नई दिल्ली: कश्मीरी अलगाववादी नेता शब्बीर शाह के स्वास्थ्य में कथित गिरावट के बाद उनके परिवार ने अधिकारियों से मेडिकल आधार पर उन्हें ज़मानत देने का आग्रह किया है, ताकि उन्हें जेल से बाहर विशेष उपचार मिल सके.
मालूम हो कि शाह को 2017 में गिरफ्तार किया गया था और तब से वह आतंकवाद के वित्तपोषण के आरोप में तिहाड़ जेल में बंद है. उनके परिवार ने बताया कि वह प्रोस्टेट कैंसर के अलावा अन्य बीमारियों से भी पीड़ित है, जिसके लिए विशेष चिकित्सा उपचार की आवश्यकता है.
शाह कश्मीर के अलगाववादी नेताओं और एक व्यापारी समूह के तीसरे व्यक्ति हैं, जिन्हें आतंकवाद के वित्तपोषण के आरोप में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद जेल में रहते हुए कैंसर होने का पता चला है.
इससे पहले, दिवंगत हुर्रियत नेता सैयद अली गिलानी के सहयोगी और दामाद अल्ताफ अहमद शाह और प्रभावशाली कश्मीरी व्यवसायी जहूर अहमद वटाली को भी जेल में क्रमशः गुर्दे और प्रोस्टेट कैंसर का पता चला था. शाह की जेल की सज़ा काटते समय मृत्यु हो गई, जबकि वटाली अपनी चिकित्सा स्थिति के कारण दिल्ली में घर में नज़रबंद होकर सज़ा काट रहे हैं.
शाह के एक पारिवारिक सूत्र ने द वायर को बताया कि 70 वर्षीय अलगाववादी नेता, जिन्होंने देश की विभिन्न जेलों में अपने जीवन के 35 साल बिताए हैं, का वजन काफी कम हो गया है और डॉक्टरों ने उन्हें ‘तीन सर्जरी’ की सलाह दी है, जिसके लिए प्री-ऑपरेटिव और पोस्ट-ऑपरेटिव देखभाल की आवश्यकता होगी, जो जेल प्रणाली की सीमाओं को देखते हुए पर्याप्त रूप से प्रदान नहीं की जा सकती है.
उन्होंने कहा कि शाह को इस वर्ष जून के दूसरे सप्ताह में राष्ट्रीय राजधानी के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां डॉक्टरों ने जेल अधिकारियों से परामर्श के बाद कथित तौर पर उनकी सहमति के बिना या उनके परिवार को सूचित किए बिना उनका ऑपरेशन करने की योजना बनाई थी.
सूत्र ने कहा, ‘न तो उनके भागने का जोखिम है और न ही समाज के लिए खतरा है. ये गंभीर और जोखिम भरी सर्जरी हैं और हम उनके इलाज की पूरी जिम्मेदारी लेंगे. अपने परिवार के साथ रहने के कारण उन्हें तत्काल चिकित्सा सुविधा मिल सकेगी, जिसकी उन्हें जरूरत है.’
उन्होंने कहा, ‘हम सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध करेंगे कि उन्हें (जहूर अहमद) वटाली और गौतम नवलखा की तरह ही नजरबंद रखा जाए.’
फरवरी 2022 में एक विशेष एनआईए अदालत के आदेश के बाद वटाली को तिहाड़ जेल से बाहर ले जाया गया और उसकी लाइलाज बीमारी के इलाज के लिए घर में नजरबंद कर दिया गया, जबकि नवलखा को सितंबर 2022 में शीर्ष अदालत ने एक निजी अस्पताल में इलाज कराने की अनुमति दी थी.
राजनीतिक नेताओं ने भी शाह के लिए ज़मानत की मांग की
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेता एम.वाई. तारिगामी ने शनिवार (21 जून) को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से शाह की ‘उम्र बढ़ने और कई बीमारियों’ को देखते हुए मानवीय समाधान के लिए हस्तक्षेप करने का आग्रह किया.
तारिगामी ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, ‘ज़मानत लंबित रहने तक, मानवीय आधार पर उन्हें नजरबंद रखने पर विचार किया जा सकता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उन्हें पर्याप्त देखभाल मिले… (और) उनका परिवार स्थिर और सहायक वातावरण में आवश्यक पूर्व और पश्चात की सर्जरी देखभाल प्रदान कर सके.’
उन्होंने कहा, ‘ऐसी ही चिकित्सा स्थितियों में ज़मानत दिए जाने के उदाहरण मौजूद हैं.’
