नई दिल्ली: साल 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की ‘बड़ी साज़िश’ से जुड़े मामले में सुनवाई तेज करने की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार (18 जून) को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (एएसजे) समीर बाजपेयी का तबादला रद्द कर दिया है. 30 मई को उनका तबादला कर दिया गया था.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, एएसजे बाजपेयी के तबादले की वकीलों ने आलोचना की थी. उन्होंने कहा था कि उनका तबादला सुनवाई को और भी धीमा कर देगा. लंबित जांच और जजों के तबादलों की वजह से मामले की सुनवाई पहले ही देरी से चल रहा है.
एएसजे बाजपेयी बीते साल सितंबर से कड़कड़डूमा अदालत में इस मामले में रोज़ाना दलीलें सुन रहे थे. तबादले के बाद उनकी जगह एएसजे ललित कुमार को दिया गया था, जिन्होंने मामलों की दोबारा सुनवाई शुरू करने का आदेश दिया था. लेकिन अब हाईकोर्ट द्वारा तबादला रद्द किए जाने के बाद एएसजे बाजपेयी इस केस की सुनवाई जारी रखेंगे.
एक वकील ने अखबार से नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘केस की रफ्तार का अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि यूएपीए समेत कई धाराओं के तहत आरोपित 18 आरोपियों में से ज़्यादातर पिछले चार सालों से जेल में हैं.’
इस मामले में दिल्ली पुलिस का दावा है कि फरवरी 2020 में हुई हिंसा ‘एक गहरी साज़िश का हिस्सा’ था.
इस मामले में जिन लोगों को आरोपी बनाया गया है, उनमें पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन, छात्र कार्यकर्ता उमर खालिद, खालिद सैफी, इशरत जहां, मीरान हैदर, गुलफिशा फातिमा, शिफा-उर-रहमान, आसिफ इक़बाल तन्हा, अतहर खान, सफूरा ज़रगर, शरजील इमाम और नताशा नरवाल शामिल हैं.
वर्षों से जेल में बंद इन आरोपियों के परिवार उनकी रिहाई की मांग करते आए हैं. वे सुप्रीम कोर्ट के इस सिद्धांत- ‘जमानत नियम है, जेल अपवाद’ की दुहाई देते रहे हैं.
पिछले साल नई दिल्ली में एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स द्वारा आयोजित एक जनसभा में उमर खालिद के पिता एसक्यूआर इलियास ने कहा था, ‘कहा जाता है कि किसी लोकतंत्र के तीन स्तंभ होते हैं- कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका. और ये एक-दूसरे से स्वतंत्र होने चाहिए. लेकिन जब देश का मुख्य न्यायाधीश अपने घर में प्रधानमंत्री को पूजा में बुलाता है और उसकी तस्वीरें वायरल होती हैं, तब क्या मुझे इंसाफ मिलने की कोई उम्मीद बची है?’
