एक
देश बदल जाने से कुछ सहूलियतें ख़त्म हो जाती हैं. इतनी दूर से तो अपने शहर जाने के लिए भी योजना बनानी पड़ती है. हालांकि, अब किसी शहर को अपना कहते भी रपटीला भ्रम गिरफ़्त में ले लेता है. जयपुर- जो कभी घर था, वहां बिताए हुए दिन अब किसी और समय की बात लगते हैं.
लेकिन इस बार भारत जाने पर मैं मसूरी जाना चाहती थी, एक बार फिर. एक कारण शायद यह भी हो कि मसूरी वह पहला हिल स्टेशन ठहरा जहां पहली बार मैं गई थी..लगभग पच्चीस-छब्बीस वर्ष पहले. औघड़ दिनों का स्मृति-लोक. किशोरावस्था में मन हर बात में रूमान तलाशता है. संभवतः उसी रूमान से मसूरी सदा के लिए बद्ध हो गया. अपरिपक्व अवस्था की सुरीली तान. स्वयं की आवृत्ति का आकर्षण, बीता हुआ दुहराने का आनंद, कुछ अधूरा रह जाने का अनुताप.
उस लड़की की अनगढ़ हंसी छू लेने का लोभ जो कंधों पर शॉल डाले, झूले पर बैठे हुए टटकी हवा सांस में भर रही थी. जो ओस से भीगे फूल चुन रही थी, सोचते हुए कि कभी अपने प्रेमी के साथ यहां आना कैसा होगा! लड़की जो जल-प्रपात को दूर से देख भर सकी थी और जिसके मन में गढ़वाल टेरेस के सामने वाली बेंच पर बैठ कॉफ़ी पीने की हुलास जागी थी. किए जाने वाले कामों की फ़ेहरिस्त में एक गांठ और लगाई थी.
किसी दिन धूप की जगह कोहरा उतर आए या कोहरे की जगह सिर्फ़ बादल या बादलों की जगह सुथरा-सा आसमान, मसूरी का नक़्श ऐसे बदल जाता है जैसे प्रेमिका ने प्रेमी के मन के अनुसार अपना मिज़ाज बदल लिया हो. आख़िरी बार वहां गए चार या शायद पांच वर्ष बीते. यूं समय की चिक उठा कर देखने पर तारीख़ों का हिसाब-किताब मिल सकता है पर तारीख़ों में कोई जगह बंध जाए तो उस जगह का अचरज ख़त्म हो जाता है. धुंधलका ही अतीत का सौंदर्य बढ़ाता है. स्मृतियां फलती-फूलती हैं, तारीख़ों के जाल से बाहर आकर.

दो
प्रायः एकांत खोजते हुए जब हम भटकते हैं तब अपने वर्तमान से भाग रहे होते हैं. किंतु हम निपट अकेले कहां हो पाते हैं. नितांत ख़ाली जगहों पर भी कोई न कोई आकर हमें चौंका देता है. ऐसी ही एक मसूरी यात्रा में मुझे वह मिला था- घूंघरदार बाल, चमकीली-सपनीली आंखों वाला. वह प्रोफेशनल गाइड नहीं था. अपने एक दोस्त की मदद कर रहा था, उसका नया होमस्टे सेट करने में. कुछ महीनों बाद वह जर्मनी जाने वाला था, अपनी पीएचडी के लिए. पर वह वहां ऐसे उपस्थित था जैसे हमेशा के लिए वहीं रह जाने वाला हो. वह इतने मन से, रम कर हमें घुमा रहा था कि लग रहा था उसके जीवन का केंद्र यही यात्रा है. जैसे वह कहीं नहीं जाएगा, जैसे वह हमेशा मसूरी में रहेगा और उसी होमस्टे में रहकर अपने दोस्त की मदद करेगा.
हम दो दिन वहां रहे और वह दोनों दिन हमारे साथ रहा..हमारी शिकायतें सुनता हुआ, उन्हें दूर करता हुआ. उसके हावभाव में यांत्रिकता नहीं था बल्कि थी गुनगुनी ऊष्मा. जब वह कुछ नहीं कर रहा होता तब लाइब्रेरी में किताबें पढ़ रहा होता. हम डेक पर बैठ कर सामने बहती पानी की पतली धारा देखते और वह अपना ट्रम्पेट निकाल लाता. एक रात हम सब देर तक बैठे रहे जैसे क्रिसमस की छुट्टियों में कोई परिवार साथ बैठा हो. रात देर से सोने के बावजूद अगले दिन सब जल्दी उठ गए थे. ट्रेक पर जाना था.
