बंगाली प्रवासी श्रमिक का दावा- हम भारतीय हैं, फिर भी बांग्लादेशी बताकर पीटा और सीमा पार धकेल दिया

बंगाल के रहने वाले श्रमिकों का आरोप है कि उन्हें देश के विभिन राज्यों, जहां वे काम करने गए थे, से बिना किसी वैध कारण के ‘बांग्लादेशी घुसपैठिया’ बताकर गिरफ़्तार किया गया, पहचान पत्रों को फ़र्ज़ी बताकर छीन लिया गया और फिर बीएसएफ ने बर्बरता से पीटकर उन्हें बांग्लादेश की सीमा में धकेल दिया. कुछ लोग पुलिस की मदद से हफ़्तों बाद भारत लौट पाए, पर कई अब भी लापता हैं.

इलस्ट्रेशन: बंगाली प्रवासी मजदूर महबूब बताते हैं कि जहां उन्हें छोड़ा गया था वह इलाका दलदली जमीन थी, जिसे नो-मैन्स लैंड माना जाता है.

हरिहरपाड़ा/कोलकाता: नाज़िमुद्दीन मंडल अब मुश्किल से खड़े हो पाते हैं. मुर्शिदाबाद जिले के हरिहरपाड़ा स्थित अपने घर में वह जैसे-तैसे बैठते हैं और कांपती आवाज में जून महीने की शुरुआत की अपनी आपबीती द वायर को सुनाते हैं. 

34 वर्षीय मंडल कहते हैं, ‘मुझे बस इतना याद है कि मुंबई के कनाकिया थाने के कुछ लोग हमें उठाकर ले गए और भारी सुरक्षा में हमें अगरतला भेज दिया गया.’

वह उन कई लोगों में शामिल थे जो रोजगार की तलाश में महाराष्ट्र गए थे. मंडल के मुताबिक, 10 जून को उन्हें मुंबई पुलिस ने उठाया था, लेकिन उसके बाद उन्हें दिन-तारीख का कोई होश नहीं रहा. 

‘सब कुछ धुंधला सा हो गया है. मुझे बस याद है कि बगदा के एक पति-पत्नी भी मेरे साथ उसी प्लेन में थे जो अगरतला जा रहा था, और वे दोनों बुरी तरह रो रहे थे.’ 

नाज़िमुद्दीन मंडल. (तस्वीर: जॉयदीप सरकार)

अगरतला में मंडल का आरोप है कि बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (बीएसएफ) के जवानों ने उन्हें और अन्य को बेरहमी से पीटा. 

मंडल बताते हैं, ‘अब तक ठीक नहीं हो पाया हूं. बदन में हर वक्त दर्द रहता है. कमर और पैरों में बेहद तकलीफ है. उन्होंने हमारे कपड़े उतरवाकर तलाशी ली और फिर बुरी तरह मारा. फिर एक रात हमें बांग्लादेश की सीमा पर ले जाकर छोड़ दिया.’ वे कहते हैं कि उन्हें चार लोगों के एक समूह के साथ सीमा पर एक दलदली इलाके में छोड़ दिया गया.

द वायर ने बीएसएफ से इस मामले में संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

बांग्लादेश की बॉर्डर गार्ड (बीडीआर) ने उन्हें खोजा. मंडल कहते हैं, ‘बीडीआर अधिकारी हमारे हालात और हमारे द्वारा बताए गए पते सुनकर हैरान थे.’ इसके बाद बीडीआर ने पश्चिम बंगाल के कूचबिहार जिले के मेखलीगंज थाने से संपर्क किया और पुलिस ने मंडल व अन्य को भारत वापस लाया.

चार भारतीय पुरुषों (जिसमें मंडल भी शामिल हैं) को बांग्लादेश से ‘लौटाए जाने’ की खबर ने पूरे देश में सुर्खियां बटोरी थीं.

मंडल का कहना है कि उन्होंने मुंबई पुलिस को अपना आधार कार्ड, पैन कार्ड और वोटर आईडी दिखाया था, लेकिन पुलिस ने सारे दस्तावेज जब्त कर लिए. साथ ही उन्होंने बीएसएफ पर उनका 7,000 रुपये छीनने का भी आरोप लगाया. दस्तावेज़ और पैसे दोनों न होने की वजह से वे अब दोबारा महाराष्ट्र काम पर नहीं जा सके हैं.

मंडल उन सैकड़ों बंगाली भाषी मज़दूरों में शामिल हैं जो महाराष्ट्र में ‘बांग्लादेशी घुसपैठिए’ कहकर गिरफ़्तार किए गए और अब शारीरिक, आर्थिक और मानसिक रूप से टूटे हुए घर लौटे हैं. 

