सुप्रीम कोर्ट का निर्देश- स्कूल में सहपाठी द्वारा पीटे गए मुस्लिम बच्चे की शिक्षा का ख़र्च उठाए यूपी सरकार

अगस्त 2023 में यूपी के मुज़फ़्फ़रनगर के एक निजी स्कूल की शिक्षक ने कथित तौर पर होमवर्क नहीं करने पर एक मुस्लिम छात्र को उसके हिंदू सहपाठियों से कक्षा में बार-बार थप्पड़ लगवाए थे. अब सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को बच्चे की स्कूली शिक्षा का ख़र्च उठाने का निर्देश दिया है.

सुप्रीम कोर्ट. (फोटो: संतोषी मरकाम/द वायर)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (14 मई) को उत्तर प्रदेश सरकार को मुजफ्फरनगर के एक मुस्लिम बच्चे की स्कूली शिक्षा का खर्च उठाने का निर्देश दिया, जिसे उसके सहपाठियों ने उसके शिक्षक के निर्देश पर थप्पड़ मारा था.

महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि राज्य सरकार स्कूल को खर्च उठाने के लिए मना सकती है, लेकिन ऐसे खर्च को उठाने की प्राथमिक जिम्मेदारी सरकार की होगी.

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने कहा, ‘बच्चे की ट्यूशन फीस, यूनिफॉर्म, किताबों आदि की कीमत और उसकी स्कूली शिक्षा पूरी होने तक परिवहन शुल्क का भुगतान करना राज्य सरकार का दायित्व है.’

गांधी की याचिका में स्कूल की शिक्षिका तृप्ता त्यागी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है, जिन पर कथित तौर पर छात्रों को मुस्लिम छात्र को थप्पड़ मारने के लिए उकसाने का आरोप है.

मालूम हो कि अगस्त 2023 में मुजफ्फरनगर के खुब्बापुर गांव में एक निजी स्कूल की शिक्षक तृप्ता त्यागी ने कथित तौर पर होमवर्क न करने पर एक मुस्लिम छात्र को उसके हिंदू सहपाठियों से कक्षा में बार-बार थप्पड़ लगवाए थे. घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद लोगों ने आक्रोश जताया था.

महिला शिक्षक को वीडियो में मुस्लिम बच्चे पर सांप्रदायिक टिप्पणी करते हुए दिखाया गया था.

अक्टूबर 2023 में उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि त्यागी को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 295 ए (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कार्य) के तहत आपराधिक आरोपों का सामना करना पड़ेगा.

बाद में उन्होंने अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया और उन्हें जमानत दे दी गई.

‘इस खर्च को पूरा करने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य की’

अदालत ने पिछले साल यह भी सुझाव दिया था कि राज्य सरकार बच्चे के स्कूली खर्च को पूरा करने के लिए प्रायोजक ढूंढे.

हालांकि, तुषार गांधी का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने कहा कि राज्य यह सुनिश्चित करने में विफल रहा है कि ट्यूशन फीस और बच्चे की स्कूल यूनिफॉर्म का खर्च वहन किया जाए.

उधर, राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि सैयद मुर्तजा मेमोरियल ट्रस्ट ने छात्र की फीस देने की पेशकश की है, हालांकि अदालत ने एक बार फिर दोहराया कि प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य की है.

अदालत ने कहा, ‘यह दर्ज किया गया है कि ट्रस्ट एक साल तक इसकी देखभाल करेगा. हम स्पष्ट करते हैं कि इस खर्च को पूरा करने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य की है. स्कूल प्राधिकरण को भुगतान करने के लिए राजी करना राज्य के लिए खुला होगा.’

ज्ञात हो कि 25 सितंबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने इस घटना को लेकर एफआईआर दर्ज करने में देरी और सांप्रदायिक आरोपों को नजरअंदाज करने पर उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस को कड़ी फटकार लगाई थी. पीठ ने निर्देश दिया था कि मामले की जांच आईपीएस-रैंक के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी द्वारा की जाए.

अदालत ने कहा था कि हालांकि छात्र के पिता द्वारा संज्ञानात्मक अपराधों से संबंधित शिकायत दर्ज की गई थी, लेकिन तुरंत कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई. शुरुआत में केवल गैर-संज्ञानात्मक अपराध में रिपोर्ट दर्ज की गई थी और घटना के लगभग दो सप्ताह बाद 6 सितंबर 2023 को ‘एक लंबी देरी के बाद’ एफआईआर दर्ज की गई थी.

अदालत ने उस समय उत्तर प्रदेश में धार्मिक भेदभाव और शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल उठाए थे. अदालत ने पाया था कि यह शिक्षा के अधिकार अधिनियम के अनिवार्य अनुपालन में प्रथमदृष्टया राज्य की विफलता है. यह अधिनियम छात्रों के शारीरिक एवं मानसिक उत्पीड़न और धर्म एवं जाति के आधार पर उनके साथ भेदभाव को रोकता है.

जस्टिस ओका ने कहा था, ‘जिस तरह से घटना घटी है, उससे राज्य की अंतरात्मा को झटका लगना चाहिए.’