लोकसभा ने मणिपुर के नेताओं से परामर्श किए बिना राज्य में राष्ट्रपति शासन की अवधि बढ़ाई

लोकसभा ने बुधवार (30 जुलाई) को मणिपुर में राष्ट्रपति शासन को 13 अगस्त से आगे और छह महीने के लिए बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी. हालांकि, केंद्र सरकार के इस फैसले का स्थानीय नेताओं, जिनमें मणिपुर विधानसभा के सदस्य और कुकी समुदाय के प्रतिनिधि शामिल हैं, ने आलोचना की है.

मणिपुर के इंफाल की सड़कों पर सुरक्षाकर्मी निगरानी रखते हुए. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: लोकसभा ने बुधवार (30 जुलाई) को मणिपुर में राष्ट्रपति शासन को 13 अगस्त से आगे और छह महीने के लिए बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी.

रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार ने इस फैसले को यह दावा करते हुए उचित ठहराया कि हिंसा प्रभावित पूर्वोत्तर राज्य में सुरक्षा स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है और हालात धीरे-धीरे स्थिर हो रहे हैं.

हालांकि, सरकार के इस फैसले का स्थानीय नेताओं, जिनमें मणिपुर विधानसभा के सदस्य और कुकी समुदाय के प्रतिनिधि शामिल हैं, ने आलोचना की है.

उनका कहना है कि केंद्र ने राष्ट्रपति शासन की वर्तमान अवधि के दौरान या उससे पहले उनसे कोई परामर्श नहीं किया.

इस संबंध में द वायर से बात करते हुए भाजपा विधायक पाओलिएनलाल हाओकिप ने कहा कि 13 फरवरी को राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद से उनकी अपनी पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने उनसे संपर्क नहीं किया है.

इस दौरान उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि केवल एक नए मुख्यमंत्री की नियुक्ति से चल रहे संकट का समाधान नहीं होगा, लेकिन हाओकिप ने राजनीतिक पहुंच की कमी को लेकर भी सवाल उठाया.

हाओकिप ने कहा, ‘मैं कहूंगा कि केंद्र ने आखिरकार सही फैसला लिया है, हालांकि थोड़ी देर हो गई है. लेकिन इस समय किसी और सरकार का गठन तब तक निरर्थक लगता है जब तक कोई राजनीतिक समझौता नहीं हो जाता. मुख्यमंत्री बदलने से हमारी समस्याएं नहीं बदल जाएंगी. केंद्र की मध्यस्थता के बिना अगर मुझे मुख्यमंत्री पद की पेशकश भी की जाए, तो मैं उसे स्वीकार नहीं करूंगा, क्योंकि यह काम नहीं करेगा. इस समय किसी सरकार का समर्थन करने की तो बात ही छोड़ दीजिए.’

विधानसभा की 44 सीटें वर्तमान में भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन के पास हैं

मालूम हो कि मणिपुर विधानसभा की 60 सीटों में से 44 सीटें वर्तमान में भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन के पास हैं, जिनमें अकेले भाजपा के 37 विधायक हैं.

हालांकि, अब ऐसा प्रतीत होता है कि पार्टी अपने ही विधायकों का समर्थन लगातार खो रही है, जिसका मुख्य कारण पूर्व मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह के नेतृत्व में हिंसा को नियंत्रित करने में राज्य सरकार की विफलता रही है.

इस दौरान भाजपा के सात विधायकों सहित सभी 10 कुकी विधायकों ने अपनी सरकार के प्रति बार-बार निराशा व्यक्त की है, लेकिन केंद्र सरकार उनकी चिंताओं को नज़रअंदाज़ करती रही है.

सत्तारूढ़ दल के एक सूत्र ने द वायर से इस बात की भी पुष्टि की कि भाजपा विधायकों का एक प्रतिनिधिमंडल राज्य में एक लोकप्रिय सरकार की मांग लेकर दिल्ली गया था, लेकिन उन्हें बिना किसी आश्वासन के वापस भेज दिया गया.

इस बीच मणिपुर कांग्रेस अध्यक्ष के. मेघचंद्र ने भी राष्ट्रपति शासन के विस्तार की निंदा करते हुए इसे ‘लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा हमला’ बताया.

द वायर से बात करते हुए उन्होंने भाजपा पर राष्ट्रपति शासन का इस्तेमाल जनता की लोकतांत्रिक इच्छा को दरकिनार करने और एक लोकप्रिय सरकार की वापसी में देरी करने का आरोप लगाया.

उन्होंने कहा, ‘मणिपुर को दिल्ली से नौकरशाही शासन की नहीं, बल्कि जवाबदेह नेतृत्व की ज़रूरत है.’

उन्होंने आगे कहा कि भाजपा नेतृत्व ने समुदायों के बीच शांति या संवाद स्थापित करने में कोई गंभीरता नहीं दिखाई है.

