बोरीवली-पडघा: शाहिदा* के दरवाज़े पर रात 3 बजे हुई दस्तक कोई नई बात नहीं थी. इस समय पर दस्तक का मतलब आमतौर पर यह होता है कि बड़ी संख्या में पुलिस पहुंच गई है और अब उनका जीवन फिर से उलट-पुलट होने वाला है. ऐसा ही हुआ 1 और 2 जून की दरम्यानी रात को, जब मुंबई से करीब 55 किलोमीटर दूर शांत से गांव बोरीवली-पडघा को 350 से ज़्यादा पुलिसकर्मियों ने घेर लिया. इनमें मुंबई और ठाणे लोकल पुलिस के साथ महाराष्ट्र की एंटी टेररिज़्म स्क्वॉड (एटीएस) भी शामिल थी.
एक अभियान के तहत पुलिस टीमों ने कोर्ट से जारी तलाशी वॉरंट के साथ गांव के 22 व्यक्तियों के घरों पर एक साथ दस्तक दी और छापेमारी शुरू कर दी.
शाहिदा कहती हैं, ‘छापे केवल 22 लोगों को निशाना बनाने के लिए थे (जिनमें से तीन सगे भाई एक ही घर में रहते हैं), लेकिन पूरे गांव को घेर लिया गया और पुलिस ने ऐसी स्थिति बना दी जैसे यहां कोई खूंखार आतंकवादी छिपे हों.’
शाहिदा बताती हैं कि यह पिछले डेढ़ साल में गांव में दूसरी बार बड़े पैमाने पर की गई छापेमारी थी. इससे पहले दिसंबर 2023 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने छापे मारे थे और उनके पति समेत 15 लोगों को गिरफ्तार किया था. इन पर आरोप था कि वे इलाके के युवाओं को प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन आईएसआईएस (आईएसआईएस) में शामिल होने के लिए प्रेरित कर रहे थे.
‘पिछली बार भी लगभग इसी समय पर वे आए थे, मेरे पति को ले गए और हमारे सारे फोन और बच्चों के स्कूल प्रोजेक्ट के लिए इस्तेमाल होने वाला कंप्यूटर हार्ड डिस्क जब्त कर लिया था.’ उन्होंने याद करते हुए बताया.
पिछली छापेमारी उस समय हुई थी जब इज़रायल ने फिलिस्तीन पर युद्ध शुरू किया था, जिसे शाहिदा ‘नरसंहार’ कहती हैं. शाहिदा के स्कूल जाने वाले बच्चों ने अपनी जेब खर्च से फिलिस्तीनी झंडे खरीदे थे ताकि गांव में एक विरोध प्रदर्शन कर सकें. पुलिस ने वे झंडे जब्त कर लिए, और बाद में एनआईए ने दावा किया कि ये झंडे ‘उग्रवादी संगठन हमास’ से संबंधित हैं.
ऐसे दावे, जो अक्सर छापेमारी और गिरफ्तारी के समय किए जाते हैं, मीडिया में सनसनी फैलाने और अदालत से शुरुआती पुलिस रिमांड हासिल करने के लिए मददगार होते हैं. लेकिन इन दावों की सच्चाई अदालत में साबित होने में कई साल लग जाते हैं. तब तक पूरी एक पीढ़ी आपराधिक न्याय प्रणाली में फंसी रहती है और उनका जीवन बर्बाद हो जाता है.
इस बार एटीएस शाहिदा के एक बेटे के खिलाफ कोर्ट से लिए गए सर्च वॉरंट के साथ आई थी. अदालत को बताया गया था कि उनके घरों में ‘अवैध/राष्ट्रविरोधी गतिविधियों’ से जुड़ी ‘आपत्तिजनक सामग्री या दस्तावेज़’ रखे गए हैं. करीब 10 घंटे तक चली इस छापेमारी में पुलिस ने 19 मोबाइल फोन, एक तलवार और एक बड़ा चाकू जब्त किया.
गांव वालों का कहना है कि जिसे पुलिस और मीडिया ‘घातक हथियार’ बता रहे हैं, वह असल में रसोई में इस्तेमाल होने वाला चाकू है.
