केंद्र सरकार ने विपक्ष की विशेष सत्र की मांग दरकिनार करते हुए मानसून सत्र की जल्द घोषणा की

16 विपक्षी दलों द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग की गई थी. इस पत्र के ठीक एक दिन बाद केंद्र की मोदी सरकार की ओर से मानसून सत्र की तारीखों का ऐलान कर दिया गया. ये पहली बार है जब सरकार द्वारा मानसून सत्र की घोषणा इतने पहले की गई है.

संसद भवन. (फोटो साभार: X/@DDNews)

नई दिल्ली: 16 विपक्षी दलों द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग के ठीक एक दिन बाद केंद्र की मोदी सरकार की ओर से मानसून सत्र की तारीखों का ऐलान कर दिया गया. ये पहली बार है जब सरकार द्वारा मानसून सत्र की घोषणा इतने पहले की गई है.

रिपोर्ट के मुताबिक, विपक्ष की ओर से लिखे पत्र में पहलगाम आतंकी हमले, ऑपरेशन सिंदूर और उसके बाद के घटनाक्रमों पर चर्चा के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया जाने की मांग की गई थी, जिसे दरकिनार करते हुए बुधवार (4 जून) को असामान्य रूप से समय से पहले मानसून सत्र की तारीखों की घोषणा कर, इस मांग को प्रभावी ढंग से खारिज कर दिया.

हालांकि, सरकार ने विपक्ष की मांग पर सीधे तौर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन केंद्रीय संसदीय मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने बुधवार को कहा कि सरकार ने 21 जुलाई से 12 अगस्त तक संसद का मानसून सत्र बुलाने के लिए माननीय राष्ट्रपति को सिफारिश करने का फैसला किया है.

मालूम हो कि इससे पहले मंगलवार को 16 विपक्षी दलों ने मोदी को लिखे अपने पत्र में पुंछ, उरी, राजौरी में हमले, संघर्ष, नागरिकों की हत्या और संघर्ष विराम की घोषणा तथा राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति पर पड़े इसके प्रभाव को लेकर राष्ट्र के सामने मौजूद ‘गंभीर सवालों’ का उल्लेख किया था.

पत्र में यह भी रेखांकित किया गया था कि विपक्ष ने भारत की स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ बातचीत करने के सरकार के प्रयासों का समर्थन किया है. लेकिन सरकार द्वारा इस पूरे घटनाक्रम पर ‘दूसरे देशों और मीडिया को जानकारी दी गई है, लेकिन देश की संसद को नहीं.’

जुलाई में मानसून सत्र आयोजित करने की रिजिजू की घोषणा के बाद, विपक्षी दलों ने सरकार पर संसद सत्र से भागने का आरोप लगाया.

एक बयान में तृणमूल सांसद और राज्यसभा में पार्टी के संसदीय नेता डेरेक ओ’ब्रायन ने कहा कि सरकार ‘पार्लियामेंटफोबिया’ से ग्रस्त है.

उन्होंने कहा, ‘संसद का सामना करने से डरने वाली मोदी सरकार की गंभीर स्थिति के लिए मेरा शब्द यही है कि सरकार ‘पार्लियामेंटफोबिया’ से ग्रस्त है.’

कांग्रेस ने लगाया प्रधानमंत्री पर विशेष सत्र से भागने का आरोप

इस संबंध में कांग्रेस सांसद और पार्टी के मीडिया एवं संचार प्रभारी महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि आम तौर पर संसद सत्र का ऐलान कुछ दिन पहले होता है. आज तक कभी भी 47 दिन पहले सत्र की तारीख नहीं बताई गई थी. ये सब केवल पहलगाम हमले, सिंगापुर में सीडीएस के खुलासे और डोनाल्ड ट्रंप के दावे से जुड़े सवालों से बचने के लिए किया गया.

उन्होंने कहा, ‘मानसून सत्र में भी राष्ट्रीय हित के इन मुद्दों को उठाया जाएगा. प्रधानमंत्री विशेष सत्र से तो भाग गए हैं, लेकिन 6 हफ्ते बाद उन्हें काफी कठिन सवालों का सामना करना पड़ेगा.’

ज्ञात हो कि विपक्ष मांग कर रहा है कि सरकार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उन दावों पर सफाई दे, जिसमें उन्होंने 10 मई को भारत और पाकिस्तान के बीच चार दिनों तक चले तनावपूर्ण सैन्य संघर्ष के बाद संघर्ष विराम में मध्यस्थता का दावा किया है.

हालांकि, भारत पहले ही ट्रंप के इस दावे को खारिज कर चुका है, बावजूद इसके ट्रंप ये दावा लगातार कर रहे हैं कि उन्होंने व्यापार रोकने की चेतावनी देकर युद्ध की कगार पर खड़े दो परमाणु देशों के बीच मध्यस्थता करवाई है.

ट्रंप की मध्यस्थता के दावे को लेकर आमने-सामने पक्ष-विपक्ष

हाल ही में इसे लेकर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने मोदी पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि ट्रंप ने नरेंद्र मोदी को पाकिस्तान के सामने सरेंडर करने पर मजबूर कर दिया.

मालूम हो कि राहुल गांधी ने 3 जून को भोपाल में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था, ‘मैं भाजपा और आरएसएस वालों को अच्छे से जान गया हूं. इनको थोड़ा सा दबाओ तो डर कर भाग जाते हैं… उधर से ट्रंप ने फोन किया और इशारा किया कि मोदी जी क्या कर रहे हो? नरेंद्र, सरेंडर. और ‘जी हुजूर’ कर के मोदी जी ने ट्रंप के इशारे का पालन किया.’

इसके जवाब में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने राहुल गांधी पर पाकिस्तान की भाषा बोलने का लगाया.

भाजपा सांसद और राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने बुधवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, ‘स्वघोषित, स्वयंभू, सर्वोच्च नेता, विपक्ष के नेता राहुल गांधी बेहद घटिया, निम्न-स्तरीय बयान देकर दुनिया को बता रहे हैं कि विपक्ष का नेता बनने के बाद भी उनमें गंभीरता और परिपक्वता की कमी है, जो इस पद के लिए जरूरी है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘जिस तरह से राहुल गांधी ने हमारे सशस्त्र बलों की वीरता और ऑपरेशन सिंदूर की सफलता पर सेना अधिकारियों के ब्रीफिंग की तुलना आत्मसमर्पण से की, उससे पता चलता है कि उनकी मानसिकता कितनी बीमार और खतरनाक हो गई है. ‘

इससे पहले द वायर ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि हालांकि, अतीत में आतंकवादी हमलों के बाद कोई विशेष सत्र आयोजित नहीं किया गया है और संसद सत्र बुलाने का निर्णय सरकार पर निर्भर करता है, लेकिन 1962 और 1971 के युद्धों के दौरान संसद को इस संबंध में सूचित किया गया था. यहां तक कि नागरिकों पर आखिरी बड़े आतंकवादी हमले – नवंबर 2008 में मुंबई में हुए आतंकवादी हमले के बाद भी संसद को जानकारी दी गई थी. क्योंकि शीतकालीन सत्र हमले के कुछ दिनों बाद ही बुलाया गया था.