हिंदी पत्रकारिता का बड़ा हिस्सा विभाजनकारी मानसिकता वाले सत्ताधीशों का सेवक क्यों हो गया?

महात्मा गांधी का कहना था कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता एक बहुमूल्य विशेषाधिकार है, जिसे कोई भी देश त्याग नहीं सकता. अफ़सोस कि आज हिंदी पत्रकारिता का बड़ा हिस्सा यह सब भूलकर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से स्वतंत्र सोच को ख़त्म कर चुका है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

कोई दो सौ साल पहले 1826 में 30 मई को बांग्ला और उर्दू के प्रभुत्व वाले कल्कत्ता (अब कोलकाता) से प्रकाशित साप्ताहिक ‘उदंत मार्तंड’ के रूप में हिंदी को उसका पहला समाचार पत्र मिला तो उस पत्र की मुख्य चिंता हिंदुस्तानियों के भविष्य से जुड़ी हुई थी. हालांकि तब तक हिंदुस्तानियों में इतनी भी जागरूकता नहीं आई थी कि वह उनके बूते अपने पलने-बढ़ने के सपने देख सकता. दमनकारी सत्ता और उदासीन समाज द्वारा डाले गए दूसरे कई रोड़े भी उसके मार्ग को ऊबड़-खाबड़ बनाए हुए थे.

इसके बावजूद उसे अपने सिद्धांतों व सरोकारों से समझौता गवारा नहीं था. इसलिए उसने समझौते करने के बजाय उनमें अपनी निष्ठा को असंदिग्ध रखते हुए ‘अस्ताचल को चले जाने’ को प्राथमिकता दी थी, जिसके चलते उसे कुल उन्नीस महीनों की ही उम्र नसीब हो पाई.

लेकिन चार दिसंबर, 1827 को उसकी अकाल मौत के पीछे सिर्फ सत्ता की बेरुखी, आर्थिक बेबसी या हिंदुस्तानियों (साफ कहें तो हिंदीभाषियों) की गैर जागरूकता ही नहीं थी. दरअसल, उस वक्त तक न हिंदी गद्य का कोई रूप स्थिर हो पाया था, न ही उसे पत्रकारीय कर्म के अनुकूल बनाने वाला मानकीकरण ही. इसलिए ‘उदंत मार्तंड’ की ‘मध्यदेशीय’ भाषा में भी खड़ी बोली और ब्रजभाषा का घालमेल-सा था. तिस पर छपाई के लिए देवनागरी लिपि के टाइप भी दुर्लभ थे.

हिंदी अख़बारों के शुरुआती कदम

क्या आश्चर्य कि इन परिस्थितियों में हिंदी को उसके पहले पत्र (जो साप्ताहिक था) के बंद हो जाने के बाद अपना पहला दैनिक पाने के लिए 1854 में ‘समाचार सुधावर्षण’ के प्रकाशन तक प्रतीक्षा करनी पड़ी. श्यामसुंदर सेन के संपादन में निकले इस द्विभाषी (हिंदी-बांग्ला) दैनिक ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के वक्त ब्रिटिश सत्ता के नाना कोप झेलते हुए हिंदी भाषा व पत्रकारिता के विकास में खासी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. ‘उदंत मार्तंड’ के मुकाबले इसको ज्यादा लंबी उम्र भी मिली. लेकिन जहां तक हिंदी गद्य को संस्कारित और स्वरूप को स्थिर व मानकीकृत करने का प्रश्न है, इस पत्र के प्रयासों की एक सीमा थी.

यह सीमा बीसवीं शताब्दी में तब तेजी से टूटनी शुरू हुई, जब हिंदी पत्रकारिता मराठीभाषी बाबू विष्णुराव पराड़कर (16 नवंबर, 1883-12 जनवरी, 1955) के युग में आई. उन्होंने हिंदी गद्य के मानकीकरण के काम को ऐसी गति से आगे बढ़ाया कि उन्हें हिंदी पत्रकारिता का ‘क्रांतिकारी शब्दशिल्पी’, ‘भीष्म पितामह’ और ‘अप्रतिम संपादकाचार्य’ वगैरह कहा जाने लगा.