‘क्या मछली और मांस खाने वाले परिवारों के घरों में बड़े और तेज चाकू मिलना कोई असामान्य बात है?’ — यह सवाल एक ऐसे व्यक्ति ने उठाया, जिनके घर पर छापा मारा गया था.
छापेमारी और तलवार व बड़े चाकू की जब्ती के बाद पुलिस ने दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज की हैं. हालांकि गांव से अब तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है. पिछली बार, 2023 में हुई छापेमारी में, पुलिस ने और भी बड़े दावे किए थे—कहा गया था कि बड़ी संख्या में धारदार चाकू बरामद हुए हैं.
‘उसके बाद से हम में से लगभग सभी ने बड़े चाकू फेंक दिए और अब रसोई में सिर्फ छोटे चाकू इस्तेमाल कर रहे हैं. पता नहीं कब पुलिस घर में घुस आए और हमारे रसोई के सामान को हथियार बता दे.’ एक महिला ने कहा, जिनके घर पर 2023 की छापेमारी हुई थी, हालांकि तब भी कोई गिरफ्तारी नहीं हुई थी.
इस बार की छापेमारी के दौरान स्थानीय पडघा पुलिस भी एटीएस के साथ मौजूद थी. एक घर, जो एक मौलाना का है, वहां पुलिस ने दावा किया कि दो गायें बिना जरूरी दस्तावेजों के रखी गई थीं. पडघा पुलिस ने मौलाना को महाराष्ट्र पशु संरक्षण अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया. हालांकि उन्हें अगले ही दिन जमानत मिल गई.

चार दशकों से विवादों के केंद्र में गांव
मुंबई-नाशिक हाईवे पर स्थित बोरीवली-पडघा गांव की 80% से अधिक आबादी मुस्लिम है, और यह गांव करीब चार दशकों से विवादों के केंद्र में रहा है. इसकी शुरुआत 1980 के दशक में तब हुई जब पूर्व छात्र नेता और तेजतर्रार कार्यकर्ता साकिब नाचन का नाम पहली बार कानून प्रवर्तन एजेंसियों से जुड़ा. नाचन समेत कई लोगों पर स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) का हिस्सा होने का आरोप लगा था, जिसे बाद में 2001 की शुरुआत में प्रतिबंधित कर दिया गया.
नाचन पर कई आतंकी मामलों में मुकदमे चले, उन्हें दोषी ठहराया गया और उन्होंने कई साल जेल में बिताए हैं. वर्तमान में उन पर महाराष्ट्र में आईएसआईएस मॉड्यूल का नेतृत्व करने का आरोप है. वह और उनका छोटा बेटा शामिल 2023 से हिरासत में हैं. जहां नाचन फिलहाल दिल्ली की तिहाड़ जेल में हैं, वहीं उनका बेटा शामिल मुंबई की तलोजा जेल में बंद है.
एटीएस का दावा है कि हालिया छापेमारी खुफिया इनपुट के आधार पर की गई, जिसमें कहा गया था कि नाचन परिवार की गिरफ्तारी के बावजूद वे अब भी गांव को नियंत्रित कर रहे हैं.
करीब 10,000 की आबादी वाले बोरीवली-पडघा गांव में ज़्यादातर लोग कोंकणी मुसलमान हैं. यहां के मुसलमान आर्थिक रूप से संपन्न माने जाते हैं और उनके पास मुंबई-नाशिक हाईवे के किनारे बड़ी मात्रा में ज़मीन है. पिछले एक दशक में यहां ज़मीन की क़ीमतें बहुत तेज़ी से बढ़ी हैं क्योंकि इलाके में कई गोदाम (वेयरहाउस) बने हैं. परंपरागत रूप से यहां के लोग मछली, बालू या निर्माण से जुड़े व्यवसाय करते आए हैं. लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि बार-बार होने वाली पुलिस छापेमारी से उनका कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ है.
