कृष्ण खन्ना: कला-जगत् की सबसे वरिष्ठ और उजली उपस्थिति

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कृष्ण खन्ना, हमारे समय के, अपनी कला भर से नहीं, अपनी सक्रियता-विचार और परामर्श से भी, एक निर्णायक मूर्धन्य रहे हैं. इस समय घिरते अंधेरों में वे एक मशाल हैं जो बहुलता, सद्भाव, जातीय स्मृति, सच के लिए और बढ़ते झूठों और घृणा के विरुद्ध निष्कंप, निर्भीक और निरन्तर जल रही है.

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अपने स्टूडियो में रमे कृष्ण खन्ना, मार्च 2017. (फोटो: द वायर)

यह एक अनोखी घटना है. मूर्धन्य चित्रकार कृष्ण खन्‍ना इस 5 जुलाई को सौ बरस के हो गए हैं. उनसे पहले उन जैसा और कोई मूर्धन्य सौ वर्ष की आयु पूरी नहीं कर पाया. वे अब भी चित्र बना रहे हैं, वे अब भी ठहाका मारकर हंसते हैं. उनकी स्मृति अब भी शिथिल नहीं, सक्रिय है. उनके एक शतक पूरे करने का एक आशय यह भी है कि अगर भारत में आधुनिक कला की यात्रा, मोटे तौर पर, डेढ़ सौ बरस की मानें तो कृष्ण उसमें लगभग अस्सी वर्ष उपस्थित और सक्रिय रहे हैं.

उनके अनेक चित्रकार-मित्र जैसे हुसैन, रज़ा, रामकुमार आदि भी दीर्घजीवी हुए पर उनमें से कई सौ बरस का नहीं हो पाया. उनके लिए यह सुखद संयोग रहा है कि उनके समय के अनेक मूर्धन्य उनके घनिष्ठ मित्र और सहकर्मी रहे हैं. उनकी बिरादरी मूर्धन्यता की बिरादरी रही है. वे अपने को मज़ाक में ‘आख़िरी खड़ा हुआ आदमी’ कहते हैं जो कि वे दरअसल कई अर्थों में हैं. सुखद यह भी है कि अब भी चित्र बना रहे हैं.

हाल में उनके घर पर हमने कुछ नए चित्र देखे: वे सफ़ेद और काले रंगों में बनाये रेखांकन हैं. जब मैंने उनके आरंभिक दिनों के जापानी पद्धति से बनाये सुमी-चित्रों की याद दिलाई तो बोले कि चीनी-जापानियों में बीच यह धारणा बहुत गहरी और व्यापक है कि सफ़ेद और काले रंग मूल रंग हैं- बाक़ी सब रंग उनमें समाये हुए हैं. उन्होंने, अगर भूलता नहीं हूं, एक अस्सी फ़ीट लंबा चित्र बनाया है जो सफ़ेद और काले रंगों में ही है.

पता नहीं क्यों कृष्ण की कीर्ति एक अद्भुत रंगकार के रूप में नहीं बनी जबकि उनके अधिकांश चित्र विभिन्न रंगों में हैं और इसका बहुत रंगारंग प्रमाण हैं कि रगों पर उनका कितना कुशल अधिकार है और उनमें उनकी रंगक्रीड़ा कितनी ऊर्जस्वित-स्पन्दित है. उन्हें रंग और रेखा का ‘मास्टर’ ही का जा सकता है. उनके यहाँ रंग बोलते हैं: वे विविधता-बहुलता, जटिलता-सूक्ष्मता में कुछ बेहद मानवीय, गहरा मार्मिक, कल्पना की सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए बोलते हैं.

कृष्ण खन्ना की कल्पना इस अर्थ में महाकाव्यात्मक है कि उन्होंने हमारे समय में मानवीय स्थिति, विडंबना, यातना और गरिमा की कथा कही है. हालांकि उन्होंने कभी अमूर्तन से परहेज नहीं किया, वे ज़्यादातर आख्यानपरक चित्रकार रहे हैं. उनकी आख्यान-भाषा एक ओर क्लासिक विषयों जैसे भीष्म पितामह, ईसा मसीह, ‘आख़िरी भोजन’, गांधी आदि को विन्यस्त करती है तो दूसरी ओर निपट साधारण और अक्सर अलक्षित बैंडवालों, ट्रकवालों और ढाबेवालों को चित्रित करती है. ऐसा विशाल वितान हमारे समय में एक नए तरह की शास्त्रीयता रूपायित करने की कोशिश रही है. नायकत्व की साधारणता और साधारणता का नायकत्व उसकी खोज के दो ध्रुवान्त हैं.