यह भी कहा जाता है कि उनके एक हाथ में कलम और दूसरे में पिस्तौल हुआ करती थी और वे न होते तो हिंदी पत्रकारिता अनेक ऐसे शब्दों (साथ ही संपादकों) से वंचित रह जाती, जिनके बिना आज वह काम नहीं चला पाती. उन्होंने उसे ‘श्री’, ‘सर्वश्री’, ‘राष्ट्रपति’ और ‘मुद्रास्फीति’ जैसे अनेक शब्द तो दिए ही, संपादक नामक संस्था की सर्वोच्चता के लिए जिद की सीमा तक सतर्क रहे.

उनका मानना था कि पत्रकारिता को प्रगतिशील मूल्यों की वाहक होना चाहिए, पत्रकार को प्रगतिशील और समाचार लिखते समय अपने विचार परे रख देने चाहिए. आज हम हिंदी दैनिकों में विचारों की अभिव्‍यक्ति के लिए अलग संपादकीय और ओप-एड पृष्ठों की जो व्यवस्था हम आज देखते हैं, उसकी परंपरा भी उनकी ही डाली हुई है.

1920 में पांच सितंबर को वाराणसी से उनके संपादन में दैनिक ‘आज’ निकला तो उसके प्रवेशांक के संपादकीय में उन्होंने लिखा था:

हमारा उद्देश्य अपने देश के लिए सर्व प्रकार से स्वातंत्र्य-उपार्जन है. हम हर बात में स्वतंत्र होना चाहते हैं. हमारा लक्ष्य है कि हम अपने देश के गौरव को बढ़ायें, अपने देशवासियों में स्वाभिमान का संचार करें, उनको ऐसा बनाएं कि भारतीय होने का उन्हें अभिमान हो, संकोच न हो. यह अभिमान स्वतंत्रता देवी की उपासना करने से मिलता है.

तत्कालीन ब्रिटिश सरकार की नीतियों के विरुद्ध उन्होंने 29 अक्टूबर, 1930 से 8 मार्च 1931 तक संपादकीय की जगह खाली छोड़ दी थी और उसकी जगह केवल यह वाक्य छापते थे:

देश की दरिद्रता, विदेश जाने वाली लक्ष्मी, सिर पर बरसाने वाली लाठियां, देशभक्तों से भरने वाले कारागार– इन सबको देखकर प्रत्येक देशभक्त के हृदय में जो अहिंसामूलक विचार उत्पन्न हों, वही संपादकीय विचार है.

पत्रकारीय लेखन में भद्रता एवं मर्यादा के पैरोकार- माखनलाल चतुर्वेदी

उस समय हिंदी पत्रकारिता की चुनौतियां इस अर्थ में दोहरी-तिहरी थीं कि उसे अपनी भाषा का संस्कार करते हुए स्वतंत्रता संघर्ष में भूमिका निभानी और साथ ही राष्ट्रनिर्माण में भी लगना था.

ऐसे में उसे बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी और लाभ-लोभ से सर्वथा निर्लिप्त हिंदी संपादकों में अग्रण्य माखनलाल चतुर्वेदी (4 अप्रैल, 1889-30 जनवरी, 1968) का साथ मिला, जिन्होंने उसको जन असंतोष एवं मानवीय पीड़ाबोध के प्रबलतम स्वर से समृद्ध करने के अनेक जतन किए.

पत्रकारीय लेखन में भद्रता एवं मर्यादा के वे अपने समय के सबसे बड़े पैरोकार थे-हर तरह के भय, संत्रास एवं बंधन के खिलाफ. इसलिए कहते हैं कि कभी कोई जंजीर उनको बांधकर नहीं रख पाई. वे कहते थे कि हम स्वतंत्रता के फक्कड़ साधक सपनों के स्वर्गों को लुटाने निकले हैं. किसी की फरमाइश पर जूते बनाने वाले नहीं हैं हम.