गांव के ज़्यादातर लोग आपस में रिश्तेदार हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि पूछताछ का पूरा आधार यही होता है कि उनका ‘नाचन परिवार से संबंध’ है या नहीं. एक युवक, जिनके घर इस बार छापा पड़ा था, पूछता है, ‘हममें से ज़्यादातर लोग सीधे या परोक्ष रूप से एक-दूसरे से, और नाचन परिवार से भी जुड़े हुए हैं. हम सब एक-दूसरे के पड़ोसी हैं, एक ही मस्जिद में जाते हैं; हमारा संपर्क में रहना स्वाभाविक है. इसे गैरकानूनी कैसे माना जा सकता है?’
इस बार एटीएस ने नाचन के एक और बेटे- आक़िब को निशाना बनाया. वॉरंट में उसका नाम था और पुलिस ने उसका मोबाइल फोन ज़ब्त कर लिया. छापे के समय घर में मौजूद एक रिश्तेदार ने बताया कि जैसे ही पुलिस अंदर घुसी, शामिल (नाचन के बेटे) के पांच साल के बेटे ने डर के मारे ज़ोर से चिल्लाना शुरू कर दिया. उन्होंने कहा, ‘उस बच्चे ने इतनी छोटी उम्र में बहुत कुछ देख लिया है.’
बच्चों पर छापों का असर
बोरीवली-पडघा गांव में बच्चों का बचपन सामान्य नहीं रहा है. सालों से होती आ रही छापेमारी की कार्रवाई और गिरफ़्तारियां अब इतनी आम हो गई हैं कि बच्चों के खेल का हिस्सा बन चुकी हैं.
एक मां ने बताया, ‘यहां के बच्चों ने अपने खेल खुद बना लिए हैं – वे ‘रेड’, ‘जेल मुलाकात’ और ‘गिरफ़्तारी’ का खेल खेलते हैं.’ जब वो ये बात कह रही थीं, तो उनके बच्चे और कुछ पड़ोस के बच्चे हमारे आसपास खड़े होकर ये बातचीत ध्यान से सुन रहे थे.
स्थानीय लोग कहते हैं कि बच्चों को इन बातों से बचाना अब नामुमकिन है. एक छात्रा, जिसने हाल ही में 10वीं की परीक्षा पास की है, कहती है, ‘जब पुलिस किसी भी समय हमारे दरवाज़े पर दस्तक देती है और पूरे गांव को आतंकवादी बनाकर पेश करती है, तो हम बच्चों को कैसे इन सबसे दूर रखें?’
वह बताती हैं कि इस बार पुलिस उनके बड़े भाई को ढूंढने आई थी. ‘उन्होंने मेरा फ़ोन भी लिया और मेरी कॉन्टैक्ट लिस्ट व ऐप्स चेक करने लगे. लेकिन जब वो मेरी फोटो गैलरी देखने लगे, तो मुझे गुस्सा आ गया. मैंने फ़ोन छीन लिया और सख़्ती से कहा कि मैं एक लड़की हूं और ये मेरी प्राइवेसी का उल्लंघन है.’
इस बार 22 लोगों के ख़िलाफ़ जिन घरों में तलाशी वॉरंट जारी किए गए थे, उनमें से कम से कम दो लोग उस वक़्त हज यात्रा पर थे. लेकिन इसके बावजूद, पुलिस उनकी अनुपस्थिति में घर में घुस गई.
स्थानीय लोगों के मुताबिक, उस समय घर में सिर्फ़ उनकी दो किशोर बेटियां मौजूद थीं. एक रिश्तेदार ने पूछा, ’एटीएस ने कहा कि उन्हें पक्की ख़ुफिया जानकारी थी. अगर ऐसा था, तो उन्हें पता होना चाहिए था कि घर में सिर्फ़ लड़कियां हैं. फिर भी उन्होंने छापा मारा. क्या ये क़ानूनी है?’
कुछ किशोर लड़कों ने शिकायत की कि उन्हें कई बार पुलिस उठाकर ले गई और पूछताछ की. एक 22 वर्षीय युवक ने कहा, ‘वे हमसे 1980 और 1990 के दशक की बातें पूछते हैं. जब हम कहते हैं कि हम तब पैदा भी नहीं हुए थे, तो वे हमारी बातों पर यक़ीन ही नहीं करते.’