इस मुक़ाम पर यानी कृष्ण खन्ना की कला के बारे में सोचते हुए इस विचार से बच नहीं सकते कि कला, आधुनिक कला, अस्पृश्य लगती दिव्यता में निहित साधारणता को उजागर करती है और अलक्षित रही आई साधारणता, यातना को गरिमा से आलोकित कर देती है. यह गरिमा उस यातना का आत्यन्तिक पक्ष नहीं भी होती पर कला उस यातना को, साधारणता को गरिमा से आविष्ट करती है.

कला कभी-कभार अलंकरण भी करती है, शोभा भी बढ़ाती है. पर उसके द्वारा गरिमा का अभिनिवेश बेहद मानवीय, सर्जनात्मक कर्म है. सचाई कहीं भी, और भारत में, अनेक क्रूरताओं, निरर्थकताओं और विडंबनाओं से लदी-फंदी रहती है. कृष्ण की कला ने, उनके आख्यान ने उसी सचाई में अर्थ, मर्म और गरिमा की खोज प्रतिष्ठा की है.

मार्च 2017 में अपने स्टूडियो में काम में रमे कृष्ण खन्ना. (फोटो: द वायर)

कृष्ण खन्ना और उनके चित्रकार-मित्रों के बीच बहुत पत्राचार हुआ है. वह एक तरह से इन मूर्धन्यों के विचारों, प्रतिक्रियाओं, उत्सुकताओं और द्वंद्वों का एक अनौपचारिक इतिहास ही है. कृष्ण ने 1960 में रज़ा को लिखा था :

‘हालांकि मैंने छवि का त्याग नहीं किया है, धीरे-धीरे उसमें मेरी रुचि कम होती गई है और उस पेंट यानी रंग में बढ़ती गई है जिसमें वह रूपाकार लेती है. अकबर (पदमसी) का सोच था कि मैं बहुत अधिक स्वतःस्फूर्त हूं और मुझे बुद्धि के आधार पर रूप को तरजीह देना चाहिए न कि भावना के आधार पर. मैं इस तरह योजनाबद्ध तरीके से विशिष्टिता नहीं ला सकता.’

1961 में कृष्ण ने रज़ा को लिखा कि ‘मैं तुम्हारी परिभाषा को बढ़ाते हुए कहूंगा कि हर चित्र का आधार अनुभव होता है जो अपने आप में और सचाई में होता है.’

1962 में जावा के बोरोबुदूर के अद्भुत स्थापत्य को देखकर कृष्ण ने रज़ा को लिखा:

‘…वैसे हमारे समय का जो स्वभाव है और उसमें जिस तरह से वैयक्तिक शैलियों के ऊपर ज़ोर दिया जाता है, इसके कारण हमारे लिए यह संभव नहीं है कि हम इस तरह के स्मारक बना सकें.. … यह समझ बनती है कि निजी शैलियों पर ज़ोर अनेक तरह की कलाओं के द्वार खोलता है, केवल एक कला के लिए नहीं. इसलिए यह कोई तार्किक बात नहीं है कि एक ही मानक के आधार पर सभी कुछ की तुलना की जा सके. असल में, आधुनिक हालात में यह हास्यास्पद बात है कि ऐसे सिद्धान्तों की खोज की जाए जिसके आधार पर सभी चीज़ों की वैधता को देखा जा सके. … इसलिए हमें बहुत सारी शैलियों और कहन के ढंगों और करने के तरीक़ों को स्वीकार करना चाहिए जो सच में गूढ़ हैं.’

शैलियों और दृष्टियों की बहुलता का एहतराम और उनका आदर कृष्ण के कला-शास्त्र में शुरू से ही शामिल हो गया था. दरअसल, यह प्रोग्रोसिव आर्टिस्ट ग्रुप के सभी मूर्धन्यों के कला-स्वभाव में रसा-बसा रहा. वे अपनी-अपनी विशिष्ट दृष्टियों और शैलियों के कारण ही आगे चलकर मूर्धन्य बने और उनका कलाकर्म इसी बहुलता का सबसे उजला और अकाट्य साक्ष्य है.

