नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ वन विभाग ने सरगुजा जिले के पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील हसदेव वन में प्रस्तावित ओपन कास्ट कोयला खदान के लिए 1,742.60 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन की सिफारिश की है, जिसके बाद विपक्षी कांग्रेस और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने विरोध में उतर आए हैं.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस सरकार के दौरान रोकी गई यह सिफ़ारिश अब केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की मंज़ूरी का इंतज़ार कर रही है. राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड के पक्ष में केंते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक के लिए यह सिफ़ारिश सरगुजा के वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग द्वारा 26 जून को किए गए जमीनी निरीक्षण के आधार पर की गई है.
यह सिफ़ारिश 7 जुलाई को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वेबसाइट पर अपलोड की गई.
हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, एक अधिकारी ने बताया कि सरगुजा संभागीय वन अधिकारी ने 26 जून को जमीनी निरीक्षण के बाद डायवर्जन की सिफ़ारिश की थी, और इस प्रस्तावित कदम के परिणामस्वरूप 6,00,000 से ज़्यादा पेड़ों की कटाई हो सकती है.
अखबार के अनुसार, एक वन अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर इस डायवर्जन का बचाव करते हुए कहा कि यह खदान आवंटन के बाद की प्रक्रिया का हिस्सा है.
विपक्षी कांग्रेस और पर्यावरण कार्यकर्ता विरोध में उतरे
छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने राज्य की भाजपा सरकार पर हसदेव में वन मंजूरी की सिफारिश करके आदिवासी समुदायों और वन संरक्षण वादों के साथ विश्वासघात करने का आरोप लगाया है.
सोमवार को सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर बघेल ने कहा, ‘एक पेड़ मां के नाम’ का नारा देने वाली भाजपा सरकार अब हसदेव के घने जंगलों में 6 लाख पेड़ों को काटने का रास्ता साफ़ कर रही है.’
उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी सरकार के दौरान रोकी गई वन मंज़ूरी को अब ‘कॉर्पोरेट हितों को लाभ पहुंचाने’ की अनुमति दे दी गई है.
बघेल ने कहा कि केते एक्सटेंशन कोयला ब्लॉक 1,760 हेक्टेयर में फैला है, जिसमें से 1,742 हेक्टेयर (99%) घना जंगल है और चोरनई नदी के जलग्रहण क्षेत्र का भी हिस्सा है, जो स्थानीय जल सुरक्षा और जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण है.
उन्होंने कहा, ‘पूरा ब्लॉक चरनोई नदी का जल ग्रहण क्षेत्र है जिसके सरंक्षण की सिफारिश जैव विविधता अध्ययन रिपोर्ट ने भी की है.’
बघेल ने कहा, ‘केते एक्सटेंशन की पर्यावरणीय और वन स्वीकृति को हमने अपनी सरकार में रोके रखा था लेकिन भाजपा सरकार ने इसे अनुमति दे दी है. इस ब्लॉक में केंद्र सरकार ने जो भूमि अधिग्रहण किया था हमारी सरकार ने उसका भी विरोध किया था परंतु मोदी सरकार ने अडानी के लाभ के लिए अधिग्रहण जारी रखा.’
उन्होंने कहा, ‘आंकड़े बताते है कि राजस्थान को सालाना जितने कोयले की ज़रूरत है वह पीईकेबी की चालू खदान से अभी कम से कम 15 बरस तक पूरी हो सकती है. इसका अर्थ यह है कि राजस्थान की ज़रूरत से अधिक कोयला निकालने के लिए अडानी की कंपनी परसा और केते एक्सटेंशन में वनों की व्यर्थ कटाई कर रही है.’
बघेल ने आरोप लगाया, ‘आज अडानी के फ़ायदे के लिए छत्तीसगढ़ के शानदार जंगलों की कटाई और हसदेव बागों बांध के जलग्रहण क्षेत्र को विष्णुदेव सरकार बलि चढ़ा रही है.’