ट्रेक की शुरुआत में वह हमारे आगे चल रहा था, संकरे रास्ते पर पेड़ों की डालियों को परे करते हुए, रास्ता बनाते हुए, रास्ता दिखाते हुए. संकरा रास्ता कुछ देर बाद बड़ी-चौड़ी पगडंडी में बदल कर खुले जंगल में तब्दील हो गया था. मकरंद और मलभुक के विलोम स्वरों तले हम पहुेच गए थे. उसने हमें नवेले पौधे दिखाए, कुछ दुर्लभ फूल, कुछ वनस्पतियां. वह पौधा भी जिसे छूने से खुजली होती है, जिसे वहां की बोली में कंडाली कहते हैं और जिसका साग बनाया जाता है. यह सब बताते हुए वह इतने संकोच में था कि कहीं हम उसके ज्ञान को अभिमान न समझ लें. हमें समझाते हुए वह एक विशेष ऊंचाई पर पहुंच जाता और अंत में एक भीनी मुस्कुराहट से हमारे सम पर आ जाता.

हमें ब्रिटिश पम्प हाउस जाना था पर हम रास्ता भटक गए थे. वह वहां कई बार जा चुका फिर रास्ता कैसे भूल गया? जवाब में उसने कहा था, ‘जंगल के रास्ते भूल-भुलैया होते हैं. एक पगडंडी पर पांव धरो, दस पगडण्डियां उग आती हैं.’
अंत में जब कुछ घंटे पैदल चलने के बाद हम वहां पहुंचे तब तक बादल उफ़न कर नीचे गिरने लगे थे. हमने अपने मफ़लर और कार्डिगन कस लिए. हम ब्रिटिश पम्प हाउस देख रहे थे जहां से पूरे मसूरी को पानी सप्लाई होता था, वर्तमान की ओर झुक आयी अतीत की एक डाल. ढेर सारी बड़ी-बड़ी मशीनें अपने पुरानेपन को गर्व से सँजोए, जिनके कल-पुर्ज़े तक मिलना अब मुश्किल.
वहां की देखभाल करने के लिए थे एसके. पाठक साहब, आदमकद समय के एक छोटे बिंदु की भांति. हमें वहां का इतिहास बताने लगे. असीम शांति उनके चेहरे पर विराजमान थी ज्यों यही उनका मोक्ष हो. जब हम लौटने लगे तो उसे जानने वाले बहुत-से लोग मिले. किसी से वह बात कर रहा था तो कोई ठहर कर उसका हाल ले रहा था. वह सबको और सब उसको इतना जान रहे थे जितना किसी शहर में अरसे से बसने वाले ही जान सकते हैं.
रास्ता फिर ऊबड़-खाबड़ होने लगा था. हम फिर किसी अजाने रास्ते पर थे. कुछ देर में पानी की आवाज़ सुनाई देने लगी. कोई अनाम झरना. इतना असल पर इतना काल्पनिक. अगले ही क्षण हम पानी के भीतर थे.
फिर वह हमें ले गया उजाड़ खंडहरों के बीच. ठंड की मारी पीली घास पर कुछ लोग पसर गए, कुछ लोग टूटी इमारत की डुलती दीवार पर चढ़ गए और कुछ लोग पहाड़ से पैर लटका कर बैठ गए.
उसने कहा, ‘इस जगह का ज़िक्र किसी किताब में, किसी ऑनलाइन साईट पर नहीं मिलेगा.’
हम उस जगह को अपने भीतर भरने लगे. किसी विरल स्थल पर जा पहुंचना, उस स्थल के अपने होने-सा सुख प्रदान करता है. जैसे वह जगह नितांत हमारी है, उस पर मात्र हमारा स्वामित्व है. आधिपत्य की यह अनुभूति कितने गहरे तक हमारे भीतर पैठी होती है. आधिपत्य जगहों पर, व्यक्तियों पर भी. जो हमारा है, वह किसी और का न होने पाये, यह भय किसी चरबदस्त की भाँति हमें सदा कुरेदता रहता है और हमारे संबंधों पर छाया बन खड़ा रहता है.

