दिल्ली विश्वविद्यालय में किसी भी पाठ्यक्रम में मनुस्मृति नहीं पढ़ाई जाएगी: कुलपति

दिल्ली विश्वविद्यालय में धर्मशास्त्र अध्ययन नामक नए पाठ्यक्रम में मनुस्मृति को प्राथमिक पाठ के रूप में शामिल किए जाने के बाद कुलपति योगेश सिंह ने कहा कि संस्थान में किसी भी रूप में मनुस्मृति का कोई भी हिस्सा नहीं पढ़ाएंगे. यह निर्देश पहले भी जारी किया गया है और विभागों को इसका पालन करना चाहिए.

(फोटो साभार: फेसबुक)

नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय में धर्मशास्त्र अध्ययन नामक नए पाठ्यक्रम में मनुस्मृति को प्राथमिक पाठ के रूप में शामिल किए जाने के बाद कुलपति योगेश सिंह ने गुरुवार (12 जून) को कहा कि संस्थान में इस पाठ को ‘किसी भी रूप में’ नहीं पढ़ाया जाएगा.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार सिंह ने कहा, ‘हम दिल्ली विश्वविद्यालय में किसी भी रूप में मनुस्मृति का कोई भी हिस्सा नहीं पढ़ाएंगे. कुलपति कार्यालय द्वारा यह निर्देश पहले भी जारी किया जा चुका है और विभागों को इसका पालन करना चाहिए. इन निर्देशों के बाद विभाग को इसे पहले ही नजरअंदाज नहीं करना चाहिए था.’

इससे पहले पाठ्यक्रम का उद्देश्य बताया गया था कि यह प्राचीन भारतीय समाज को समग्र रूप में और उसके भागों के रूप में संस्कृत में संकलित ग्रंथों में चित्रित किया गया है, जिन्हें धर्मशास्त्र के रूप में जाना जाता है.

इस पाठ्यक्रम में रामायण, महाभारत और पुराण जैसे अन्य हिंदू धार्मिक ग्रंथों को भी शामिल किया गया है. इस पेपर को वर्तमान शैक्षणिक सत्र में एक मुख्य पाठ्यक्रम के रूप में पेश किया गया है और इसमें चार क्रेडिट हैं. यह उन स्नातक छात्रों के लिए है, जो कामचलाऊ संस्कृत जानते हैं.

आपस्तंब धर्मसूत्र, बौधायन धर्मसूत्र, बौधायन धर्मसूत्र, वशिष्ठ धर्मसूत्र, मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद स्मृति और कौटिल्य अर्थशास्त्र जैसे ग्रंथों को प्राथमिक पाठ के रूप में शामिल किया गया था.

वीसी सिंह ने हिंदुस्तान टाइम्स को बताया, ‘हमारा रुख वही है. डीयू में किसी भी कोर्स में मनुस्मृति नहीं पढ़ाई जाएगी. यूनिवर्सिटी ने पहले भी यह स्पष्ट कर दिया था. संस्कृत विभाग के ‘धर्मशास्त्र अध्ययन’ से इस पाठ को हटा दिया गया है. भविष्य में भी जब भी हमारे संज्ञान में आएगा कि इस पाठ को पढ़ाई के लिए सुझाया गया है, तो प्रशासन इसे हटा देगा.’

गौरतलब है कि इससे पहले मनुस्मृति को लागू करने की व्यापक रूप से आलोचना की गई थी, क्योंकि इसमें सामाजिक, आर्थिक और लैंगिक असमानताओं को बढ़ावा देने और उन्हें मजबूत करने की बात कही गई थी, जिसके कारण विश्वविद्यालय के कुछ फैकल्टी सदस्यों ने इस कदम पर चिंता जताई थी.