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हरिहरपाड़ा से सटे भगवांगोला के महबूब शेख, जिनकी उम्र करीब 30 के आसपास है, उन्होंने भी ऐसी ही आपबीती सुनाई. 

महबूब बताते हैं, ‘हम 15 नंबर में रहते थे. एक दिन पुलिस आई और हमें उठा लिया. हमने पहचान पत्र दिखाए, लेकिन उन्होंने कहा कि ये नकली हैं और हम बांग्लादेशी हैं.’ 

मज़दूरों और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं का दावा है कि 9 और 10 जून को मुंबई से लगभग 140 बंगाल के प्रवासी मज़दूरों को ‘बांग्लादेशी’ बताकर उठा लिया गया.

मुंबई के मीरा रोड स्थित जिस इलाके को मज़दूर ‘15 नंबर’ कहते हैं, वह कनाकिया पुलिस स्टेशन के अंतर्गत आता है. द वायर ने इस थाने के वरिष्ठ अधिकारियों से उनके बयान के लिए संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी.

महबूब का दावा है कि उन्हें पुणे ले जाया गया और बीएसएफ कैंप में चार दिन तक पूछताछ की गई. उनके अनुसार, बीएसएफ ने उनका पर्स, फोन, आधार और वोटर कार्ड, नकदी और यहां तक कि जेवर भी छीन लिए.

महबूब बताते हैं, ‘हमसे बेल्ट उतरवा दिए गए, जिसके कारण हमारे पैंट नीचे गिर गए, और वे (बीएसएफ) लोग हंसने लगे. हमें अपमानित किया गया. पैसा, फोन, कागज़ सब छीन लिया.’ 

उन्होंने बताया कि महिलाओं के साथ भी ऐसा ही सलूक हुआ, लेकिन उन्होंने इसके बारे में विस्तार से नहीं बताया. 

वह कहते हैं, ‘हमें बागडोगरा के बीएसएफ कैंप ले जाया गया, जहां हमें फिर से प्रताड़ित किया गया. हमें खाना देकर कहा, यह तुम्हारा आखिरी भारतीय खाना है. रात को हमें एक जंगल जैसे इलाके में ले जाकर धमकी दी और कहा, अगर दोबारा आए, तो गोली मार देंगे. अपने देश वापस जाओ.’ 

महबूब बताते हैं कि जहां उन्हें छोड़ा गया था वह इलाका दलदली जमीन थी, जिसे नो-मैन्स लैंड माना जाता है. हफ़्तेभर जंगलों और दलदली ज़मीन में भटकने के बाद वे कांटेदार तारों के नीचे से रेंगकर भारत में वापस आए. स्थानीय लोगों की मदद से वे रायगंज पुलिस स्टेशन पहुंचे जहां उनकी पहचान सत्यापित की गई.

वह कहते हैं, ‘अब भी बुरे सपने आते हैं. लगता है जैसे मौत से बचे, लेकिन सब कुछ खो दिया.’ 

व्यवस्थित दमन की तस्वीर

जून की शुरुआत से अब तक बंगाली भाषी मज़दूरों, खासकर अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाले लोगों की कई आपबीती सामने आई हैं. अधिकतर लोगों के पास आधार और वोटर आईडी जैसे वैध दस्तावेज़ थे, फिर भी उन्हें महाराष्ट्र में ‘बांग्लादेशी’ बताकर हिरासत में लिया गया और उनके दस्तावेजों को ‘फर्जी’ बताया गया.

शमीम खान को भी 10 जून को मीरा रोड से उठाया गया था. हरिहरपाड़ा स्थित अपने घर से उन्होंने द वायर को बताया, ‘हमें गिरफ़्तार किया गया, बागडोगरा ले जाया गया और हमारी पूरी जमा पूंजी छीन ली गई. मेरे पास 20,300 रुपये थे, सब बीएसएफ ने ले लिया.’ 

लगभग सभी पीड़ितों ने बताया कि उनके पैसे, फोन, पहचान पत्र जबरन छीन लिए गए. कई लोगों ने बीएसएफ कैंपों में अमानवीय बर्ताव, कपड़े उतरवाकर मारपीट और मानसिक प्रताड़ना की बात कही.

शमीम खान को 10 जून को मीरा रोड से उठाया गया था. उन्होंने बताया कि उन्हें गिरफ़्तार कर बागडोगरा ले जाया गया और उनकी सारी जमा पूंजी छीन ली गई. (फोटो: जॉयदीप सरकार)

खान कहते हैं, ‘हमें बुरी तरह पीटा गया. बीएसएफ ने हमें बांग्लादेशी नोट पकड़ा दिए और फोटो खींचा. हम कहते रहे कि हम भारतीय बंगाली हैं, लेकिन उन्होंने हमारी भाषा सुनकर हमें और मारा.