बादलों की छांह में हल्की तपिश भर रही थी. वह पेड़ के नीचे लेटा था, माथे पर बांह धरे, घुटने मोड़े. उस समय वह वहां था पर अनुपस्थित प्रतीत हो रहा था. मुझे इच्छा हुई कि उसके भीतर छिपे रहस्य जानने की पर रहस्य तो क़ीमती होते हैं. यूं ही कोई नहीं सौंप देता न यूं मांगे जाते हैं. ऊंघती हुई चुप एक बार फिर हमारे बीच आ बैठी थी. कुछ देर बाद उसी ने हमारा सम्मोहन तोड़ा.
ज़मीन पर पड़ा पाइन कोन उसने मेरे हाथ में पकड़ा दिया. पाइन कोन कहने को पेड़ का ख़ारिज हिस्सा हैं पर पेड़ से अलग होकर भी अपने साथ वह गंध ले आते हैं जिस से जंगल महकता है, ज्यों दो लोगों के अलग हो जाने पर भी प्रेम बचा रहता है और प्रेम टूटने पर प्रेम की स्मृतियां.
कुछ देर बाद हम पहुंच गए थे गहरे-घने जंगल में. वह हमें सांपों से सावधान करता, क़िस्से सुनाता, सीटी बजाता चलता, किसी की बातों पर ठठाकर हँसता. वह थोड़ी देर पहले वाले लड़के से एकदम भिन्न था. वह हम सब से डूब कर बातें कर रहा था, यह सोचे बग़ैर कि यह सब आज भर के लिये है. अपरिचितों की तरह मिले, वैसे ही अलग हो जाएंगे.
जंगल से बाहर आए ही थे कि बर्फ गिरनी शुरू हो गई. छोटे-छोटे सफ़ेद फूल. मैंने पहली दफ़ा वह जादू देखा था. ठंडे, गलन भरे सफ़ेद फूल धीरे-से जिस्म की ऊष्मा से टकरा कर फूट जाते. इधर वे आकर ठहरते, उधर बदन में सरसराहट पैदा होती. न हम कहीं से आए थे, न हमें कहीं और जाना था. उसके लंबे बालों में सफ़ेद फूल उलझ गए थे. चटक काले के बीच निर्दोष सफ़ेद. वह भी हंस रहा था, दूधिया हंसी.
उसने कहा, ‘अब चलते हैं. बर्फ की बारिश तेज़ होने वाली है.’ हम फिर एक पाँत में उसके पीछे चलने लगे थे. लौटते हुए एक कैफ़े में मैंने अफ़ोगाटो ऑर्डर की. इसका ज़िक्र मैंने एक उपन्यास में पढ़ा था. ठंडी वैनिला आइसक्रीम पर गर्म एस्प्रेसो, ज्यों ठंड में गर्म दुशाला ओढ़ लिया हो.
उस दिन के बाद हम सबको वक़्त और मसरूफ़ियत निगल गए. वह दिन स्थिर था पीछे छूटे कालखंडों में, पर हम भूल गए थे-उस दिन को, उस जंगल को, उस हंसी को, उन लोगों को जो हमें मिले थे.

तीन
वर्षों बाद एक मेसेज चमका, ‘मेरे पिता की मृत्यु हो गई है.’ यह कौन था!
मुझे भूली हुई बातें याद आने लगीं. याद आया कि वह मसूरी छोड़कर जर्मनी जाने वाला था, कि उसके पहाड़ छूटने वाले थे. उसके पिता की मृत्यु हो गई है. मुझे क्या कहना चाहिए? पिता की मृत्यु के बाद उसे दो दिन के लिये मिली एक परिचित अपरिचित की याद आयी है. क्यों? मैं नहीं पूछ पाई. दुख के रास्ते तय नहीं होते हैं. वह दरारों से रिस कर फूट पड़ता है. मैं उसे कुछ लिखना चाहती थी, जो उसकी उदासी से मेल खाए किंतु उसे उदास न करे. मुझे नहीं सूझा.