‘मीडिया हमारी बात सुनना ही नहीं चाहता’
स्थानीय लोग कहते हैं कि मीडिया अक्सर पुलिस की कार्रवाई को एकतरफा ढंग से पेश करता है और कभी यह जानने की कोशिश नहीं करता कि इन कार्रवाइयों का समुदाय पर क्या असर पड़ता है. हर बार जब गांव में छापा पड़ता है, तो बड़ी संख्या में मीडिया टीमें भी पहुंच जाती हैं.
सईद* कहते हैं, ‘उन्हें हमारी बात सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं है. वे बस मुस्लिम-विरोधी बातों को फैलाना चाहते हैं.’
वो एक घटना का ज़िक्र करते हैं जब टीवी रिपोर्टरों की एक टीम कार से ही गांव की शूटिंग कर रही थी. ‘मुझे समझ नहीं आया कि उन्होंने कार से ही धुंधली, हिलती-डुलती वीडियो क्यों ली. मैंने एक रिपोर्टर से कहा कि बाहर आओ, लोगों से मिलो और उनका पक्ष सुनो. लेकिन उन्होंने मना कर दिया.’
सईद का मानना है कि यह जानबूझकर किया गया ताकि गांव को ‘खतरनाक जगह’ दिखाया जा सके– जैसे रिपोर्टरों के लिए भी यहां आना सुरक्षित नहीं.
पुलिस और मीडिया, दोनों की नकारात्मक भूमिका ने गांव के लोगों को बहुत सतर्क और आशंकित बना दिया है. जब द वायर ने उनसे संपर्क किया, तो वे बात करने को तैयार थे लेकिन साफ़ शब्दों में कहा कि किसी की तस्वीर न ली जाए और पहचान ज़ाहिर न की जाए. एक व्यक्ति ने कहा, ‘पिछली बार जिन लोगों ने खुलकर मीडिया से बात की थी, इस बार उन सबके नाम सर्च वॉरंट में आ गए हैं.’
पुलिस ने कई तरह की थ्योरीज़ सामने रखी हैं, लेकिन मीडिया का ध्यान जिस पर सबसे ज़्यादा गया, वह यह दावा था कि नाचन ने गांव को ‘स्वतंत्र इस्लामी राज्य’ घोषित कर दिया है और उसका नाम बदलकर ‘अल-शाम’ रख दिया है — जो आतंकी संगठन आईएसआईएस के विस्तारवादी इरादों की याद दिलाता है.
हालांकि गांव वाले इस दावे पर हंसते हैं. एक बुजुर्ग निवासी, जो पहले जेल जा चुके हैं, कहते हैं, ‘हमारे गांव में मुसलमान, दलित और आदिवासी साथ रहते हैं और एक-दूसरे के त्योहार मनाते हैं. हम हर साल मिलकर गणपति की शोभायात्रा निकालते हैं. फिर कोई इसे ‘इस्लामी राज्य’ कैसे कह सकता है?’
द वायर की टीम 65 वर्षीय वसीमा मुल्ला के घर भी गई, जिनकी मौत उस वक्त दिल का दौरा पड़ने से हो गई जब पुलिस उनके घर में दाख़िल हुई. उनके परिवार ने बात करने से इनकार कर दिया, लेकिन पड़ोसियों ने बताया कि जैसे ही वसीमा ने अपनी बेटी के घर पर पुलिस को छापा मारते देखा, वो घबरा गईं और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगीं. फिर अचानक ज़मीन पर गिर पड़ीं. एक पड़ोसी ने दावा किया कि जब पुलिस को उनकी मौत की जानकारी दी गई, तब भी उन्होंने उनके दामाद को उनके पास जाने की अनुमति नहीं दी.
गांववालों का मानना है कि अगर छापेमारी इतनी ही ज़रूरी थी, तो इसे दिन में किया जा सकता था. एक बुजुर्ग महिला ने कहा, ‘उन्हें हमें डराना था, लोगों को झकझोरना था, ये दिखाना था कि वे कुछ भी कर सकते हैं और कोई उनसे सवाल नहीं कर सकता.’
*नाम बदले गए हैं ताकि पहचान ज़ाहिर न हो.
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