तारिगामी कश्मीर के चौथे नेता हैं जिन्होंने शाह के लिए ज़मानत मांगी है. शाह को दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ द्वारा दर्ज मनी लॉन्ड्रिंग के 2005 के एक मामले के संबंध में 2017 में प्रवर्तन निदेशालय के निर्देश पर जम्मू-कश्मीर पुलिस ने गिरफ्तार किया था.
इससे पहले, हुर्रियत के उदारवादी अध्यक्ष मीरवाइज उमर फारूक, जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष सज्जाद लोन ने भी अधिकारियों से शाह को जेल से रिहा करने और उन्हें घर में नजरबंद करने की अपील की थी, ताकि उनके इलाज के दौरान उनका परिवार उनके करीब रह सके.
द वायर से बात करते हुए मीरवाइज ने कहा कि शाह की स्वास्थ्य स्थिति खराब हो गई है जबकि उनके परिवार के सदस्यों को पिछले दो वर्षों से उनसे फोन पर बात करने की अनुमति नहीं दी गई है.
मीरवाइज ने जम्मू-कश्मीर सरकार से इस मुद्दे को केंद्र सरकार के समक्ष उठाने की अपील करते हुए कहा, ‘ऐसे समय में जब वह ऐसी चिकित्सा आपात स्थिति का सामना कर रहे हैं और उन्हें सर्जरी की सख्त जरूरत है, उन्हें ज़मानत और उचित चिकित्सा उपचार देने से इनकार करना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है.’
शाह, जिन्होंने गिलानी और मीरवाइज के नेतृत्व वाले हुर्रियत कांफ्रेंस के दो गुटों को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, हुर्रियत कांफ्रेंस से संबद्ध प्रतिबंधित डेमोक्रेटिक फ्रीडम पार्टी (डीएफपी) के अध्यक्ष हैं.
पिछले हफ़्ते दिल्ली हाईकोर्ट ने शाह की ज़मानत याचिका खारिज करते हुए कहा था कि वह जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग करने की साज़िश कर रहे थे. उनके वकील ने तर्क दिया था कि अलगाववादी नेता को कभी किसी मामले में दोषी नहीं ठहराया गया है.
प्रवर्तन निदेशालय, जिसने शाह पर मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया है, ने 2022 में उनके श्रीनगर आवास को कुर्क कर लिया था और उन पर ‘पत्थरबाजी, जुलूस, विरोध प्रदर्शन, बंद, हड़ताल और अन्य विध्वंसक गतिविधियों के जरिए कश्मीर घाटी में अशांति फैलाने’ का आरोप लगाया था.
ईडी ने एक बयान में कहा था, ‘वह आतंकवादी संगठन हिज्ब-उल-मुजाहिदीन (एचएम) और पाकिस्तान स्थित अन्य आतंकवादी संगठनों के साथ-साथ पाकिस्तानी प्रतिष्ठान से हवाला और विभिन्न अन्य तरीकों और चैनलों के जरिए धन प्राप्त करने में शामिल थे और इन निधियों का इस्तेमाल कश्मीर घाटी में आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देने और समर्थन देने के लिए किया जा रहा था.’
2018 में उनकी पत्नी और श्रीनगर स्थित प्रमुख स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. बिलकिस शाह ने ज़मानत याचिका दायर की थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उनके पति को तिहाड़ जेल में ‘धीमा जहर’ दिया जा रहा है.
1992 में एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा था कि ‘राजनीतिक कैदी’ कहे जाने वाले शाह ने 39 साल से अधिक समय जेल में बिताया है, क्योंकि उनकी राजनीति के कारण उनका सरकार और यहां तक कि अन्य अलगाववादी नेताओं के साथ भी टकराव रहा.
गौरतवब है कि शाह को पहली बार 1968 में 14 वर्षीय छात्र के रूप में गिरफ़्तार किया गया था, उन पर कश्मीर में लोगों के ‘आत्मनिर्णय के अधिकार’ के लिए प्रदर्शन आयोजित करने और उसे अंजाम देने का आरोप था.
2008 में अमरनाथ तीर्थस्थल बोर्ड द्वारा भूमि हस्तांतरण के खिलाफ कश्मीर में आंदोलन के चरम पर था, तब शाह ने मुजफ्फराबाद तक एक मार्च का नेतृत्व किया था, जिसके दौरान हुर्रियत के उदारवादी नेता शेख अब्दुल अजीज की कथित पुलिस गोलीबारी में मौत हो गई थी.