मेघचंद्र ने आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों (आईडीपी) के लिए सरकार द्वारा हाल ही में घोषित पुनर्वास योजना की भी आलोचना की और इसे एक ‘मज़ाक’ बताया, जिसमें कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं है.

उन्होंने कहा, ‘दो साल बाद वे लोगों को राहत शिविरों से उनके मूल घरों में नहीं, बल्कि पूर्वनिर्मित घरों में स्थानांतरित कर रहे हैं.’

बता दें कि द वायर ने घाटी और पहाड़ी दोनों क्षेत्रों में राहत शिविरों का दौरा किया है, जहां विस्थापित परिवार उचित भोजन, कपड़े, शिक्षा, स्वच्छता और प्रत्यक्ष सरकारी सहायता के अभाव में विकट परिस्थितियों में जीवन यापन कर रहे हैं.

इनमें से अधिकांश शिविरों का प्रबंधन वर्तमान में नागरिक समाज संगठनों द्वारा किया जा रहा है, न कि राज्य या केंद्र सरकार द्वारा.

दिल्ली ने शांति की घोषणा की, मणिपुर असहमत

संसद में अपने भाषण में राष्ट्रपति शासन की अवधि बढ़ाए जाने का बचाव करते हुए गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा, ‘शांति का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है कि राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद से पिछले चार महीनों में केवल एक मौत हुई है और कोई हताहत नहीं हुआ है?’

हालांकि, ज़मीनी रिपोर्टें इस दावे का खंडन करती हैं.

राज्य में जिस दिन राष्ट्रपति शासन लागू हुआ, उसी दिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कुकी और मैतेई दोनों समुदायों को अपने क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से आने-जाने की अनुमति देने के लिए ‘मुक्त आवागमन’ नीति की घोषणा की. हालांकि, पहले ही दिन हिंसा भड़क उठी, जिसके परिणामस्वरूप एक व्यक्ति की मौत हो गई.

उल्लेखनीय पहाड़ियों में रहने वाले कई कुकी इंफाल नहीं लौट पा रहे हैं, जहां उनके घरों पर सशस्त्र मैतेई समूह, अरम्बाई तेंगोल के सदस्यों ने जबरन कब्जा कर लिया है.

कांगपोकपी जिले के कुकी बहुल इलाकों में प्रशासन और राहत कार्यों की देखरेख करने वाली आदिवासी एकता समिति (सीओटीयू) ने केंद्र सरकार द्वारा संकट से निपटने के तरीके पर गहरी निराशा व्यक्त की है.

संगठन ने एक बार फिर इंफाल घाटी से पूरी तरह अलग होने का आह्वान किया है.

घाटी और पहाड़ियों में अलग-अलग प्रशासन को लेकर संघर्ष होते रहे हैं

इस संबंध में सीओटीयू नेता लामिनलुन सिंगसिट ने द वायर को बताया, ‘अनादि काल से घाटी और पहाड़ियों में अलग-अलग प्रशासन को लेकर संघर्ष होते रहे हैं, लेकिन स्थायित्व की कमी के कारण यह बिना किसी समाधान के समाप्त हो गया. यह अंतहीन और अनसुलझा मुद्दा 3 मई, 2023 को फिर से सामने आया, जिसके परिणामस्वरूप जान-माल का नुकसान हुआ.’

उन्होंने आगे कहा, ‘इस बार केंद्र सरकार द्वारा शांति भंग करने से जन आंदोलन तब तक नहीं रुकेगा जब तक कि बहुसंख्यक मेईतेई समुदाय (घाटी) से पूरी तरह अलग होकर एक अलग प्रशासन न बना दिया जाए.’

ज्ञात हो कि सीओटीयू वर्तमान में कांगपोकपी में विस्थापित कुकी आबादी के लिए स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा जैसी आवश्यक सेवाओं का प्रबंधन कर रहा है.

सिंगसिट ने बताया कि जब राज्य और केंद्रीय सुरक्षा बल इंफाल घाटी में कुकी परिवारों की सुरक्षा करने में विफल रहे, तो उन्हें कांगपोकपी में स्थानांतरित करना पड़ा.

सिंगसिट ने राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद केंद्र की ओर से संवाद की पूर्ण कमी की भी पुष्टि की.

उन्होंने कहा, ’28 मई, 2023 और 12 अक्टूबर, 2024, ये दो ही दिन थे जब गृह मंत्रालय (एमएचए) ने हमसे संपर्क किया. गृह मंत्रालय मूल समस्याओं का समाधान किए बिना केवल शांति की अपील करता है. राष्ट्रपति शासन के बाद गृह मंत्रालय ने बैठकों के लिए केवल एसओओ (संचालन निलंबन) समूहों से संपर्क किया है.’

गौरतलब है कि मणिपुर में कुकी और मैतेई समुदायों के बीच जारी हिंसा के कारण अब तक 270 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं. सरकारों द्वारा उन्हें उनके गांवों में बसाने के बार-बार किए गए वादों के बावजूद 60,000 से ज़्यादा लोग विस्थापित हैं.