राज्य प्रवासी मज़दूर कल्याण बोर्ड के प्रमुख तृणमूल सांसद समीरुल इस्लाम इन मज़दूरों की मदद के लिए नेटवर्क तैयार कर रहे हैं.

इस्लाम कहते हैं, ‘मैंने पहले कभी ऐसा कुछ नहीं देखा था. भारतीय नागरिकों को विदेशी बताकर दूसरे देश में छोड़ देना हिंसक सोच को दर्शाता है.’  

इस्लाम ने बताया कि उन्होंने राजस्थान में काम कर रहे उत्तर दिनाजपुर ज़िले के इटाहर गांव के कई मज़दूरों के परिजनों ने भी संपर्क किया है, जो अब लापता बताए जा रहे हैं.

हरिहरपाड़ा के टार्टिपुर गांव में एक सभा के दौरान लोगों के अंदर डर साफ महसूस होता है. यहां का हर घर किसी न किसी प्रवासी मज़दूर पर निर्भर है, लेकिन अब मुंबई का नाम लेते ही आवाज़ें धीमी हो जाती हैं.

41 वर्षीय अनवर अली कहते हैं, ‘मैं उस दिन (10 जून) बाहर था इसलिए बच गया. लेकिन अब बांग्ला बोलने, लुंगी पहनने या मछली-चावल पकाने पर भी लोग शक करते हैं. पहले ऐसा नहीं था. अब लगता है जैसे बंगाली होना ही जुर्म हो गया है. ठेकेदार ने फोन पर कहा, ‘हिंदी सीखो, लुंगी छोड़ो.’ लेकिन मैं अपनी मातृभाषा कैसे छोड़ दूं?’ 

अली, निजामुद्दीन मंडल के दूर के रिश्तेदार हैं.

महाराष्ट्र की घटना अकेली नहीं है. ओडिशा में भी बंगाली मज़दूरों को पीटा गया और उन्हें ‘अवैध बांग्लादेशी’ कहा गया.

राजस्थान के जयपुर में नदिया जिले के निवासी सफीकुल इस्लाम को वोटर आईडी नहीं दिखाने पर गिरफ़्तार किया गया था. उनका परिवार दावा करता है कि वे अब तक डिटेंशन सेंटर में हैं.

कितने लोग लापता हैं, कोई हिसाब नहीं

बगदा के फाजेर और तस्लीमा मंडल, को 10 जून को मुंबई से गिरफ़्तार किया गया था. उन्होंने फोन पर परिवार को सूचना दी थी, जिसके बाद स्थानीय प्रशासन हरकत में आया. बताया गया है कि उन्हें भी सीमा पार धकेल दिया गया था, लेकिन भारत-बांग्लादेश के अधिकारियों की बैठक के बाद 16 जून को उन्हें भाटुली गांव (बांग्लादेश) से बरामद कर लाया गया.

यह वही दंपत्ति हैं जिनका जिक्र मंडल ने इस रिपोर्ट की शुरुआत में किया था.

बगदा के दंपती फाजेर और तस्लीमा मंडल. (फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

लेकिन बाकी लोग इतने भाग्यशाली नहीं रहे. प्रवासी मजदूर एकता मंच के आसिफ फारूक कहते हैं कि कितने मजदूर अब भी गायब हैं, इसका कोई स्पष्ट आंकड़ा नहीं है. इस संबंध में आरटीआई दाखिल की गई है, लेकिन अभी तक जवाब नहीं मिला है. 

फारूक कहते हैं, ‘शुरुआत में सिर्फ चार केस सामने आए थे, लेकिन अब सौ से ज्यादा मजदूरों की कहानियां सामने आ रही हैं. किसी का फोन चालू नहीं है.’ 

इस बीच, दिल्ली से 26 जून से एक और परिवार- दानिश शेख (27), सोनाली बीबी (25) और उनका बेटा साबिर (5)  लापता है. पास में रहने वाले लोगों का कहना है कि उन्हें भी बांग्लादेशी बताकर सीमा पार भेज दिया गया है.

बिरभूम जिले के मुरारई गांव की पंचायत प्रमुख नीतू रवीदास ने द वायर को बताया, ‘हम उन्हें जानते हैं. वे यहीं के हैं. हमने उनकी नागरिकता से जुड़े सारे दस्तावेज और सबूत दिल्ली पुलिस को भेज दिए हैं, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला है. 

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)