शहर संभावना भी है और नरक भी…

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कभी शहर का उत्सव है तो कहीं उसमें घटती मानवीयता पर विलाप. कई बार प्रश्नांकन, कई बार सचाई का लाचार स्वीकार. तो कहीं छूट गए गांव-कस्बों की मार्मिक यादें. अकेले शहरों पर लिखी गई कविताएं मानवीय स्थिति के इतने पक्षों को समेटे हुए हैं.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

आज की ज़्यादातर कविता शहरों में लिखी जाती है. शायद पढ़ी भी ज़्यादा शहरों में जाती है. इस कविता का एक बड़ा अंश स्वयं शहरों पर लिखा गया है. पेंगुइन से अंग्रेज़ी में एक बृहत् संचयन आया है. ‘द पेंगुइन बुक ऑफ पोएम्स ऑन द इंडियन सिटी’. लगभग एक हज़ार पृष्ठ हैं, मूल्य दो हज़ार रुपये है. उसमें बीस भाषाओं से मूल अंग्रेज़ी में लिखी गई या अंग्रेज़ी में अनूदित 375 कविताएं संकलित की गई हैं. संपादन किया है बिलाल मोइन ने. आकार में इतनी मोटी पुस्तकें इन दिनों कम ही प्रकाशित होती हैं.

भारत के सैंतीस शहरों पर कविताएं हैं, जिनमें मुंबई, पुणे, अहमदाबाद, त्रिवेन्द्रम, बेंगलुरू, जयपुर, चंडीगढ़, इलाहाबाद, बनारस, हैदराबाद, चेन्नई, कलकत्ता, शिलांग, भुवनेश्वर, इम्फाल, गुवाहाटी गैंगटोक, देहरादून आदि शामिल हैं. कविताओं की रेंज काफ़ी व्यापक है. उसमें शहरों की जनाकीर्णता, अकेलापन, उसमें अभी भी बची हुई और निरंतर घटती प्रकृति, विचित्र चरित्र, अनचीन्हीं जगहें, प्रेम और अन्य संबंध, उलझनें, विडंबनाएं, कई अपरिचित चीजें और घटनाएं आदि अनेक भाव और अनुभव शामिल हैं.

कभी शहर का उत्सव है तो कहीं उसमें घटती मानवीयता पर विलाप. कई बार प्रश्नांकन, कई बार सचाई का लाचार स्वीकार. तो कहीं छूट गए गांव-कस्बों की मार्मिक यादें. अकेले शहरों पर लिखी गई कविताएं मानवीय स्थिति के इतने पक्षों को समेटे हुए हैं. शहर संभावना भी है और नरक भी.

वाल्मीकि, अमीर खुसरो, कबीर, मीर, ग़ालिब और बहादुर शाह ज़फ़र से लेकर रवीन्द्र नाथ ठाकुर, रूडयार्ड किपलिंग, अकबर इलाहाबादी, जीवनानंद दास, विष्णु दे, सुभाष मुखोपाध्याय, मीराजी, शंख घोष, जयन्त महापात्र, एके रामानुज, नारायण सुर्वे, नामदेव ढसाल, विक्रम सेठ, आगा शाहिद अली, अरुण कोलटकर, दिलीप चित्रे, दीनानाथ नदीम, अरविंद कृष्ण मेहरोत्रा आदि कवियों की रचनाएं शामिल हैं. हिंदी से कबीर, सूरदास, निराला, कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, लीलाधर जगूड़ी, मनमोहन, अनामिका, मनीष मिश्र हैं.

दो बातें इन कविताओं से सामान्य रूप से पुष्ट होती हैं. पहली यह कि हमारे शहर अपने निजी वैशिष्ट्य में एक-दूसरे से क़ाफी अलग हैं क्योंकि उनकी ऐतिहासिकता और महत्व अलग हैं. दूसरी यह कि उनके रूप-रस-गंध में बहुत विविधता है. यह भी सूझता है कि किसी को थोड़े जतन और संवेदनशील समझ से हिंदी में शहरों को लेकर लिखी गई कविताओं का एक संचयन तैयार करना चाहिए.

पुस्तकों की होली

एक यहूदी सिद्रा देकोवन एज़राही ने अमरीकी पत्रिका ‘सलमागुण्डी’ में एक टिप्पणी लिखी है जो शुरू होती है जर्मन कवि हैनरिख़ हाइने की इन पंक्तियों से:

वह सिर्फ़ पूर्वरंग था,
जहां वे पुस्तकें जलाते हैं;
वे आख़िरकार लोगों को भी जलाएंगे.

यहूदी अपने को ‘पुस्तक के लोग’ मानते आए हैं जिसका एक आशय यह भी है कि वे छपे शब्दों को पवित्र मानते हैं- सिर्फ़ धार्मिक पुस्तकों भर के नहीं. लगता यह है कि हालांकि अभी पुस्तकें इज़रायल में जलायी नहीं गई हैं पर उसकी सरकार, जिसके पास अब तलवारें हैं, वे उनका इस्तेमाल उनके विरुद्ध कर रही है जिनके पास सिर्फ़ कलमें हैं. पिछली फरवरी में पूर्वी येरूशेलम में स्थित दो पुस्तकों की दुकानों में इजरायली पुलिस दाख़िल हुई और उसके कम पढ़े सिपाहियों ने, गूगल अनुवाद की मदद से, वहां से उन पुस्तकों को ज़ब्त कर लिया जिनके इस तरह अनूदित शीर्षकों ने उनको लगा कि उनकी विषय-वस्तु आपत्तिजनक हो सकती है.