अलबत्ता, हिंदी के तत्कालीन साहित्यिक पत्रों की ‘समझदारी’ को लेकर वे बहुत चिंतित व निराश थे और मानते थे कि हिंदी भाषा का मासिक साहित्य बेढंगे व बीते जमाने की चाल चल रहा है. किसी भी पत्र के संपादक को वे समस्त देश के समक्ष उत्तरदायी मानते और जिम्मेदारी की भावना से भरना चाहते थे. उन्होंने आजीवन इस बात पर जोर दिया कि हमें (यानी हिंदी वालों को) अपने पत्रों को ऐसा बनाना चाहिए कि हम पर ज्ञान की कमी का लांछन कतई न लगे.

‘पत्रकारिता का एकमात्र उद्देश्य जन-मन को शिक्षित करके लोगों की सेवा’

महात्मा गांधी भले ही प्रचलित अर्थों में पत्रकार न रहे हों (इसके बावजूद कि वे छह पत्रों से जुड़े हुए थे, जिनमें से दो के तो संपादक भी थे), उनका हिंदी प्रेम ऐसा था कि हिंदी पत्रकारिता की विकास यात्रा की चर्चाएं भी उनके विचारों की चर्चा के बगैर पूरी नहीं होतीं.

वे संपादकों और पत्रकारों के किसी भी तरह की महत्वाकांक्षा से सर्वथा परे रहने के पक्ष में थे. 2 जुलाई, 1925 के ‘यंग इंडिया’ में उन्होंने लिखा था:

‘मैंने पत्रकारिता को जीविका के लिए नहीं बल्कि केवल अपने जीवन के मिशन के लिए सहायता के रूप में अपनाया है. मेरा यह मिशन उदाहरणों द्वारा सिखाना और कठोर संयम के तहत सत्याग्रह के बेजोड़ हथियार का उपयोग करना है जो अहिंसा का प्रत्यक्ष परिणाम है.’

इसी तरह उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि पत्रकारिता का एकमात्र उद्देश्य जन-मन को शिक्षित करके लोगों की सेवा करना होना चाहिए. वे मानते थे कि यह सेवा तभी संभव हो सकती है, जब इस बात को ठीक से समझ लिया जाए कि जिस तरह पानी की अनियंत्रित धारा फसलों को डुबो और नष्ट कर देती है, अनियंत्रित कलम भी विनाश का ही काम करती है. लेकिन नियंत्रण बाहर से किया जाए, तो वह नियंत्रण की कमी से भी ज़्यादा ज़हरीला साबित होता है. ऐसा कोई भी नियंत्रण तभी लाभदायक हो सकता है, जब उसे अंदर से इस्तेमाल किया जाए. यानी वह आत्मनियंत्रण के रूप में अमल में आए.

महात्मा का यह भी कहना था कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता एक बहुमूल्य विशेषाधिकार है, जिसे कोई भी देश त्याग नहीं सकता. लेकिन समाचार माध्यमों को इस बात के लिए लगातार सचेत रहना चाहिए कि उनको तथ्यों के अध्ययन के लिए पढ़ा जाए, न कि स्वतंत्र सोच की आदत को ही खत्म कर डालने के लिए.

आज हो रही पत्रकारिता चिंता का सबब

अफसोस कि आज हिंदी पत्रकारिता का बड़ा हिस्सा यह सब कुछ भूलकर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से स्वतंत्र सोच को खत्म करके उसे पोच सोच से प्रतिस्थापित करने के लिए ही काम करने लगा है. उसे न अपने भविष्य की चिंता है और न उन हिंदुस्तानियों के भविष्य की, जिसके लिए ‘उदंत मार्तंड’ चिंतित था.

इसने प्रगतिशील मूल्यों की सारी जगह पोंगापंथ को दे दी है और जिस आत्मनियंत्रण की बात महात्मा गांधी करते थे, उसका स्व-सेंसरशिप की सीमा तक विसर्जन कर दिया है.

ऐसे में निस्संदेह, सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस पतनशीलता का अंत कहां होगा?

क्या इस पत्रकारिता के ‘दिशावाहक’ इसका सारा ठीकरा अन्यायी पूंजी और उसके जयघोष में लगे विभाजनकारी मानसिकता वाले सत्ताधीशों पर फोड़कर अपनी दायित्वहीनता का बचाव कर सकते हैं? नहीं, वे धान कूटने और कांख ढकने की पुरानी कहावत को इस तरह सार्थक नहीं कर सकते.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)