मैं एकटक उस मेसेज को अलग-अलग तरह से पढ़ने की कोशिश करती रही ज्यों ऐसा करने से उसके मायने बदल जाएंगे. किसी दिन मेरे पिता भी नहीं रहेंगे. किसी दिन मां भी नहीं रहेंगी. तब मुझसे कोई नहीं पूछेगा आंखों के नीचे काले गढ़े क्यों पड़ गए हैं. मेरा अकेलापन मुखर हो उठा. मुझे याद आया मैं तब से ऐसी किसी यात्रा पर नहीं गई हूँ. मैं एक जगह ठहरी हुई हूँ, उस जगह के बीत जाने की प्रतीक्षा में.
मैंने उससे पूछा, ‘उसी शहर में हो?’ हां, वहीं जहां हमारी इकलौती मुलाक़ात दर्ज थी. मैंने मसूरी के हाल से शुरू किया. मसूरी जो उसके बग़ैर कल्पना से परे था, वह जो मसूरी के ज़िक्र के बिना अधूरा था. लेकिन उसका उत्तर अप्रत्याशित था. अपना शहर उसके लिए इतना भर बचा है कि जर्मनी जाने के बाद उसे मसूरी की रोज़ याद नहीं आती. आती है कभी-कभी पर ऐसे नहीं जो उसे बेचैनी से भर दे या वहां से भाग कर यहां आने पर मजबूर कर दे.

मुझे अरसे पहले वाली अपनी उदासी याद आई जो उसके मसूरी छोड़ने के विषय में सुनकर मुझे हुई थी. क्या वह अपने शहर को भूल गया था? उसने कहा वह अतीत में नहीं जी सकता. वह हर नयी जगह को ‘एम्ब्रेस’ करता है. वह रहता है जर्मनी की जेड नाम की जगह. मैंने गूगल पर सर्च किया. जेड नदी के किनारे बसी छोटा-सी जगह. वह कह रहा था कि अपना वर्तमान शहर उसे बेहद अच्छा लगता है.
पढ़ाई, दोस्त और घूमना. मीलों की पैदल यात्रा. अपनी दोस्त की बच्ची का गॉडफादर है वह. उसने बच्ची की तस्वीर भेजी. तस्वीर में वह भी था. शरीर कुछ भर गया है, बाल भी लंबे हो गए हैं, आंखें लेकिन वैसी ही हैं. तस्वीर में वह खुश दिखाई पड़ रहा था.
मैंने पूछा, ‘मन लगता है पराये देश में?’ उसने लिखा था, ‘नए देश बहुत उदार हो जाते हैं अगर उन्हें अपना लिया जाए.’
तो क्या मेरी ही विफलता है कि मैं अब तक बैंकॉक में आउटसाइडर महसूस करती हूं?
उससे एक बार मिली अवश्य थी पर उसे जानती नहीं थी. अब मैं उसे जान रही थी. एक लड़का जो मुझसे ठीक अगली पीढ़ी का था. जिसके सोच की शृंखला नयी, विस्तृत और गहरी थी. मैं अपनी उलझनें सवालों में ढाल कर उसके आगे रखती और बदले में मुझे मिलते लंबे जवाब जो परिस्थितियों को देखने का नया दृष्टिकोण मुझे दे देते. मैं उसकी बातें पढ़ती. मैं उसे लिखती. अक्सर मैं मुस्कुराती. कभी-कभी रो भी देती. हमारे बीच कितनी ही बातें होतीं. उसके शब्द मेरे लिए रामाप्रिय की गंध-से सुखदायक थे.

हमारे पसंदीदा लेखक, हमारी पढ़ी हुई अनगिनत किताबों, लिखी जाने वाली किताबों, पसंद के संगीत, बचपन के दिन, हमारे स्वप्न, हमारे किए गए गुनाहों और किए जा सकने वाले अपराध, अपराध-बोध और ईश्वर. मैं अब ‘मोका’ पीने लगी थी और वह अपनी ‘लाटे’ ख़ुद ब्रू करने लगा था. हमारी भाषा अंग्रेज़ी से हिंदी की ओर बढ़ रही थी और धीरे-धीरे उसमें देशज शब्द भी शामिल होने लगे थे.