वहीं, छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन और हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति ने एक संयुक्त बयान जारी कर वन विभाग द्वारा खनन के लिए वन भूमि के उपयोग की सिफ़ारिश की निंदा की है और इसे पारिस्थितिक, कानूनी और लोकतांत्रिक मानदंडों का ‘घोर उल्लंघन’ बताया.
कार्यकर्ताओं ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह क्षेत्र प्रस्तावित लेमरू हाथी अभ्यारण्य से केवल 3 किमी दूर है, जिससे बढ़ते मानव-हाथी संघर्ष को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हो रही हैं, जो इस क्षेत्र में पहले से ही एक प्रमुख मुद्दा रहा है. भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा किए गए एक जैव विविधता अध्ययन में पहले ही चेतावनी दी जा चुकी थी कि हसदेव में खनन संघर्ष को और बढ़ा देगा, जिससे राज्य के लिए इसे संभालना असंभव हो जाएगा.
छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला ने कहा, ‘यह सिफ़ारिश न केवल हसदेव में खनन पर प्रतिबंध लगाने के भारतीय वन्यजीव संस्थान के सुझाव के विरुद्ध है, बल्कि छत्तीसगढ़ विधानसभा द्वारा इस क्षेत्र के सभी कोयला ब्लॉकों को रद्द करने के सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव की भी अवहेलना करती है.’
हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, परियोजना की पर्यावरणीय मंज़ूरी के लिए जन सुनवाई के दौरान स्थानीय लोगों ने 1,623 लिखित आपत्तियां प्रस्तुत की थीं. कार्यकर्ताओं का आरोप है कि ईएसी ने जन चिंताओं पर उचित विचार किए बिना मंज़ूरी की सिफ़ारिश करते हुए उनकी अनदेखी की.
मालूम हो कि हसदेव अरण्य 1,500 किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ घना जंगल है, जो छत्तीसगढ़ के आदिवासी समुदायों का निवास स्थान है. इस घने जंगल के नीचे अनुमानित रूप से पांच अरब टन कोयला दबा है. इलाके में खनन बहुत बड़ा व्यवसाय बन गया है, जिसका स्थानीय लोग विरोध कर रहे हैं.
हसदेव अरण्य जंगल को 2010 में कोयला मंत्रालय एवं पर्यावरण एवं जल मंत्रालय के संयुक्त शोध के आधार पर पूरी तरह से ‘नो गो एरिया’ घोषित किया था. हालांकि, इस फैसले को कुछ महीनों में ही रद्द कर दिया गया था और खनन के पहले चरण को मंजूरी दे दी गई थी. बाद में 2013 में खनन शुरू हो गया था.
मालूम हो कि छत्तीसगढ़ में भाजपा के सत्ता में आते ही पिछले साल दिसबंर में हसदेव अरण्य क्षेत्र में परसा पूर्व और केते बासन (पीईकेबी) दूसरे चरण विस्तार कोयला खदान के लिए पेड़ काटने की कवायद पुलिस सुरक्षा घेरे के बीच बड़े पैमाने पर हुई थी.
स्थानीय प्रशासन ने दावा किया था कि उसके पास पीईकेबी-II में पेड़ काटने के लिए सभी आवश्यक अनुमतियां हैं, जो पीईकेबी-I खदान का विस्तार है.
इससे पहले वन विभाग ने मई 2022 में पीईकेबी चरण-2 कोयला खदान की शुरुआत करने के लिए पेड़ काटने की कवायद शुरू की थी, जिसका स्थानीय ग्रामीणों ने कड़ा विरोध किया था. बाद में इस कार्रवाई को रोक दिया गया था.
पिछले साल जुलाई में केंद्र सरकार ने संसद में बताया था कि छत्तीसगढ़ के हसदेव वन क्षेत्र में परसा ईस्ट केते बासन (पीईकेबी) खदान में 94,460 पेड़ काटे गए हैं और 2,73,757 पेड़ काटे जाने हैं.