याद आती है 1933 की एक घटना जिसमें बर्लिन में ऐसी ही ज़ब्ती पुस्तकों की हुई थी और बाद में उनकी होली जलायी गई थी. इन पुस्तकों में आइन्स्टाइन, फ्रायड, ब्रेख़्त, ब्रॉड, मान बन्धु, ज़्वाइग, हाफ़मान्स्थाल आदि की पुस्तकें शामिल थीं. पुस्तक-होली जिस जगह हुई बेबेलप्लाट्ज़ में, वहां एक स्मारक बनाया गया है जिसका नाम है ‘ख़ाली पुस्तकालय’.

इज़रायल में पुस्तकें जलाने की रस्म नहीं हुई क्योंकि इस बीच लाखों फिलिस्तीनियों को मारने का अभियान अमल में आ गया: पुस्तकें जलाने से कहीं बेहतर और कारगर है मनुष्यों को ही बमों से जला देना.

पुस्तकें ज़ब्त होने के कुछ दिनों बाद ज़फा में एक सभा हुई जिसमें इज़रायली यहूदी और फ़िलिस्तीनी शामिल थे, गज़ा के एक कवि हिंद जूदाह की एक कविता पढ़ी गई:

क्या मतलब है जंग के वक़्त शायर होने का
मतलब है मुआफ़ी मांगना
ढंग के ऊपर
ढंग से नीचे
ढेर सारी मुआफ़ी मांगना
जले हुए दरख़्तों से
बेआशियां परिन्दों से
मलवे में तब्दील घरों से
सड़कों पर पड़ी दरारों से
मौत से पहले और बाद बच्चों के पीले चेहरों से
हर उदास या क़त्ल की गईं मांओं के चेहरों से
क्या मतलब होता है जंग के वक़्त महफूज़ रहने का?

रैन भई चहुं ओर

याद आता है कि आज से 65 वर्ष पहले छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत की षष्टिपूर्ति के अवसर पर अज्ञेय ने हिंदी प्रकृति काव्य का, खड़ी बोली में लिखी कविताओं का एक संचयन ‘रूपाम्बरा’ नाम से संपादित और भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित किया था. उसमें पहली कविता अमीर खुसरो की थी.

पिछले सप्ताह खुसरो की ज़िंदगी और कविता पर आधारित ‘अनमास्क’ नामक रंगसमूह द्वारा, युवा लेखक-रंगकर्मी मानव कौल द्वारा प्रस्तुत, एक संगीतनाटिका ‘जो डूबा सो पार’ देखी. दो घंटे के अथक प्रवाह में, गायक-अभिनेताओं के अत्यन्त सुरीलेपन के साथ, कव्वाली शैली में खुसरो की कविताएं गायीं. ऐसे सुरीले अभिनेता मुंबई याने महाराष्ट्र में ही हो सकते हैं. बेसुरी दिल्ली में तो उनकी कल्पना ही नहीं की जा सकती, कम से कम आज. रूपाकार दास्तानगोई का है और यह प्रस्तुति एक साथ दास्तान और संगीतिका दोनों है.

खुसरो अनेक सत्ताओं के नज़दीकी थे और साथ ही निज़ामुद्दीन औलिया के भक्त भी. फ़ारसी, संस्कृत और अन्य बोलियों में निष्णात खुसरो ने उन्हीं के निर्देश पर हिंदवी में कविता लिखी और अनुभव और दृष्टि की बहुत सारी जटिलताओं को सरलता में विन्यस्त किया. उनके वितान में प्रार्थना और विकल विनयगीत हैं, विलाप और विदागीत हैं, बखान और बयान का कुछ टेढ़ापन है. कई बार उसमें अंकित यथार्थ अतियथार्थ लगता है और व्यापक विनोद भाव भी अदम्य है.

इस थोड़ी अराजक सी संपदा को दास्तान और संगीत में बांध सकना आसान नहीं है. पर इस प्रस्तुति ने उसे संभव बनाया. बतकही का रस, कविता का रूमान, समकालीन स्थिति पर जब-तब मुख्य गायक-अभिनेता के व्यंग्य सभी ने समां बांध दिया. कमानी हॉल ठसाठस भरा हुआ था और दर्शकों ने कई बार अपनी प्रसन्नता और अनुकूल प्रतिक्रिया व्यक्त की.

यों तो नाटक में संगीत का इस्तेमाल अनेक रंगकर्मियों जैसे बव कारंत, बंसी कौल, एके रैना, अरविंद गौड़ आदि ने क्षमता और कल्पना के साथ किया है. पर याद आया हबीव तनवीर का ‘आगरा बाज़ार’ जो इसी दिल्ली में ऐसे ही संगीत से भरपूर देखने का सौभाग्य मिला था. ‘जो डूबा सो पार’ का संगीत हिंदुस्तानी शास्त्रीय है जबकि ‘आगरा बाज़ार’ का छत्तीसगढ़ी लोकसंगीत था. पर दोनों का प्रभाव अभिभूति के साथ-साथ प्रश्नांकन की ओर ले जाता. दोनों ही प्रश्नावाचक थिएटर के बेहद उजले और सुंदर उदाहरण हैं.

क्या यह निरा संयोग है कि पहला नज़ीर अकबराबादी पर आधारित था और दूसरा अमीर खुसरो पर? खुसरो ने अपने समय के बढ़ते अंधेरों की शिनाख्त की थी. क्या हम भयावह और बीहड़ चकाचौंध में अपने बढ़ते अंधेरों की शिनाख़्त कर पा रहे हैं, यह प्रश्न यह प्रस्तुति हम पर छोड़ती है.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)