उसकी बातों में अक्सर कोई कुमाऊंनी शब्द जड़ा होता. वह जर्मन अच्छे से लिख-पढ़ लेता है. पीएचडी भी उसी भाषा में है. अब उसी भाषा में किताबें लिखने वाला है. एक मैं हूँ जो कभी कोई और भाषा इस तरह सीख ही नहीं पायी कि उस भाषा में लिख-पढ़ सकूँ. ‘नयी भाषा जादुई होती है. एक्सप्रेशन के लिए नई-पूरी दुनिया मिल जाती है’, उसने लिखा था.
मेरे पास नई दुनिया नहीं है, मेरे पास मेरी मौजूदा दुनिया भी पूरी नहीं है. मैंने कहा नहीं, बस सोच कर रह गई.
‘नयी भाषा से नये दोस्त मिलते हैं. मेरी आख़िरी गर्लफ्रेंड वहीं की थी. भाषा दो लोगों के बीच प्रेम का पुल होती है. कभी प्रेम भी भाषा तक पहुंचने का पुल होता है.’
‘तुम्हारे साथ क्या हुआ था?’ मैंने पूछा.
‘दोनों.’ उसने लिखा. लिखते हुए वह ज़रूर मुस्कुराया होगा.
हमारी बातों में बचपन की पदचाप सुनाई देने लगी थी. उसने बताया उसे रेलों का अस्तित्व बहुत देर से मालूम हुआ. वह अक्सर बस से यात्रा किया करता. मुझे याद आया मेरा दिन रेल की सीटी से जागा करता. उसने कभी पानी से होली नहीं खेली थी, मेरे लिये होली का अर्थ ही पानी में भीगना था. उससे बातें करते वक्त जो याद नहीं था, वह याद आता जाता था. जो भुला गया था, वह सामने खड़ा था. पुरानी ज़िंदगी की तपिश नई ज़िंदगी तक पहुंचने लगी तो मैंने पूछा, ‘नॉस्टलजिया चुभता नहीं है?

उसने लिखा, ‘नॉस्टलजिया सूर्यास्त की तरह होता है जिसे हम रोज़ देखते हैं. हर बार वह पिछले सूर्यास्त की तरह सुंदर होता है. उस सुंदरता में कुछ बदलता नहीं है. वह देखना भी कुछ क्षणों का होता है. उसी तरह हम पुराने दिनों को याद करते हैं पर उसमें दफ़्न नहीं हो जाते. छोटी-छोटी बातें हमें बनाती हैं. कुछ उपस्थित, कुछ अनुपस्थित, कुछ मलाल, कुछ सुकून, कुछ सफलताएं, कुछ असफलताएं, सबसे गढ़े गए हम.’
उसने अपने घर की तस्वीर भेजी. पीढ़ियों का इतिहास समेटे घर की, जहां आधी सदी पहले एक चीनी मोची का परिवार रहा करता था. बाद में वह घर बेच कर अपने देश चला गया और यह घर ख़रीदा उसके दादा ने. उस घर की खिड़कियाँ भी बहुत पुरानी हैं जो कितने ही बदलावों की साक्षी रही होंगी. तस्वीर में खिड़कियाँ भी थीं, वैनेशियन ब्लाइंड्स से ढकी.
उसने अपनी पहली किताब लैंडोर में, पेड़ों से मुंदी सेमेट्री में लिखना शुरू किया था.
‘वहीं क्यों?’
‘ऐसी जगहों के कोने-कोने से फूटती है रोशनी, जीने की लालसा, इश्क़ की इच्छा. उसी अंकुरण को मैं अपने लिखे में उतारता रहा था. उसी को लिए विदेश चला आया. जो वहां बोया गया, वह यहां पनप गया.’
‘आपने किसी सेमेट्री में बैठकर नहीं लिखा?’ उसने पूछा था.
औरतें कहां श्मशानों में फिरती हैं, वह भी लिखने के लिए. उन्हें तो एक कोना भर मिल जाए और मिल जाए ख़ाली समय. उसके प्रश्न से मुझे याद आया धर्मशाला का चर्च और उसके पास बनी क़ब्रगाह और याद आयी हाल ही में देखी चाओ-फ्राया के किनारे बनी एक क़ब्रगाह.

कब्रगाहों की, श्मशानों की बात करते हुए हम जाने कहां-कहां की यात्रा कर आये. एक आकाशगंगा से दूसरी आकाशगंगा तक. उसने कहा, ‘बार-बार टूटते हुए कोई चीज़ अंततः चूरा हो जाती है.’
