से भी इस तरह की जानकारी मांगी जा रही है? प्रॉक्टर ने जवाब दिया- मुझे मालूम नहीं.
कश्मीरी छात्रों के विरोध के बावजूद प्रॉक्टर ने इस फैसले को वापस लेने की किसी भी संभावना से इनकार किया है.
क्या यह छात्रों की निजता का उल्लंघन है?
सुप्रीम कोर्ट की वकील शाहरुख आलम कहती हैं, ‘अगर विश्वविद्यालय ऐसा कर रहा है तो यह कहीं से भी ठीक नहीं है. इसे ही रेसियल प्रोफाइलिंग कहते हैं. यह अनुच्छेद 21 और 15 का उल्लंघन है, भारतीय संविधान की प्रस्तावना में किए गए ‘बंधुता’ के वादे का उल्लंघन है.’
आलम इस कदम को सामूहिक दंड के एक रूप की तरह देखती हैं, साथ ही कहती हैं कि यह निश्चित रूप से निजता के अधिकार का भी उल्लंघन है.
इस मामले को लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद ने सोशल मीडिया पर लिखा है, ’22 अप्रैल के बाद से विश्वविद्यालयों ने कैंपस में कश्मीरी छात्रों को भरोसा दिलाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया है. अब ये नया मामला! कश्मीरी छात्रों का डरना स्वाभाविक है क्योंकि कई विश्वविद्यालय खुले तौर पर आरएसएस के साथ खड़े दिखे हैं.’
अन्य विश्वविद्यालयों का हाल?
द वायर हिंदी ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और डॉ. बीआर अंबेडकर विश्वविद्यालय के कश्मीरी छात्रों से भी संपर्क किया लेकिन उन्हें इस दिल्ली विश्वविद्यालय के कश्मीरी छात्रों के तरह कोई सर्कुलर नहीं मिला है.
हालांकि, कुछ कश्मीरी छात्रों ने दावा किया उनके पास स्थानीय पुलिस के कॉल आए थे, विवरण मांगा गया था. अंबेडकर विश्वविद्यालय के छात्र सैयद ने बताया, ‘मुझे एक फोन कॉल आया था. कॉल करने वाला खुद को मोती नगर पुलिस से बताया और मेरा पता मांगा. लेकिन मैंने कोई जानकारी देने से इनकार कर दिया.’