अशोक वाजपेयी के साथ कृष्ण खन्ना की यह तस्वीर कुछ सप्ताह पहले जून के महीने में ली गयी थी. (फोटो: संजीव चौबे)

कृष्ण खन्ना ने अपने समय में आधुनिक कला से संबंधित कई राष्ट्रीय संस्थानों में यथासमय अपनी भूमिका निभाई. 1977 में वे जगदीश स्वामीनाथन के साथ ललित कला अकादेमी के सबसे बड़े आयोजन त्रिनाले में सक्रिय रहे. बाद में, स्वामी के साथ भारत भवन में भी उनकी अत्यंत सार्थक भूमिका रही. वे न होते तो त्रिनाले इतनी उच्चकोटि का बहुविध न हो पाता और न ही भारत भवन में आधुनिक कला का इतना बड़ा संग्रह हो पाता.

दूसरे शब्दों में, कृष्ण खन्ना, हमारे समय के, अपनी कला भर से नहीं, अपनी सक्रियता-विचार और परामर्श से भी, एक निर्णायक मूर्धन्य रहे हैं. आज वे अपनी जिजीविषा और सिसृक्षा से कला-जगत् में सबसे वरिष्ठ और उजली उपस्थिति हैं. भारतीय संस्कृति में इस समय घिरते अंधेरों में वे एक मशाल हैं जो बहुलता, सद्भाव, जातीय स्मृति, सच के लिए और बढ़ते झूठों और घृणा के विरुद्ध निष्कंप, निर्भीक और निरन्तर चल रही है.

घर सूना/सुख दूना

हिंदी में वात्सल्य भाव की कविता इन दिनों कम ही लिखी जाती है. वह समय और था जब सूरदास ने वात्सल्य की कविता को बहुत ऊंचाई पर पहुंचा दिया था. ऐसे में नई कविता के महत्वपूर्ण कवि और आलोचक-प्रस्तोता जगदीश गुप्त के, उनके जीवनकाल के अंतिम चरण में लिखी गई कविताओं के संग्रह ‘वासूनामा’ की ओर ध्यान जाना कई कारणों से हुआ.

इस संग्रह में उनके पोते वसु को लेकर 262 कविताएं हैं जो वात्सल्य को लेकर लिखी गई कविता की अभूतपूर्व घटना है. दूसरे, इन कविताओं में एक शिशु के बड़े होने, नटखटता, हठ, हरकतें, धीरे-धीरे कई क्रियाएं सीखने आदि की छोटी-छोटी घटनाएं मार्मिकता से दर्ज़ की गई हैं. तीसरे, खड़ी बोली में बाललीला की इतनी कविताएं किसी और कवि ने नहीं लिखी हैं.

‘गुस्ताख़ी किसने की?’ शीर्षक कविता है:

‘सोफ़े से कुर्सी से/खींचकर गद्दियां उतार देता है/कभी एक पर/कभी दोनों पर/पसर जाता है/अपनी मौज़ में/कब तक कौन कहे./सहसा कोई आ जाता तो/रास्ता नहीं देता/आनाकानी करता है/उसके राज्य में आने की/गुस्ताख़ी किसने की?’

जगदीश जी को ‘वासूनामा’ में जब-तब तुलसी और सूर की याद न आए यह संभव नहीं. ‘अब डरता नहीं’ शीर्षक कविता है:

‘दादी से हठ वश/मिर्चा टूंग लेता है/और जब जुबान पर/लगने लगता है तो/सिर घुमाने लगता/मज़ा भी और सिसियाहट भी/झेलता है/‘मिरिच दसन टकटोरे/तीछन लागी नैन भरि आए/रोवत बाहर दौरे’ -सूर/पहले डरता था/अब वासू मिर्च से डरता नहीं/कचर-कचर के खा जाता है.’

‘चला जाए तो घर सूना/आ जाए तो सुख दूना’ जैसी पंक्तियां लिखने वाले इस वरिष्ठ कवि ने साथ-साथ घर-परिवार, शहर, मेले-ठेले, खेल, उपद्रवों आदि का भी यथास्थान बखान किया है. ‘कार में क़ैद वासू’, ‘वासू के नक़्शे ही नक्शे’, ‘वासू की गणेश पूजा’, ‘वासू के हाथों में टिड्डी’ आदि शीर्षक एक शिशु के विपुल संसार की छवियां उकेरते हैं.

अगर कहीं-कहीं काव्यतत्व शिथिल लगता है तो उसकी भरपाई उस गहरी मानवीय ऊष्मा ओर उच्छल ममत्व से हो जाती है जो इन कविताओं में भरपूर है.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)