मैंने लिखा, ‘हमारा मन भी एक रोज़ चूरा-चूरा हो जाएगा, हमारी देह तो हो ही जाती है.’
वह पिता की मृत्यु पर भारत आया था, लंबे समय बाद. इस बार जब आया सब बदल चुका था. घर के मायने, शहर के मायने. एक ईंट के खिसकने पर, पूरी दीवार कमज़ोर पड़ जाती है. माँ थीं पर पिता के बग़ैर माँ नहीं लग रही थीं. मां का अकेलापन डराता था.
उसने मृत्यु पहली बार देखी है, अपने पूरे आक्रामक रूप में. मृत्यु की थपेड़ इतनी तेज़ होती है, यह तब तक नहीं जाना जा सकता जब तक यह चोट स्वयं को न लगी हो. वह जीवन के निर्णायक अंत पर अनगिन बातें लिखता गया. दूसरों की बातें पढ़ते-सुनते हुए हम अपने भीतर की उलझनों पर निगाह डालने लगते हैं. उन गिरहों तक पहुंचने लगते हैं जिनके अस्तित्व से हम अपरिचित होते हैं.
मुझे मेरी देखी हुई पहली मृत्यु याद आयी, दादा की. बाद उसके नाना की. मुझे याद आया कि छुटपन में वे मेरे जीवन से यूं जुड़े थे ज्यों चौखट से दरवाज़ा. मुझे यह भी याद आया कि मुझे जितना शोक मनाना चाहिए था, उन्हें जितना याद करना चाहिए था, मैंने नहीं किया. उनके होने और फिर न होने को मैंने ऐसे स्वीकार लिया जैसे हवा से हिलते पेड़ों को या नदी में तिरती नावों को. लेकिन उनके न होने से जो जगह ख़ाली हुई वह फिर कभी नहीं भरी.

मैंने महसूस किया कि असल में मैं अब तक उनकी अनुपस्थिति से उबर नहीं पायी हूँ. पीड़ाओं को भुलाते हुए हम स्वयं खो जाते हैं. कितने घर उसने बदले, कितने मैंने भी बदले. घर जिसे समझा वह घर नहीं हुआ, घर जिसे नहीं समझा उसका बिखरना तय था. जो घर बनाया, उस घर से हम भी बने. जो घर टूटे, उनके पैने कोनों ने हमें भी कुरेदा.
‘बालों का क्या?’
‘छोटे करवा लिए.’
हमने चुप्पी को तोड़ा था.
हमारे संदेश लंबे ख़तों में बदल रहे थे जो हम तवील फ़ुरसत होने पर लिखते. हमारे बीच शिकायतें नहीं थीं. हमारे बीच वायदे नहीं थे. इंतज़ार भी नहीं था. वह ऐसी स्पेस थी जहां हम निष्कवच रहते, जो सवाल पूछा जाता उसका जवाब ज़रूर देते चाहे वह प्रश्न कितना भी असहज करने वाला होता. आहिस्ता-आहिस्ता हमने पाया हम किसी भी प्रश्न पर असहज नहीं होते. सवालों का पथरीलापन झड़ने लगा था. मैं उससे ज़िंदगी सीख रही थी. मैं पारदर्शी हो रही थी. वह भी.
उसने नई किताब लिखी है. डाक से भिजवा रहा है. ‘किताब में मेरा शहर है. मुझे मसूरी की इतनी याद आती थी कि किताब लिख दी.’ वह अपना सच टुकड़ों में लिख कर मुझे भेज रहा था. अपने शहर की यादें उसने किताब में रख दी हैं. मैं आंखें बंद करती हूं और मसूरी को याद करती हूं जहां मैं कई बार गई, जहां मैं अरसे से नहीं गई, जहां मैं फिर जाऊंगी. वहां के स्वर, सुगंध, घंटाघर, डुलती बत्तियां, लैंडस्केप, चीड़-देवदारों का संकुल.
‘मैं नॉस्टॉलजिया में दफ़्न हो गई तो?’
‘जो वहां दफ़्न होता है, वह अमर हो जाता है.’
(दिव्या विजय को प्रथम जानकी पुल शशिभूषण द्विवेदी सम्मान मिल चुका है.)
